Saturday, September 27, 2008

पत्रकारिता के ये कौन से मानदंड हैं ?

पत्रकारिता के पेशे में हम लोगों को कई बार अपमान के कड़वे घूँट पीकर चुप रहना पड़ता है. इस बार भी चुप रह सकता था, लेकिन हरकत ही ऐसी हुई है कि चुप नहीं रहा जा सकता. अमर उजाला में मैंने साढे सात साल से अधिक समय बिताया है. उसी अख़बार के किसी अधिकारी ने 26 सितम्बर को ऐसी हरकत की है जिसे चुप रहकर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. मुझे पता नहीं कि ये बात अमर उजाला के निदेशक अतुल महेश्वरी और ग्रुप एडिटर शशि शेखर की जानकारी में है कि नहीं. मुझे व्यक्तिगत रूप से इस अवांछित हरकत ने भीतर तक पीड़ा पहुंचाई है. आम तौर पर मै शांत रहता हूँ. छोटी-मोटी बातों को वैसे भी पेशागत मजबूरियों के चलते हम लोग पीते ही रहते हैं. जो हुआ, उसे पीना और हज़म करना मुश्किल नहीं, असंभव है.
मै तीस सितम्बर तक DLA के मेरठ संस्करण से बतौर रेजिडेंट एडिटर जुड़ा हूँ. एक अक्तूबर से हरिभूमि से फ़िर जुड़ने जा रहा हूँ. वहां पहले भी तीन साल काम कर चुका हूँ. मै पिछले छब्बीस साल से पत्रकारिता जगत में हूँ. कभी न ऐसी हरकत किसी के साथ की और न ही ये मेरे स्वभाव में है कि बर्दाश्त की जाए. ये इन्टरनेट युग है. मेरे जैसे बहुत से पत्रकार हैं, जो ब्लोग्स पर भी कुछ न कुछ लिखते रहते हैं. मेरा भी आजकल के नाम से ब्लॉग है. मैंने 24 सितम्बर को शबाना आज़मी के एक बयान पर नई पोस्ट डाली थी. इसमे उनकी इस पीड़ा को रेखांकित किया गया कि पाँच-सात सिरफिरे लड़कों के कारण आजमगढ़ जैसे रवायती शहर को ये प्रचारित कर बदनाम नहीं किया जाना चाहिए कि वहां आतंकवादियों की नर्सरी तैयार हो रही है.
अमर उजाला ने एडिट पेज पर हाल ही में ब्लॉग कोना नाम से नया कालम शुरू किया है. इसमे ब्लोगर ताज़ा मसलों पर क्या लिख रहे हैं, उसे लिया जाता है. 26 सितम्बर के संस्करण में शबाना आज़मी पर लिखे गए मेरे लेख को इसमे लिया गया है शबाना आज़मी की पीड़ा को समझिये शीर्षक से. एडिट पेज देख रही डेस्क ने ब्लॉग के साथ मेरा नाम भी नीचे दिया, जैसा कि व्यवस्था है. लेकिन जिसने पेज चेक किया, उसने ओमकार चौधरी नाम को खुरचकर हटा दिया और बेशर्मी के साथ ब्लॉग का नाम आजकल जाने दिया. मै इस हरकत को उजागर करने के लिए यहाँ अख़बार में छपे अंश को स्केन करके एज इट इज डाल रहा हूँ. मजेदार बात ये है कि दूसरे ब्लोगर का नाम पूरे सम्मान और आस्था भाव से प्रकाशित किया गया है.
यहाँ से नाम खुरच देने से क्या मनोरथ पूरा हुआ, ये समझ से बाहर की बात है. मै ये भी समझ पाने में असमर्थ रहा कि मेरा नाम प्रकाशित हो जाने से कौन सा जलजला आने वाला था. अमर उजाला में रहते हुए मेरा नाम पाँच सौ बार तो छपा होगा. मेरे पास ऐसी बहुत सी कटिंग्स हैं, जो अमर उजाला में लीड बनकर छपी हैं, वो भी बाई लाइन. मै ये समझ पाने में असफल हूँ कि अगर इतनी ही परेशानी थी तो मेरे ब्लॉग से टिप्पणी ली ही क्यों गई ? और ली, तो ये हरकत क्यों की गयी ? ये पत्रकारिता के कौन से मानदंड स्थापित किए जा रहे हैं ? इन 26 सालों में मै खूब छपा हूँ. आज भी छप रहा हूँ. ये सिलसिला अन्तिम साँस तक जारी रहेगा. किसी एक जगह से किसी का नाम खुरच देने से क्या किसी की हस्ती मिटाई जा सकती है ? कोई कहीं भी क्यों न बैठा हो, उसे अपने आपको खुदा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए. तकदीर यहाँ बैठकर नहीं लिखी जाती हैं. या तो ऊपर वाले की मेहर होती है या फ़िर आदमी अपनी मेहनत से ख़ुद लिखता है.

