Wednesday, September 17, 2008

बन्दूक की संस्कृति का संधान जरूरी

किसी भी सभ्य समाज के लिए इससे अधिक चिंता की बात भला और क्या हो सकती है कि लोग सविधान और कानून पर विश्वाश करना छोड़कर बन्दूक उठा लें और हर समस्या का हल लाठी-गोली से करने की कोशिश करने लगें. हालाँकि सोचने की बात ये भी है कि लोगों का संविधान, कानून और अदालतों से भरोसा क्यों उठ रहा है. व्यवस्था से मोह भंग क्यों होता जा रहा है. सत्ता और कुर्सी पर बैठे लोग ऐसे संगठनों को पनपने का मौका क्यों दे रहे हैं, जो देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त हैं और आम आदमी को नाइंसाफी का यकीन दिलाकर भड़काने में कामयाब होते जा रहे हैं. पूर्वोत्तर के कई राज्य अलगाववादी संगठनों के आंदोलनों के कारण कई साल तक जलते रहे . कुछ एतिहासिक गलतियों और केन्द्र के तुगलकी निर्णयों ने जम्मू कश्मीर के हालात बिगाड़ दिए. आदिवासी इलाकों की लगातार उपेक्षा का ही परिणाम है कि आज देश के सोलह राज्य नक्सली हिंसा की चपेट में हैं. समय समय पर केन्द्र और राज्यों की सरकारों ने हिंसा में लिप्त संगठनों को हथियार डालकर वार्ता की मेज पर आमंत्रित किया. बातचीत में गंभीरता की कमी रही. समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रयास कम हुए, उन्हें उलझाए रखने की कोशिशे ज्यादा हुई. नतीजा ये हुआ कि हिंसक गतिविधियों में लगे संगठनों को सरकारों के खिलाफ दुष्प्रचार के और मौके मिल गए. अविश्वास की खाई और चौडी होती चली गई.
राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटील ने मंगलवार को नई दिल्ली में राज्यपालों के सम्मलेन में बन्दूक की इस घातक संस्कृति पर गहरी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि देश विरोधी गतिविधियों में लगे संगठनों और लोगों के खिलाफ सख्ती करनी होगी. बकौल राष्ट्रपति हमारे सामने आतंकवाद, वामपंथी उग्रवाद और विद्रोही गतिविधियाँ बड़ी चुनौती हैं. अलग अलग मकसद वाले संगठनों ने राष्ट्र के विरूद्ध एक लम्बी और स्थाई लडाई छेड़ रखी है. तेरह सितम्बर को दिल्ली में हुए विस्फोटों कि चर्चा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि महानगरीय आतंकवाद की ऐसी उभरती हुई घटनाओं ने विध्वंशकारी गतिविधियों को नया आयाम दिया है, जो बेहद चिंता का विषय है.
श्रीमती पाटील ने जो कहा, उससे असहमत होने की कोई वजह नही है. लेकिन क्या कभी किसी सरकार ने उन कारणों की तह में जाकर उनके समाधान की गंभीर कोशिश की है, जिनके चलते विभिन्न राज्यों में ये हालात उत्पन्न हुए हैं. केन्द्र की सरकारों ने राजनीति ज्यादा की है, समाधान खोजने के प्रयास कम किए हैं. क्या केन्द्र और राज्यों की सरकारें उन कारणों से अपरिचित हैं ? बिल्कुल नहीं. हकीकत यह है कि समस्याओं को सुलझाने की नीयत ही नहीं है. सरकारों ने छोटी-छोटी समस्याओं को इतना विकराल बना दिया है कि अब उनमे कई तरह के पेंच फंस गए हैं. कुछ संगठनों को विदेशों से भरपूर मदद मिलने लगी है. इन संगठनों के नेता अब विदेशी हुक्मरानों की भाषा में बात करने लगें हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि इन राज्यों के ज्यादातर लोग भी उनकी राय से इत्तेफाक रखते हैं. अलगाववाद की बोली को आज भी अधिकांश लोग सिरे से खारिज करते हैं.
