Saturday, September 27, 2008

पाटिल साहब देश को जवाब दें


दिल्ली में फ़िर धमाका हुआ है। इस बार निशाने पर दक्षिण दिल्ली का महरोली इलाका रहा। दो सप्ताह पहले ही तो दिल्ली में सीरियल धमाके हुए थे, जिनमें पचास से ऊपर बेक़सूर मारे गए थे। राजधानी में आतंकवादियों की खून की होली यह बताने को काफी है कि उनकी पैठ कितनी गहरी है वे चाह रहे हैं, वहां हमले करने में कामयाब हैं। केन्द्र की यूपीए सरकार आतंक पर लगाम लगाने में नाकाम सिद्ध हो रही है। वक्त आ गया है जब ग्रह मंत्री शिवराज पाटिल को अब देश को जवाब देना ही होगा।
वैसे भी वे विपक्ष के साथ-साथ अपने सहयोगी दलों के भी निशाने पर हैं। लालू यादव ही नहीं, बाहर से सरकार को समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी के भी निशाने पर वे आ चुके हैं। सरकार के कई घटक दलों का मानना है कि ग्रह मंत्री के तौर पर पाटिल कम से कम आतंकवाद के मोर्चे पर पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। उनकी सरपरस्ती मे कश्मीर से लेकर असम तक की समस्या और अधिक उलझी है। अब सोनिया गांधी को भी पाटिल के सम्बन्ध में निर्णय लेना ही होगा।
अब तक के घटनाक्रम से ये साफ हो गया कि वह राज्यों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में असफल रहे हैं। न वे खुफिया तंत्र को चुस्त चौकस कर पाएं हैं और न ही आतंकवादी संगठनों की लगाम कस पाएं हैं। हाल की घटनाओं से तो लगता है कि आतंकवादी अब बेखौफ होकर अपने नापाक मंसूबों का पूरा करने में लगे हैं।
जब केन्द्र में अटल बिहारी बाजपाई की सरकार थी, तब भी एक दौर ऐसा आया था, जब आतंकवादी खुलकर खेल रहे थे। संसद से लेकर अयोध्या तक और संकटमोचन मन्दिर से लेकर जम्मू कश्मीर विधान सभा तक पर अटैक कर रहे थे, तब यही शिवराज पाटिल लोकसभा में राजग सरकार को पानी पी पीकर कोसते थे। अब वे चार साल से गृहमंत्री हैं तो देश को बताएं कि निर्दोषों के खून कि ये होली रोकने में वे क्यों नाकाम सिद्ध हो रहे हैं।
ओमकार चौधरी

4 comments:

सचिन मिश्रा September 27, 2008 at 10:21 PM  

inko kapde badalne se time milega tabi to jawab degein...

Brijesh Singh September 28, 2008 at 4:08 AM  

omkar ji. kya home minister change kar dene se hi atankvad khatma hi jaega.

ओमकार चौधरी September 28, 2008 at 7:50 AM  

आप सही कह रहे हैं ब्रिजेश जी, एक होम मिनिस्टर बदल देने से आतंकवाद ख़तम नहीं होगा, लेकिन मैंने दूसरे कुछ सवाल उठाए हैं. जब विपक्ष में थे, तब यही पाटिल साहब तत्कालीन सरकार को कोसते रहते थे. सवाल अप्रोच का भी है. नीयत का भी है. अगर देश का होम मिनिस्टर बड़ी वारदात होने के बाद घटनास्थल पर जाने से पहले दो बार कपड़े बदले..तो सवाल उठने लाजिमी हैं. सवाल ये भी है की सरकार आतंवादियों को संदेश किस तरह के दे रही है ? आपने आते ही पोटा जैसा सख्त कानून ख़तम कर दिया. माना कि उसका दुरूपयोग हुआ, परन्तु आप उसमे संशोधन करके कुछ सेफगार्ड ले सकते थे ताकि आगे से उसके दुरूपयोग की आशंका ही नहीं रहे. अब जब पानी सर से ऊपर गुजरने लगा है, तब प्रधानमंत्री से लेकर विदेशमंत्री तक को लगने लगा है कि कड़ा कानून बनना चाहिए. प्रशासनिक सुधार आयोग के चेयरमेन वीरप्पा मोइली ने भी सख्त कानून की सिफारिश की है. अब ये ह्रदय परिवर्तन क्यों हो रहा है. आखिर देश की प्रभुसत्ता और एकता अखंडता जैसे सवालों पर तो राजनीति नहीं होनी चाहिए. दुर्भाग्य से आज विपक्ष में बैठे लोग भी वही कर रहे हैं. जरूरत इस बात की है कि आतंकवादियों का बहुत कड़ा संदेश दिया जाए. जिनके परिजन बेमौत मरे जाते हैं, उन्हें पता चलता है कि आतंकवाद कितना भयावह है. इसलिए सख्त कानून और सख्त सरकार की जरूरत है. येही सरकार अगर कदम उठाए तो देश के लोग इन्हीं होम मिनिस्टर की प्रशंसा करेंगे. सवाल है कि कब तक खामोश होकर बलिदान देते रहें बेक़सूर कोग ?

parul September 28, 2008 at 8:48 AM  

apki trha yha sarkar bhi soche to aatank ko jad se mitya ja sakta h.apke veecharo ko ek slaam

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पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

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