Tuesday, December 23, 2008

युद्ध के मुहाने पर भारत-पाक

चाहे-अनचाहे हालात 2001 जैसे पैदा हो गए हैं। तब संसद पर हमले के बाद पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव बनाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को सेनाएं सरहद पर तैनात करने का निर्णय लेना पड़ा था। मुंबई पर अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद सीमा पर सेना भेजने के अलावा मनमोहन सिंह सरकार वे सभी कदम उठा चुकी है, जो युद्ध से पहले जरूरी समङो जाते हैं। तीनों सेना हाई अलर्ट पर हैं। समुद्री किनारों की चौकसी बढ़ा दी गई है। नौसेना ने कई उपाय किए हैं, जिनमें जंगी बेड़ों की तैनाती से लेकर हवाई निगरानी तक शामिल है। वायु सेना ने देश के अन्य हिस्सों के साथ-साथ राजधानी दिल्ली को हवाई हमलों से महफूज करने के लिए आस-पास के वायुसेना हवाई अड्डों पर मिग और दूसरे जंगी हवाई जहाजों को हाई अलर्ट पर रहने के निर्देश जारी किए हैं। थल सेना ने किसी भी स्थिति के लिए कमर कस ली है।
विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी साफ कर चुके हैं कि यदि पाकिस्तान आतंकी शिविरों को ध्वस्त कर दोषियों को नहीं सौंपता है तो भारत के सैन्य कार्रवाई समेत तमाम विकल्प खुले हैं। संसद पर हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से अपने सभी तरह के संबंध विच्छेद कर लिये थे। जो सख्त कदम उस समय उठाए गए थे, उनमें ट्रेन, बस और हवाई सेवा बंद करने के साथ-साथ उच्चायोगों में राजनयिकों की बड़े पैमाने पर कटौती भी शामिल थी। करीब दो साल तक भारत ने किसी भी पाकिस्तानी विमान को अपनी वायुसीमा में उड़ान भरने की इजाजत नहीं दी। तब मजबूर होकर पाकिस्तान को लश्कर पर पाबंदी लगानी पड़ी थी लेकिन यह कदम भी धोखा ही साबित हुआ, क्योंकि लश्कर और जैश ने नाम बदलकर आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैंप जारी रखे। नतीजतन संसद पर हमले के बाद भी आतंकी हमले नहीं रुके।
यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान अलकायदा, तालिबान, जैश, लश्कर जैसे संगठनों का अड्डा बन चुका है। वहां आतंकवाद की नर्सरी ही नहीं तैयार हो रही, खून की होली खेलने वाला पूरा साजो-सामान भी तैयार किया जा रहा है। षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने इस्लामाबाद दौरे के समय खरी-खरी सुनाते हुए यहां तक दावा किया कि दुनिया भर में हो रहे आतंकवादी हमलों में से पचहत्तर प्रतिशत के तार किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जुड़े हैं। भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से इसीलिए आईएसआई चीफ को भारत भेजने को कहा था ताकि उन्हें आईना दिखाया जा सके। पकड़े गए आतंकवादी कसाब ने जो खुलासे किए हैं, उनसे साफ होता है कि भारत में तबाही की लगभग हर वारदात के पीछे आईएसआई का हाथ है।
भारत मुंबई हमले के बाद खामोश होकर बैठना नहीं चाहता। वह निर्णायक कार्रवाई चाहता है। इसके लिए वह हर संभव उपाय करने में जुटा है। भारतीय नेतृत्व ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी को मुंबई आने और पकड़े गए आतंकवादी से पूछताछ करने की छूट देकर कूटनीतिक समझदारी का परिचय दिया है। इस हमले में जो बाईस विदेशी मारे गए, उनमें से छह अमेरिकी थे। यह आश्चर्य की बात है कि पूरा विश्व मान रहा है कि मुंबई के हमलावर पाकिस्तानी थे। वहां का मीडिया सबूतों और तथ्यों के साथ साबित कर चुका है कि हमलावर किन-किन जगहों से थे, इसके बावजूद यदि राष्ट्रपति जरदारी, प्रधानमंत्री गिलानी और विदेशमंत्री कुरैशी भारत से पुख्ता सबूतों की मांग कर रहे हैं तो साफ है कि वे पाकिस्तान की जमीन से आतंकवाद को उखाड़ फैंकने के कतई मूड़ में नहीं हैं। आश्चर्य की बात तो यही है कि जिसने बेनजीर भुट्टो तक की जान ले ली, आसिफ अली जरदारी सत्ता में आने के बाद अब उन्हीं आतंकवादी संगठनों पर परदा डालने की कौशिश करते नज़र आ रहे हैं। पाकिस्तान के अंदरूनी हालातों से भारत परिचित है लेकिन इस बार वह पाकिस्तानी हकूमत को सस्ते में छोडने के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि जहां तीनों सेनाओं को हाई अलर्ट पर रखा गया है, वहीं संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद में भी तथ्य रखे जा रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश इस लड़ाई में खुलकर भारत के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं लेकिन अमेरिका का बुश प्रशासन चाहता है कि भारत सैन्य कार्रवाई जैसा कडा कदम न उठाए. हालांकि बीस जनवरी से अमेरिकी सत्ता संभालने वाले बराक ओबामा ने कहा है कि अपनी प्रभुसत्ता अक्षुण्ण रखने के लिए भारत को यह अधिकार है। भारत युद्ध अथवा सैन्य कार्रवाई नहीं चाहता, लेकिन किसी मुल्क को अपने नागरिकों के खून से होली खेलने की इजाजत भी नहीं दे सकता. मुंबई हमले के बाद से भारत के नागरिकों में गहरा रोष देखने को मिल रहा है. सरकार पर गहरा दबाव है. लोगों की जान माल की सुरक्षा के लिए वह इस बार निर्णायक कार्रवाई के मूड में है. वैसे भी लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है. यू पी ऐ सरकार उस से पहले पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके अपने पक्ष में वातावरण बनाना चाहती है.जिस तरह का दबाव सरकार पर है, उसे देखते हुए भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान निर्णायक कार्रवाई का मन बना चुका है। एक सौ बीस देशों में तैनात अपने राजदूतों और उच्चायुक्तों को दिल्ली बुलाकर मौजूदा हालातों के बारे में फीड किया गया है ताकि वे उन देशों के राष्ट्र प्रमुखों को उससे अवगत कराकर उन्हें भारत के पक्ष में कर सकें। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रक्षा मंत्रालय के वार रूम में बैठक कर साफ संकेत दे दिए हैं कि यदि पाक ने सहयोग नहीं किया तो भारत के सैन्य कार्रवाई समेत समस्त विकल्प खुले हुए हैं। इस बैठक में तीनों सेनाध्यक्षों के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, रक्षा, विदेश और गृह मंत्री भी मौजूद थे। साफ है, पाकिस्तान का यही रुख रहा तो उस पर कड़ी कार्रवाई तय है।

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Wednesday, December 17, 2008

डर्टी, डेनजर्स और डिफिकल्ट जॉब

मुंबई हमले के बाद से एक बार फ़िर देश में बढ़ते आतंकवाद पर बहस छिडी है. मैंने सेना में उच्च पदों पर रहे लेफ्टिनेंट जनरल ओ पी कौशिक से इसके विभिन्न पहलुओं पर लम्बी बातचीत की. इसे हाल ही में हरिभूमि में प्रकाशित किया गया. सेना पर किस तरह के दबाव हैं. सेना के जवानों को किस तरह मानवाधिकारों के झूठे केसों का सामना करना पड़ रहा है, इस पर वे खुलकर बोले. उनसे इस मुद्दे पर हुई बातचीत की अन्तिम कड़ी यहाँ दी जा रही है. -ओमकार चौधरी.

लेफ्टिनेंट जनरल ओ पी कौशिक (रिटायर्ड)
मानवाधिकारवादी आतंक से निपटने में एक बड़ी बाधा हैं। मिस्टर जएनके चीफ जस्टिस थे ब्रिटेन के। उनसे यह सवाल पूछा गया था कि आप ऐसी स्थिति में नेशनल सिक्युरिटी और ह्ययुमन राइटस में से किसे प्राथमिकता देंगे? उनका कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सब मानवाधिकारों की अनदेखी की जा सकती है। इराक में अमेरिकी सैनिक लड़ रहे हैं। उनसे पूछा गया

कि आप किस कानून के तहत मानवाधिकारों का हनन कर रहे हैं? उन्होंने जवाब दिया कि हम युद्ध लड़ रहे हैं। चूंकि यह एक युद्ध क्षेत्र है, इसलिए यहां किसी प्रकार का कोई कानून मान्य नहीं है। इसके ठीक उलट अगर हम कशमीर में लड़ते हैं, तब मानवाधिकार वाले हल्ला करते हुए आ जाते हैं। बड़ा जबरदस्त किस्म का दवाब बनाते हैं।
मैं कश्मीर वैली में जीओसी था। कुपवाड़ा में एक गांव है कुनालपोसपोरा। हमें सूचना मिली कि वहां आंतकवादी आ गए हैं। हमने वहां पर एक कालम भेजा, एक सूबेदार और 29 जवान। कुल तीस सैनिक। सेना ने चारों उग्रवादी पकड़ लिये। एकदम से हमारे कालम के खिलाफ शिकायत हुई कि इन्होंने तो 70 औरतों का बलात्कार कर दिया है। यानि तीस आदमियों ने एक रात में 70 औरतों का बलात्कार कर दिया। बड़ा भारी केस हो गया। केन्द्र सरकार में भी प्रतिक्रिया हुई। एक प्रेस कमेटी बनायी गयी, जिसका अध्यक्ष पी.जी. वर्गीज को बनाया गया। मैं भी उनके साथ गया। हम गांव में गए। वहां एक बुढ़िया औरत मिली। होगी 70 साल की। मैंने उससे पूछा कि अम्मा क्या हो गया? वो कहती है कि रेप हो गया। मैंने पूछा कि रेप क्या होता है? वो बोली कि हमे नहीं मालूम रेप क्या होता है, लेकिन रेप हो गया। मैंने कहा कि मिस्टर वर्गीज सुन रहे हो?
हमने सारा गांव इकट्ठा किया। उस गांव में जवान औरतों की संख्या पच्चीस भी नहीं थी। उन औरतों से जब पूछा कि तुम्हारे साथ कुछ बदमाशी हुई? उन्होंने कहा कि नहीं हुई। कुछ नहीं हुआ लेकिन रिपोर्ट गई कि तीस लोगों ने 70 महिलाओं का बलात्कार कर दिया। अब बताइए, इसका कितना गलत प्रभाव पड़ेगा? मेरी ही रेजीमैंट (राजपुताना राइफल) के एक सूबेदार ने एनकाउंटर में एक आतंकवादी को मार गिराया। उस पर आरोप लगा कि उसने तो गलत आदमी को मार दिया। मानवाधिकार आयोग वालों ने स्टैंड ले लिया। उन्होंने सूबेदार पर कोर्ट केस करा दिया। सूबेदार को बरी होने में पांच साल लगे। कौन रिस्क लेगा ऐसे में? सेना को कोई सपोर्ट करने को तैयार नहीं है।
मैं आपको नागालैंड की बात बताता हूँ। वहां मैं चीफ आफ आर्मी स्टाफ था ईस्टन आर्मी का। हमारी राष्ट्रीय राइफल निकल रही थी। उनके ऊपर आंतकवादियों का फायर आया। सेना ने जवाब में फायर किया। छह-सात उग्रवादी मारे गए। आरोप लगा कि इन्होंने तो सामान्य नागरिकों को मार दिया। प्रेस में आ गया कि आर्मी ने सिविल एरिया में फायरिंग कर दी है। संसद में भी सवाल आ गया। उन दिनों मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष होते थे रंगनाथ मिश्र । इंकवायरी के लिए वे आ गए। मैं भी कोलकाता से कोहिमा पहुंच गया। अगले दिन हम राजभवन से घटनास्थल के लिए रवाना हुए। रास्ते में हमारे ऊपर फायर आ गया। हमारे साथ चल रहे ब्रिगेडियर ने बताया कि उग्रवादियों ने फायर किया है। आप उतरकर हिल के पास प्रोटेक्शन ले लीजिए। हमें इन्हें क्लीयर करने में बीस-पच्चीस मिनट लगेंगे। फिर चलेंगे। पच्चीस मिनट बाद ब्रिगेडियर आए कि साहब क्लीयर हो गया है, अब चल सकते हैं। रंगनाथ मिश्र बोले कि नहीं, वापस चलते हैं। हमने कहा कि डरने की कोई बात नहीं है, सब कुछ ठीक है। मैंने उनसे कहा कि आप दिल्ली से आए हैं। मैं कोलकाता से आया हूं तो आपको चलना चाहिए। फिर मैंने उन्हें बताया कि इससे एक सप्ताह पहले हमले में हमारे 26 जवान मारे गए थे, उसका इन्वेस्टीगेशन करने आप नहीं आए। मिस्टर मिश्र ने कहा कि मिस्टर कौशिक क्या मेरे कार्यकाल में आर्मी के खिलाफ एक भी मामला दर्ज हुआ? मैंने कहा कि मेरा वो मतलब नहीं है, लेकिन आप क्यों आए यहां पर? मैने उनसे कहा कि मैं इसे थ्री डी एनवायरमेंट बोलता हूं। डर्टी, डेनजर्स और डिफिकल्ट। इट इज ए डर्टी जाब। इट इज ए डेनजर्स जाब एंड वरी डिफिकल्ट जाब। मैं क्यों फंसू इस काम में। हम राजभवन पहुंच गए। मेरी और उनकी इस पर बहस हुई। ( समाप्त )

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Tuesday, December 16, 2008

दिखानी होगी कठोर इच्छाशक्ति

मुंबई पर हमले के बाद से एक बार फ़िर इस पर चर्चा तेज हो गई है कि सरकार आतंकवाद रोकने में नाकाम क्यों साबित हो रही है. भारतीय सेना में महत्वपूर्ण पदों पर रहे लेफ्टिनेंट जनरल ओ पी कौशिक से हाल में मैंने आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की. उनकी मानें तो न देश के राजनेता इस पर गंभीर हैं, न न्याय व्यवस्था, न नौकर शाही और न ही पुलिस. उन्होंने जो कुछ कहा, उसे यहाँ लेखों के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ. - ओमकार चौधरी

लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) ओ पी कौशिक
देश पर अब तक जितने भी आतंकवादी हमले हुए, वे बहुत नियोजित और दुखद रहे हैं। हर राज्य की राजधानी को वे निशाना बना रहे हैं। संसद पर हमला हो चुका है। मुंबई पर कई हमले हो चुके हैं। हर हमले में पचास से ज्यादा मृत्यु हो जाती हैं। लगता है, आतंकवादियों के दिल में में कोई डर नहीं है। उनको ये भरोसा हो गया है कि भारत में कोई भी घटना कर दो, सजा नहीं मिलेगी। सजा मिलेगी भी तो पंद्रह-बीस साल बाद। राजनीतिक दबाव आ जाएगा, हम छूट जाएंगे। आतंकी के दिल

