Tuesday, December 23, 2008

युद्ध के मुहाने पर भारत-पाक

चाहे-अनचाहे हालात 2001 जैसे पैदा हो गए हैं। तब संसद पर हमले के बाद पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव बनाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को सेनाएं सरहद पर तैनात करने का निर्णय लेना पड़ा था। मुंबई पर अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद सीमा पर सेना भेजने के अलावा मनमोहन सिंह सरकार वे सभी कदम उठा चुकी है, जो युद्ध से पहले जरूरी समङो जाते हैं। तीनों सेना हाई अलर्ट पर हैं। समुद्री किनारों की चौकसी बढ़ा दी गई है। नौसेना ने कई उपाय किए हैं, जिनमें जंगी बेड़ों की तैनाती से लेकर हवाई निगरानी तक शामिल है। वायु सेना ने देश के अन्य हिस्सों के साथ-साथ राजधानी दिल्ली को हवाई हमलों से महफूज करने के लिए आस-पास के वायुसेना हवाई अड्डों पर मिग और दूसरे जंगी हवाई जहाजों को हाई अलर्ट पर रहने के निर्देश जारी किए हैं। थल सेना ने किसी भी स्थिति के लिए कमर कस ली है।
विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी साफ कर चुके हैं कि यदि पाकिस्तान आतंकी शिविरों को ध्वस्त कर दोषियों को नहीं सौंपता है तो भारत के सैन्य कार्रवाई समेत तमाम विकल्प खुले हैं। संसद पर हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से अपने सभी तरह के संबंध विच्छेद कर लिये थे। जो सख्त कदम उस समय उठाए गए थे, उनमें ट्रेन, बस और हवाई सेवा बंद करने के साथ-साथ उच्चायोगों में राजनयिकों की बड़े पैमाने पर कटौती भी शामिल थी। करीब दो साल तक भारत ने किसी भी पाकिस्तानी विमान को अपनी वायुसीमा में उड़ान भरने की इजाजत नहीं दी। तब मजबूर होकर पाकिस्तान को लश्कर पर पाबंदी लगानी पड़ी थी लेकिन यह कदम भी धोखा ही साबित हुआ, क्योंकि लश्कर और जैश ने नाम बदलकर आतंकवादियों के ट्रेनिंग कैंप जारी रखे। नतीजतन संसद पर हमले के बाद भी आतंकी हमले नहीं रुके।
यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान अलकायदा, तालिबान, जैश, लश्कर जैसे संगठनों का अड्डा बन चुका है। वहां आतंकवाद की नर्सरी ही नहीं तैयार हो रही, खून की होली खेलने वाला पूरा साजो-सामान भी तैयार किया जा रहा है। षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने इस्लामाबाद दौरे के समय खरी-खरी सुनाते हुए यहां तक दावा किया कि दुनिया भर में हो रहे आतंकवादी हमलों में से पचहत्तर प्रतिशत के तार किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जुड़े हैं। भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से इसीलिए आईएसआई चीफ को भारत भेजने को कहा था ताकि उन्हें आईना दिखाया जा सके। पकड़े गए आतंकवादी कसाब ने जो खुलासे किए हैं, उनसे साफ होता है कि भारत में तबाही की लगभग हर वारदात के पीछे आईएसआई का हाथ है।
भारत मुंबई हमले के बाद खामोश होकर बैठना नहीं चाहता। वह निर्णायक कार्रवाई चाहता है। इसके लिए वह हर संभव उपाय करने में जुटा है। भारतीय नेतृत्व ने अमेरिकी खुफिया एजेंसी को मुंबई आने और पकड़े गए आतंकवादी से पूछताछ करने की छूट देकर कूटनीतिक समझदारी का परिचय दिया है। इस हमले में जो बाईस विदेशी मारे गए, उनमें से छह अमेरिकी थे। यह आश्चर्य की बात है कि पूरा विश्व मान रहा है कि मुंबई के हमलावर पाकिस्तानी थे। वहां का मीडिया सबूतों और तथ्यों के साथ साबित कर चुका है कि हमलावर किन-किन जगहों से थे, इसके बावजूद यदि राष्ट्रपति जरदारी, प्रधानमंत्री गिलानी और विदेशमंत्री कुरैशी भारत से पुख्ता सबूतों की मांग कर रहे हैं तो साफ है कि वे पाकिस्तान की जमीन से आतंकवाद को उखाड़ फैंकने के कतई मूड़ में नहीं हैं। आश्चर्य की बात तो यही है कि जिसने बेनजीर भुट्टो तक की जान ले ली, आसिफ अली जरदारी सत्ता में आने के बाद अब उन्हीं आतंकवादी संगठनों पर परदा डालने की कौशिश करते नज़र आ रहे हैं। पाकिस्तान के अंदरूनी हालातों से भारत परिचित है लेकिन इस बार वह पाकिस्तानी हकूमत को सस्ते में छोडने के पक्ष में नहीं है। यही कारण है कि जहां तीनों सेनाओं को हाई अलर्ट पर रखा गया है, वहीं संयुक्त राष्ट्र, सुरक्षा परिषद में भी तथ्य रखे जा रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश इस लड़ाई में खुलकर भारत के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं लेकिन अमेरिका का बुश प्रशासन चाहता है कि भारत सैन्य कार्रवाई जैसा कडा कदम न उठाए. हालांकि बीस जनवरी से अमेरिकी सत्ता संभालने वाले बराक ओबामा ने कहा है कि अपनी प्रभुसत्ता अक्षुण्ण रखने के लिए भारत को यह अधिकार है। भारत युद्ध अथवा सैन्य कार्रवाई नहीं चाहता, लेकिन किसी मुल्क को अपने नागरिकों के खून से होली खेलने की इजाजत भी नहीं दे सकता. मुंबई हमले के बाद से भारत के नागरिकों में गहरा रोष देखने को मिल रहा है. सरकार पर गहरा दबाव है. लोगों की जान माल की सुरक्षा के लिए वह इस बार निर्णायक कार्रवाई के मूड में है. वैसे भी लोकसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है. यू पी ऐ सरकार उस से पहले पाकिस्तान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करके अपने पक्ष में वातावरण बनाना चाहती है.जिस तरह का दबाव सरकार पर है, उसे देखते हुए भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान निर्णायक कार्रवाई का मन बना चुका है। एक सौ बीस देशों में तैनात अपने राजदूतों और उच्चायुक्तों को दिल्ली बुलाकर मौजूदा हालातों के बारे में फीड किया गया है ताकि वे उन देशों के राष्ट्र प्रमुखों को उससे अवगत कराकर उन्हें भारत के पक्ष में कर सकें। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रक्षा मंत्रालय के वार रूम में बैठक कर साफ संकेत दे दिए हैं कि यदि पाक ने सहयोग नहीं किया तो भारत के सैन्य कार्रवाई समेत समस्त विकल्प खुले हुए हैं। इस बैठक में तीनों सेनाध्यक्षों के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, रक्षा, विदेश और गृह मंत्री भी मौजूद थे। साफ है, पाकिस्तान का यही रुख रहा तो उस पर कड़ी कार्रवाई तय है।

