Tuesday, October 28, 2008

मेरा गाँव, कुलदेवता, माँ और जोनी



बड़ी दीवाली पर हर साल परिवार के साथ गाँव जाना होता है. इस बार भी गया. मेरा गाँव दबथुवा मेरठ जिले में सरधना मार्ग पर है. एक किसान परिवार में जन्म हुआ. जैसे गाँव के बाकी बच्चों का बचपन बीतता है, वैसे ही मेरा भी बीता. गाँव के प्राथमिक विद्यालय में प्रारंभिक शिक्षा ली. उसके बाद मेरठ कालेज से उच्च शिक्षा लेने के बाद पत्रकारिता में आ गया. हर बार की तरह इस बार भी पत्नी, बेटे और बेटी के साथ सबसे पहले कुलदेवता पर गया. वहां दीपावली पर दिये जलाने की परम्परा है. बाकी किसान परिवारों की तरह हमारे कुलदेवता का स्थान भी खेतों के बीच में ही है. इस बहाने साल में कम से कम एक बार अपने खेतों पर भी हम लोग हो आते हैं. जब खेत की पगडंडियों से गुजरते हैं तो बचपन की बहुत सी यादें ताज़ा हो जाती हैं. स्कूल जाने से पहले सबेरे-सबेरे खेत में जाना हमारी दिनचर्या में शामिल था. कभी गन्ने कटवाने और बोगी में लदवाने, कभी पशुओं के लिए चारा कटवाने तो कभी खेत जोत रहे चाचा और बाबा के लिए सुबह का खाना देने के लिए हम जाते थे. पास ही बहने वाले रजबाहे पर खूब मस्ती होती थी. उसमे नहाना, मैले हो गए कपडों को रेह लगाकर धोना, फ़िर सुखाना और पहनना जैसे दिनचर्या में शामिल था. उस ज़माने में कुछ खेतों में एक ऐसी मिट्टी मिलती थी, जो कपडों पर लगाने से उसका मेल निकाल बाहर करती थी. अब भी बहुत से गाँव वासी उसका उपयोग कपड़े धोने में करते हैं. पडौस में एक झाड़-झंकाड़ वाला बाग़ था, उसमे बेर के कुछ पेड़ थे, हम लोग भूख लगने पर अक्सर बेर खाने के लिए वहां चले जाते थे. समय के साथ वह बाग़ भी नहीं रहा लेकिन जब भी मै उस तरफ़ जाता हूँ, नजर उस ओर उठ ही जाती है. अफ़सोस होता है कि वक्त के साथ जंगल और हरियाली ख़तम होती जा रही है.




खेतों पर जाना मुझे बहुत अच्छा लगता है. शायद इसलिए कि वहां जाते ही मेरे भीतर ख़ुद ब ख़ुद बचपन सा लौट आता है. फसलों और मिट्टी की भीनी भीनी खुशबू आज भी मुझे उतनी ही सुहानी लगती है. पेडों की शाखें, उन पर अठखेलियाँ करते पंछी, उनके घौसलें, रखे हुए अंडे, खेतों के बीच से कीटों, पक्षियों की आती आवाजें आज भी उतना ही सम्मोहित और उत्प्रेरित करती हैं. जितना तब करती थी. सच कहूं तो मै वहां से हमेशा ताजगी और ऊर्जा लेकर लौटता हूँ. बेटे अंकुर और बेटी कावेरी का जन्म जरूर गाँव में हुआ.लेकिन ये वहां रहे नहीं. वे एक तरह से गाँव के उतने नहीं हैं, जितना मै या मेरी धर्मपत्नी कमलेश. बेटा इस समय जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मॉस काम का एम् ऐ फाइनल का स्टूडेंट है. बेटी साउथ देलही के एक इंस्टिट्यूट से आंतरिक साज सज्जा का कोर्स कर रही है. कह सकते हैं कि वे गाँव में न कभी पढ़े लिखे हैं और न वे उतनी शिद्दत के साथ मेरे और खेतों के रिश्ते को महसूस कर पाते होंगे. मै ईंख, धान आदि फसलों को जब केमरे में कैद कर रहा था, तो बेटी उस दीवानगी को हैरान होकर देख रही थी. मै अक्सर उन द्रश्यों को बाद में अपने लेपटोप पर निहारा करता हूँ. ऐसा करके हमेशा अपने आप को उन खेतों के बीच ही महसूस करता हूँ.