में अगर ये डर बैठ जाए कि वह मारा जाएगा तो वारदात नहीं करेगा। आतंकियों में भी फर्क है। उत्तर पूर्व का आतंकी मरने में गर्व समझता है। वह नजदीक आकर वार करता है। कश्मीर और पाकिस्तान के आतंकी मरने से डरते हैं। दूर से आक्रमण करने की कोशिश करते हैं। दुर्भाग्य से हमारे देश की नीतियां ऐसी हैं कि आतंकियों के मन में कोई डर नहीं रह गया है। जब तक उग्रवादी के मन में यह डर नहीं बैठेगा कि वह मारा जा सकता है, तब तक घटनाएं होती रहेंगी।
जितने भी बड़े लोकतांत्रिक देश हैं, सबने कड़े कानून बना लिये हैं। कोई भी आतंकी उन देशों में वारदात करेगा तो उसे सख्त सजा मिलेगी। अमेरिका में आतंकी के लिए मृत्युदंड का प्रावधान है। कनाडा, जर्मनी, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया में भी मृत्युदंड की व्यवस्था है। इन्हीं की देखादेखी भारत में पोटा कानून बनाया गया था। उसमें अमेरिकन कानून का करीब अस्सी प्रतिशत ज्यों का त्यों लिया गया था। जब पोटा बना, तब मुङो भी गृह मंत्रालय बुलाया गया था। मैंने भी सलाह दी। उस कानून में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था लेकिन किसी कारण से वर्तमान सरकार ने उसे रद्द कर दिया। परेशानी यह है कि उसके बदले कोई नया कानून बनाया ही नहीं गया।
इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि हमारे देश में आतंकवादी वारदातें क्यों हो रही हैं और रुक क्यों नहीं रही हैं? पहली बात, सरकार के स्तर पर ढील है। कोई भी नीति तय नहीं है कि सरकार सुरक्षा बल से क्या चाहती है? स्पष्ट निर्देश नहीं देंगे तो कैसे काम चलेगा। या तो सरकार निर्देश दे कि आप आतंकवाद को जड़ से उखाड़ो। सेना अपने ढंग से काम करेगी। या आप कहिए कि इस तरह की कार्रवाई करो कि नए उग्रवादी पैदा नहीं होने पाएं। उसके लिए अलग तरह से कार्रवाई की जाएगी। सरकार यदि कहे कि सरहद पार करके कोई उग्रवादी इस तरफ नहीं आने पाए, तो सेना का काम करने का ढंग अलग तरह से होगा। सरकार कोई नीति बनाने को तैयार ही नहीं। कोई निर्देश देने को तैयार नहीं है।

क्या करे सरकार ?
सरकार की ओर से पहल की जानी चाहिए। सारी राजनीतिक पार्टियां मिलकर एक नीति निर्धारित करें और उस समय सत्ता में जो भी सरकार हो, उस नीति का पालन करे। बताएं कि ये हमारी काउंटर टेरेरिस्ट पॉलिसी है। जैसे अमेरिका और इग्लैंड में हो रहा है। इंग्लैंड में चाहे लेबर पार्टी सत्ता में हो या कंजरेटिव पार्टी, उन्होंने इससे संबंधित नीति में कोई परिवर्तन नहीं किया। अमेरिका में भी ड्मोक्रेट्स हों अथवा रिपब्लिकन वे आतंक के खिलाफ तय नीति में बदलाव नहीं करते। दूसरी बात, अगर देश में पोटा लागू नहीं किया जाता तो उसी के बराबर का एक सख्त कानून बनना चाहिए, जिसमें उग्रवाद के खिलाफ मृत्युदंड का प्रावधान जसी सजाएं रखी जाएं। ऐसा होने पर उनमें डर फैलेगा। तीसरी बात, आतंकवाद में मदद करने वाले स्थानीय लोगों की पहचान करके उन्हें सख्त सजा दी जानी चाहिए। यह तय मानिए कि स्थानीय मदद होती ही है। ऐसा नहीं हो सकता कि कोई कराची से चले। सीधे होटल पहुंचे। आक्रमण कर दे। स्टेशन पर जाए। लोगों पर हमला कर दे। बिना स्थानीय मदद के यह संभव ही नहीं है।

मीडिया अपनी जिम्मेदारी समङो
मीडिया को बहुत सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। आंतकवादी चाहता है कि उसका नाम फैले। उसका प्रचार हो। मीडिया इस खतरे को समझ नहीं रहा है। कमी सरकारी एजेंसियों की भी है। मीडिया से सही बात शेयर ही नहीं की जाती। आतंकवादी जो कहानी देते हैं, मीडिया में चल जाती है। इसलिए आतंकवाद को रोकने में मीडिया की भूमिका भी तय करनी होगी, जिसे हम मीडिया पोलिसी के रूप में भी मान सकते हैं। इसी के अभाव में मीडिया में खबरों को गलत ढंग से दिखाया जाता है।
कई लोग ऐसे हैं जो कभी कहीं जाते ही नहीं और वहां की खबरों को बढ़ा-चढ़ा पेश करते रहते हैं। इसमें सरकार की ओर से मीडिया के साथ सूचना का ठीक प्रकार से आदान-प्रदान करना जरूरी होगा।
दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक सेमिनार हुआ जिसका विषय था टेरेरिज्म, ह्युमन राइटस एण्ड नेशनल सिक्योरिटी। यहां पर एक अंग्रेजी अखबार के चीफ एडिटर सेमिनार शुरू होने से पहले कुछ लोगों के साथ बैठे बढ़-चढ़कर बातें कर रहे थे कि वहां के लोग हमारे देशवासियों जसे नहीं हैं। कह रहे थे कि कशमीर पर हमारा कोई हक नहीं है। हमें उसे छोड़ देना चाहिए। वहां पर हमारे कोई कानून नहीं माने जाते। मैं दूर से ही उनकी बात सुन रहा था। मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उनसे पूछा कि आप पिछले 15 सालों में कभी कशमीर गए हैं? उन्होंने कहा कि नहीं, मैं कभी नहीं गया। उन्होंने मुझसे पूछा कि आप कौन है? ये बताने से पहले कि मैं कौन हूं, मैंने उनसे कहा कि आप एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं और आपको ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। आप पंद्रह साल से वहां गए ही नहीं और एक एक्सपर्ट की तरह बात कर रहे हैं। फिर मैंने उन्हें बताया कि मेरा नाम लेफिटनेंट जनरल कौशिक है। मैं कशमीर का जीओसी रह चुका हूं। मैंने 18 साल उग्रवादियों को झेला है। आईजी आपरेशन रह चुका हूं। ब्लैक कैट कमांडो का मैं फाउंडर आईजी आफिसर रहा हूं। मैं ईस्टन आर्मी के सातों राज्यों का चीफ रहा हूं। मैंने कहा कि जिम्मेदार पद पर रहते हुए आप बिल्कुल गलत तरीके से बात कर रहे हैं। मेरा मानना है कि मीडिया को भी इस मामले में अपना दायित्व निभाने की जरूरत है।
जब भी इस तरह के हमले होते हैं, उस समय टेलीविजन पर लाइव टेलीकास्ट नहीं होना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से सारी प्लानिंग की जानकारी उग्रवादियों को मिल जाती है। आंतकवादी को टेरराइज करने की जरूरत है। ये तभी संभव है, जब वह पूरी तरह अंधकार में हो कि मेरा क्या होगा? यहां तो उल्टा हो रहा है। उसे हर मिनट की जानकारी मिल रही है कि अब कमांडो उतर गया। अब उस फ्लोर पर पहुंच गया है। जाहिर है, ऐसे में वह सतर्क हो जाएगा और नुकसान उसे होने के बजाय सेना या सुरक्षाबल के जवानों को होगा।
यही समस्या ब्रिटिश आर्मी के साथ हुई थी, जब ब्रिटिश आर्मी ने अर्जेटीना पर अटैक किया था। अर्जेटीना ब्रिटेन से 22 सौ मील दूर था। फोकलैंड आइलैंड पर अर्जेटीना ने कब्जा कर लिया था। मैं उन दिनों हाईकमिश्नरी में असिस्टैंट मिलेट्री एडवाइजर था लंदन में। लाइव टेलीकास्ट आ रहा था कि अभी हमारे पैराटूपर यहां पहुंच गए हैं। यहां कमांडो उतर गए हैं। यहां गन उतर गई हैं। वे सब खबरें अर्जेटीना को मिल रही थी। उनके पास कोई भी इंटेलीजंस एजेंसी नहीं थी। सेटेलाइट उनके पास नहीं थे। उन्हें सारी सूचनाएं ब्रिटिश मीडिया से मिल रही थीं। एक दम सरकार ने मीडिया को ब्लैक आउट कर दिया। इससे अर्जेटीना को सूचनाएं मिलनी बंद हो गई। सेना को पता ही नहीं चल रहा था कि हो क्या रहा है। दस दिन के भीतर अर्जेटीना की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। मुम्बई में हुए हमलों में जो मीडिया प्रोजेक्चशन हुआ है, वो सुरक्षा के लिहाज से बिलकुल गलत है।
इसलिए देश के मौजूदा हालात को देखते हुए जरूरी है की मीडिया पॉलिसी बने.

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Saturday, December 13, 2008

क्या ऐसे ही रुकेगा आतंकवाद ?

मुंबई पर हमले के बाद से एक बार फ़िर इस पर चर्चा तेज हो गई है कि सरकार आतंकवाद रोकने में नाकाम क्यों साबित हो रही है. भारतीय सेना में महत्वपूर्ण पदों पर रहे लेफ्टिनेंट जनरल ओ पी कौशिक से हाल में मैंने आतंकवाद के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की. उनकी मानें तो न देश के राजनेता इस पर गंभीर हैं, न न्याय व्यवस्था, न नौकर शाही और न ही पुलिस. उन्होंने जो कुछ कहा, उसे यहाँ लेखों के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ. - ओमकार चौधरी


लेफ्टि. जन. ओ. पी. कौशिक (रि.)
वर्ष 1954 में चीन की मदद से मलाया-पेन्नसुला में आंतकवाद शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने जनरल टेंपलर को मलाया का सिविल और मिल्रिटी प्रमुख बनाकर भेजा और सीधे शब्दों में कहा कि यू विल फिनिश टेरेरिजम फ्राम मलाया-पेन्नसुला एट आल कास्ट। जनरल टेंपलर ने मलाया से आंतकवाद को बिल्कुल खत्म कर दिया और आज वो एक विकसित और प्रगतिशील देश है। हमारे यहां सेना को कोई डायरेक्शन ही नहीं है।

कश्मीर में उग्रवाद शुरू हुआ था, नौ दिसम्बर 1989 में, जब रूबैया सईद पकड़ी गई थी। मुफ्ती सईद की बेटी। मैं उन दिनों आईजी आपरेशन था ब्लैक कैट कमांडो का। जैसे ही रूबैया के अपहरण की सूचना मिली, वैसे ही हम हवाई जहाज से श्रीनगर पहुंच गए। दो घंटे के भीतर पता लगा लिया कि उन्होंने रूबैया को कहां रखा है। उस स्थान को घेरकर मैं तुरंत फ्लाइट से दिल्ली आया। यहां हमारी क्रोइसिस मैनेजमेंट कमेटी की मीटिंग थी। मैंने सबको ब्रीफ किया। उनमें टीएन सेशन भी थे जो कि उन दिनों कैबिनेट सेकेट्री होते थे। उन्होंने होम मिनिस्टर मुफ्ती मोहम्मद सईद को बुला लिया। उन्होंने पूछा कि जनरल कौशिक कौन है? मैंने कहा, मैं हूँ। उन्होंने कहा कि जनरल कौशिक आप एकदम बाहर जाइए और अपने कमांडोज को उस बंगले से हटने का निर्देश दे दें। मैंने उनसे कहा कि एक मिनट मेरी बात तो सुन लीजिए। कहने लगे कि नहीं.नहीं.आप तुरंत जाइए ओर रेडियो पर मैसेज दें कि कमांडो वहां से हट जाएं। मैंने उनसे कहा कि मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि रूबैया को कुछ नहीं होगा। मैं तो आपसे निर्देश चाहता हूं। पांच मिनट में हम रूबैया को उनसे छुड़वा लेंगे। कहने लगे कि नहीं.नहीं.मैं आपसे ज्यादा बात नहीं करूंगा। आप कमांडो को वहां से हटा लीजिए। हम बाहर गए। कमांडो को हटने के लिए कह दिया। आतंकवादियों ने रूबैया को छोड़ दिया। बदले में छह आतंकवादियों को छुड़वा लिया। वो छह लोग ही आज छह आंतकवादी संगठनों के मुखिया बन गए हैं।
19 साल हो गए उस घटना को। हजारों उग्रवादी सुरक्षाबलों ने पकड़ रखे हैं। जेलें भरी हुई हैं। एक भी उग्रवादी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं है। आखिर क्यों? मिल्रिटी वालों के खिलाफ झूठी शिकायतें हो रही हैं। 453 केस कोर्ट में रजिस्टर्ड हैं मानवाधिकार उल्लंघन के। ऐसे में क्या करेगी मिलेट्री? लगभग 1300 लोगों को सजा दी जा चुकी है। इससे क्या संदेश जाएगा। आज कशमीर में इतनी खराब हालत है कि यदि कोई आंतकवादी मिलिट्री वेन पर हमला करता है और उसके जवाब में कार्रवाही होती है। उसकी एके 47 रायफल बरामद करते हैं तो उस स्थिति में भी कोर्ट में केस होता है कि आर्मी ने किसी निर्दोष इंसान को मार दिया। आर्मी का अधिकारी कहता है कि मुङो गोली लगी है। मैंने एके 47 पकड़ी है। मैंने आंतकवादी को मारा है। वो कहते हैं कि गवाह पेश करो। अफसर कहता है कि मैं गवाह कहां से पेश करूं? अब जंगल में जो उग्रवादी को मार रहा है, वह गवाह कहां से आएगा ? इतना ही नहीं, आंतकवादी को बचाने के लिए गांव के ही दस लोग आगे आ जाते हैं। वो कहते हैं कि इसे तो हम जानते हैं। हमारे गांव का था। ये तो उग्रवादी नहीं था। कोर्ट केस का आर्मी पर इतना भारी दबाव है कि वह सोचता है कि उग्रवादी जा रहा है। इसे मारूं कि नहीं? कहीं कोर्ट केस न हो जाए। जाने ही दूं इसे। न तो कोर्ट एक्शन ले रही। न राजनेता एक्शन ले रहे। न नौकरशाह एक्शन ले रहे। सब मूकदर्शक बने हुए हैं।

बढ़ता राजनीतिक दबाव
आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि सेना और सुरक्षाबलों पर दबाव किस कदर बढ़ रहा है। एस.सी. जमीर नागालैंड के मुख्यमंत्री थे, जो अब महाराष्ट्र के गवर्नर हैं। हमने एक स्थान पर छापा मारा। हमारे चार सैनिक मारे गए। हमने उस कार्रवाई में भूमिगत तत्वों का एक बहुत महत्वपूर्ण आतंकवादी पकड़ लिया। उसे दीमापुर सेक्टर जेल में रख लिया। एस सी जमीर ने अपने पुलिस डीजी चमनलाल को कहा कि इसे छोड़ दो। चमनलाल बहुत अच्छा पुलिस अफसर था। वह इस समय मानवाधिकार आयोग के सदस्य हैं। उन्होंने मुङो फोन किया कि जनरल साहब मुङो आदेश मिले हैं कि इस आतंकवादी को छोड़ दो। मुङो आदेश मानने पडेंगे क्योंकि मैं इनका डीजी हूं। आप कुछ कर सकते हो तो कर लो। मैंने एकदम से एस सी जमीर को टेलीफोन किया कि इसे पकड़ने में हमारे चार आदमियों की जानें गई हैं। आपने छोड़ने के आदेश दे दिए हैं। कहने लगे कि जनरल साहब क्या फर्क पड़ता है। मेरे ऊपर एक और उग्रवादी का प्रेशर है। मैंने कहा कि इसे छोड़ दिया तो सेना के मनोबल पर बुरा असर पड़ेगा। बोले कि नहीं.नहीं छोड़ देते हैं। वे मेरी बात ही नहीं माने। मैंने उनसे कहा कि अच्छा 24 घंटे तक उसे मत छोड़िए। मेरा मकसद ये था कि दीमापुर सेक्टर जेल को हम घेर लेंगे। जैसे ही वह छोड़ा जाएगा, फिर पकड़ लेंगे और पुलिस को नहीं सौंपेंगे। या इस बीच केन्द्र सरकार से दबाव डलवा देंगे। उन्होंने मुझसे कहा कि ठीक है, 24 घंटे नहीं छोडूंगा। जैसे ही मैंने फोन रखा, उन्होंने उसी समय डीजी को फोन किया कि आप तुरंत उसे छोड़ दो। तो मैं ये जानना चाहता हूं कि क्या ये अकेले सेना की समस्या है? क्या राजनेताओं की समस्या नहीं है? उसे छोड़ दिया गया। सेना ने बहुत कड़ा स्टेप लिया। मैंने उनसे कह दिया कि मैं नागालैंड से पूरी तरह सेना वापस कर रहा हूं। मैंने सेना को बैरकों में वापस जाने को कह दिया। एस सी जमीर ने प्रधानमंत्री से बात की कि सेना ने आपरेशन बंद कर दिए हैं। आर्मी चीफ ने मुझसे पूछा कि ये क्या हुआ? मैंने उन्हें वस्तुस्थिति बताई। वे बोले कि ये तो तुमने मुङो बताया नहीं? मैंने उन्हें विस्तार से पूरी बात बता दी। वे खुद आश्चर्यचकित रह गए।

