Thursday, November 13, 2008

दिल्ली में जाम के मजे ले रहा हूँ

जी हाँ, आजकल कोई मुझ से पूछता है कि क्या हाल हैं, तो मेरा यही जवाब होता है कि दिल्ली में जाम के मजे ले रहा हूँ. जब से मेरठ छोड़ कर देश की राजधानी में धूनी रमाई है, तब से जाम, जाम और बस जाम के ही मजे ले रहा हूँ. वो जाम नहीं, जो आप समझ रहे हैं. जीवन में उसकी तो एक बूँद भी नहीं चखी. दिल्ली में रहने वाले एक और जाम को झेलने को अभिशप्त हैं. सड़कों पर कदम-कदम पर लगने वाले जाम से. इंडिया टुडे के विशेष संवाददाता श्याम लाल यादव मेरे कनाट प्लेस दफ्तर में बैठे थे, बोले..सुबह आठ बजे घर से निकला. दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) के मुख्य कार्यकारी ई श्रीधरन से मिलना था. साढे नौ बजे का समय तय था, जाम में ऐसा फंसा कि ग्यारह बजे के बाद किसी तरह पहुँच पाया. जाने अनजाने श्याम लाल ने जैसे मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया. दिल्ली मै पहले भी कई साल रहकर गया हूँ. कभी कभार जाम का सामना तब भी करना पड़ता था लेकिन इतना बुरा हाल तो तब नहीं था. यह तो तब है, जब दिल्ली में सैकडो की संख्या में ओवरब्रिज बन गए हैं. फ्लाई ओवर खड़े हो गए हैं. दिल्ली सरकार चोराहों को रेड लाइट फ्री बनाने की जोरदार मुहीम छेड़े हुए है. सड़कें चौडी बनाई जा रही हैं. मेट्रो ट्रेन का जाल बिछाया जा रहा है. रिंग रोड और नई दिल्ली में रिक्शा, टेंपो, रेहडी वाले, घोडे तांगे और थ्री व्हीलर प्रतिबंधित किए जा चुके हैं.



आप जानते हैं, 2010 में दिल्ली में कामन वेल्थ गेम होने जा रहे हैं. दस हजार करोड़ रूपए से भी अधिक तैयारियों पर खर्च किया जा रहा है. तीन नए स्टेडियम बन रहे हैं, यमुना के बेसिन में अक्षरधाम मन्दिर के पास खेल गाँव बन रहा है. सड़कें चौडी की जा रही हैं. कई नए होटलों का निर्माण हो रहा है. एक तरह से दिल्ली की कायापलट करने के दावे किए जा रहे हैं. कामन वेल्थ के नाम पर प्राइवेट बिल्डर तक मोटी कमाई करने में लगे हैं. दिल्ली और आसपास के इलाके में जमीनों और नए बनाए जा रहे फ्लेट्स की कीमतें आसमान छू रही है. नौकरी पेशा आदमी अब इस क्षेत्र में एक छत का बंदोबस्त करने का केवल सपना ही देख सकता है. उसे हकीकत में नहीं बदल सकता.
मै जब भी जाम में फंसा होता हूँ, एक ही बात सोचता हूँ कि क्या कभी दिल्ली जाम से मुक्ति पा सकेगी ? अगर कभी ऐसा हुआ तो वह दिल्ली वालों और यहाँ आने वालों के लिए सुनहरा दिन होगा. क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि जाम से मुक्ति दिलाने के नाम पर ही करोड़ों-अरबों रूपए फूंके जा रहे हैं और इसी से दिल्ली वासियों को निजात नहीं मिल पा रही ? आख़िर इस समस्या से पार क्यों नही पाई जा रही ? क्या योजनाओं में खोट है ? या फ़िर दिन दूनी रात चौगुनी वेहिकल्स की संख्या बढ़ती जा रही है ? परिवहन निगम के आंकडे बताते हैं कि साठ लाख से अधिक वाहन तो अकेले दिल्ली में ही रजिस्टर्ड हैं. रोजाना बीस लाख वेहिकल बाहर से दिल्ली आते हैं. सड़कों पर कभी सीवर का काम हो रहा होता है. कभी फ्लाई ओवर के कारण एक तरफ़ से सड़क को रोक दिया जाता है तो कभी ग़लत पार्किंग जाम की वजह बनती है