लोग पूछते हैं कि आतंकवाद, अलाववाद और बन्दूक की इस नई संस्कृति का आख़िर समाधान क्या है ? सवाल पूर्वोतर और जम्मू कश्मीर का ही नहीं है, राज्यों में आम आदमी भी इंसाफ में देरी से इतना नाराज है कि वो ख़ुद बन्दूक उठा लेता है. ऐसे में यह प्रश्न निश्चित ही गंभीर बन जाता है. कानून, संविधान और व्यवस्था पर लोगों का विश्वास फ़िर से कायम हो, इसके लिए सबसे जरूरी है कि भ्रष्ट व्यवस्था ख़तम हो. आम आदमी को शीघ्र न्याय मिले. पुलिस, प्रशासन को चुस्त चौकस और संवेदनशील बनाया जाए. अदालतों और जजों की संख्या बधाई जाए. सरकार गवाहों की सुरक्षा की गारंटी ले. हर अपराध की सुनवाई और सजा की अवधि तय की जाए. जिन इलाकों का विकास नहीं हुआ है, वहां तुंरत प्राथमिकता के आधार पर ये काम किया जाए. इसके अलावा देश विरोधी गतिविधियों में लगे संगठनों और लोगों के खिलाफ ऐसी कठोर कार्रवाई की व्यवस्था कानून में हो कि कोई भी संगठन इस तरह की हरकत करने से पहले दस बार सोचे. जो राष्ट्र की मुख्य धारा में रहकर बातचीत करने को तैयार हैं, उनसे गंभीरता और ईमानदारी से बातचीत कर समस्याओं के निश्चित समयावधि में समाधान के प्रयास किए जाएँ. विदेशी तंत्र के दुष्प्रचार की हवा निकलने के लिए तथ्यों के आधार पर जवाब दिए जाएँ. अगर वे फ़िर भी बाज नहीं आते हैं तो उस देश से दो टूक बात की जाए.
यह शत प्रतिशत सही बात है कि नक्सलवादी समस्या, शोषितों की उपेक्षा, अभावग्रस्तता और असंतोष के कारण सोलह राज्यों तक फ़ैल चुकी है. इसका समाधान ये ही है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था को संवेदनशील, जवाबदेह, चुस्त चौकस और मजबूत बनाया जाए. उनकी समस्याओं का अविलंभ समाधान किया जाए. बेहतर प्रशासन दिया जाए. लोगों को रोजगार के ज्यादा अवसर मुहैया कराएं जाएँ. इसके अलावा अपनी पुलिस व्यवस्था को भी दुरुस्त किए जाने की जरूरत है. उसका चेहरा दमनकारी का नही, न्याय दिलाने वाले संगठन का होना बेहद जरूरी है. अगर सरकार इतनी कोशिशे कर लेती है तो जो सूरत इस समय दिखाई दे रही है, निश्चित ही वो बदलेगी.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

3 comments:

Hima Agarwal September 17, 2008 at 6:06 PM  

आपने सच कहा है क‍ि कोई भी सरकार आतंकवाद या हिंसा से निपटने के लिए इच्‍छुक ही नहीं दिखाई देती।

रंजन राजन September 17, 2008 at 7:08 PM  

हमारे सामने आतंकवाद, वामपंथी उग्रवाद और विद्रोही गतिविधियाँ बड़ी चुनौती हैं.
सही कहा आपने कि समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रयास कम हुए, उन्हें उलझाए रखने की कोशिशे ज्यादा हुई. नतीजा ये हुआ कि हिंसक गतिविधियों में लगे संगठनों को सरकारों के खिलाफ दुष्प्रचार के और मौके मिल गए. अविश्वास की खाई और चौडी होती चली गई.

SHEHZAD AHMED October 20, 2008 at 10:27 AM  

आपने दिशा कैसे बदली जाए उसकी रूपरेखा दिखा दी है। जरुरत इसे फोलो करनी की है। विस जनता जाग जाए तो यह राह ख़ुद ही आसन हो जायगी।

जो लिखा

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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