अदालतों से इंसाफ नहीं
एक और उदाहरण देना चाहूंगा। एक एम्बुश में हमारे 26 आदमी मर गए थे। हमारे काफी हथियार भी ले गए थे वो। ये वाकिया मणिपुर में हुआ था, इम्फाल में। सीतापुर से वापस आ रहे थे। हमें बताया गया कि मिलिटेंट जो हथियार ले गए हैं, उनमें से तेरह हथियार एक केबिनेट मिनिस्टर के घर में रखे हैं। हमने रात को छापा मारा और सभी हथियार बरामद कर लिये। गोवाहाटी हाईकोर्ट का एक बैंच है इम्फाल में। हाईकोर्ट में केस हो गया। सैन्य अधिकारियों से कहा गया कि तुमने कानून-व्यवस्था अपने हाथ में ले रखी है.मिनिस्टर के घर पर तुम छापा मारते हो? सैन्य अफसर ने कहा कि देखिए, ये डिस्टर्ब एरिया है और डिस्टर्ब एरिया में हमें अधिकार है कि जहां हमें शक है, वहां सर्च कर सकते हैं। अगर कहीं हथियार-गोला बारूद है, उसे नष्ट कर सकते हैं और शक होने पर बिना वारंट के किसी को गिरफ्तार कर सकते हैं। यह सब हमने आर्म फोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट के तहत किया है। इस एक्ट में यह विशेषाधिकार भी है कि अगर आर्मी ने कोई गलती कर दी है तो उसके खिलाफ तब तक कोई केस दर्ज नहीं हो सकता, जब तक केन्द्र सरकार इजाजत नहीं दे दे। यह सब बताने के बावजूद जज कहता है कि नहीं, हथियार वापस करो। हमारे अफसर ने कहा कि ये हमारी प्रोपर्टी है, कैसे वापस करें? जज ने धमकाया कि हथियार वापस करो, नहीं तो आपको जेल भेजूंगा। अफसर ने कहा कि ये आटोमैटिक हथियार हैं। इन्हें कोई सिविलियन नहीं रख सकता। जज ने कहा कि मैं कुछ सुनने को ही तैयार नहीं हूं। हमारे अफसर ने कहा कि ठीक है, मैं अपने आफिसर से परमीशन ले लेता हूं। आप कल तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दीजिए। मामला मेरे सामने आया। मैंने कह दिया कि हथियार वापस नहीं किए जाएंगे। अगले दिन मेजर ने कोर्ट में जज को साफ कह दिया कि मुङो हथियार नहीं सौंपने के निर्देश हुए हैं और यह भी कि जो भी राष्ट्र विरोधी हैं, उन्हें बख्शेंगे नहीं। जज ने कहा कि आप मुङो धमकी दे रहे हैं? मेजर ने कहा कि हम देश-द्रोहियों को नहीं छोडेंगे। जज साहब वहां से उठे और रातों-रात गोवाहाटी पहुंच गए कि आर्मी तो मुङो भी मारेगी।

हरेक जिम्मेदारी समङो
अहम सवाल यही है कि क्या न्याय प्रणाली सेना के साथ है? जम्मू-कश्मीर में कोर्ट आर्मी के लोगों के खिलाफ केस दर्ज करने के आदेश दिए जा रही है। क्या ये आर्मी को डराने की कोशिश नहीं है? कुपवाड़ा जिले की घटना है। मिस्टर जरगर वहां डीसी थे। हमारे हाथ एक दस्तावेज लगा, जिससे पता चला कि डीसी 120 आंतकवादियों को तन्ख्वाह दे रहा है। मैं जीओसी था। हमने जरगर को बुलाया। पूछा कि ये क्या बात है भई? उसने स्वीकार किया कि हां, देता हूं। हमें तो यहां रहना है। आखिर यह सब क्या हो रहा है? किसी जिले में उग्रवाद क्यों और कैसे फैलता है, इससे साफ है। तो साफ हो गया कि नौकरशाही भी सेना के साथ नहीं है। राजनेता केवल हल्ला-गुल्ला करते हैं। सेना के अधिकारी का ये ध्येय होता है कि जिस इलाके की जिम्मेदारी उसे सौंपी गई है, वह उससे आतंकवादियों को उखाड़ फैंके। इसी कारण आप सुनते हैं कि मेजर मर गया, कैप्टन मर गया, लेफ्टिनेंट कर्नल मर गया। वे अपनी कुर्बानी दे रहे हैं ताकि उस क्षेत्र में शांति बनी रहे। दूसरी तरफ जिला प्रशासन उग्रवादियों की मदद कर रहे हैं। वे क्यों नहीं ये शपथ लेते कि भले ही जान चली जाए लेकिन वे अपने जिले में उग्रवाद को नहीं पनपने देंगे। राजनेताओं को कोई मतलब नहीं। न्याय व्यवस्था को कोई मतलब नहीं। नौकरशाही को कोई मतलब नहीं। पुलिस का हाल भी देख रहे हैं। उग्रवाद की समस्या का हल कैसे निकल सकता है? हर इकाई की जिम्मेदारी है कि वह हर हाल में ईमानदारी से काम करे। हर एक की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर सब इकाई अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती हैं तो उग्रवाद नहीं रुक सकता। ( जारी है.. )

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Monday, December 8, 2008

विकास और विनम्रता की जीत


लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हुए सत्ता के इस सेमीफाइनल में कह सकते हैं कि विकास और विनम्रता की जीत हुई है। आतंकवाद और महंगाई जसे मसले उतने प्रभावशाली नहीं रहे, जिसकी उम्मीद विश्लेषक कर रहे थे। भाजपा ने आंतरिक सुरक्षा
और महंगाई को इस चुनाव में मुख्य मुद्दा बनाया था। चुनाव के ठीक बीच में मुंबई पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें एक सौ अस्सी से अधिक जानें चली गईं। टेलीविजन चैनलों पर साठ घंटे का मुंबई से सीधा प्रसारण हआ। केन्द्र और महाराष्ट्र की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों को सुरक्षा के सवाल पर कटघरे में खड़ा किया गया। हमले के

अगले दिन दिल्ली में वोट पड़े। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी इसके बाद ही मतदान हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों और भाजपा
के कुछ नेताओं को लगता था कि आतंकवाद इन राज्यों में बड़ा गुल खिला सकता है। मध्य प्रदेश में कह सकते हैं कि भाजपा को फायदा हुआ होगा लेकिन अगर यह सही है तो वही बात दिल्ली और राजस्थान पर लागू क्यों नहीं हुई? राजस्थान की राजधानी जयपुर और अजमेर शरीफ में भी आतंकवादी हमला हो चुका है। इसी तरह दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव से कुछ ही समय पहले सीरियल धमाके हुए थे। विश्लेषकों को लगा कि मुंबई पर हुआ हमला इन तीन राज्यों में कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है परन्तु एेसा नहीं हुआ। इन परिणामों को देखकर कह सकते हैं कि मतदाताओं ने न कांग्रेस को इतराने का


मौका दिया है और न भाजपा को गर्व से सीना फुलाने और खुशफहमी पालने का अवसर दिया है। सही बात तो यह है कि दोनों पार्टियों को जागरूक मतदाताओं ने वोट के साथ-साथ नसीहत भी दी है कि राष्ट्रीय मसलों पर वे मिल-जुलकर काम करें। इन परिणामों से यह साफ हो गया है कि अब भावनात्मक मुद्दे आसानी से नहीं भुनाए जा सकेंगे। एंटी इन्कंबैंसी फैक्चटर भी कहीं दिखाई नहीं दिया। रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान और शीला दीक्षित ने अपने अपने राज्यों में बहुत विनम्र रहकर विकास कार्य कराए। वे किसी तरह के विवादों में भी नहीं फंसे। उनकी सरकारों पर किसी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप भी नहीं लगा। इन तीनों की छवि बेदाग रही। नतीजन जनता ने उन्हें अगले पांच साल के लिए फिर जनादेश दिया है।
लोकसभा के आम चुनाव पांच महीने बाद अप्रैल में प्रस्तावित हैं। यूपीए के पास अधिक समय नहीं है। छह राज्यों जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में हुए चुनावों को इसी कारण सत्ता का सेमीफाइनल कहा जा रहा था। इनमें भी चार हिंदी भाषी राज्यों पर राजनीतिक विश्लेषकों और प्रमुख दलों की निगाहें टिकी थीं। दिल्ली में दस साल से कांग्रेस की सरकार है। पिछला चुनाव भी पार्टी ने शीला दीक्षित के नेतृत्व में लड़ा और जीता था। खुद कांग्रेस के आला नेताओं को भी इसका भरोसा नहीं था कि यहां उनकी लगातार तीसरी बार सरकार बन ही जाएगी। भाजपा ने विजय कुमार मल्होत्रा जसे वरिष्ठ नेता को उनके सामने मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया परन्तु विकास मल्होत्रा, महंगाई और आतंकवाद पर भारी पड़ा। यही बात छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के संबंध में कही जा सकती है। कांग्रेस उम्मीद पाले बैठे थी कि राजस्थान के साथ-साथ इन दोनों राज्यों में उसे पांच साल के भाजपा शासनकाल में लोगों की स्वाभाविक नाराजगी का लाभ मिलेगा। एेसा नहीं हुआ। इसकी वजह यह भी रही कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस किसी एक सर्वमान्य नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने में नाकाम रही और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को भले ही विधानसभा का चुनाव लड़वाकर संकेत दिए हों परन्तु डा. रमन सिंह की भले मानुष की छवि उन पर भारी पड़ी। शीला दीक्षित की तरह रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान ने भी अपना ध्यान पूरी तरह राज्य के विकास पर केन्द्रित किया। डम्फर प्रकरण के अलावा मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के खिलाफ और कोई एेसा मुद्दा कांग्रेस के हाथ नहीं लगा, जिसे लेकर वह मतदाताओं के बीच जा सके। यह सही है कि पहले उमा भारती और बाद में बाबू लाल गौर की कार्यशैली ने भाजपा को वहां मुश्किल में डाला परन्तु शिवराज सिंह चौहान के कमान संभाल लेने के बाद किसी तरह के विवाद नहीं उभर सके। उमा भारती ने मध्य प्रदेश में भाजपा को हरवाने के लिए पूरी ताकत लगाई परन्तु विफल रही। इससे यह भी साफ हो गया कि लोग नकारात्मक प्रचार को पसंद नहीं करते हैं। दिल्ली में यही गलती भाजपा ने की। विजय कुमार मल्होत्रा ने शीला सरकार पर घोटाले करने के आरोप लगाए परन्तु इसे साबित करने के लिए कोई सबूत पेश करने में नाकाम रहे। भाजपा यहां मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में भी विफल रही कि वह बेहतर सरकार दे सकती है।
कह सकते हैं कि यह परिणाम न कांग्रेस के पक्ष में हैं और न ही भाजपा के। भाजपा अगर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में अपनी सरकारें बचाने में कामयाब रही तो कांग्रेस ने शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली के सिंहासन पर तीसरी बार कब्जा करके एक बड़ी मनोवज्ञानिक जीत दर्ज करने में सफलता हासिल की है। कांग्रेस राजस्थान में भी सत्ता में लौट रही है लेकिन इसके लिए उसे बैसाखियों का सहारा लेना पड़ेगा। वह मिजोरम में दस साल बाद वापसी कर रही है। भाजपा के लिए सबसे अधिक पीड़ा की बात दिल्ली में सरकार नहीं बना पाना है। इसकी वजह उसकी रणनीतिक गलतियां भी रही हैं। सत्ता के इस सेमीफाइनल के मोटे तौर पर संकेत ग्रहण किए जाएं तो कह सकते हैं कि मतदाताओं ने विकास और विनम्रता में विश्वास व्यक्चत किया है। निसंदेह महंगाई और आतंकवाद देश के सम्मुख बड़े मुद्दे हैं और हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा एक अहम मुद्दा बनकर उभरे परन्तु जहां तक राज्य विधानसभा के चुनाव का सवाल है, उसमें साफ हो गया है कि मतदाताओं ने साफ-सुथरी छवि, ईमानदार, शांति और विनम्रता से विकास के काम करने वाले नेतृत्व को पसंद किया है। इसे अगर स्पष्ट संकेत मानें तो राजनेताओं को सतर्क हो जाना चाहिए। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की छवि एक विनम्र नेता की नहीं बन सकी। भले ही वे वहां की महिलाओं में लोकप्रिय रही हों परन्तु आम मतदाताओं में उनकी महारानी वाली छवि ने पार्टी को नुकसान ही पहुंचाया।

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Saturday, December 6, 2008

अब क्या करे भारत सरकार

सरकार के खिलाफ ऐसा जनाक्रोश कभी नहीं देखा गया। मुंबई पर हमले ने देशवासियों के सब्र के बांध को तोड़ दिया है। सरकार से नाराजगी की वजह सूचनाएं मिल जाने के बावजूद वारदात हो जाना है। लोगों को लगता है कि मंत्री और नेता अपनी सुरक्षा तो चाक-चौबंद कर लेते हैं परन्तु आम आदमी को दरिंदों के लिए निरीह प्राणी की तरह मरने के लिए छोड़ देते हैं। लोग पूछ रहे हैं कि इस आक्रोश की परिणति क्या होगी? क्चया इन विधानसभा चुनाव के परिणामों में भी लोगों का गुस्सा दिखाई देगा? या लोग लोकसभा चुनाव में हिसाब-किताब चुकता करेंगे? अपना मानना है कि तब तक केन्द्र सरकार कुछ घोषणाएं करके लोगों की नाराजगी कम करने की कोशिश करेगी। तेल और ब्याज की दरों में कमी से ये प्रयास शुरू हो चुके हैं। लोग जानने को उत्सुक हैं कि क्चया पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी ठिकानों और प्रशिक्षण केन्द्रों पर भारत हमला कर सकता है? रक्षा और विदेश मामलों के जानकारों की मानें तो भारत इस मामले को काफी दूर तक ले जाने की तैयारी में है। अमेरिकी हस्तक्षेप के चलते भारत तब तक पाकिस्तान पर हमला नहीं कर सकता, जब तक अमेरिकी सेनाएं पाकिस्तान में मौजूद हैं। हां, हमला हो या नहीं, इस बार भारत के कड़े रुख से पाकिस्तानी निजाम को पसीना जरूर आ जाएगा। यूपीए के रणनीतिकारों को लगता है कि भारत-पाक के बीच युद्ध के हालात बनने से देश की नाराज जनता मनमोहन सरकार के साथ खड़ी नजर आने लगेगी। लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है। उससे पहले राहत भरी घोषणाओं और पाकिस्तान के साथ कुछ गरमागरमी के वातावरण से सरकार अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करेगी।

इस राजनीतिक जोड़-घटाव से सरकार चुनाव से पहले भले ही थोड़ी बहुत क्षति-पूर्ति कर ले परन्तु इस बात की क्या गारंटी है कि इस बीच कोई और आतंकवादी वारदात नहीं होगी। मुंबई जैसे हालात भले ही न बनें परन्तु अब छोटी-मोटी वारदातों को भी लोग सहन करने के मूड़ में नजर नहीं आ रहे। मुंबई हमले के समय सरकार ने देखा कि किस तरह इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने लाइव प्रसारण कर उसकी मुश्किलों को और बढ़ाने का काम किया। साठ घंटे तक पूरी दुनिया ने आतंकवादी हमले का सीधा प्रसारण देखा। इससे सरकारी एजेंसियों की पोल तो खुली ही, आतंकियों का दहशत पैदा करने और अपनी करतूत को दुनिया भर में पहुंचाने का मकसद भी पूरा हुआ। वे जो करना चाहते थे, वह भारतीय मीडिया ने पूरा कर दिया। जाने-अनजाने में इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने एक और काम किया। उन्होंने पाकिस्तान और आतंकी संगठनों के बजाय भारतीय नेतृत्व और व्यवस्था को ही खलनायक बना दिया। नतीजतन, लोग पाकिस्तान और आतंकवादियों को कम, भारतीय नेतृत्व को ज्यादा गाली दे रहे हैं। इससे सरकार ही नहीं, सभी दलों के नेता जबरदस्त दबाव में हैं। जन विश्वास हासिल करने के लिए वे सरकार पर कड़ी और निर्णायक कार्रवाई करने का दबाव बना रहे हैं।

