Monday, January 5, 2009

पाक न माने तो कार्रवाई करे भारत

मुंबई हमले के तुरंत बाद पाकिस्तान के उन ठिकानों पर हमला नहीं करके क्या भारत ने रणनीतिक चूक नहीं कर दी है, जहां आतंकवादियों के लिए प्रशिक्षण केन्द्र चलाए जा रहे हैं? भारतीय नेतृत्व ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का एक सुनहरी अवसर गवां दिया है। संसद पर आतंकवादी हमले के बाद भी भारत के पास हमले का विकल्प था। तब दस महीने तक सेना मोरचे पर खड़ी रही। अमेरिका ने तब भी सीधी कार्रवाई नहीं करने दी। भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद पाकिस्तान ने जैश ए मोहम्मद पर पाबंदी तो लगाई लेकिन वह नाम बदलकर तबाही की इबारत लिखता रहा। पूरी दुनिया जान चुकी है कि मुंबई हमले में आईएसआई का हाथ है। अमेरिका भी जान चुका है। भारत ने सबसे पहले अमेरिकी नेतृत्व को ही विश्वास में लिया, लेकिन इसका भारत को क्या सिला मिला? एफबीआई के जरिए भारत सरकार ने पाकिस्तान को कुछ अहम सबूत भिजवाए तो उसने उन्हें मानने से ही इंकार कर दिया। पाकिस्तान का रुख पूरी तरह असहयोग का है। पहले उसने एक मात्र जीवित पकड़े गए आतंकवादी अजमल कसाब के पाकिस्तानी होने से इंकार किया। उसके बाद कसाब की चिट्ठी पर चुप्पी साध ली। फिर कहना शुरू किया कि भारत ने हमला किया तो पाकिस्तान गैरतमंद कौम की तरह खड़ा हो जाएगा और माकूल जवाब देगा। दबाव बढ़ा तो कहा कि हिन्दुस्तान पहले सबूत दे। उसके बाद पाक सहयोग करेगा। दो दिन पहले एक अखबार के जरिए कहा गया कि भारतीय एजेंसियों को आरोपियों से पूछताछ की इजाजत दी जा सकती है, वह भी अपनी जमीन पर।
अमेरिका के सुर भी बदलते रहे हैं। हाल में अमेरिका ने पाकिस्तान को सलाह दी है कि वह आरोपियों को यदि नहीं सौंपना चाहता तो उन पर अपने देश में ही मुकदमा चलाए और सजा दे। कहने का तात्पर्य यह है कि अमेरिका ने मुंबई हमले को मजाक बनाकर रख दिया है। वह ये भी भूल गया है कि इस हमले में आठ अमेरिकी भी मारे गए हैं। क्या भारत अब भी अमेरिका का मुंह ताकते रहना चाहेगा? कूटनीतिक प्रयासों का समय खत्म हो गया है। अब यह कहने का वक्त भी खत्म हो गया है कि हमारे सभी विकल्प खुले हैं। अब उन विकल्पों पर अमल करने का समय आ गया है। यह मुंबई हमले के तुरंत बाद आतंकवादी ठिकानों पर हमला न करने की गलती सुधारने का समय है।
सोमवार सुबह भारत ने नई दिल्ली में स्थित पाकिस्तान के उच्चायुक्त शाहिद मलिक को बुलाकर वे सबूत भी सौंप दिए, जिनकी मांग वहां की सरकार करती रही है। विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने फिर दोहराया कि भारत मुंबई की गलती को माफ करने के मूड़ में नहीं है। क्या मान लिया जाए कि अब जो कदम उठाए जा रहे हैं, उनसे भारत अपने अंतिम कूटनीतिक प्रयासों को आजमाने की कोशिश कर रहा है। गृहमंत्री पी चिदम्बरम सबूत लेकर वाशिगंटन रवाना होने वाले हैं। चीन सहित सभी देशों को भी सबूतों से अवगत कराने का निर्णय सरकार ने लिया है। क्या माना जाए कि पूरी दुनिया के सामने अकाट्य सबूत पेश कर भारत पाकिस्तान पर निर्णायक अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाना चाहता है? यह सलाह भी दी जा रही है कि भारत को ये सबूत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सम्मुख भी रखने चाहिए ताकि पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित कराने की दिशा में ठोस पहल की जा सके, लेकिन क्या इन प्रयासों को अमेरिका और चीन जसे देशों का समर्थन हासिल होगा? चीन मुंबई हमले पर लगातार अनर्गल बयानबाजी करता चला आ रहा है। अमेरिका पर विश्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वह भारत से पहले अपने सामरिक हितों की रक्षा करने को तरजीह दे रहा है। वह पाकिस्तान पर मुंबई हमले के आरोपियों को भारत के हवाले करने का निर्णायक दबाव इसलिए नहीं बढ़ा रहा क्योंकि वह पाक-अफगान सीमा पर फंसा हुआ है। पाकिस्तान ने सेना की कुछ टुकड़ियां वहां से हटाकर पूर्वी सीमा पर तैनात कर दी हैं। इससे तालिबान और अलकायदा के खिलाफ सीमांत प्रांत में चल रही अमेरिका की मुहिम को झटका लगने की आशंका है।
राष्ट्रपति जार्ज बुश हों अथवा बराक ओबामा, भारत यात्रा पर कोंडालिसा राइस आएं या मार्क वाउचर, उनकी कुल कोशिश यही है कि भारत चेतावनियों से आगे न बढ़ने पाए। अमेरिका के इस अंकुश और बेजा दखल के लिए खुद भारतीय नेतृत्व जिम्मेदार है। भारत की एकता-अखंडता और प्रभुसत्ता को कायम रखने के लिए लिये जाने वाले अहम निर्णयों के लिए भी अगर वह अमेरिका का मुंह ताकता रहेगा तो उसकी आगे चलकर और भी बुरी गत होने वाली है। भारत को यह तय करना होगा कि वह अमेरिका से बराबरी के रिश्ते बनाना चाहता है या पाकिस्तान जैसे देशों की तरह उसका पिछलग्गू बनना चाहता है। भारत को इजरायल से सीख लेनी चाहिए। फलस्तीनी सरकार अगर हमास जैसे बिगडैल आतंकवादी संगठन पर लगाम कसने की जिम्मेदारी नहीं ले रही है तो इजरायल ने उसे नेस्तनाबूद करने के लिए पहले हवाई हमला किया और अब जमीनी हमला बोलकर उसे गाजा पट्टी में घुसकर सबक सिखाने का फैसला लिया है। वहां अमेरिका इजरायल के साथ है। तो वह भारत के साथ क्यों नहीं है? क्योंकि भारत उस पर दबाव ही नहीं बना पा रहा है। भारत को उसे दो टूक समझाना होगा। बताना होगा कि अनिश्चिकाल तक वह खामोश नहीं रह सकता। अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर उसकी कार्रवाई पर असर न पड़े, इसके लिए जरूरी है कि अमेरिका पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव बनाए कि वह आतंकवादी प्रशिक्षण केन्द्रों को पूरी तरह ध्वस्त करे और वांछित आरोपियों को भारत के हवाले करे। यदि अमेरिका ऐसा नहीं करता है तो भारत को अब जुबानी जमा खर्च बंद कर सीधी कार्रवाई कर देनी चाहिए। सीमा पार बैठकर जो लोग भी भारत के खिलाफ षड़यंत्र रच रहे हैं, उन्हें सबक सिखाने का वक्त आ गया है।

