Monday, December 8, 2008

विकास और विनम्रता की जीत


लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हुए सत्ता के इस सेमीफाइनल में कह सकते हैं कि विकास और विनम्रता की जीत हुई है। आतंकवाद और महंगाई जसे मसले उतने प्रभावशाली नहीं रहे, जिसकी उम्मीद विश्लेषक कर रहे थे। भाजपा ने आंतरिक सुरक्षा
और महंगाई को इस चुनाव में मुख्य मुद्दा बनाया था। चुनाव के ठीक बीच में मुंबई पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला हुआ, जिसमें एक सौ अस्सी से अधिक जानें चली गईं। टेलीविजन चैनलों पर साठ घंटे का मुंबई से सीधा प्रसारण हआ। केन्द्र और महाराष्ट्र की कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों को सुरक्षा के सवाल पर कटघरे में खड़ा किया गया। हमले के

अगले दिन दिल्ली में वोट पड़े। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी इसके बाद ही मतदान हुआ। राजनीतिक विश्लेषकों और भाजपा
के कुछ नेताओं को लगता था कि आतंकवाद इन राज्यों में बड़ा गुल खिला सकता है। मध्य प्रदेश में कह सकते हैं कि भाजपा को फायदा हुआ होगा लेकिन अगर यह सही है तो वही बात दिल्ली और राजस्थान पर लागू क्यों नहीं हुई? राजस्थान की राजधानी जयपुर और अजमेर शरीफ में भी आतंकवादी हमला हो चुका है। इसी तरह दिल्ली में भी विधानसभा चुनाव से कुछ ही समय पहले सीरियल धमाके हुए थे। विश्लेषकों को लगा कि मुंबई पर हुआ हमला इन तीन राज्यों में कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है परन्तु एेसा नहीं हुआ। इन परिणामों को देखकर कह सकते हैं कि मतदाताओं ने न कांग्रेस को इतराने का


मौका दिया है और न भाजपा को गर्व से सीना फुलाने और खुशफहमी पालने का अवसर दिया है। सही बात तो यह है कि दोनों पार्टियों को जागरूक मतदाताओं ने वोट के साथ-साथ नसीहत भी दी है कि राष्ट्रीय मसलों पर वे मिल-जुलकर काम करें। इन परिणामों से यह साफ हो गया है कि अब भावनात्मक मुद्दे आसानी से नहीं भुनाए जा सकेंगे। एंटी इन्कंबैंसी फैक्चटर भी कहीं दिखाई नहीं दिया। रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान और शीला दीक्षित ने अपने अपने राज्यों में बहुत विनम्र रहकर विकास कार्य कराए। वे किसी तरह के विवादों में भी नहीं फंसे। उनकी सरकारों पर किसी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप भी नहीं लगा। इन तीनों की छवि बेदाग रही। नतीजन जनता ने उन्हें अगले पांच साल के लिए फिर जनादेश दिया है।
लोकसभा के आम चुनाव पांच महीने बाद अप्रैल में प्रस्तावित हैं। यूपीए के पास अधिक समय नहीं है। छह राज्यों जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में हुए चुनावों को इसी कारण सत्ता का सेमीफाइनल कहा जा रहा था। इनमें भी चार हिंदी भाषी राज्यों पर राजनीतिक विश्लेषकों और प्रमुख दलों की निगाहें टिकी थीं। दिल्ली में दस साल से कांग्रेस की सरकार है। पिछला चुनाव भी पार्टी ने शीला दीक्षित के नेतृत्व में लड़ा और जीता था। खुद कांग्रेस के आला नेताओं को भी इसका भरोसा नहीं था कि यहां उनकी लगातार तीसरी बार सरकार बन ही जाएगी। भाजपा ने विजय कुमार मल्होत्रा जसे वरिष्ठ नेता को उनके सामने मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया परन्तु विकास मल्होत्रा, महंगाई और आतंकवाद पर भारी पड़ा। यही बात छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के संबंध में कही जा सकती है। कांग्रेस उम्मीद पाले बैठे थी कि राजस्थान के साथ-साथ इन दोनों राज्यों में उसे पांच साल के भाजपा शासनकाल में लोगों की स्वाभाविक नाराजगी का लाभ मिलेगा। एेसा नहीं हुआ। इसकी वजह यह भी रही कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस किसी एक सर्वमान्य नेता को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने में नाकाम रही और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को भले ही विधानसभा का चुनाव लड़वाकर संकेत दिए हों परन्तु डा. रमन सिंह की भले मानुष की छवि उन पर भारी पड़ी। शीला दीक्षित की तरह रमन सिंह और शिवराज सिंह चौहान ने भी अपना ध्यान पूरी तरह राज्य के विकास पर केन्द्रित किया। डम्फर प्रकरण के अलावा मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के खिलाफ और कोई एेसा मुद्दा कांग्रेस के हाथ नहीं लगा, जिसे लेकर वह मतदाताओं के बीच जा सके। यह सही है कि पहले उमा भारती और बाद में बाबू लाल गौर की कार्यशैली ने भाजपा को वहां मुश्किल में डाला परन्तु शिवराज सिंह चौहान के कमान संभाल लेने के बाद किसी तरह के विवाद नहीं उभर सके। उमा भारती ने मध्य प्रदेश में भाजपा को हरवाने के लिए पूरी ताकत लगाई परन्तु विफल रही। इससे यह भी साफ हो गया कि लोग नकारात्मक प्रचार को पसंद नहीं करते हैं। दिल्ली में यही गलती भाजपा ने की। विजय कुमार मल्होत्रा ने शीला सरकार पर घोटाले करने के आरोप लगाए परन्तु इसे साबित करने के लिए कोई सबूत पेश करने में नाकाम रहे। भाजपा यहां मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में भी विफल रही कि वह बेहतर सरकार दे सकती है।
कह सकते हैं कि यह परिणाम न कांग्रेस के पक्ष में हैं और न ही भाजपा के। भाजपा अगर छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में अपनी सरकारें बचाने में कामयाब रही तो कांग्रेस ने शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली के सिंहासन पर तीसरी बार कब्जा करके एक बड़ी मनोवज्ञानिक जीत दर्ज करने में सफलता हासिल की है। कांग्रेस राजस्थान में भी सत्ता में लौट रही है लेकिन इसके लिए उसे बैसाखियों का सहारा लेना पड़ेगा। वह मिजोरम में दस साल बाद वापसी कर रही है। भाजपा के लिए सबसे अधिक पीड़ा की बात दिल्ली में सरकार नहीं बना पाना है। इसकी वजह उसकी रणनीतिक गलतियां भी रही हैं। सत्ता के इस सेमीफाइनल के मोटे तौर पर संकेत ग्रहण किए जाएं तो कह सकते हैं कि मतदाताओं ने विकास और विनम्रता में विश्वास व्यक्चत किया है। निसंदेह महंगाई और आतंकवाद देश के सम्मुख बड़े मुद्दे हैं और हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा एक अहम मुद्दा बनकर उभरे परन्तु जहां तक राज्य विधानसभा के चुनाव का सवाल है, उसमें साफ हो गया है कि मतदाताओं ने साफ-सुथरी छवि, ईमानदार, शांति और विनम्रता से विकास के काम करने वाले नेतृत्व को पसंद किया है। इसे अगर स्पष्ट संकेत मानें तो राजनेताओं को सतर्क हो जाना चाहिए। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की छवि एक विनम्र नेता की नहीं बन सकी। भले ही वे वहां की महिलाओं में लोकप्रिय रही हों परन्तु आम मतदाताओं में उनकी महारानी वाली छवि ने पार्टी को नुकसान ही पहुंचाया।