सवाल यह है कि सरकार अब क्या करे? लोगों का गुस्सा कैसे शांत हो किया जा सकता है? किस तरह आतंकवादी वारदातों पर अंकुश लगाया जा सकता है? पाकिस्तान पर मुश्कें कसने के लिए किस तरह के कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत है। गहरी नींद में सोई पड़ी सरकारी मशीनरी को झिंझोड़कर कैसे जगाया जा सकता है? बेखौफ हो रहे आतंकवादियों के मन में दहशत कैसे पैदा की जा सकती है? इनसे भी अहम सवाल यह है कि व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में अविश्वास की जो भावना तेजी से पनपी है, उसे कैसे कम किया जाए? मीडिया को एेसे राष्ट्रीय संकट में किस तरह की भूमिका निभानी चाहिए, यह अह्म प्रश्न भी सरकार के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती है।

शिवराज पाटिल, विलास राव देशमुख, आर आर पाटिल जैसे कुछ लोगों के इस्तीफा दे देने से जन विश्वास नहीं लौट आएगा। सरकार को हर स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी। पुलिस, प्रशासन, जांच, खुफिया एजेंसियों, नेवी, आर्मी, वायुसेना, राज्य और केन्द्र सरकार की मशीनरी को जिम्मेदार बनाना होगा। पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार करने की जरूरत है। ढीले खुफिया तंत्र को जिला स्तर से लेकर केन्द्रीय स्तर तक चुस्त-चौकस बनाना होगा। सभी सुरक्षा एजेंसियों में संवाद और समन्वय बढ़ाना होगा। संकट के बाद एक-दूसरे पर दोषारोपण की नीति को त्यागना होगा। राज्यों और केन्द्र सरकार के बीच भी बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा। आतंकवादियों और देशद्रोहियों को सख्त सजा के लिए कड़े कानून बनाने होंगे। अदालतों और जजों की संख्या बढ़ानी होगी ताकि सभी तरह के मामलों का त्वरित निपटारा हो सके। इससे लोगों का कानून और न्याय व्यवस्था के साथ साथ सरकार पर भी विश्वास बहाल हो सकेगा। आतंकवाद सहित राष्ट्रीय हित से जुड़े मसलों पर राजनीतिक दलों में आम सहमति बनानी होगी। सरहदों को अभेद्य बनाना होगा ताकि कोई भी देश विरोधी शक्चित तोड़फोड़ के लिए आतंकवादी व हथियार नहीं भेज सके। मीडिया को जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की भी सख्त जरूरत है। इसके लिए मीडिया नीति बनाई जानी चाहिए। आम आदमी का सरकार के प्रति विश्वास तभी बहाल होगा, जब उसे लगेगा कि वह उसकी और देश की सुरक्षा के प्रति चिंतित और संकल्पबद्ध है।

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Friday, November 28, 2008

उन्होंने देशवासियों की गैरत को ललकारा है

उन्होंने हमारी गैरत को ललकारा है. हमारे सुरक्षा तंत्र की पोल खोलकर रख दी है. 2020 तक महाशक्ति बन जाने का उपहास उड़ाया है. खुफिया एजेंसियों की काहिली, सरकारी नपुंसकता और घटना के बाद कहे जाने वाले इस जुमले की हवा निकालकर रख दी है कि बहुत हो गया, अब और बर्दाश्त नहीं करेंगे. वे धड़ल्ले से मुंबई में घुसे. सड़कों पर तांडव मचाया. मुंबई की शान कहे जाने वाले दो आलीशान पाँच सितारा होटलों में नरसंहार कर विदेशी पर्यटकों को बंधक बनाया. नरीमन हाउस, एक सिनेमाघर और एक अस्पताल के अलावा सड़क पर चलते लोगों को निशाना बनाया. उनकी तादाद डेढ़ दर्ज़न से अधिक नहीं थी लेकिन उन्होंने सैकडों की संख्या में पहुंचे सैनिकों, एन एस जी कमांडो, मुंबई पुलिस और अर्ध सैनिक बलों की नाक में दम करके रख दिया. उन्होंने डेढ़ सौ से अधिक बेक़सूर लोगों को मार डाला और चार सौ को घायल कर हमेशा के लिए अपंग बना दिया. इससे भी बढ़कर उन मुठ्ठी भर आतंकवादियों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को दुनिया भर में एक असुरक्षित स्थान के रूप में बदनाम करके रख दिया. आज कोई भी मुंबई को सुरक्षित शहर मानने को तैयार नहीं है.

पूरा देश सदमे में है. मारे गुस्से के लोगों की मुठ्ठियाँ तनी हुई हैं. जबड़े भींचे हुए हैं, सरकार की काहिली के कारण वे ख़ुद को मजबूर और अपमानित महसूस कर रहे हैं. नरीमन हाउस में ऑपरेशन ख़तम कर जैसे ही एन एस जी कमांडो नीचे उतरे, उग्र लोगों ने भारत माता की जय के नारे लगाने शुरू कर दिए. उन्होंने जांबाज़ सैनिकों और एन एस जी कमांडो का तालियाँ बजाकर स्वागत किया. इस एक घटना से पता चलता है कि आतंकवादियों के बार बार देश पर हो रहे आक्रमणों को लेकर नागरिकों में किस कदर नाराजगी है. हर महीने दो महीने के भीतर आतंकवादी देश के किसी न किसी कोने में बेक़सूर नागरिकों का लहू बहा देते हैं. लोगों में जितना गुस्सा उनके प्रति है, उससे कहीं ज्यादा सरकार और उसमे बैठे जिम्मेदार नेताओं के खिलाफ है जो हर घटना के बाद एक बयान देकर अपने दायित्व की पूर्ति कर लेते हैं कि अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

मुंबई ही नहीं, पूरे देश को ही डेढ़ दर्ज़न आतंकवादियों ने तीन दिन तक बंधक बनाए रखा. वहां जो कुछ हुआ, उसे वयस्क नागरिकों ही नहीं, स्त्री और मासूम बच्चों ने भी टेलीविजन के जरिये देखा. बच्चों और आम लोगों के दिलो-दिमाग पर इन गोलियों और बम विस्फोटों का कितना बुरा असर पड़ा है, इसका अंदाजा न सरकार को है और न न्यूज़ चेनलों को. छबीस नवम्बर की रात से जो कुछ हो रहा है, उसने एक बार फ़िर साबित कर दिया है कि हमारे तंत्र की तंद्रा तभी टूटती है, जब घर लुट चुका होता है. शत्रु घर में घुसकर परिवार के लोगों की हत्या कर चुके होते हैं. सरकार में बैठे लोगों को तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता, जब तक हमला ख़ुद उन पर न हो. किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी देश-प्रदेश के नागरिकों की जान माल की सुरक्षा है. लेकिन लगता नहीं कि सरकारें अपनी इस जिम्मेदारी के प्रति सजग अथवा चिंतित हैं. हर घटना के बाद वे सिर्फ़ बयानबाजी करती हैं. इससे लोगों में गहरी नाराजगी व्याप्त है. उनके बर्दाश्त की सीमा ख़तम हो रही है.

सरकार में बैठे लोगों को ख़ुद से सवाल पूछना चाहिए कि वे देश की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं या उसे बट्टा लगाने में लगे हैं. बहुत हो चुका. अब लोग और अपमान बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं. आतंकवादियों ने भारत और इसके नागरिकों की गैरत को ललकारा है. सत्ता में बैठे लोग नहीं चेते तो जनता जानती है कि उसे क्या करना है. सरकार यह जान ले कि अब आम आदमी निर्णायक कार्रवाई चाहता है. लोग अब और हमले और अपमान बर्दाश्त करने को तैयार नहीं हैं.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

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इससे भयावह मंजर और क्या होगा ?

वो रात
इक ख़बर बन कर आई
इक ऐसी ख़बर
जिसके चेहरे पर हैवानियत पसरी थी
जिसकी आंखें बिना आंसुओं की थीं
जिसके होंठ लहू लुहान थे
















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Monday, November 24, 2008

प्लीज धोनी को कप्तानी करने दें

इस ख़बर ने क्रिकेट प्रेमियों को एक बार फ़िर आशंकाओं से ग्रस्त कर दिया है कि चयनकर्ताओं और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के बीच तनातनी शुरू हो गई है. कप्तान की पसंद को दरकिनार करने के सवाल पर भारतीय क्रिकेट में पहले भी बवाल हो चुके हैं. चयन समिति के सदस्य हमेशा से अपनी पसंद कप्तानों पर थोपने की कोशिश करते रहे हैं. इसके नतीजे न अतीत में अच्छे निकले और न अब निकलेंगे. सुनील गावस्कर, कपिल देव, सचिन तेंदुलकर और अनिल कुंबले जैसे महान क्रिकेटरों से लेकर सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, अजहरुद्दीन और कृष्णामचारी श्रीकांत जैसे धुरंधर खिलाड़ियों तक को कप्तानी के समय चयनकर्ताओं की मनमानी का शिकार होना पड़ा. इनमे से अधिकांश को बे-आबरू होकर पहले कप्तानी से और अंतत : टीम से ही रुखसत होना पड़ा. कप्तान और चयनकर्ताओं के टकराव के नतीजे देश लंबे समय तक भुगतता रहा. चयनकर्ताओं ने अपने क्षेत्रों के खिलाड़ियों को टीम में लेने के लिए कभी मोहिन्द्र अमरनाथ जैसे बेहतरीन हरफनमौला को टीम से ड्राप किया तो हाल के दौर में सौरव गांगुली जैसा शानदार खिलाडी इस गंदी राजनीति का शिकार हुआ.

जब भी नए कप्तान आए, टीम ने अच्छे रिजल्ट दिए. एक-दो सीरीज के बाद ही कप्तान पर चयनकर्ता अपनी पसंद के खिलाडी को टीम में लेने के लिए दबाव बनाना शुरू कर देते हैं. इसी कारण कभी अमरनाथ तो कभी गांगुली जैसे बेहतरीन खिलाडी बाहर बैठाए जाते रहे. यह अलग बात है कि इन दोनों ने ही टीम में शानदार वापसी करके चयनकर्ताओं की बोलती बंद कर दी. अब धोनी जैसे खिलाडी के साथ भी अगर चयनकर्ता ठीक उसी तरह की हिमाकत कर रहे हैं तो जान लीजिए कि टीम इंडिया के फ़िर से बुरे दिन लौटने वाले हैं.जब से धोनी के नेतृत्व में टीम ने सीरीज दर सीरीज जीतने का सिलसिला शुरू किया है, तब से विश्व की सभी धुरंधर समझी जाने वाली टीमों को पसीना आया हुआ है. दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, इंग्लेंड, वेस्ट इंडीज, श्रीलंका और बंगलादेश से लेकर विश्व चैम्पियन कंगारुओं तक को उनकी टीम हार का मज़ा चखा चुकी है.
अच्छा तो यही होगा कि धोनी की टीम को खेलने दिया जाए. धोनी को वही खिलाडी दिए जाएँ, जो वे चाहें. अगर ऐसा नहीं हुआ तो टीम उसी गर्त में जा पहुंचेगी, जहाँ से बड़ी मुश्किल से निकली है.धोनी पूरे मन से खेल रहे हैं. रननीति से लेकर टीम के चयन तक में लगभग सभी टीमें और कप्तान धोनी का लोहा मानते हैं. उन्होंने अपने खिलाड़ियों का जितना अच्छा इस्तेमाल किया है, उसकी कट किसी टीम के पास दिखायी नहीं दे रही. अगर धोनी पर इसी तरह का दबाव बनाया जाता रहा तो बाकी कप्तानों की तरह वे भी कंधे ढीले छोड़ देंगे. उनकी टीम में भी राजनीति शुरू हो जाएगी. वहां भी युवराज और सहवाग जैसे खिलाडी नैसर्गिक खेल खेलना बंद कर देंगे और फ़िर इस टीम को गर्त में जाने से कोई नहीं रोक पाएगा. इसलिए अच्छा होगा, यदि चयनकर्ता अपने क्षेत्रों की चिंता करने के बजे देश की चिंता करें.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

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बहुत कुछ तय करेंगे ये चुनाव

सबकी निगाहें छः राज्यों में हो रहे चुनाव के नतीजों पर टिकी है. मिजोरम और जम्मू कश्मीर के परिणामों से केन्द्र की राजनीति पर भले ही कोई फर्क न पड़ता हो परन्तु इनके महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता. वैसे सबकी दिलचस्पी चार हिन्दी भाषी राज्यों के परिणामों पर हैं. इनमें से तीन मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार हैं जबकि दिल्ली में कांग्रेस का शासन है. लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं है. इस कारण इन चुनावों को मिनी महाकुम्भ भी कहा जा रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि इनके नतीजे देश की राजनीतिक दिशा तय कर सकते हैं. कांग्रेस और भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. भाजपा के लिए इन तीनों राज्यों में वापसी करना चुनौती है तो कांग्रेस के लिए दिल्ली में. कांग्रेस के लिए राह इस कारण थोड़ी मुश्किल नजर आ रही है क्योंकि वह दिल्ली में दस साल से सत्ता में है. इसके बावजूद शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ कोई बड़ी नाराजगी देखने में नहीं आ रही है. किसी भी सरकार के लिए वैसे तो आजकल पाँच साल की एंटीइनकम्बेंसी ही काफी होती है लेकिन अपनी सरकारों पर लटकने वाली इस तलवार को परे हटाने के लिए भाजपा नेताओं ने महंगाई और आतंकवाद जैसे मुद्दों को हवा देकर कांग्रेस को घेरने में कोई कसर नहीं छोडी है.इन राज्यों में कांग्रेस बजे आक्रामक होने के रक्षात्मक नजर आ रही है.
यह कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस अगर हिन्दी भाषी इन चार में से दो अथवा तीन राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब हो गई तो सोनिया गांधी लोकसभा चुनाव समय से पहले कराने का निर्णय ले सकती हैं. हालाँकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नियत समय पर ही लोकसभा चुनाव कराने के पक्ष में हैं. इसके विपरीत अगर भाजपा ने दिल्ली पर कब्जा करने के अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में से किन्हीं दो राज्यों में फ़िर से सरकार बना ली तो कांग्रेस तय समय से पहले आम चुनाव कराने का खतरा नहीं लेगी.इन्हीं तीन राज्यों में कामयाबी के बाद 2004 में भाजपा ने केन्द्र सरकार के लिए नया जनादेश लेने के लिए समय से पूर्व लोकसभा चुनाव कराने का खतरा उठाया था. नतीजतन सरकार जाती रही. इसलिए कांग्रेस बहुत सोच विचार कर ही समय से पहले आम चुनाव कराने का निर्णय लेगी.
आम तौर पर विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े और जीते जाते हैं. इस बार के चुनाव थोड़े अलग माहोल में हो रहे हैं. इस वक्त महंगाई और आतंकवाद बड़ा मुद्दा बन गए हैं. भा ज पा ने सोची समझी रणनीति के तहत कांग्रेस को इन मुद्दों पर घेर लिया है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में पॉँच साल के शासन के बाद भी अगर भा ज पा के खिलाफ वैसी नाराजगी देखने को नहीं मिल रही है तो इसकी वजह यही है कि लोग महंगाई और आतंकवाद से त्रस्त हैं और ढीली ढाली नीतियों को इसका जिम्मेदार मानते हुए केन्द्र की यूंपीऐ सरकार को दोषी मान रहे हैं. संसद भवन पर हमले के दोषी अफजल को फांसी नहीं दिए जाने को भाजपा ने एक और प्रमुख मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस पर हमला बोल दिया है.
कांग्रेस जहाँ इन चुनावों में मुस्लिम कार्ड खेल रही है, वहीं भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मामले को तूल देकर हिन्दू वोटों को अपने पक्ष में करने में कोई कसार बाकी नहीं छोडी है. इसलिए यह देखना भी दिलचस्प होगा कि मतदाता क्या जनादेश देते हैं. वे किसके पक्ष में जाते हैं. वैसे हिंदुस्तान का आम मतदाता बहुत समझदार है. समय समय पर वह विभिन्न राजनीतिक दलों को सबक भी देता रहा है. कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि छः राज्यों के ये चुनाव देश की भावी राजनीति की दिशा जरूर बता देंगे.

