Saturday, December 6, 2008

अब क्या करे भारत सरकार

सरकार के खिलाफ ऐसा जनाक्रोश कभी नहीं देखा गया। मुंबई पर हमले ने देशवासियों के सब्र के बांध को तोड़ दिया है। सरकार से नाराजगी की वजह सूचनाएं मिल जाने के बावजूद वारदात हो जाना है। लोगों को लगता है कि मंत्री और नेता अपनी सुरक्षा तो चाक-चौबंद कर लेते हैं परन्तु आम आदमी को दरिंदों के लिए निरीह प्राणी की तरह मरने के लिए छोड़ देते हैं। लोग पूछ रहे हैं कि इस आक्रोश की परिणति क्या होगी? क्चया इन विधानसभा चुनाव के परिणामों में भी लोगों का गुस्सा दिखाई देगा? या लोग लोकसभा चुनाव में हिसाब-किताब चुकता करेंगे? अपना मानना है कि तब तक केन्द्र सरकार कुछ घोषणाएं करके लोगों की नाराजगी कम करने की कोशिश करेगी। तेल और ब्याज की दरों में कमी से ये प्रयास शुरू हो चुके हैं। लोग जानने को उत्सुक हैं कि क्चया पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी ठिकानों और प्रशिक्षण केन्द्रों पर भारत हमला कर सकता है? रक्षा और विदेश मामलों के जानकारों की मानें तो भारत इस मामले को काफी दूर तक ले जाने की तैयारी में है। अमेरिकी हस्तक्षेप के चलते भारत तब तक पाकिस्तान पर हमला नहीं कर सकता, जब तक अमेरिकी सेनाएं पाकिस्तान में मौजूद हैं। हां, हमला हो या नहीं, इस बार भारत के कड़े रुख से पाकिस्तानी निजाम को पसीना जरूर आ जाएगा। यूपीए के रणनीतिकारों को लगता है कि भारत-पाक के बीच युद्ध के हालात बनने से देश की नाराज जनता मनमोहन सरकार के साथ खड़ी नजर आने लगेगी। लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है। उससे पहले राहत भरी घोषणाओं और पाकिस्तान के साथ कुछ गरमागरमी के वातावरण से सरकार अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करेगी।

इस राजनीतिक जोड़-घटाव से सरकार चुनाव से पहले भले ही थोड़ी बहुत क्षति-पूर्ति कर ले परन्तु इस बात की क्या गारंटी है कि इस बीच कोई और आतंकवादी वारदात नहीं होगी। मुंबई जैसे हालात भले ही न बनें परन्तु अब छोटी-मोटी वारदातों को भी लोग सहन करने के मूड़ में नजर नहीं आ रहे। मुंबई हमले के समय सरकार ने देखा कि किस तरह इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने लाइव प्रसारण कर उसकी मुश्किलों को और बढ़ाने का काम किया। साठ घंटे तक पूरी दुनिया ने आतंकवादी हमले का सीधा प्रसारण देखा। इससे सरकारी एजेंसियों की पोल तो खुली ही, आतंकियों का दहशत पैदा करने और अपनी करतूत को दुनिया भर में पहुंचाने का मकसद भी पूरा हुआ। वे जो करना चाहते थे, वह भारतीय मीडिया ने पूरा कर दिया। जाने-अनजाने में इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने एक और काम किया। उन्होंने पाकिस्तान और आतंकी संगठनों के बजाय भारतीय नेतृत्व और व्यवस्था को ही खलनायक बना दिया। नतीजतन, लोग पाकिस्तान और आतंकवादियों को कम, भारतीय नेतृत्व को ज्यादा गाली दे रहे हैं। इससे सरकार ही नहीं, सभी दलों के नेता जबरदस्त दबाव में हैं। जन विश्वास हासिल करने के लिए वे सरकार पर कड़ी और निर्णायक कार्रवाई करने का दबाव बना रहे हैं।

सवाल यह है कि सरकार अब क्या करे? लोगों का गुस्सा कैसे शांत हो किया जा सकता है? किस तरह आतंकवादी वारदातों पर अंकुश लगाया जा सकता है? पाकिस्तान पर मुश्कें कसने के लिए किस तरह के कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत है। गहरी नींद में सोई पड़ी सरकारी मशीनरी को झिंझोड़कर कैसे जगाया जा सकता है? बेखौफ हो रहे आतंकवादियों के मन में दहशत कैसे पैदा की जा सकती है? इनसे भी अहम सवाल यह है कि व्यवस्था के प्रति लोगों के मन में अविश्वास की जो भावना तेजी से पनपी है, उसे कैसे कम किया जाए? मीडिया को एेसे राष्ट्रीय संकट में किस तरह की भूमिका निभानी चाहिए, यह अह्म प्रश्न भी सरकार के समक्ष आज सबसे बड़ी चुनौती है।