8 comments:

ravindra vyas December 8, 2008 at 7:41 PM  

अोमकार जी। राजस्थान की मुख्यमंत्री विजयाराजे की जगह वसुंधरा राजे कर लें। हालांकि अब वे सत्ता से बाहर हो गई हैं।

MANVINDER BHIMBER December 8, 2008 at 8:02 PM  

मतदाताओं को साफ़ छवि के नेताओं की दरकार है......ये सही है कि कही न कही मुंबई विस्फोट मतदाताओं के जेहन में रहे है, कोई भी मुद्दा आम आदमी की सुरक्षा से अहम नही है,,,,,अच्छी पोस्ट के लिए बधाई

ओमकार चौधरी December 8, 2008 at 8:05 PM  

रवींद्र जी, इस तरफ़ ध्यान दिलाने के लिए आभार. मैंने ठीक कर दिया है.

रौशन December 8, 2008 at 9:37 PM  

बेहतरीन विश्लेषण

मंतोष सिंह December 8, 2008 at 11:36 PM  

देश की जनता को ज्यादा दिनों तक मुर्ख बनाना संभव नहीं है। नेताओं को लगता था कि कुछ भी हो कुर्सी तो हमारी ही है, लेकिन मिजोरम के मुख्यमंत्री समेत कई नेताओं को बोल्ड होना पड़ा। यह जनादेश जनता का जनादेश है, जिसका खुले दिल से स्वागत करना चाहिए, क्योंकि हमारे लिए नेता नहीं देश सर्वोपरि है।

अशोक मधुप December 9, 2008 at 1:58 PM  

एक पिक्चर का गाना है.. तुम्हारी भी जय जय हमारी भी जय जय ,न तुम जीते न हम हारे! यह बात यहां सही बैठती है। मतदाताओं ने न कांग्रेस को इतराने का मौका दिया है और न भाजपा को गर्व से सीना फुलाने और खुशफहमी पालने का अवसर दिया है।
दोनों दलों को उनकी आैकात बता दी व यह भी संदेशा दे दिया कि अब भी सचेत हो जाआें नही तो आने वाले चुनाव मे दीमाग ठिकाने लगा दिए जाएगें।

Dr. Chandra Kumar Jain December 9, 2008 at 2:00 PM  

सही...सटीक
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन

dharmendra December 13, 2008 at 7:13 AM  

ho sakta hai ki yeh parliament election ka semifinal match ho, but aisa lagta hai ki real parliament election me manmohan aur unke mantri logo ke nishane par honge.

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