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Tuesday, November 18, 2008

बिग बॉस के घर की रासलीला

आम तौर पर मै टेलीविजन पर सीरियल आदि नहीं देखता. कुछ सीरियल अच्छी कहानियो के साथ शुरू होते हैं लेकिन धीरे-धीरे इतने उबाऊ हो जाते हैं कि सिवाय बाल नोचने के दर्शक कुछ नहीं कर पाता. मजबूर होकर वह चेनल बदलता है लेकिन वहां भी वही हाल मिलता है. टीआरपी और कमाई का रोग ऐसा लग गया है कि न मूल्यों की परवाह है, न सिधान्तों की, न सामाजिक दायित्वों की और न आने वाली पीढी के भविष्य की. समाज में ऐसा भी होता है, इस

कुतर्क के आधार पर समाज में हो रहे तमाम तरह के अप्कर्मों को परोसा जा रहा है. कुछ रियल्टी शो चल रहे हैं. ये भी गजब हैं. कुछ विशुद्ध मनोरंजन कर रहे हैं, उनसे आम दर्शकों को खास शिकायत नहीं है, लेकिन बिग बॉस के हाउस जैसे कार्यक्रम किसका भला कर रहे हैं ? इस कार्यक्रम की टीआरपी बढ़वाने वाले लोगों में ख़ुद मै भी शामिल हूँ. मै इसे नियमित रूप से देख रहा हूँ. क्यों देखता हूँ, ख़ुद नहीं समझ पा रहा. शायद इसलिए कि इसमे प्रमोद महाजन के साहबजादे राहुल महाजन हैं, टीवी सीरियल्स की नामचीन अभिनेत्री श्वेता तिवारी के पूर्व पतिदेव राजा चौधरी हैं. कुछ दिन पहले तक अबू
सलेम की प्रेमिका मोनिका बेदी थी. शायद यह देखने के लिए कि इतनी बदनाम शख्सियतें एक जगह हैं तो किस तरह का व्यव्हार कर रहीं हैं. वे अपनी अपनी इमेज सुधरने के लिए क्या क्या कर रहे हैं. कितने शरीफ बनकर जनता की सहानुभूति लूटने की कोशिश कर रहे हैं. और

जनता भी किस तरह उन्हें बिग बॉस के हाउस में बनाए रखने के लिए एस एम् एस के जरिये समर्थन कर रही है. मेरी तरह बहुतों की दिलचस्पी शायद इन्हीं बातों को जानने में होगी.
और विडम्बना देखिये. विश्व सुन्दरी का खिताब जीतने वाली डायना हेडन को दर्शक बिरादरी ने मोनिका बेदी से भी पहले बिग
राहुल महाजन कितने अच्छे आचरण के हैं, इसी से पाता चल जाता है कि उनकी नव विवाहिता ने उन पर मार पीट का आरोप लगते हुए कुछ ही महीने में तलाक़ ले लिया. प्रमोद महाजन की तेरहवीं भी नहीं हुई थी, तब राहुल महाजन ड्रग लेने के चक्कर में गिरफ्तार हुए और मौत के मुह से लौटे. मोनिका के बारे में सारी दुनिया जानती है कि वह लंबे समय तक
माफिया डॉन अबू सलेम के साथ पुर्तगाल में रहकर ऐश करती रही. अब सलेम जेल की चक्की पीस रहे हैं तो ये बिग बॉस के

घर में राहुल महाजन के साथ मटक मटक कर रिश्ते बढ़ा रही हैं. दर्शक भी किसी फ़िल्म की रोमांटिक कहानी की तरह इसका पूरा लुत्फ़ लेते रहे. राजा चौधरी पर भी राहुल महाजन की तरह अपनी अभिनेत्री पत्नी पर मारपीट का आरोप लगा था. मामला पुलिस थाने तक पहुँचा. तलाक़ तक नौबत पहुँच गयी. इन तीन पात्रों के आलावा सम्भावना सेठ को पूरी दर्शक बिरादरी ने देखा कि किस तरह का आचरण उन्होंने बिग बॉस के हाउस में दिखाया. एक बार आउट होने के बाद लौटी तो पहले से भी
ज्यादा हंगामा किया. राजा चौधरी के साथ गाली गलौज तक हुई. क्या क्या नहीं दिखाया गया रियल्टी शो के नाम पर. लव स्टोरी दिखायी गयी. मारपीट दिखायी गयी. डांस, गीत संगीत से लेकर एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र दिखाए गए. यानी सब कुछ है इसमे. वह भी उन पात्रों के साथ, जिनकी समाज में कोई बहुत अनुकरणीय छवि नहीं है.

बॉस के घर से बेघर कर दिया. केतकी, एहसान कुरैशी, पायल रोहतगी, देबोजीत सहा जैसे तो महत्वहीन होकर रह गए.
इस रियल्टी शो के आयोजकों ने भी साबित किया कि महिलाओं का कब तक और किस तरह उपयोग किया जाता है. बिग बॉस के घर में भी उनसे रोटी बनवाई गयी, कपड़े धुलवाए गए. अपमानित भी कराया गया. सम्भावना सेठ हालाँकि ख़ुद भी कोई कसर करके नहीं लौटी वहां से लेकिन उन्होंने राजा चौधरी पर मानहानि का केस ठोकने का ऐलान कर दिया है. मोनिका

बेदी राहुल महाजन के बाहर आने का बेसब्री से इन्तजार कर रही है. उन्हें लगता है कि बिग बॉस के घर में राहुल से उनका जो प्रेम परवान चढा है, वह आगे बढेगा.
मेरी समझ में नहीं आ रहा कि बिग बॉस के इस घर में ऐसा कौन सा उत्तम कार्य हुआ है, जिससे प्रेरणा ली जाए.
लोगों को अच्छा लगता यदि बिग बॉस के घर में कुछ अच्छे आचरण के लोगों को आमंत्रित कर वहां रहने का अवसर दिया जाता. पता नहीं यह धरना क्यों बंटी जा रही है कि लोग बुरे लोगों को ही देखना चाहते हैं.

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Thursday, November 13, 2008

दिल्ली में जाम के मजे ले रहा हूँ

जी हाँ, आजकल कोई मुझ से पूछता है कि क्या हाल हैं, तो मेरा यही जवाब होता है कि दिल्ली में जाम के मजे ले रहा हूँ. जब से मेरठ छोड़ कर देश की राजधानी में धूनी रमाई है, तब से जाम, जाम और बस जाम के ही मजे ले रहा हूँ. वो जाम नहीं, जो आप समझ रहे हैं. जीवन में उसकी तो एक बूँद भी नहीं चखी. दिल्ली में रहने वाले एक और जाम को झेलने को अभिशप्त हैं. सड़कों पर कदम-कदम पर लगने वाले जाम से. इंडिया टुडे के विशेष संवाददाता श्याम लाल यादव मेरे कनाट प्लेस दफ्तर में बैठे थे, बोले..सुबह आठ बजे घर से निकला. दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) के मुख्य कार्यकारी ई श्रीधरन से मिलना था. साढे नौ बजे का समय तय था, जाम में ऐसा फंसा कि ग्यारह बजे के बाद किसी तरह पहुँच पाया. जाने अनजाने श्याम लाल ने जैसे मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया. दिल्ली मै पहले भी कई साल रहकर गया हूँ. कभी कभार जाम का सामना तब भी करना पड़ता था लेकिन इतना बुरा हाल तो तब नहीं था. यह तो तब है, जब दिल्ली में सैकडो की संख्या में ओवरब्रिज बन गए हैं. फ्लाई ओवर खड़े हो गए हैं. दिल्ली सरकार चोराहों को रेड लाइट फ्री बनाने की जोरदार मुहीम छेड़े हुए है. सड़कें चौडी बनाई जा रही हैं. मेट्रो ट्रेन का जाल बिछाया जा रहा है. रिंग रोड और नई दिल्ली में रिक्शा, टेंपो, रेहडी वाले, घोडे तांगे और थ्री व्हीलर प्रतिबंधित किए जा चुके हैं.



आप जानते हैं, 2010 में दिल्ली में कामन वेल्थ गेम होने जा रहे हैं. दस हजार करोड़ रूपए से भी अधिक तैयारियों पर खर्च किया जा रहा है. तीन नए स्टेडियम बन रहे हैं, यमुना के बेसिन में अक्षरधाम मन्दिर के पास खेल गाँव बन रहा है. सड़कें चौडी की जा रही हैं. कई नए होटलों का निर्माण हो रहा है. एक तरह से दिल्ली की कायापलट करने के दावे किए जा रहे हैं. कामन वेल्थ के नाम पर प्राइवेट बिल्डर तक मोटी कमाई करने में लगे हैं. दिल्ली और आसपास के इलाके में जमीनों और नए बनाए जा रहे फ्लेट्स की कीमतें आसमान छू रही है. नौकरी पेशा आदमी अब इस क्षेत्र में एक छत का बंदोबस्त करने का केवल सपना ही देख सकता है. उसे हकीकत में नहीं बदल सकता.
मै जब भी जाम में फंसा होता हूँ, एक ही बात सोचता हूँ कि क्या कभी दिल्ली जाम से मुक्ति पा सकेगी ? अगर कभी ऐसा हुआ तो वह दिल्ली वालों और यहाँ आने वालों के लिए सुनहरा दिन होगा. क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जाम से मुक्ति दिलाने के नाम पर ही करोड़ों-अरबों रूपए फूंके जा रहे हैं और इसी से दिल्ली वासियों को निजात नहीं मिल पा रही ? आख़िर इस समस्या से पार क्यों नही पाई जा रही ? क्या योजनाओं में खोट है ? या फ़िर दिन दूनी रात चौगुनी वेहिकल्स की संख्या बढ़ती जा रही है ? परिवहन निगम के आंकडे बताते हैं कि साठ लाख से अधिक वाहन तो अकेले दिल्ली में ही रजिस्टर्ड हैं. रोजाना बीस लाख वेहिकल बाहर से दिल्ली आते हैं. सड़कों पर कभी सीवर का काम हो रहा होता है. कभी फ्लाई ओवर के कारण एक तरफ़ से सड़क को रोक दिया जाता है तो कभी ग़लत पार्किंग जाम की वजह बनती है



कामन वेल्थ गेम्स में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. राष्ट्रमंडल खेल संघ के अध्यक्ष दिल्ली में हैं. उन्होंने तैयारी स्थलों का जायजा लिया है. जिस रफ्तार से काम चल रहा है, उससे उन्हें लगता है कि दो हजार दस तक दिल्ली सरकार तैयारियों को पूरा नहीं कर पाएगी. खास कर खिलाड़ियों के लिए बनाए जा रहे खेल गाँव के मामले को जिस तरह कुछ पर्यावरण संरक्षण वादियों ने कोर्ट में चुनौती दे राखी है, उस से उन्हें लगता है कि यह काम कभी भी रोका जा सकता है. ऐसे में भरी संकट खड़ा हो सकता है. बाकी तैयारियां भी कछुआ चाल से ही चल रहीं हैं.
यह वाकई चिंता की बात है. ख़ुद दिल्ली के अधिकारी मान रहे हैं कि खेल गाँव का पच्चीस प्रतिशत भी काम अभी पूरा नहीं हुआ है. अगर यही हाल रहा तो तय मानिये, कामन वेल्थ गेम्स के समय बड़ी भद पिटने वाली है. जिस जगह खेल गाँव बन रहा है, मेरे जैसे लाखों लोग उसी सड़क यानी निजामुद्दीन पुल पर जाम के शिकार होते हैं. खुदा न खास्ता दो हजार दस तक भी जाम का यही हाल रहा तो विदेशी खिलाडी दिल्ली की बहुत अच्छी तस्वीर और अनुभव लेकर अपने देश लौटेंगे.

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Sunday, November 2, 2008

कुंबले, सौरव के बाद दबाव द्रविड़ पर



सौरव गांगुली के बाद जम्बो के अचानक सन्यास की घोषणा ने सबको हैरत में डाल दिया है. अनिल कुंबले भारत ही नहीं, दुनिया के बेहतरीन गेंदबाजों में से एक हैं. उनसे अधिक विकेट केवल मुथैया मुरलीधरन और शेर्न वारने ने लिए हैं. भारत में किसी गेंदबाज ने टेस्ट क्रिकेट में 619 विकेट लेने का कारनामा नहीं दिखाया. कपिल देव ने भी नहीं. कुंबले अठारह साल तक भारत के लिए खेले और अपने दम पर उन्होंने अनेक मैचों में शानदार जीत दिलाई. दुनिया के वे ऐसे दूसरे गेंदबाज हैं, जिन्हें एक ही पारी में सभी दस विकेट मिले. 1999 में कुंबले ने यह करिश्मा दिल्ली के इसी फिरोजशाह कोटला मैदान में पाकिस्तान के खिलाफ खेलते हुए किया था. जिस पर उन्होंने अन्तर राष्ट्रीय क्रिकेट से सन्यास लेने की घोषणा की.

जितना सम्मान कुंबले को मिलना चाहिए था, नहीं मिला. उन्हें कप्तानी भी तब मिली, जब करियर का संध्या काल आ पहुँचा था. निश्चित तौर इसे लेकर बहस होगी कि कुंबले ने अचानक सन्यास का ऐलान क्यों किया और क्या उन्हें भी सौरव गांगुली की तरह ही ससम्मान (?) क्रिकेट को अलविदा कह देने को मजबूर तो नही किया गया था. हालाँकि इस महान लेग स्पिनर ने रहस्योद्घाटन किया कि नागपुर टेस्ट के बाद वे सन्यास लेने का ऐलान करने वाले थे लेकिन उंगली की चोट के कारण एक टेस्ट पहले ही वे क्रिकेट को अलविदा कह रहे हैं.

कह सकते हैं कि भारत की लंबे समय तक सेवा करने वाला एक और जांबाज खिलाडी अब मैदान पर खेलते हुए नजर नहीं आएगा. कुंबले की विदाई और सम्मानजनक तरीके से हो सकती थी. ये ऐसे खिलाडी हैं, जो फ़िर कभी भारतीय टीम को नसीब नहीं होंगे. यह टेस्ट सीरीज कई घटनाओं के लिए याद की जाएगी. सचिन तेंदुलकर ने टेस्ट में सर्वाधिक रन बनने का ब्रायन लारा का रिकोर्ड तोड़कर भारत को फ़िर से यह गौरव दिलाया तो सौरव गांगुली ने अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया. सीरीज अभी ख़तम भी नहीं हुई है कि कुम्बले ने भी सन्यास का ऐलान कर दिया. जाहिर है, अब दबाव राहुल द्रविड़ पर आ गया है क्योंकि एक अरसे से उनका बल्ला खामोश है. यहाँ तक कि वे अपने घरेलू मैदान पर भी रनों के लिए तरसते हुए देखे गए. नागपुर में भी अगर यही हाल रहा तो द्रविड़ पर भी सौरव और कुंबले का अनुसरण करने का दबाव बढ़ जाएगा.

पिछले कुछ समय से टीम इंडिया के फाइव फेब खासी चर्चा में हैं. सचिन, सौरव, द्रविड़, लक्ष्मण और कुंबले पर अच्छा प्रदर्शन करने का जबरदस्त दबाव रहा है. सचिन और लक्ष्मण के अलावा केवल सौरव ही सैकडा लगाकर आलोचकों का मुह बंद करने में सफल रहे. सौरव चूकि पहले ही सन्यास का ऐलान कर चुके हैं, इसलिए उनके टीम में लौटने का प्रशन नहीं उठता. सचिन अभी सन्यास के बारे में दूर दूर तक भी नहीं सोच रहे हैं. लक्ष्मण ने भी दिल्ली टेस्ट में दोहरा शतक जमाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी है, इसलिए सारा दबाव अब द्रविड़ पर है. नागपुर में भी अगर वह नहीं चले तो उन पर भी गांगुली और कुंबले का अनुसरण करने का दबाव पड़ेगा.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

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Thursday, October 30, 2008

माँ के प्रति फ़र्ज़

माँ डायबिटीज की मरीज है
बेटे से कहा, दवा ला दे
बेटे ने कहा, परहेज रख
अपने आप ठीक हो जाएगी.