4 comments:

समयचक्र - महेद्र मिश्रा January 5, 2009 at 7:45 PM  

आपके विचारो से सहमत हूँ . एक समाचार के अनुसार पूर्व राष्ट्रपति दा. कलाम ने भी हमले हेतु कहा है
पर समझ में नही अत है कि हमारे आका किस का(क्या अमेरिका) मुंह देख रहे है और किसकी स्वीकृति का इंतजार कर रहे है .लगता है कि देश के राजनेताओं में निर्णय लेने की क्षमता नही है .

Richa Joshi January 5, 2009 at 9:01 PM  

हर हिंदुस्‍तानी का मन यही कहता है कि पाक में चल रहे आतंकवादी कैंपों पर हमला कर उन्‍हें नेस्‍तनाबूद कर दिया जाए लेकिन युद्ध किसी भी समस्‍या का हल नहीं है और ये अंतिम हथियार है। ये भी एक सत्‍य है।

अशोक मधुप January 6, 2009 at 10:27 PM  

युद्ध को अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं, आतंक वा पाकिस्तान से नही बंगला देश से भी आ रहा है। राजनीति यह है कि असम में चल रहे आंतकवादी हमलों को लेकर हम पहले बंगला देश में आतकवादी शिविरों पर कार्रवाई करें। वहा हमला होता देख पाकिस्तानी नेतृत्व स्वयं अपना सुर बदल लेगां ।

parul January 11, 2009 at 1:13 PM  

apke in veecharo ka asar sarkar bhi padna chaiye

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