आज़मी पर लिखी मूल पोस्ट
( नीचे क्लिक करें )
शबाना आज़मी की पीड़ा


ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

यहाँ अमर उजाला के एडिट पेज पर की गयी इस हरकत को आपके
लिए दे रहा हूँ. पढने के लिए स्केन करके डाले गए लेख पर क्लिक करें



14 comments:

Anil Pusadkar September 27, 2008 at 1:48 PM  

होती अख़बारों मे ये टुच्ची हरकत ही रहती है। आपकी नाराज़गी जायज है। लिखते रहिये अगली पारी के लिये शुभकामनायें

chandrashekhar hada September 27, 2008 at 2:59 PM  

ye hi hai akhwarnavisi chaudryji,hum doosron ki pareshaniyon ko duniya ke saamne latey hain, unki awaaj bante hain, par jab apni baat aati hai to hum chup ho jate hain.hamen apne liye bhi ladana chahiye,aapko nai jagah mubarak par APNE LIYE HAMESHA LADTE RAHIYE kyonki HAR JAGAH apko TAANG KHICHOO log mil jayenge.

manvinder bhimber September 27, 2008 at 3:11 PM  

ओमकार जी ,
आप का नाम खुरच कर अगर किसी ने नाम मिटाने की हरकत की है तो ये उसकी कुंठित मानसिकता का नमूना है. मेरे विचार से आप भी कुछ जियादा रिएक्ट कर रहे हैं...वैसे सही भी है रिअक्शन ...... लेकिन यहाँ हमारे लिए लोग इस प्रकार का सोचते है वहां वे हमारे लिए खुश होने की वजह भी छोड़ देते हैं......जिस प्राणी ने ये हरकत की है......उसने अपना छोटापण दिखा दिया है लेकिन ये भी बता दिया की आपका कद उससे " बड़ा " है ....कद बड़ा है इसी लिए उसने कद को छोटा करने का कुप्रयास किया......

seema gupta September 27, 2008 at 4:16 PM  

"who so ever has done this act, it is very shameful and he should be ashamed of this cheap act. Really sorry to know abt it"

Regards

रंजना [रंजू भाटिया] September 27, 2008 at 4:31 PM  

आप लिखते रहे ..यह गलत मानसिकता है .सोच जैसे जिसकी ..

jasmer hudda,  September 27, 2008 at 6:46 PM  

ओमकार जी जो कह रहे हैं वो एक सच है पर इनका एक दूसरा सच भी मीडिया नारद पर पढ़ने को मिला वो भी कम रोचक नहीं है

ओमकार चौधरी September 27, 2008 at 6:58 PM  

एक तो जो लोग अपना नाम छिपाकर ब्लॉग पर टिपण्णी करते हैं, उनकी मंशा पर ही शक होता है, दूसरे, अगर सच मालूम न हो तो कमेन्ट नहीं करना चाहिए, मैंने उन नारद महाराज को जवाब दे दिया है. आप भी उसे पढ़ सकते हैं.