इसके बाद बेटा निकल गया
माँ वेश्नो देवी की यात्रा पर
वहां से लौटा तो जागरण कराया
सारी रात माताओं के गीत गाए
ख़ुद भी जागा, पडौसी भी जगाए

सुबह ख़बर मिली,
माँ नहीं रही
थोड़ी देर आंसू बहाए
आस पडौसियों ने कहा,
ईश्वर को यही मंजूर था
बेटे ने सेवा में
कसर नहीं छोडी
माँ ही बद परहेज थी

उसके बाद जुटे लोग
ले गए शमशान
कर दी अंत्येष्टि
बेटे ने सर मुंडवाया
ब्रह्मिन जिमाए
इस तरह माँ के प्रति
पूरे फ़र्ज़ निभाए.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

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Tuesday, October 28, 2008

मेरा गाँव, कुलदेवता, माँ और जोनी



बड़ी दीवाली पर हर साल परिवार के साथ गाँव जाना होता है. इस बार भी गया. मेरा गाँव दबथुवा मेरठ जिले में सरधना मार्ग पर है. एक किसान परिवार में जन्म हुआ. जैसे गाँव के बाकी बच्चों का बचपन बीतता है, वैसे ही मेरा भी बीता. गाँव के प्राथमिक विद्यालय में प्रारंभिक शिक्षा ली. उसके बाद मेरठ कालेज से उच्च शिक्षा लेने के बाद पत्रकारिता में आ गया. हर बार की तरह इस बार भी पत्नी, बेटे और बेटी के साथ सबसे पहले कुलदेवता पर गया. वहां दीपावली पर दिये जलाने की परम्परा है. बाकी किसान परिवारों की तरह हमारे कुलदेवता का स्थान भी खेतों के बीच में ही है. इस बहाने साल में कम से कम एक बार अपने खेतों पर भी हम लोग हो आते हैं. जब खेत की पगडंडियों से गुजरते हैं तो बचपन की बहुत सी यादें ताज़ा हो जाती हैं. स्कूल जाने से पहले सबेरे-सबेरे खेत में जाना हमारी दिनचर्या में शामिल था. कभी गन्ने कटवाने और बोगी में लदवाने, कभी पशुओं के लिए चारा कटवाने तो कभी खेत जोत रहे चाचा और बाबा के लिए सुबह का खाना देने के लिए हम जाते थे. पास ही बहने वाले रजबाहे पर खूब मस्ती होती थी. उसमे नहाना, मैले हो गए कपडों को रेह लगाकर धोना, फ़िर सुखाना और पहनना जैसे दिनचर्या में शामिल था. उस ज़माने में कुछ खेतों में एक ऐसी मिट्टी मिलती थी, जो कपडों पर लगाने से उसका मेल निकाल बाहर करती थी. अब भी बहुत से गाँव वासी उसका उपयोग कपड़े धोने में करते हैं. पडौस में एक झाड़-झंकाड़ वाला बाग़ था, उसमे बेर के कुछ पेड़ थे, हम लोग भूख लगने पर अक्सर बेर खाने के लिए वहां चले जाते थे. समय के साथ वह बाग़ भी नहीं रहा लेकिन जब भी मै उस तरफ़ जाता हूँ, नजर उस ओर उठ ही जाती है. अफ़सोस होता है कि वक्त के साथ जंगल और हरियाली ख़तम होती जा रही है.




खेतों पर जाना मुझे बहुत अच्छा लगता है. शायद इसलिए कि वहां जाते ही मेरे भीतर ख़ुद ब ख़ुद बचपन सा लौट आता है. फसलों और मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू आज भी मुझे उतनी ही सुहानी लगती है. पेडों की शाखें, उन पर अठखेलियाँ करते पंछी, उनके घौसलें, रखे हुए अंडे, खेतों के बीच से कीटों, पक्षियों की आती आवाजें आज भी उतना ही सम्मोहित और उत्प्रेरित करती हैं. जितना तब करती थी. सच कहूं तो मै वहां से हमेशा ताजगी और ऊर्जा लेकर लौटता हूँ. बेटे अंकुर और बेटी कावेरी का जन्म जरूर गाँव में हुआ.लेकिन ये वहां रहे नहीं. वे एक तरह से गाँव के उतने नहीं हैं, जितना मै या मेरी धर्मपत्नी कमलेश. बेटा इस समय जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मॉस काम का एम् ऐ फाइनल का स्टूडेंट है. बेटी साउथ देलही के एक इंस्टिट्यूट से आंतरिक साज सज्जा का कोर्स कर रही है. कह सकते हैं कि वे गाँव में न कभी पढ़े लिखे हैं और न वे उतनी शिद्दत के साथ मेरे और खेतों के रिश्ते को महसूस कर पाते होंगे. मै ईंख, धान आदि फसलों को जब केमरे में कैद कर रहा था, तो बेटी उस दीवानगी को हैरान होकर देख रही थी. मै अक्सर उन द्रश्यों को बाद में अपने लेपटोप पर निहारा करता हूँ. ऐसा करके हमेशा अपने आप को उन खेतों के बीच ही महसूस करता हूँ.



गाँव जाने का दूसरा मकसद माँ से मिलना होता है. बीच बीच में माँ मेरे पास रहने को आती रहती है लेकिन महीने भर में ही उनका मन वापस गाँव में लौट जाने का होने लगता है. कमलेश से कहती है कि ओमकार से कहकर मुझे गाँव में छुड़वा दे, मै फ़िर आ जाउंगी. माँ की इच्छा हमारे लिए सर्वोपरि है. पिता का साया तो बीस साल पहले सर से उठ गया था. माँ है तो जैसे सब कुछ है. वह हमेशा हम लोगों की बाट जोहती मिलती है. बड़े भइया के पास रहती है, वे ही गाँव में रहकर खेती बाडी सँभालते हैं. इस बार भी जब कुलदेवता पर दीपक जलाकर पहुंचे तो माँ ने हम चारों के सर पर हाथ रखकर दुनिया भर के आशीर्वाद दिए. कावेरी और अंकुर माँ के आजू-बाजू जम चुके थे. कावेरी बीस बरस से ज्यादा की हो गई है लेकिन आज भी छोटी बच्ची की तरह माँ की गोद में जा छिपती है. माँ के पास बैठना, हर तरह की बातें करना, घर बाहर की तमाम खबरें लेना, मन को सुकून देता है. उसी से दुखद खबरें भी मिलती हैं कि इस बीच गाँव के कौन कौन से बुजुर्ग गुजर गए और दुर्घटना या बीमारी से किसकी असमय मौत हो गई है. जो करीबी होते हैं, उनके पास होकर आते हैं. कुछ घरों में मिठाई पहुंचवाई जाती है. और इसके बाद गोवर्धन पूजा की बारी आती है. बचपन से ही हम घर में दीपावली पर गोवर्धन पूजा होते हुए देख रहे हैं. उत्तर भारत के अधिकांश स्थानों पर गोवर्धन पूजा दीपावली के अगले दिन होती है लेकिन हमारे गाँव और आसपास के इलाके में एक दिन पहले यानि दीपावली पर ही पूजा हो जाती है.





गोवर्धन पूजा के लिए भाभी मीठे पूड़े बनाती हैं. घर के चौक में सुबह ही गोबर से एक मानव आकृति बनाई जाती है, जिसके पास खेती के काम आने वाले तमाम ओजार रखे जाते हैं. दूध बिलोने वाली बिलोनी से लेकर अनाज छानने वाले छाज तक को वहां रखा और पूजा जाता है. इस मौसम तक गन्ना भी पककर तैयार हो जाता है. लिहाजा गोवर्धन के साथ गन्ने की पूजा का प्रचलन भी है. पूजा के बाद मीठे पूड़े आपस में बांटकर खाने का रिवाज है. यह एक तरह से सर्दियों के आगमन की सूचना भी होती है. इस त्यौहार से कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र के किसान अपना गन्ना चीनी मीलों को देना शुरू कर देते हैं. गन्ना यहाँ के किसानों की प्रमुख फसल है. इसी सीजन में धान की फसल की पैदावार भी होती है. हालाँकि इस इलाके में धान उतनी मात्र में नहीं होता, जितना हरियाणा और पंजाब में होता है.



इस बार गाँव जाने पर जिसने हमारे साथ जमकर लड़ाई की, उसके बारे में बताना तो मै भूल ही गया. वह जोनी है. हमारा पामेलियन डोगी. डी एल ऐ छोड़ने के बाद परिवार को दिल्ली शिफ्ट करना था. इसलिए कुछ समय के लिए जोनी को माँ के पास गाँव छोड़ना पड़ा. इस बीच वहां जाना भी नहीं हुआ. वह पिछले तेरह साल से हमारे परिवार का अभिन्न हिस्सा है. जब दैनिक जागरण में था, तब फोटोग्राफ़र आबिद उसे कहीं से लाया था. तब बहुत नन्हा सा था जोनी. उसे हमने बच्चे की तरह ही पाला. न वह हमसे अलग रहा पाता है. न हम लोग उसके बिना सहज हो पाते हैं. इस बार उसे एक महीना अलग रहना पड़ा तो गाँव पहुँचते ही वह भों-भों करते हुए खूब लड़ा. देर तक उसे पुचकारते रहे. तब जाकर वह शांत हुआ. बाद में कावेरी की गोद में बैठा तो उतरा ही नहीं. कभी कभी लगता है कि जिसे हम जानवर कहते हैं, वह प्यार की भाषा इन्सान से कहीं बेहतर समझता है.
तो कह सकता हूँ कि इस बार अपनी दीपावली बहुत यादगार रही. कुछ चित्र भी यहाँ दे रहा हूँ. कुलदेवता के, माँ के, खेतों के. परिवार के. मुझे आशा है कि मेरे गाँव की इस यात्रा ने आपकी भी कुछ न भूलने वाली यादें ताजा कर दी होंगी. . आपको भी अपना गाँव, अपने करीबी, खेत, और पंछियों की वह चहचाहट जरूर याद आई होगी.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

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Monday, October 27, 2008

न रहे कहीं अँधेरा




दीपावली पर आप और आपके परिवार को हार्दिक शुभकामनाएँ

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Tuesday, October 21, 2008

देश को तोड़ डालेंगे ये काले अंग्रेज

इन राजनेताओं ने ऋषियों मुनियों की इस भारत भूमि को क्या बना दिया है ? कौन सा आदर्श ये आने वाली पीढी के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं ? कोई मराठियों की बात कर रहा है, कोई गुजरात प्राइड की बात करता है। कोई दलितों की राजनीति कर रहा है, कोई मुसलमानों की तो कोई हिन्दुओं की. कोई भाषा को तूल देता नजर आ रहा है तो कई क्षेत्रों से अलग राज्य की मांग उठती दिखाई देती है. इस गंदी राजनीति ने लोगों को धर्म, जाति, भाषा, प्रान्त और वर्ग के आधार पर बांटकर रख दिया है. आज के इन नेताओं को अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि वोटों की फसल काटने और येन केन प्रकारेण सत्ता को हथियाने के लिए उन्होंने नफरत के बीज बोने के अलावा क्या किया है. बांटो और राज करो की नीति पर चलते हुए अंग्रेजों ने बरसों तक भारतवासियों पर शासन किया. वे चले गए तो ये काले अंग्रेज आ गए. आम आदमी तब भी पिसता था. आज भी पिस रहा है. हकीकत तो यह है कि इन्होने अंग्रेजों से दो कदम आगे जाकर दिलों और समाजों को बाँट दिया है और अब प्रांतवाद, भाषावाद जैसे खतरनाक नारे देकर देश को बाँटने का गहरा षडयंत्र रच रहे हैं.


कितने अफ़सोस की बात है कि समाज और देश को बाँटने की साजिश रचने वाले ये मुट्ठी भर लोग कानून और संविधान से खिलवाड़ करते हुए सरेआम तोड़ फोड़ करते हैं। मासूम और बेक़सूर लोगों को पीटते हैं. उनका खून बहाते हैं. ये व्यवहार ऐसे लोगों के साथ भी हो रहा है, जो अभावग्रस्त जीवन जीने को अभिशप्त कर दिए गए हैं. जो दो जून की रोटी की तलाश में यहाँ वहां भटक रहे हैं. वे कोई अपराधी नहीं हैं. वे नक्सलवाद भी नहीं फैला रहे हैं, वे आतंकवाद में भी विश्वास नहीं करते. वे इन अमीरजादों की धन दौलत छीनने के लिए लूटपाट का रास्ता भी नहीं अपना रहे। ये मेहनतकश इन्सान देश के कानून और संविधान में पूरी आस्था रखते हुए काम चाहते हैं, ताकि अपने परिवार का भरण पोषण कर सकें. देश की तरक्की में अपना अमूल्य योगदान दे सकें. आजादी के साठ साल बाद भी अगर इस कदर असमानता, गरीबी और भुखमरी है तो इसके लिए इस देश के नीति नियंता और शासक जिम्मेदार हैं न कि ये लोग, जिन्हें राज ठाकरे जैसे लोग सड़कों पर पिटवा कर वोटों की बेहद गंदी राजनीति करने पर आमादा हैं.

इनकी गंदी राजनीति के शिकार कौन बन रहे हैं ? गरीब, आटो चालक, बस-ट्रक ड्राईवर, मेहनत मजदूरी करने वाले वंचित तबके के लोग। उन्हें लाठियों से पीटा जाता है। उनके ऑटो तोडे जाते हैं. टेक्सियाँ फूंक दी जाती हैं. जिन बसों-ट्रकों को वे चलाते हैं, उन्हें आग के हवाले कर दिया जाता है. उनकी ठेलियां लूट ली जाती हैं. गुंडे लाठियाँ और हथियार लेकर सड़कों पर उतर पड़ते हैं। पुलिस, प्रशासन, सरकार-सब मूकदर्शक की भूमिका निभाते नजर आते हैं. आखिर इस देश की व्यवस्था को ये क्या हो गया है ? जिन पर कानून व्यवस्था लागू करने की जिम्मेदारी है, वे हाथ पर हाथ रख कर क्यों बैठे हैं ?

आम आदमी को आख़िर कितना दबाया जाएगा ? और कितने जुल्म उस पर किए जाएँगे ? कब तक वह ये गुंडागर्दी बर्दाश्त करेगा ? क्या मजबूर होकर वह नक्सली और आतंकवादी नहीं बनेगा ? क्या वह हथियार उठाने को बाध्य नहीं होगा ? आख़िर उसे इन्साफ कौन देगा ? अगर किन्हीं लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक जमीन बचाने के लिए राज ठाकरे जैसे सिरफिरों की गिरफ्तारी का नाटक किया भी जाता है तो उसकी जमानत का बंदोबस्त पहले कर लिया जाता है. इस तरह के मिले जुले ड्रामे देख कर इस देश का आम आदमी बस मन मसोसकर रह जाता है। जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्वा न्योछावर कर दिया, उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि अंग्रेजों के जाने के बाद इसकी बागडोर संभालने वाले इतने गिरे हुए जमीर के लोग होंगे, जो अपनी क्षुद्र राजनीति को चमकाने के लिए समाज के सबसे निर्बल व्यक्ति को कुचलने का दुष्चक्र रचेंगे।

यह देश के जन जन के चेत जाने का वक्त है. गोरे अंग्रेजों ने तो इस देश के दो ही टुकड़े किए थे. ये आज के नेता पता नहीं कितने टुकड़े करेंगे. आम आदमी के पास कोई और ताकत हो या नहीं, उसके पास वोट की ताकत तो है. ठान लीजिए कि देश और समाज के साथ दिलों के टुकड़े करने और भाषा, प्रान्त, नस्ल के आधार पर लोगों को आपस में लड़ने वालों को किसी भी सूरत में संसद और विधानसभाओं तक नहीं पहुँचने देना है. भगा दो इन काले अंग्रेजों को, नहीं तो ये सत्ता पाने और अपनी तिजोरियां भरने के लिए इसी तरह आम आदमी को मरवाते रहेंगे। और तोड़ डालेंगे इस देश को.