गाँव जाने का दूसरा मकसद माँ से मिलना होता है. बीच बीच में माँ मेरे पास रहने को आती रहती है लेकिन महीने भर में ही उनका मन वापस गाँव में लौट जाने का होने लगता है. कमलेश से कहती है कि ओमकार से कहकर मुझे गाँव में छुड़वा दे, मै फ़िर आ जाउंगी. माँ की इच्छा हमारे लिए सर्वोपरि है. पिता का साया तो बीस साल पहले सर से उठ गया था. माँ है तो जैसे सब कुछ है. वह हमेशा हम लोगों की बाट जोहती मिलती है. बड़े भइया के पास रहती है, वे ही गाँव में रहकर खेती बाडी सँभालते हैं. इस बार भी जब कुलदेवता पर दीपक जलाकर पहुंचे तो माँ ने हम चारों के सर पर हाथ रखकर दुनिया भर के आशीर्वाद दिए. कावेरी और अंकुर माँ के आजू-बाजू जम चुके थे. कावेरी बीस बरस से ज्यादा की हो गई है लेकिन आज भी छोटी बच्ची की तरह माँ की गोद में जा छिपती है. माँ के पास बैठना, हर तरह की बातें करना, घर बाहर की तमाम खबरें लेना, मन को सुकून देता है. उसी से दुखद खबरें भी मिलती हैं कि इस बीच गाँव के कौन कौन से बुजुर्ग गुजर गए और दुर्घटना या बीमारी से किसकी असमय मौत हो गई है. जो करीबी होते हैं, उनके पास होकर आते हैं. कुछ घरों में मिठाई पहुंचवाई जाती है. और इसके बाद गोवर्धन पूजा की बारी आती है. बचपन से ही हम घर में दीपावली पर गोवर्धन पूजा होते हुए देख रहे हैं. उत्तर भारत के अधिकांश स्थानों पर गोवर्धन पूजा दीपावली के अगले दिन होती है लेकिन हमारे गाँव और आसपास के इलाके में एक दिन पहले यानि दीपावली पर ही पूजा हो जाती है.





गोवर्धन पूजा के लिए भाभी मीठे पूड़े बनाती हैं. घर के चौक में सुबह ही गोबर से एक मानव आकृति बनाई जाती है, जिसके पास खेती के काम आने वाले तमाम ओजार रखे जाते हैं. दूध बिलोने वाली बिलोनी से लेकर अनाज छानने वाले छाज तक को वहां रखा और पूजा जाता है. इस मौसम तक गन्ना भी पककर तैयार हो जाता है. लिहाजा गोवर्धन के साथ गन्ने की पूजा का प्रचलन भी है. पूजा के बाद मीठे पूड़े आपस में बांटकर खाने का रिवाज है. यह एक तरह से सर्दियों के आगमन की सूचना भी होती है. इस त्यौहार से कुछ ही समय बाद इस क्षेत्र के किसान अपना गन्ना चीनी मीलों को देना शुरू कर देते हैं. गन्ना यहाँ के किसानों की प्रमुख फसल है. इसी सीजन में धान की फसल की पैदावार भी होती है. हालाँकि इस इलाके में धान उतनी मात्र में नहीं होता, जितना हरियाणा और पंजाब में होता है.



