Monday, February 2, 2009

चुनाव आयोग पर सियासत सही नहीं

अपनी निष्पक्षता, पारदर्शिता और संवेधानिक दायित्वों के प्रति गंभीरता के लिए पूरे विश्व में विख्यात भारत का निर्वाचन आयोग आम चुनाव से ठीक पहले विवादों में घिर गया है। अब इस मसले पर राजनीति भी शुरू हो गई है। जहां भाजपा चावला को हटाने की मांग कर रही है, वहीं कांग्रेस नेताओं और कानून एवं विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज ने उल्टे मुख्य चुनाव आयुक्त की मंशा पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। संवेधानिक संस्थाओं की मर्यादा, गरिमा और विश्वसनीयता बनी रहे, यह सत्तापक्ष-विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है। कोशिश होनी चाहिए कि संवेधानिक संस्थाओं में एेसे व्यक्ति नियुकत न हो, जिनका जुड़ाव किसी खास विचारधारा, पार्टी अथवा नेता से हो। इसके अलावा, नियुकत किए गए व्यक्ति को अपने आचरण से एेसा संकेत नहीं देना चाहिए कि वह उस संवेधानिक संस्था के बजाय किसी और का हित साध रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को नवीन चावला को बर्खास्त करने संबंधी जो पत्र भेजा है, उसमें इसी तरह के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। निर्वाचन आयोग में गोपालस्वामी की नियुक्ति अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय हुई थी। नवीन चावला की नियुक्ति मनमोहन सरकार ने की है। जब उनकी आयुक्त के रूप में तैनाती हुई, उसी समय से भाजपा चावला के खिलाफ मोरचा खोले हुए है। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को भेजी गई शिकायती चिट्ठी में 204 सांसदों ने कहा था कि नियुक्ति से ठीक पहले कांग्रेस से जुड़े सांसदों ने अपनी निधि से चावला की पत्नी के एक ट्रस्ट में डोनेशन दिए हैं। उनके तार 10, जनपथ से भी जुड़े रहे हैं। ये गंभीर आरोप थे, जिन्हें राजनीतिक कारणों से अनदेखा कर दिया गया। एन गोपालस्वामी ने अपने पत्र में यही कहा है कि चावला का अब तक का कार्यकाल पक्षपात पूर्ण फैसलों वाला रहा है। यह गंभीर आरोप है। इन्हें राजनीतिक कारणों से हवा में उड़ाना देशहित में नहीं होगा। अफसोस की बात है कि आयुक्तों को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है, जिस कारण रिटायरमैंट से ठीक पहले गोपालस्वामी की इस पहल को भी शंका की दृष्टि से देखा जा रहा है।
सर्वविदित है की गोपाल स्वामी अप्रैल में मुख्य चुनाव आयुक्त पद से मुक्त होने जा रहे हैं. कांग्रेस नेता उनकी मंशा पर यह कहते हुए सवाल उठा रहे हैं कि अवकाश ग्रहण करने से कुछ ही माह पहले उन्होंने चावला को हटाने कि सिफारिश क्यों की है. क्या गोपाल स्वामी भी भाजपा के हित तो नहीं साधना चाह रहे हैं. वरिष्ठता क्रम के हिसाब से गोपाल स्वामी के बाद चावला ही मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार सँभालने वाले हैं. आम आदमी के बीच इस विवाद से यही संकेत जा रहे हैं कि निर्वाचन आयोग को भी राजनितिक दलों ने अपने अपने हित साधने का अखाडा बनाकर रख दिया है. इन विवादों के चलते निर्वाचन आयोग सहित सभी प्रमुख संवेधानिक संस्थाओं की गरिमा किस कदर प्रभावित होती है, इसका अंदाजा शायद इन्हे नहीं है.
ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

4 comments:

विष्णु बैरागी February 2, 2009 at 6:48 PM  

यदि चावला की निष्‍ठा संदिग्‍ध है तो स्‍वामी की नीयत। स्‍वामी चाहते है कि जो कुछ और जैसा कुछ वे करते रहे हैं वह चावला को करने के अवसर न मिलें। स्‍वामी की बातें कितनी भी सही क्‍यों न हों, टाइमिंग उन्‍हें संदिग्‍ध और अविश्‍वसनीय बना रहा है। वे ईमानदार हैं या नहीं किन्‍तु इस समय तो ईमानदार नहीं दिख रहे।

इष्ट देव सांकृत्यायन February 2, 2009 at 7:51 PM  

यह विवाद ऐसे ही नहीं आया है ओंकार जी. जान-बूझ कर खडा किया गया है, उन्हीं नेताओं द्वारा, जिनके ख़िलाफ़ यह अभी लग रहा है. परम्परा के मुताबिक अंत में होगा यह कि एक पिट्ठू को हटाकर दूसरा बडा पिट्ठू बैठा दिया जाएगा.

हरि February 2, 2009 at 9:45 PM  

हर डाल पर पिट्ठू पर बैठा है
अंजाम-ए-गुलिस्‍तां क्‍या होगा

अनुनाद सिंह February 3, 2009 at 9:29 AM  

चौधरी जी, बिना पिट्ठुओं के भारत में परिवारवाद कैसे जिन्दा रह सकेगा?

अजादी के बाद कांग्रेस की दो सूत्री नीति रही है , - "भ्रष्ट करो और राज करो" तथा "बांटो और राज करो"।

जो लिखा

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

ऊपर वापिस लौटें