ओमकार चौधरी


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Sunday, October 12, 2008

जांच आयोगों के जरिये घिनौनी राजनीति


जांच आयोगों की निष्पक्षता पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। इस बार चूकि मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने सवाल खड़ा किया है, इसलिए इस मुद्दे पर बहस जरूर होनी चाहिए। मामला गुजरात दंगों की दो जांचों से जुडा है। पहले तो ये ही सवाल उठता है कि एक ही मामले की दो जांच क्यों ? सभी अवगत हैं कि 27 फरवरी 200 2 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लग गई थी, जिसमे अयोध्या से लौट रहे 58 कारसेवक मारे गए थे। भाजपा नेता आरोप लगाते रहे हैं कि ट्रेन में उपद्रवियों ने बाहर से तेल छिड़क कर आग लगाई थी। उसी घटना के बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे। एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें अधिकतर मुस्लिम समुदाय के थे। उस समय नरेन्द्र मोदी सरकार पर आरोप लगे कि उसने दंगाइयों को रोका नहीं। उल्टे पुलिस और प्रशासन ने शासन के इशारे पर चुप्पी साध ली। अदालतों में मामलों की सुनवाई शुरू हुई तो भी जांच एजेंसियों पर दोषी आधिकारियों और उपद्रवियों को बचाने के गंभीर आरोप लगे। नतीजतन हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने मामलों की सुनवाई गुजरात से बाहर करने के अभूतपूर्व आदेश जारी कर दिए।
दंगों को लेकर देश में जमकर राजनीति होती रही है। कांग्रेस जहाँ भाजपा पर साम्प्रदायिक भावनाएं भड़का कर वोट की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है, वहीं भाजपा कांग्रेस पर मुस्लिम समुदाय को भड़काने और भाजपा के खिलाफ मिथ्या प्रचार करने का आरोप लगाती रही है। गुजरात दंगों की कालिख एक दूसरे के चेहरे पर पोतने के लिए दोनों ही दलों ने कोई कसर बाकी नहीं छोडी है। इससे आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है कि भाजपा सरकार ने साबरमती एक्सप्रेस की जांच के लिए नानावती आयोग बैठाया तो केन्द्र की मनमोहन सरकार ने यूं एस बनर्जी आयोग का गठन कर दिया। इन आयोगों ने वही किया, जो दोनों सरकारें चाहती थीं। नानावती आयोग ने मोदी सरकार को क्लीनचिट दे दी और बनर्जी आयोग ने भाजपा को झूठा साबित करने के लिए कहा कि ट्रेन में आग भीतर से ही लगी। बाहर से आगजनी के कोई सबूत नहीं मिले हैं। घटना पूर्व नियोजित षडयंत्र का हिस्सा नही थी.

मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एस राजेंद्र बाबू की इस पर बहुत तीखी प्रतिक्रिया आयी है। उन्होंने इस तरह की जांचों पर सवाल खड़े करते हुए जहाँ सरकारों को कटघरे में खड़ा किया है. वहीं, आयोगों को भी यह कहते हुए लताड़ लगाई है कि वे बेहद संवेदनशील मामलों की भी निष्पक्ष जांच नहीं कर रहे हैं। जस्टिस एस राजेंद्र बाबू ने कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि इन जांच आयोगों की अलग अलग रिपोर्ट्स से साफ़ हो गया है कि उन्होंने सरकार के दबाव में काम किया, जो बेहद चिंता का विषय है. ऐसे आयोग निष्पक्ष हो भी कैसे सकते हैं, जिनकी सेवा शर्तें सरकार तय करती हैं. उन्होंने जांच आयोगों के अध्यक्षों के कामकाज के तरीकों पर यह कहते हुए सवाल उठाए हैं कि गोधरा हो या नंदीग्राम.. पीड़ित तो आम आदमी ही रहा है.
उनकी यह तल्ख़ टिप्पणी बहुत कुछ कह देती है कि आयोग की रिपोर्ट से ऐसा नहीं लगना चाहिए कि किसी की अनदेखी कर दी गयी है और किसी का पक्ष लिया गया है. नानावती आयोग ने तो कमाल ही कर दिया है. उसने नरेन्द्र मोदी, उनकी सरकार के मंत्रियों और पुलिस तक को क्लीनचिट दे दी. उसने कहा कि गोधरा मामले में इनकी कोई भूमिका नहीं थी. ध्यान रहे, नानावती को यह जिम्मेदारी सौपी गयी थी कि वे पता लगाएं कि साबरमती एक्सप्रेस में आग लगने के क्या कारण थे. केन्द्र सरकार, खासकर लालू प्रसाद यादव द्वारा बैठाए गए यूं एस बनर्जी आयोग की रिपोर्ट भी संदेहों के घेरे में रही है. उन्होंने अंतरिम रिपोर्ट ऐसे समय दी थी, जब बिहार में विधानसभा चुनाव का ऐलान हो गया था. लालू यादव और कांग्रेस ने चुनाव के दौरान उस रिपोर्ट का जमकर दुरूपयोग किया और मुस्लिम वोटों के दोहन में कोई कसार बाकी नहीं छोडी. इसलिए अगर मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने जांच आयोगों के कामकाज के तौर तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं तो यह बेवजह नहीं हैं.


ओमकार चौधरी

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Sunday, October 5, 2008

राहुल गांधी पर दांव लगाएंगी सोनिया ?


कांग्रेस के भीतर से उठ रहे संकेतों को समझें तो लगता है की एक वर्ग राहुल गाँधी को अपने सर्वमान्य नेता के तौर पर देखने को कुछ ज्यादा ही उतावला है। आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा, इसे लेकर पिछले कुछ समय से कुछ ज्यादा ही बयानबाजी हो गयी है. यह होड़ तब शुरू हुई, जब पंजाब यात्रा के समय ख़ुद राहुल ने बयान दे डाला कि वे प्रधानमंत्री बन सकते हैं. चापलूस किस्म के कांग्रेसियों को मौका और बहाना मिल गया। हद तो तब हो गयी, जब इस मुहिम में वीरप्पा मोइली, दिग्विजय सिंह और अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज नेता भी शामिल हो गए।

कांग्रेस में ऐसे कई नेता हैं जिन्हें, मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियाँ पसंद नहीं हैं। कुछ प्रधानमंत्री के तौर पर आज तक भी मनमोहन सिंह को स्वीकार नहीं कर पाए हैं। इनमे अर्जुन सिंह, प्रणब मुख़र्जी और शिवराज पाटील प्रमुख हैं। ये नेता ही राहुल गांधी को आगे करके मनमोहन को पीछे धकेलने के लिए उतावले हैं. हालाँकि कांग्रेस के कुछ गठबंधन सहयोगी मनमोहन को ही अगले चुनाव में भी नेता बनाए रखने के पक्ष में हैं। इनमे लालू यादव और शरद पवार सरीखे नेता शामिल हैं। अभी चुनाव में चूकि समय है, इसलिए पार्टी नेता जल्दबाजी में नहीं हैं. माना जा रहा है कि चुनाव से पहले राहुल गांधी को आगे करने की मुहिम जोर पकडेगी।

ऐसे कई मसले हैं, जिन पर मनमोहन सरकार कटघरे में है। आर्थिक मोर्चे पर अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री और उनकी टोली बुरी तरह विफल साबित हुई है. इस टोली में वित्त मंत्री पी चिदंबरम, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया और रिजर्व बैंक के गवर्नर शामिल हैं. महंगाई सातवे आसमान पर है. कर्ज लेकर घर बनने का सपना देखने वालों का बुरा हाल है. बैंकों ने ब्याज की दर हद से ज्यादा बढ़ा दी है. पट्रोलियम पदार्थों के दाम बेतहाशा बढे हैं. 2004 में कांग्रेस ने नारा दिया था, कांग्रेस का हाथ-आम आदमी के साथ। विपक्ष अब इसी को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को घेरने की तैयारियों में जुटा है. सोनिया भी जानती हैं कि मनमोहन सिंह लोकप्रिय प्रधानमंत्री साबित नहीं हुए हैं. सही बात तो ये है कि सोनिया गांधी के सामने वे प्रधानमंत्री के रूप में कभी स्थापित हो ही नहीं सके. उन्हें हमेशा 10, जनपथ का ताबेदार ही माना गया. आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर तो ये सरकार विफल रही ही है।

मनमोहन सिंह दस दिन की विदेश यात्रा से लौटे तो अपनी उम्मीदवारी को लेकर उन्होंने यह कहकर चर्चाओं को और पंख लगा दिए कि अभी से इस बारे में अटकलबाजियों का कोई अर्थ नहीं है. एक बार फ़िर सोनिया गांधी को आगे आना पड़ा. उन्होंने यह कहकर मामले को शांत करने कि कोशिश की कि प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह ने अच्छा काम किया है और वे ही प्रधानमंत्री होंगे. दरअसल, लगता है कि सोनिया अब ख़ुद भी चाहती हैं कि राहुल गांधी आगे आकर कमान संभालें. हालत और राजनीतिक मजबूरियों के साथ-साथ वर्तमान परिस्थितियां उन्हें और बाकी कांग्रेसियों को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं. माना जा रहा है कि चुनाव से कुछ पहले राहुल के पक्ष में जोरदार तरीके से माहोल बनने की मुहीम छेडी जाएगी. और उसे 10, जनपथ का समर्थन होगा. पार्टी के दिग्गज राहुल गांधी के पक्ष में खुलकर सामने आएँगे. ऐसे में मनमोहन सिंह ख़ुद राहुल के नाम को आगे करेंगे. इसलिए अगर चुनाव से पहले सोनिया राहुल को आगे करें तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा।


ओमकार चौधरी


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Saturday, October 4, 2008

कौन आग लगा रहा है कंधमाल में ?

कंधमाल में हिंसा रुकने के नाम नहीं ले रही. ताज़ा हिंसा में बीस और घरों को आग के हवाले कर दिया गया. भयभीत लोग परिवारों के साथ पलायन कर सुरक्षित जगहों पर जाने के लिए मजबूर हो गए हैं. हालात कितने भयावह हैं, इसी से पता चलता है कि अब तक बीस हजार लोग शरणार्थी शिविरों में पहुँच चुके हैं. समाज में भीतर ही भीतर अग्नि प्रज्वलित हो रही है. पुलिस प्रशासन ने ताजा हिंसा के बाद सैकडों लोगों को गिरफ्तार किया है. पहले भी गिरफ्तारियां होती रहीं हैं लेकिन हिंसा और आगजनी रुकने का नाम नहीं ले रही. उडीसा की यह सांप्रदायिक हिंसा खतरनाक मोड़ पर आ गई है. केन्द्र सरकार पर भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है. प्रधानमंत्री चिंतित हैं. केन्द्र ने उडीसा सरकार को एक एड्वोइस नोट भेजा है, जिसे धारा 356 के इस्तेमाल करने से पहले की कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है. अगर केन्द्र वहां नवीन पटनायक सरकार को बर्खास्त कर राष्टपति शासन लगाता है तो हालात और भी ख़राब हो सकते हैं.
इस समय सी आर पी ऍफ़ की 32 कंपनी वहां हिसाग्रस्त इलाकों में तैनात हैं. इससे कुछ फर्क तो पड़ा है लेकिन उपद्रवी काबू में नहीं आ रहे. अब तक सैकडों घर और चर्च फूंक डाले गए हैं. शुक्रवार तक ताजा हिंसा में 33 लोग मारे जा चुके है. कई नगरों में कर्फ्यू लगा हुआ है. अल्पसंख्यक आयोग की टीम के अलावा गृह मंत्री शिवराज पाटिल कंधमाल का दौरा कर चुके हैं. आज हालत ये हो गई हैं कि वहां कोई ख़ुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा. नवीन पटनायक सरकार हिंसा पर काबू करने में नाकाम नजर आ रही है. यहाँ यह साफ़ करना जरूरी है कि मारे गए लोगों में सिर्फ़ एक ही समुदाय के लोग नहीं हैं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है. उनमे दलित भी है, आदिवासी भी और इसाई भी. हाँ, ज्यादातर हमले ईसाइयों और दलितों पर ही हुए हैं. हमलावर हिंदू भी हैं और ईसाई भी.
ताजा हिंसा विहिप नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद शुरू हुई है, जिन्हें तीस से अधिक हथियार बंद लोगों ने जन्माष्टमी के दिन मार डाला था. वे दलितों के धर्मांतरण का पुरजोर विरोध करने वालों में प्रमुख थे. इसके बाद विश्व हिन्दू परिषद् और अन्य हिंदू संगठनों के आह्वान पर आयोजित राज्य बंद के बाद से हिंसा का जो दौर शुरू हुआ, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा.
यह सही है कि चर्चों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया है लेकिन बड़ी संख्या में दलितों के घर भी फूंके गए हैं. वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी भी जलती आग में हाथ सेंकने में पीछे नहीं रहे हैं. सरकार की ढील तो रही ही है, वहां के संगठनों ने भी इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण पर जमकर रोटियां सेंकी. वहां के हालात वाकई खतरनाक मोड़ ले चुके हैं. उडीसा आज से नहीं, पिछले दस साल से इस आग में जल रहा है, जब से आस्ट्रेल्य्न मिशनरी के ग्राहम स्टोन और उनके दो बेटों को इसी क्षेत्र में जीप में जलाकर मार डाला गया गया था. उन पर आदिवासियों और हिंदूवादी संगठनों ने विदेशी पैसे के बल पर दलितों के धर्मांतरण का आरोप लगाया था. पिछले साल कुछ हथियार बंद लोगों ने क्रस्मस डे पर ईसाई समुदाय के लोगों पर हमले किए. कई को मर डाला. चर्चों को आग लगा दी. इसके बाद से लावा सुलग रहा था, जो अब ज्वालामुखी बनकर कंधमाल के साथ पडौसी जिलों को भी लीलने में लगा है.
केन्द्र वहां के हालातों से बेहद चिंतित है. प्रधान मंत्री ने केबिनेट की बैठक बुलाई है. आशंका है कि पटनायक सरकार को बर्खास्त करने का फ़ैसला लिया जा सकता है. यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा. इसके बाद हिंदूवादी संगठनों को और भी खुलकर खेलने का मौका मिल जाएगा. इसलिए जरूरी है कि केन्द्र सोच समझकर फ़ैसला ले. अच्छा तो ये ही होगा कि पटनायक को बुलाकर बात की जाए और उन्हें जितनी भी मदद की जरूरत है, वह मुहैय्या कराई जाए. ऐसे समय की जाने वाली राजनीति हालात को और पेचीदा बना सकती है.

ओमकार चौधरी
mailto:homkarchaudhary@gmail.com

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Sunday, September 28, 2008

तुम अगर साथ देने का वादा करो..

बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी, ख्वाबों ही में हो चाहे मुलाकात तो होगी.
तुम अगर साथ देने का वादा करो, मै यूँ ही मस्त नगमे सुनाता रहूँ.
तू हुस्न है मै इश्क हूँ, तू मुझमे है मै तुझ में हूँ
आधा है चंद्रमा रात आधी, रह न जाए तेरी मेरी बात आधी
तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ, वफ़ा कर रहा हूँ, वफ़ा चाहता हूँ.
किसी पत्थर की मूरत से मुहब्बत का इरादा है....
मेरा प्यार वो है के मरकर भी तुमको जुदा अपनी बाँहों से होने न देगा...