इस बार गाँव जाने पर जिसने हमारे साथ जमकर लड़ाई की, उसके बारे में बताना तो मै भूल ही गया. वह जोनी है. हमारा पामेलियन डोगी. डी एल ऐ छोड़ने के बाद परिवार को दिल्ली शिफ्ट करना था. इसलिए कुछ समय के लिए जोनी को माँ के पास गाँव छोड़ना पड़ा. इस बीच वहां जाना भी नहीं हुआ. वह पिछले तेरह साल से हमारे परिवार का अभिन्न हिस्सा है. जब दैनिक जागरण में था, तब फोटोग्राफ़र आबिद उसे कहीं से लाया था. तब बहुत नन्हा सा था जोनी. उसे हमने बच्चे की तरह ही पाला. न वह हमसे अलग रहा पाता है. न हम लोग उसके बिना सहज हो पाते हैं. इस बार उसे एक महीना अलग रहना पड़ा तो गाँव पहुँचते ही वह भों-भों करते हुए खूब लड़ा. देर तक उसे पुचकारते रहे. तब जाकर वह शांत हुआ. बाद में कावेरी की गोद में बैठा तो उतरा ही नहीं. कभी कभी लगता है कि जिसे हम जानवर कहते हैं, वह प्यार की भाषा इन्सान से कहीं बेहतर समझता है.
तो कह सकता हूँ कि इस बार अपनी दीपावली बहुत यादगार रही. कुछ चित्र भी यहाँ दे रहा हूँ. कुलदेवता के, माँ के, खेतों के. परिवार के. मुझे आशा है कि मेरे गाँव की इस यात्रा ने आपकी भी कुछ न भूलने वाली यादें ताजा कर दी होंगी. . आपको भी अपना गाँव, अपने करीबी, खेत, और पंछियों की वह चहचाहट जरूर याद आई होगी.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

7 comments:

manvinder bhimber October 29, 2008 at 2:18 PM  

सच में आप ने गांव की सैर करा दी है.............अपनी मिटटी की खुशबू ही अनोखी होती . कमलेश, अंकुर और कावेरी की फोटो काफी धुंधली खींचीं है.....या शायद उस समय धुंधलका उतर आया होगा....
एक बार मैं भी दबथुआ गई थी......यशपाल की माता जी के निधन के मौके पर ........
ये बहुत साल पहले की बात है.....अब तो दबथुआ भी बदल गया है......आप नही बदले और लगातार दीपावली पर गांव जा रहे हैं......माँ और कुलदेवता का आशीर्वाद प्राप्त कर रहे है....यही अच्छी बात है....

Anonymous,  October 29, 2008 at 5:19 PM  

कावेरी खेतों में क्‍या चूहे ढूंढ रही? आज हमारी बिटिया रंगे हाथों फोटो में पकड़ी गई।

parul October 30, 2008 at 9:36 AM  
This comment has been removed by the author.
parul October 30, 2008 at 9:36 AM  

sir hari bhari jagah muje bhi behad pasand h, mane kabhi gav ki jindgi nahi dekhi h par ek bar jarur gav ke logo se samay bitana h aur vha ke bare mein likhna h. gav ke khet behad ache lage. kafi achi rahi h apki diwali. hamesha rahe. pure parivar ke sath acha lagta hi h.kush rahe app

saleem akhter siddiqui October 30, 2008 at 3:25 PM  

omkar bhai,
apni mitti se jude rahna bahut kam aisa karte hain. waqai aapka bhi jawab nahin.

जगदीश त्रिपाठी October 31, 2008 at 7:15 PM  

गांव को आपने याद रखा है। भूल भी कैसे सकते हैं। खेतों से गांव से मेड़ों से मुंडेरों से बचपन का याराना जो है। बचपन की दोस्ती ताजिंदगी याद रहती है। बच्चों का क्या? उनका बचपन शहर में बीत रहा है तो वे क्यों गांवों के प्रति चाहत रखेंगे। आपकी पोस्ट पढ़ने के बाद हमें पुराने दिन याद आ गए। वैसे भाई साहब मेरठ दिल्ली से ज्यादा दूर नहीं है। हर महीने एक बार चले जाया करें। और ऐसा ही एक खूबसूरत चिट्ठा लिख दिया करें। हमें कुछ क्षणों के लिए गांव की याद में डूबने का मौका तो मिल जाएगा।

kuch unkahi November 1, 2008 at 3:47 PM  

photo bahut acchey hai sir photo dekh kar muze apna gav ki yaad aa gayi

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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