Monday, November 24, 2008

बहुत कुछ तय करेंगे ये चुनाव

सबकी निगाहें छः राज्यों में हो रहे चुनाव के नतीजों पर टिकी है. मिजोरम और जम्मू कश्मीर के परिणामों से केन्द्र की राजनीति पर भले ही कोई फर्क न पड़ता हो परन्तु इनके महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता. वैसे सबकी दिलचस्पी चार हिन्दी भाषी राज्यों के परिणामों पर हैं. इनमें से तीन मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार हैं जबकि दिल्ली में कांग्रेस का शासन है. लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं है. इस कारण इन चुनावों को मिनी महाकुम्भ भी कहा जा रहा है. विश्लेषकों का मानना है कि इनके नतीजे देश की राजनीतिक दिशा तय कर सकते हैं. कांग्रेस और भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. भाजपा के लिए इन तीनों राज्यों में वापसी करना चुनौती है तो कांग्रेस के लिए दिल्ली में. कांग्रेस के लिए राह इस कारण थोड़ी मुश्किल नजर आ रही है क्योंकि वह दिल्ली में दस साल से सत्ता में है. इसके बावजूद शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ कोई बड़ी नाराजगी देखने में नहीं आ रही है. किसी भी सरकार के लिए वैसे तो आजकल पाँच साल की एंटीइनकम्बेंसी ही काफी होती है लेकिन अपनी सरकारों पर लटकने वाली इस तलवार को परे हटाने के लिए भाजपा नेताओं ने महंगाई और आतंकवाद जैसे मुद्दों को हवा देकर कांग्रेस को घेरने में कोई कसर नहीं छोडी है.इन राज्यों में कांग्रेस बजे आक्रामक होने के रक्षात्मक नजर आ रही है.
यह कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस अगर हिन्दी भाषी इन चार में से दो अथवा तीन राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब हो गई तो सोनिया गांधी लोकसभा चुनाव समय से पहले कराने का निर्णय ले सकती हैं. हालाँकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नियत समय पर ही लोकसभा चुनाव कराने के पक्ष में हैं. इसके विपरीत अगर भाजपा ने दिल्ली पर कब्जा करने के अलावा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में से किन्हीं दो राज्यों में फ़िर से सरकार बना ली तो कांग्रेस तय समय से पहले आम चुनाव कराने का खतरा नहीं लेगी.इन्हीं तीन राज्यों में कामयाबी के बाद 2004 में भाजपा ने केन्द्र सरकार के लिए नया जनादेश लेने के लिए समय से पूर्व लोकसभा चुनाव कराने का खतरा उठाया था. नतीजतन सरकार जाती रही. इसलिए कांग्रेस बहुत सोच विचार कर ही समय से पहले आम चुनाव कराने का निर्णय लेगी.
आम तौर पर विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े और जीते जाते हैं. इस बार के चुनाव थोड़े अलग माहोल में हो रहे हैं. इस वक्त महंगाई और आतंकवाद बड़ा मुद्दा बन गए हैं. भा ज पा ने सोची समझी रणनीति के तहत कांग्रेस को इन मुद्दों पर घेर लिया है. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में पॉँच साल के शासन के बाद भी अगर भा ज पा के खिलाफ वैसी नाराजगी देखने को नहीं मिल रही है तो इसकी वजह यही है कि लोग महंगाई और आतंकवाद से त्रस्त हैं और ढीली ढाली नीतियों को इसका जिम्मेदार मानते हुए केन्द्र की यूंपीऐ सरकार को दोषी मान रहे हैं. संसद भवन पर हमले के दोषी अफजल को फांसी नहीं दिए जाने को भाजपा ने एक और प्रमुख मुद्दा बनाते हुए कांग्रेस पर हमला बोल दिया है.
कांग्रेस जहाँ इन चुनावों में मुस्लिम कार्ड खेल रही है, वहीं भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा ठाकुर मामले को तूल देकर हिन्दू वोटों को अपने पक्ष में करने में कोई कसार बाकी नहीं छोडी है. इसलिए यह देखना भी दिलचस्प होगा कि मतदाता क्या जनादेश देते हैं. वे किसके पक्ष में जाते हैं. वैसे हिंदुस्तान का आम मतदाता बहुत समझदार है. समय समय पर वह विभिन्न राजनीतिक दलों को सबक भी देता रहा है. कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि छः राज्यों के ये चुनाव देश की भावी राजनीति की दिशा जरूर बता देंगे.

5 comments:

parul November 24, 2008 at 10:20 AM  

achi chintan kiya h sir

parul November 24, 2008 at 10:20 AM  

achi chintan kiya h sir

Mired Mirage November 24, 2008 at 11:11 AM  

आशा है जनता अपने वोट का सदुपयोग करेगी ।
घुघूती बासूती

Suresh Chiplunkar November 24, 2008 at 11:59 AM  

चुनाव तो आते-जाते रहते हैं, ध्यान हमेशा बड़े लक्ष्य की ओर होना चाहिये… जनता को जागरूक करने का अभियान एक दिन या एक-दो चुनावों में नहीं होता… कांग्रेस नाम के "बर्ड फ़्लू" को इस देश से मिटाने के लिये अभी काफ़ी वक्त और काफ़ी चुनाव लगेंगे…

sonia November 24, 2008 at 5:16 PM  

abhi rajniti k bare mein mujhe jyada jankari nahi hai, per apke aise lekh mere ander intrest laker hi chodenge

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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