Tuesday, August 26, 2008

तटबंध

जब भी कोई नदी
तोड़ती है तटबंध
आ जाती है प्रलय
मच जाती है तबाही
उजड़ जाती हैं बस्तियां
और बहुतों के सुहाग
रास्ता बदल लेना
नदी की फितरत नही है
ये अलग ही दौर है
नदियाँ रास्ता बदल लेती हैं
और मच जाती है तबाही
अकेले कोसी को दोष मत दो
जिसे देखो, जिधर देखो
नदियाँ तोड़ रही है तटबंध
बदल रही है रास्ता
बस्तियां उजडती हों उजडें
तबाही होती है तो हो
प्रलय और तबाही से
भला उनका क्या वास्ता
ये आज के दौर की नदियाँ हैं
रास्ता बदलती है
उफनती हैं
तो इसकी वजह वे नही
बल्कि हालात हैं
नदियों को दोष क्यो देते हो
उनकी मर्यादा किसने भंग की ?
उन्हें तटबंध तोड़ने को
किसने विवश किया ?
सोचोगे
तो उसे नही
ख़ुद को कोसोगे


-ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com





0 comments:

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

ऊपर वापिस लौटें