प्यार के इन मधुर गीतों को स्वर देने वाले महेंद्र कपूर नहीं रहे, यह ख़बर सुनकर दिल धक् सा रह गया. किशोर कुमार, मुकेश और मुहम्मद रफी की कड़ी के एक और पार्श्व गायक चले गए. इन सभी की अपनी एक खास पहचान थी. मुकेश दर्द भरे गीतों के जाने गए तो रफी ने हर तरह के गीत गाए. किशोर का अपना ही अंदाज़ था। उछल कूद से लेकर उन्होंने तेरी दुनिया से होके मजबूर चला, मै बहुत दूर..बहुत दूर..बहुत दूर चला..जैसे बेहद संजीदा गीत भी गाए. महेंद्र कपूर ने देश भक्ति गीतों से अपनी खास पहचान बनाई. हालाँकि उन्हें इसकी शिकायत भी रही कि उनके गाए प्यार के मस्त नगमों को नजर अंदाज कर दिया जाता है और लोग देश भक्ति के उनके गाने याद करते हैं. खासकर मनोज कुमार ने अपनी फिल्मों में उनसे देश भक्ति के गीत गवाए. मेरे देश की धरती सोना उगले..उगले हीरे मोती..है प्रीत जहाँ की रीत कि सदा..मै गीत वहां के गता हूँ, भारत का रहने वाला हूँ भारत की बात सुनाता हूँ और दुल्हन चली..हो रे पहन चली..तीन रंग की चोली..जैसे गीत अमर हो गाए. फ़िल्म पूरब और पश्छिम में उनकी गयी आरती ओइम जय जगदीश हरे..तो इस कदर लोकप्रिय हुई कि आज भी एक बड़े वर्ग में घर घर गाई जाती है. कोई धार्मिक अनुष्ठान हो और उसी धुन में आरती न गयी जाए, ऐसा सम्भव नहीं

एक गीत की रिकार्डिंग के मौके पर रफी, मुकेश और आशा भोंसले के साथ महेंद्र कपूर

1934 में देश के प्रमुख सांस्कृतिक शहर अमृतसर में जन्मे महेंद्र कपूर को मायानगरी में अपना स्थान बनने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। एक प्रतियोगिता के जरिये वे चुने गए. हुस्न चला है इश्क से मिलने॥उनका पहला गीत था, जिसने उन्हें चर्चा में ला दिया. बहुत कम लोग जानते हैं कि शुरू में मुहम्मद रफी ने उन्हें काम दिलाने में बहुत मदद की थी. बाद में जब किशोर कुमार ने फ़िल्म इंडस्ट्री में कदम रखा तो एक दौर ऐसा भी आया कि जब निर्माता निर्देशकों ने केवल किशोर से गाने गवाना शुरू कर दिया. रफी और महेंद्र कपूर लगभग खाली होकर बैठ गए. उस दौर के बारे में ख़ुद महेंद्र कपूर ने एक रेडियो इंटरव्यू में एक बार खुलासा किया था. वे 74 के थे. बीमारी ने उन्हें आ घेरा था. हम सबके लिए यह दुखद ख़बर है, जो उनके गीत गुनगुनाते हुए बड़े हुए हैं. दुखद यह भी है कि निकाह के बाद उन्हें फिल्मों में काम मिलना लगभग बंद हो हो गया था. वे धार्मिक कार्यकर्मों में गाते हुए नजर आने लगे थे. किशोर, रफी और मुकेश के दौर के एक और बेहतरीन गायक हमसे रुखसत हो गए. जब भी उनका ये गीत सुनेंगे..तब उनकी बहुत कमी खलेगी.. तुम अगर साथ देने का वादा करो..में यूँ ही मस्त नगमे सुनाता रहूँ
ओमकार चौधरी



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Saturday, September 27, 2008

पाटिल साहब देश को जवाब दें


दिल्ली में फ़िर धमाका हुआ है। इस बार निशाने पर दक्षिण दिल्ली का महरोली इलाका रहा। दो सप्ताह पहले ही तो दिल्ली में सीरियल धमाके हुए थे, जिनमें पचास से ऊपर बेक़सूर मारे गए थे। राजधानी में आतंकवादियों की खून की होली यह बताने को काफी है कि उनकी पैठ कितनी गहरी है वे चाह रहे हैं, वहां हमले करने में कामयाब हैं। केन्द्र की यूपीए सरकार आतंक पर लगाम लगाने में नाकाम सिद्ध हो रही है। वक्त आ गया है जब ग्रह मंत्री शिवराज पाटिल को अब देश को जवाब देना ही होगा।
वैसे भी वे विपक्ष के साथ-साथ अपने सहयोगी दलों के भी निशाने पर हैं। लालू यादव ही नहीं, बाहर से सरकार को समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी के भी निशाने पर वे आ चुके हैं। सरकार के कई घटक दलों का मानना है कि ग्रह मंत्री के तौर पर पाटिल कम से कम आतंकवाद के मोर्चे पर पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। उनकी सरपरस्ती मे कश्मीर से लेकर असम तक की समस्या और अधिक उलझी है। अब सोनिया गांधी को भी पाटिल के सम्बन्ध में निर्णय लेना ही होगा।
अब तक के घटनाक्रम से ये साफ हो गया कि वह राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में असफल रहे हैं। न वे खुफिया तंत्र को चुस्त चौकस कर पाएं हैं और न ही आतंकवादी संगठनों की लगाम कस पाएं हैं। हाल की घटनाओं से तो लगता है कि आतंकवादी अब बेखौफ होकर अपने नापाक मंसूबों का पूरा करने में लगे हैं।
जब केन्द्र में अटल बिहारी बाजपाई की सरकार थी, तब भी एक दौर ऐसा आया था, जब आतंकवादी खुलकर खेल रहे थे। संसद से लेकर अयोध्या तक और संकटमोचन मन्दिर से लेकर जम्मू कश्मीर विधान सभा तक पर अटैक कर रहे थे, तब यही शिवराज पाटिल लोकसभा में राजग सरकार को पानी पी पीकर कोसते थे। अब वे चार साल से गृहमंत्री हैं तो देश को बताएं कि निर्दोषों के खून कि ये होली रोकने में वे क्यों नाकाम सिद्ध हो रहे हैं।
ओमकार चौधरी

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पत्रकारिता के ये कौन से मानदंड हैं ?

पत्रकारिता के पेशे में हम लोगों को कई बार अपमान के कड़वे घूँट पीकर चुप रहना पड़ता है. इस बार भी चुप रह सकता था, लेकिन हरकत ही ऐसी हुई है कि चुप नहीं रहा जा सकता. अमर उजाला में मैंने साढे सात साल से अधिक समय बिताया है. उसी अख़बार के किसी अधिकारी ने 26 सितम्बर को ऐसी हरकत की है जिसे चुप रहकर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. मुझे पता नहीं कि ये बात अमर उजाला के निदेशक अतुल महेश्वरी और ग्रुप एडिटर शशि शेखर की जानकारी में है कि नहीं. मुझे व्यक्तिगत रूप से इस अवांछित हरकत ने भीतर तक पीड़ा पहुंचाई है. आम तौर पर मै शांत रहता हूँ. छोटी-मोटी बातों को वैसे भी पेशागत मजबूरियों के चलते हम लोग पीते ही रहते हैं. जो हुआ, उसे पीना और हज़म करना मुश्किल नहीं, असंभव है.
मै तीस सितम्बर तक DLA के मेरठ संस्करण से बतौर रेजिडेंट एडिटर जुड़ा हूँ. एक अक्तूबर से हरिभूमि से फ़िर जुड़ने जा रहा हूँ. वहां पहले भी तीन साल काम कर चुका हूँ. मै पिछले छब्बीस साल से पत्रकारिता जगत में हूँ. कभी न ऐसी हरकत किसी के साथ की और न ही ये मेरे स्वभाव में है कि बर्दाश्त की जाए. ये इन्टरनेट युग है. मेरे जैसे बहुत से पत्रकार हैं, जो ब्लोग्स पर भी कुछ न कुछ लिखते रहते हैं. मेरा भी आजकल के नाम से ब्लॉग है. मैंने 24 सितम्बर को शबाना आज़मी के एक बयान पर नई पोस्ट डाली थी. इसमे उनकी इस पीड़ा को रेखांकित किया गया कि पाँच-सात सिरफिरे लड़कों के कारण आजमगढ़ जैसे रवायती शहर को ये प्रचारित कर बदनाम नहीं किया जाना चाहिए कि वहां आतंकवादियों की नर्सरी तैयार हो रही है.
अमर उजाला ने एडिट पेज पर हाल ही में ब्लॉग कोना नाम से नया कालम शुरू किया है. इसमे ब्लोगर ताज़ा मसलों पर क्या लिख रहे हैं, उसे लिया जाता है. 26 सितम्बर के संस्करण में शबाना आज़मी पर लिखे गए मेरे लेख को इसमे लिया गया है शबाना आज़मी की पीड़ा को समझिये शीर्षक से. एडिट पेज देख रही डेस्क ने ब्लॉग के साथ मेरा नाम भी नीचे दिया, जैसा कि व्यवस्था है. लेकिन जिसने पेज चेक किया, उसने ओमकार चौधरी नाम को खुरचकर हटा दिया और बेशर्मी के साथ ब्लॉग का नाम आजकल जाने दिया. मै इस हरकत को उजागर करने के लिए यहाँ अख़बार में छपे अंश को स्केन करके एज इट इज डाल रहा हूँ. मजेदार बात ये है कि दूसरे ब्लोगर का नाम पूरे सम्मान और आस्था भाव से प्रकाशित किया गया है.
यहाँ से नाम खुरच देने से क्या मनोरथ पूरा हुआ, ये समझ से बाहर की बात है. मै ये भी समझ पाने में असमर्थ रहा कि मेरा नाम प्रकाशित हो जाने से कौन सा जलजला आने वाला था. अमर उजाला में रहते हुए मेरा नाम पाँच सौ बार तो छपा होगा. मेरे पास ऐसी बहुत सी कटिंग्स हैं, जो अमर उजाला में लीड बनकर छपी हैं, वो भी बाई लाइन. मै ये समझ पाने में असफल हूँ कि अगर इतनी ही परेशानी थी तो मेरे ब्लॉग से टिप्पणी ली ही क्यों गई ? और ली, तो ये हरकत क्यों की गयी ? ये पत्रकारिता के कौन से मानदंड स्थापित किए जा रहे हैं ? इन 26 सालों में मै खूब छपा हूँ. आज भी छप रहा हूँ. ये सिलसिला अन्तिम साँस तक जारी रहेगा. किसी एक जगह से किसी का नाम खुरच देने से क्या किसी की हस्ती मिटाई जा सकती है ? कोई कहीं भी क्यों न बैठा हो, उसे अपने आपको खुदा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. तकदीर यहाँ बैठकर नहीं लिखी जाती हैं. या तो ऊपर वाले की मेहर होती है या फ़िर आदमी अपनी मेहनत से ख़ुद लिखता है.

आज़मी पर लिखी मूल पोस्ट
( नीचे क्लिक करें )
शबाना आज़मी की पीड़ा


ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

यहाँ अमर उजाला के एडिट पेज पर की गयी इस हरकत को आपके
लिए दे रहा हूँ. पढने के लिए स्केन करके डाले गए लेख पर क्लिक करें



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Thursday, September 25, 2008

शबाना आज़मी की पीड़ा


फ़िल्म अभिनेत्री और पूर्व राज्यसभा सदस्य शबाना आज़मी मीडिया से नाराज हैं. मीडिया के खुलेपन और निष्पक्षता पर भी उन्होंने गंभीर सवाल खड़े किए हैं. उनकी नाराजगी की वजह मीडिया द्वारा उनके गृह जिले आजमगढ़ को आतंकवादियों की नर्सरी बताना है. मीडिया के रवैये पर काफी क्षुब्ध शबाना पूछ रहीं हैं कि पॉँच-सात सिरफिरे लोगों के कारण क्या किसी पूरे इलाके को बदनाम किया जाना सही है ? आपको बता दें कि हाल ही में दिल्ली में हुए बम धमाकों के बाद दिल्ली पुलिस ने जामिया नगर में मुठभेड़ के बाद जिस सैफ को गिरफ्तार किया, वो आजमगढ़ का रहने वाला है. पुलिस की मानें तो उस से हुई पूछताछ में ये रहस्य उदघाटन हुआ है कि उस समेत सात युवक इन धमाकों को अंजाम देने में शामिल रहे है. इनमे से अधिकांश आजमगढ़ के रहने वाले हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि सैफ के पिता पहले ही कह चुके हैं कि अगर उनका बेटा दोषी है तो वे ख़ुद चाहेंगे कि उसे सख्त सजा मिले. अकेले शबाना ही नहीं, पूरा आजमगढ़ शर्मसार है. बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि अधिसंख्य मुसलमान मुठ्ठी भर भटके हुए लड़कों के कारण बेहद व्यथित हैं. आजमगढ़ कैफी आज़मी का जिला है और उन्होंने अपना आख़िर का बहुत सा समय वहीं बिताया था. आज अगर मीडिया कुछ सवाल उठा रहा है तो इसकी वजह भटके हुए चंद सिरफिरे लड़के हैं, जिन्होंने आज़मी परिवार की इस बेहद कामयाब अभिनेत्री और समाजसेविका की पीड़ा को भी बाहर ला दिया.
आज़मी परिवार की निष्ठा पर कौन संदेह कर सकता है ? कैफी आज़मी की विचारधारा वामपंथी थी लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कम्युनिष्टों जैसा व्यव्हार नहीं किया. देश की तरक्की के लिए किए जाने वाले प्रयासों का उन्होंने कभी विरोध नहीं किया, जैसा आज के कम्युनिष्ट करते हैं. वैसे भी उनकी सक्रिय राजनीति में खास दिलचस्पी नहीं रही. बहरहाल, बात आजमगढ़, शबाना की नाराजगी और मीडिया की भूमिका की हो रही थी. शबाना जैसे तरक्की पसंद लोगों को भी गंभीरता से सोचना होगा कि आख़िर ये हालात क्यों बन रहे हैं. हालांकी समय-समय पर ख़ुद शबाना और जावेद अख्तर ने आतंकवाद की निंदा की है लेकिन उन जैसे सही सोच वाले मुसलमानों को आगे आकर इस तरह की वहशियाना हरकतों की और कड़े शब्दों में निंदा करनी होगी. जहाँ तक मीडिया की भूमिका का सवाल है, उस पर निश्चित रूप से गहरे मंथन की जरूरत है. अमेरिका में 2001 में 11 सितम्बर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए घातक हमले के बाद वहां के मीडिया ने न तो मारे गए लोगों के शव टीवी चेनल्स पर दिखाए और न ही किसी पीड़ित परिवार को रोते बिलखते हुए दिखाया. हमारे यहाँ तो लाइव कवरेज़ में क्या क्या नहीं दिखाया जाता. आतंकवादियों का असल मकसद तो हमारे ये चेनल्स ही पूरा करने में लगे हैं. वे तो एक छोटे से इलाके में बम धमाके करते हैं, मीडिया उसे लाइव दिखाकर पूरे देश ही नहीं, विश्व भर में पहुँचा देता है. इसे देख कर लोगों के मन पर कितना बुरा असर पड़ रहा है, इसका अंदाजा मीडिया को नहीं है, उसे केवल टीआरपी दिखाई देती है. चेनल्स की आपसी प्रतिद्वंदिता ने सारी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है. सूचना देने के अधिकार का यह कतई मतलब नहीं है कि देश और समाज पर पड़ने वाले असर की पूरी तरह अनदेखी कर दी जाए.
आजमगढ़ को बदनाम न करें
आज़मी की इस पीड़ा को समझा जा सकता है. मुठ्ठी भर लोगों की कारस्तानी के लिए न तो किसी कौम को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें होनी चाहिए और न ही किसी गौरवशाली परम्परा के शहर को इस तरह बदनाम करने के प्रयास होने चाहिए. सही बात तो यह है कि मीडिया को आज अपनी भूमिका, जिम्मेदारी और समाज व देश के प्रति जवाबदेही पर गंभीर मंथन करना चाहिए. महज सूचना देने के अधिकार के नाम पर जिस तरह सनसनी फैलाने की कोशिश मीडिया करता है, उस पर अब सही सोच के लोग सवाल खड़े करने लगे हैं. खास कर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में होड़ लग गई है. यह होड़ ख़त्म होनी चाहिए. मीडिया को सोचना होगा कि इस होड़ में कहीं वह जाने अनजाने किसी का मनोरथ तो पूरा नहीं कर रहा है ?

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

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फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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