कामन वेल्थ गेम्स में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. राष्ट्रमंडल खेल संघ के अध्यक्ष दिल्ली में हैं. उन्होंने तैयारी स्थलों का जायजा लिया है. जिस रफ्तार से काम चल रहा है, उससे उन्हें लगता है कि दो हजार दस तक दिल्ली सरकार तैयारियों को पूरा नहीं कर पाएगी. खास कर खिलाड़ियों के लिए बनाए जा रहे खेल गाँव के मामले को जिस तरह कुछ पर्यावरण संरक्षण वादियों ने कोर्ट में चुनौती दे राखी है, उस से उन्हें लगता है कि यह काम कभी भी रोका जा सकता है. ऐसे में भरी संकट खड़ा हो सकता है. बाकी तैयारियां भी कछुआ चाल से ही चल रहीं हैं.
यह वाकई चिंता की बात है. ख़ुद दिल्ली के अधिकारी मान रहे हैं कि खेल गाँव का पच्चीस प्रतिशत भी काम अभी पूरा नहीं हुआ है. अगर यही हाल रहा तो तय मानिये, कामन वेल्थ गेम्स के समय बड़ी भद पिटने वाली है. जिस जगह खेल गाँव बन रहा है, मेरे जैसे लाखों लोग उसी सड़क यानी निजामुद्दीन पुल पर जाम के शिकार होते हैं. खुदा न खास्ता दो हजार दस तक भी जाम का यही हाल रहा तो विदेशी खिलाडी दिल्ली की बहुत अच्छी तस्वीर और अनुभव लेकर अपने देश लौटेंगे.

11 comments:

SHEHZAD AHMED November 13, 2008 at 9:42 AM  

जाम की जो समस्या आपने सामने आ रही है उसने सभी का जेना मुश्किल किया हुआ है।इसके चलते केवल श्रीधरन ही नही देश में करोडो लोग परेशान है। आपने जाम पर अपने जो अनुभव शेयर किया है। येही आज की हकीकत है जिससे हम जूझते है।

आपका अपना शहजाद

SHEHZAD AHMED November 13, 2008 at 9:46 AM  

vaise hum bhi sir meerut mey jaam or dhool ke hi mje le rhe hai

dharmendra November 13, 2008 at 9:51 AM  

delhi me lage jam ko jab hum kisi bridge se gujratey huey dekhte ho to lagta hai ki kisi desh ki rajdhani mey hai. kuch bhi kaha jaye lekin itne logo ke sapno ko pura karne ki kosis me lagi apni rajdhani abhi bhi apni hariyali ko bachaye hue hai. aise to har jagah baywashtha me kuch n kuch kmi to rahti hi hai.

Manvinder November 13, 2008 at 9:52 AM  

आपने मेरठ छोड़ दिया है तो क्या हुआ....हम तो मेरठ में ही हैं......यहाँ पर भी हर दिन जाम लगते है ......लेकिन दिल्ली के जाम को गंभीरतासे लिया ही जाना चाहिए. ......खेल के अलावा भी राजधानी को रेड लाईट फ्री करने की कवायद फल रही है ...ऐसे में जाम क्यों .....

Avanindra,  November 13, 2008 at 7:50 PM  

जाम का यह अनुभव एक जाम के आलोक में विभिन्न समस्याओं की तस्वीर पेश कर रहा है। बेवाकी और साफगोई से किसी भी समस्या की इतनी साफ-साफ तस्वीर खींच देना आपकी कलम के लिए बहुत ही सहज है। आशा नहीं, बल्कि विश्वास है कि यह आलेख उन लोगों का ध्यान भी अपनी ओर खींचने में सफल होगा जो इसके निदान के लिए सक्षम भी हैं और जिम्मेवार भी।

ashok madhup,  November 13, 2008 at 10:54 PM  

अभी तो शुरूआत है मान्यवर । हमारी नैनो को जरा सडको पर आ जाने दो तब पता चलेगा महानगरो मे रहने वालों को आटे दाल का भाव। सोमवार को घर से चलोगे तो शानिवार को दफतर पंहुचा करोगे।
अशोक मधुप

Kalpana November 14, 2008 at 12:27 AM  

Sahi baat hai dilli ke jaam ki baat hi kuchh aur hai ,per Los Angeles/ Southern California ne to bas hi kar di hai.

Danish Khan November 14, 2008 at 7:26 AM  

sir, aapne jaam ki baat bilkul sahi kahi. hum mrt ke jaam me fase rahte hai lekin delhi se kam. delhi me jitne rules hai utna he jaam, bas bhagwan bharose hai.
mrt ke kuch ilake jaam ka pul ban gaye hai.

akanksha November 14, 2008 at 1:30 PM  

बिना साकी के जाम मिल जाता है और आप लोग हैं कि दिल्ली को कोस रहे हैं. यह तो फायदे की बात है जनाब की इस जाम में किसी का नहीं सिर्फ हमारे काम का तमाम होता है। मजे लीजिए इस बिन प्याले के धुएं के जाम का।

SALEEM AKHTER SIDDIQUI November 15, 2008 at 7:05 PM  

abhi to aage-aage dekhye hoata hai kya.

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

ऊपर वापिस लौटें