Saturday, October 4, 2008

कौन आग लगा रहा है कंधमाल में ?

कंधमाल में हिंसा रुकने के नाम नहीं ले रही. ताज़ा हिंसा में बीस और घरों को आग के हवाले कर दिया गया. भयभीत लोग परिवारों के साथ पलायन कर सुरक्षित जगहों पर जाने के लिए मजबूर हो गए हैं. हालात कितने भयावह हैं, इसी से पता चलता है कि अब तक बीस हजार लोग शरणार्थी शिविरों में पहुँच चुके हैं. समाज में भीतर ही भीतर अग्नि प्रज्वलित हो रही है. पुलिस प्रशासन ने ताजा हिंसा के बाद सैकडों लोगों को गिरफ्तार किया है. पहले भी गिरफ्तारियां होती रहीं हैं लेकिन हिंसा और आगजनी रुकने का नाम नहीं ले रही. उडीसा की यह सांप्रदायिक हिंसा खतरनाक मोड़ पर आ गई है. केन्द्र सरकार पर भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव बढ़ रहा है. प्रधानमंत्री चिंतित हैं. केन्द्र ने उडीसा सरकार को एक एड्वोइस नोट भेजा है, जिसे धारा 356 के इस्तेमाल करने से पहले की कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है. अगर केन्द्र वहां नवीन पटनायक सरकार को बर्खास्त कर राष्टपति शासन लगाता है तो हालात और भी ख़राब हो सकते हैं.
इस समय सी आर पी ऍफ़ की 32 कंपनी वहां हिसाग्रस्त इलाकों में तैनात हैं. इससे कुछ फर्क तो पड़ा है लेकिन उपद्रवी काबू में नहीं आ रहे. अब तक सैकडों घर और चर्च फूंक डाले गए हैं. शुक्रवार तक ताजा हिंसा में 33 लोग मारे जा चुके है. कई नगरों में कर्फ्यू लगा हुआ है. अल्पसंख्यक आयोग की टीम के अलावा गृह मंत्री शिवराज पाटिल कंधमाल का दौरा कर चुके हैं. आज हालत ये हो गई हैं कि वहां कोई ख़ुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा. नवीन पटनायक सरकार हिंसा पर काबू करने में नाकाम नजर आ रही है. यहाँ यह साफ़ करना जरूरी है कि मारे गए लोगों में सिर्फ़ एक ही समुदाय के लोग नहीं हैं, जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है. उनमे दलित भी है, आदिवासी भी और इसाई भी. हाँ, ज्यादातर हमले ईसाइयों और दलितों पर ही हुए हैं. हमलावर हिंदू भी हैं और ईसाई भी.
ताजा हिंसा विहिप नेता स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद शुरू हुई है, जिन्हें तीस से अधिक हथियार बंद लोगों ने जन्माष्टमी के दिन मार डाला था. वे दलितों के धर्मांतरण का पुरजोर विरोध करने वालों में प्रमुख थे. इसके बाद विश्व हिन्दू परिषद् और अन्य हिंदू संगठनों के आह्वान पर आयोजित राज्य बंद के बाद से हिंसा का जो दौर शुरू हुआ, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा.
यह सही है कि चर्चों को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया गया है लेकिन बड़ी संख्या में दलितों के घर भी फूंके गए हैं. वन क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी भी जलती आग में हाथ सेंकने में पीछे नहीं रहे हैं. सरकार की ढील तो रही ही है, वहां के संगठनों ने भी इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण पर जमकर रोटियां सेंकी. वहां के हालात वाकई खतरनाक मोड़ ले चुके हैं. उडीसा आज से नहीं, पिछले दस साल से इस आग में जल रहा है, जब से आस्ट्रेल्य्न मिशनरी के ग्राहम स्टोन और उनके दो बेटों को इसी क्षेत्र में जीप में जलाकर मार डाला गया गया था. उन पर आदिवासियों और हिंदूवादी संगठनों ने विदेशी पैसे के बल पर दलितों के धर्मांतरण का आरोप लगाया था. पिछले साल कुछ हथियार बंद लोगों ने क्रस्मस डे पर ईसाई समुदाय के लोगों पर हमले किए. कई को मर डाला. चर्चों को आग लगा दी. इसके बाद से लावा सुलग रहा था, जो अब ज्वालामुखी बनकर कंधमाल के साथ पडौसी जिलों को भी लीलने में लगा है.
केन्द्र वहां के हालातों से बेहद चिंतित है. प्रधान मंत्री ने केबिनेट की बैठक बुलाई है. आशंका है कि पटनायक सरकार को बर्खास्त करने का फ़ैसला लिया जा सकता है. यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा. इसके बाद हिंदूवादी संगठनों को और भी खुलकर खेलने का मौका मिल जाएगा. इसलिए जरूरी है कि केन्द्र सोच समझकर फ़ैसला ले. अच्छा तो ये ही होगा कि पटनायक को बुलाकर बात की जाए और उन्हें जितनी भी मदद की जरूरत है, वह मुहैय्या कराई जाए. ऐसे समय की जाने वाली राजनीति हालात को और पेचीदा बना सकती है.

ओमकार चौधरी
mailto:homkarchaudhary@gmail.com

3 comments:

manvinder bhimber October 4, 2008 at 8:50 PM  

sarkaar ko kuch essa pryoog waha karna hoga jisse vipaksh bhi shant ho or waha ka atankwaad bhi.....
achchi post ke liye badhaaee
verification hata de.....

Richa Joshi October 4, 2008 at 10:31 PM  

कंधमाल की ताजा हिंसा पर काबू पाने के लिए तुरंत प्रयास होने चाहिएं। बगैर किसी राजनीतिक दाव-पेच के। साथ ही मूल कारणों और नीतियों की समीक्षा भी हो।

parul October 5, 2008 at 9:26 AM  

desh ko kaise sudhra ja sakta yha app jaise log hi jante h. apke yha lekh hume seekh bhi dete h

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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