4 comments:

अशोक मधुप December 23, 2008 at 9:28 AM  

तैयारी तो सब कर रहे हैं किंतु इसमे कितनी इमानदारी है, यह सोचना होगा।
कहीं चुनाव में जनसमर्थन के लिए तो यह कवायद नही। हम नेताआें के करनी पर यकीन नही कर सकते । उनके इरादे क्या है , अपने राजनैतिक हित के लिए वे सब कुछ कर सकतें है।
युद्ध प्रथम नही अंतिम विकल्प है किंतु मेरे राजनेता शायद वोट पाने को इसे प्रथम विकल्प के रूप में देख रहे हैं। वे ये नी सोच रहे कि युद्ध विकास को कितना प्रभावित करता है।
घर में सख्ती दिखाए तो लगेगा कि बाहर भी वह कुछ कर सकते हैं। जब फांसी की सजा पाएं आतंवादियों को यह फांसी पर नही चढा पा रहे तो हमला तो दूर की बात है। फासीं के सजा पाए आतकवादी को चौराहे पर फासंी दीजिए। कसाब के नाम पर हमे जो राजनैतकि लाभ मिलना था मिल गया। पाक को मदद करने के लिए उससे पत्र भी लिखवा लिया। अब मारये उसे चोराहे पर गोली। देश मे कठोरता दिखाइये, बाहर से आने वाले खुद डरेगें ।

Manvinder December 23, 2008 at 3:25 PM  

आपने ठीक कहा है ....देश इस समय युद्ध के मुहाने पर है....रक्षा मंत्री ने सेना की छुट्टियाँ रद्द कर दी है....इसके अलावा भी कई कदम उठा लिया है जिनसे यह संकेत मिल रहे है

Richa Joshi December 30, 2008 at 2:10 PM  

इस देश को एक इंदिरा चाहिए। लूले-लंगड़े और बूढ़ों के वश की बात नहीं।

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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