(उसे यहाँ दे रहा हूँ)

अगर सच मालूम न हो तो किसी विषय पर इस तरह के कमेन्ट नहीं करने चाहिए. रविन्द्र अग्रवाल को वहां स्थापित करने वाला मै ही था. मैंने ही उन्हें सेलेक्ट किया था. वो संभवत : प्रबंधन तंत्र की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे. इसलिए उन्हें जाना पड़ रहा है. जहाँ तक मेरा सवाल है, मै हरिभूमि में तीन साल तक काम कर चुका हूँ, उस दौरान उस अख़बार में जो परिवर्तन हुए हैं, उनसे नारद जैसे लोग हैं, अपरिचित हैं. अन्यथा मेरे नाम के के साथ जाति नहीं लगाते. मै जहाँ रहा, वहां केवल उस जाति के लोग काम नहीं करते, जैसी बीमारी कुछ संपादकों को, और अख़बारों में है. हरिभूमि के अलावा 23 साल तक ऐसे अख़बारों में काम किया है, जहाँ के मालिक उस जाति के नहीं हैं, जिसका जिक्र इन नारद जी महाराज ने किया है. अपने ज्ञान को अपडेट करिए और तब कमेन्ट करिए...

Danish Khan September 27, 2008 at 8:26 PM  

सर, यह हरकत जिसने भी की, बड़ी ओछी है. इससे यह साफ़ है कि कोई है जो आपके नाम से खौफ खातें हैं. दूसरा पहलु यह है कि अगर नाम खुरचना था तो आपके ब्लॉग से वह लेख लिया ही क्यूँ गया ?
इसका मतलब वो लोग आपके ब्लॉग के कंटेंट को तो इस्तेमाल कर रहे हैं पर आपका नाम देने में उन्हें दिली तकलीफ होती है.

श्रीकांत पाराशर September 27, 2008 at 10:39 PM  

Sir aapki peeda jayaj hai. agar aapke naam se itni hi nafrat thi to poori tippani hi hata deni chahiye thi, kewal naam kyon hataya? yah nihayat ochhi harkat hai. Dusari baat, aajkal aisi mansikata ke patrakar badhte ja rahe hain. Main bhi ek kathit bade akhbar ke bangalore edition ka resident editor raha hun. mere chhod dene ke bad local star par aise aise log adhikar men aaye ki mere naam se hi khof khane lage. aur to aur main jis program men chief guest hota usme bhi mera naam nikalkar samachar chhapte. yah suruat ki baat hai jab mujhe yah sab ajeeb lagta tha. ab to kise parwah hai unki, parantu lagta hai patrakarita ka pesha aur aise log, kahan jaa rahe hain hum? Baharhal aap to mast rahiye. ye bichhu kism ke log nahin badlenge.

हरि September 28, 2008 at 5:43 PM  

अखबारों में कुछ रीढ़विहीन लोग अपनी नौकरी बचाने के लिए या बोस को खुश करने के लिए ऐसा करते रहते हैं। इनमें वह नौकर भी शामिल हैं जो शीर्ष पर होते हैं। ऐसी बातों पर ओमकार जी आपको गौर ही नहीं करना चाहिए।

उमेश कुमार September 28, 2008 at 11:50 PM  

आप उद्देलित न होकर शान्त मन से विचारो का प्रवाह बनाए रखे जिससे लोग प्रेरणा ले।ऎसे रीढ विहीन लोग आपको कदम -कदम पर मिलेगें।

dharmander September 29, 2008 at 8:32 PM  

res sir

ye bhaut bura hua likin isse jayda bura ho be nahi sakta. apke vichro ko wo ignor nahi kar sake, muje to ye accha laga. apki pahchan apke nam se nahi kam se hoti hai. age badte rahiye bus

ye tou badda toing h September 30, 2008 at 2:12 AM  

चाणक्‍य ने कहा, मुण्‍डे मुण्‍डे मतिर्भिन्‍ना, अर्थात जितनी खोपड़ीयां, उतनी ही राय या विचार ।
लोकतंत्र है भइये, सबको कहने दो, सबकी सुनो अपनी भी कह लो क्‍या दिक्‍कत है, ''सार सार को गहि रहो, थोथा देओ उड़ाय '' तुलसी या संसार में भांति भांति के लोग, सबसों हिल मिल चालिये नदी नाव संजोग ।
सामने वाला अपनी नजर में सही होता है, लेकिन आपकी नजर में गलत, आप अपनी नजर में सही हो सकते हैं लेकिन दूसरों की नजर में गलत । ये दुनियां इसी सिद्धान्‍त पर टिकी है ।
माडरेशन लगा दीजिये टिप्‍पणी पसन्‍द आये तो प्रकाशित कर दीजिये वरना धता बता दीजिये

Anonymous,  January 16, 2010 at 6:33 AM  

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