Wednesday, August 27, 2008

अपने अपने दर्द समंदर

अपने-अपने दर्द समंदर
अपने-अपने वीराने हैं
सब चेहरे जाने पहचाने
फ़िर भी कितने बेगाने हैं
एक दूजे में मस्त यहाँ सब
हम ही तनहा-अनजाने हैं
कैसी दुनिया कैसे लोग
हर रिश्ते के अफसाने हैं
किसी के हिस्से खाली जाम
कहीं छलकते पैमाने हैं
कहीं भूख से मौत के मेले
कहीं बिखरते खानें हैं
कैसी बातें लेकर बैठे
हम भी कैसे दीवाने हैं
-ओमकार चौधरी

4 comments:

seema gupta August 28, 2008 at 9:22 AM  

कैसी बातें लेकर बैठे
हम भी कैसे दीवाने हैं
" wonderful poetry liked reading it"

"hum to therey deewane,
deewano jaisee bateyn kerteyn hain,
jug chutey ya rub ruthey,
subkee fikr mey aahen brthey hain..."

Regards

हरि August 28, 2008 at 11:34 AM  

आपके दर्द कविता में दिखाई दिए। जमाने के दर्द हैं आपकी कलम में। इसी तरह जमाए रहिए।

Udan Tashtari August 28, 2008 at 5:53 PM  

बहुत उम्दा, क्या बात है!

Manvinder August 28, 2008 at 8:48 PM  

bahut achcha likha hai
kavitao ki bhochaar jaari rakhe

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