शिवराज पाटिल, विलास राव देशमुख, आर आर पाटिल जैसे कुछ लोगों के इस्तीफा दे देने से जन विश्वास नहीं लौट आएगा। सरकार को हर स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी। पुलिस, प्रशासन, जांच, खुफिया एजेंसियों, नेवी, आर्मी, वायुसेना, राज्य और केन्द्र सरकार की मशीनरी को जिम्मेदार बनाना होगा। पुलिस व्यवस्था में व्यापक सुधार करने की जरूरत है। ढीले खुफिया तंत्र को जिला स्तर से लेकर केन्द्रीय स्तर तक चुस्त-चौकस बनाना होगा। सभी सुरक्षा एजेंसियों में संवाद और समन्वय बढ़ाना होगा। संकट के बाद एक-दूसरे पर दोषारोपण की नीति को त्यागना होगा। राज्यों और केन्द्र सरकार के बीच भी बेहतर तालमेल स्थापित करना होगा। आतंकवादियों और देशद्रोहियों को सख्त सजा के लिए कड़े कानून बनाने होंगे। अदालतों और जजों की संख्या बढ़ानी होगी ताकि सभी तरह के मामलों का त्वरित निपटारा हो सके। इससे लोगों का कानून और न्याय व्यवस्था के साथ साथ सरकार पर भी विश्वास बहाल हो सकेगा। आतंकवाद सहित राष्ट्रीय हित से जुड़े मसलों पर राजनीतिक दलों में आम सहमति बनानी होगी। सरहदों को अभेद्य बनाना होगा ताकि कोई भी देश विरोधी शक्चित तोड़फोड़ के लिए आतंकवादी व हथियार नहीं भेज सके। मीडिया को जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की भी सख्त जरूरत है। इसके लिए मीडिया नीति बनाई जानी चाहिए। आम आदमी का सरकार के प्रति विश्वास तभी बहाल होगा, जब उसे लगेगा कि वह उसकी और देश की सुरक्षा के प्रति चिंतित और संकल्पबद्ध है।

4 comments:

अशोक मधुप December 6, 2008 at 10:13 PM  

बिल्कुल सही लिखा आपने। किंतु नए हालात के लिए हम सबको भी तैयार होना होगा। चुपचाप छिपकर मरने की जगह आंतकवादियों का सामना करना मरना या मारना जिस दिन हम सीख लेंगें आधी समस्याआें का अपने आप समाधान हो जाएगा।

cmpershad December 6, 2008 at 10:25 PM  

सब से पहले मंत्री अपनी जेड सेक्यूरिटी हटा दें ताकि आतंकियों को सुविधा हो इस देश के कचरे को साफ करने में..

Pradeep Kumar December 7, 2008 at 11:39 PM  

मीडिया को दोष देने से क्या फायदा ? अगर कोइए हमें हमारी कमजोरी दिखाए तो इसमें उसका कोइए दोष नहीं होता . इस बात को कौन झुठला सकता है कि इन नपुंसक नेताओं के निर्णय न लेने के कारण कमांडो मौके पैर ९-१० घंटे देर से पहुंचे? क्या कोई आम आदमी देश कि सीमा में इतनी आसानी से आ जा सकता है? क्या कोई आम आदमी बिन पैसे के अपना फोटो कार्ड भी बनवा सकता है ? क्या हुआ गर दुनिया ने हमारी नपुंसकता देख ली तो ? यहाँ जब तक नपुंसक लोग राज करते रहेंगे कुछ नहीं बदलेगा ............

Pradeep Kumar December 7, 2008 at 11:51 PM  

मीडिया को दोष देने से क्या फायदा ? अगर koi हमें हमारी कमजोरी दिखाए तो इसमें उसका कोई दोष नहीं होता . इस बात को कौन झुठला सकता है कि इन नपुंसक नेताओं के निर्णय न लेने के कारण कमांडो मौके पैर ९-१० घंटे देर से पहुंचे? क्या कोई आम आदमी देश की सीमा में इतनी आसानी से आ जा सकता है? क्या कोई आम आदमी बिन पैसे के अपना फोटो कार्ड भी बनवा सकता है ? क्या हुआ गर दुनिया ने हमारी नपुंसकता देख ली तो ? यहाँ जब तक नपुंसक लोग राज करते रहेंगे कुछ नहीं बदलेगा ............ क्या सिर्फ १०० आदमी देश के १० बड़े शैरोन पैर कब्ज़ा करके इस देश को पंगु नहीं बना सकते ? जब तक यहाँ के जवान सोये रहेंगे और बूढे ( जिनकी उम्र राम का नाम लेने की होती है , उस उम्र में आदमी सिर्फ बने बनाए रास्तों पे चलता है , वो koi नया रास्ता नहीं चुन सकता) यूं ही राज़ करते रहेंगे . अब भी क्या बदला है ? इतिहास से हमने क्या सीखा ? सिर्फ कुछ लोगों के इस्तीफे से क्या होगा ? जिस रास्ते से वो आतंकवादी आये वहाँ अब भी पहले जैसी हालत है . एक समुद्र में १०-१२ एजेन्सी एक दूसरे की टांग खींचने का काम कर रही हैं , ऐसे में क्या सुरक्षा बढ़ी होगी कोई भी सोच सकता है ? अब हम कुछ लोगों को मांग रहे हैं ताकि उनको यहाँ लाकर दामाद की तरह उनकी सेवा कर सकें . पाक तो मूर्ख है . सारे आतंकवादी भारत को सौंप दे भारत उनको ज्यादा हिफाज़त से रखेगा . अफज़ल इसका सबूत है .

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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