Wednesday, February 11, 2009

अखाड़ा नहीं बनाएं सदनों को


मंगलवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्षी दलों ने जमकर हंगामा किया। विधायक मेजों पर चढ़ गए। समाजवादी पार्टी के सदस्यों ने राज्यपाल को भाषण नहीं देने दिया। उन पर कागज के गोले फैंके। भाजपा सदस्यों ने बहिष्कार किया। बुधवार को आंध्र प्रदेश विधानसभा में भी एेसे ही दृश्य देखने को मिले। वहां तेलुगु देशम और टीआरएस विधायकों ने हंगामा किया। टीआरएस और टीडीपी विधायकों को निलंबित कर दिया गया। सदन में हो रही नारेबाजी को रोकने के लिए स्पीकर ने मार्शल को बुलाया और विधायकों को सदन से बाहर करने का आदेश दिया। विधायकों और मार्शलों के बीच हुई धक्का मुक्की में एक विधायक घायल भी हो गया। इसी दिन उड़ीसा विधानसभा में कांग्रेस विधायकों ने हंगामा किया।
यूपी में बसपा की सरकार है। आंध्र में कांग्रेस की तो उड़ीसा में बीजू जनता दल और भाजपा की। एेसे में सवाल उठना लाजिमी है कि सभी राज्यों में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं, फिर हंगामा क्यों? जवाब है लोकसभा चुनाव की तैयारी। सत्तारूढ़ दल जहां लोकलुभावन घोषणाएं करके अपने पक्ष में जनादेश बनाने की कोशिश कर रहे हैं वहीं विपक्षी दल सदनों को राजनीति का अखाड़ा बनाने से नहीं चूक रहे। यह बेहद अफसोस की बात है कि लोकतंत्र के इन पवित्र मंदिरों की गरिमा व मर्यादा को हंगामों, प्रदर्शनों, नारेबाजियों से कुचलने की शर्मनाक कोशिशें की जा रही हैं।
वृहस्पतिवार से संसद का अल्पकालीन बजट सत्र शुरू हो रहा है। लोकसभा चुनाव से पहले यह अंतिम सत्र होगा, लिहाजा यहां भी हंगामे की पूरी आशंका है। सत्तारूढ़ यूपीए गठबंधन अंतरिम रेल और आम बजट में लोकलुभावन घोषणाएं करने की तैयारी कर रहा है, जबकि विपक्षी दल एटमी करार से लेकर महंगाई, घोटालों, आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर सरकार की विफलता जैसे मसले जोर-शोर से उठाएगा। तय है कि यह सत्र वैसे ही हंगामे की भेंट चढ़ेगा, जैसे पिछले सत्र चढ़ते आए हैं।
किसी जमाने में भारतीय संसद और विधानसभाएं गंभीर बहसों के लिए जानी जाती थीं लेकिन अब ये राजनीति के अखाड़े बन गए हैं। विरोधी दलों को लगता है कि सदन की कार्रवाई को बाधित कर वे अपनी बात जनता के बीच आसानी से पहुंचा सकते हैं। यह सोचा गया था कि सीधे प्रसारण से हंगामों पर अंकुश लगेगा, लेकिन उल्टा हुआ। सदनों में आए दिन होने वाले इन हंगामों से पूरा देश चिंतित है। आखिर संसद में जो होना चाहिए, वह क्यों नहीं हो रहा है? और जो नहीं होना चाहिए, वही क्यों हो रहा है?
सदनों की एक गरिमा और मर्यादा है, जिसे बनाए रखने की जिम्मेदारी सदस्यों और राजनीतिक दलों की है लेकिन बहस का स्तर ही नहीं गिरा है, सदस्यों के आचरण पर भी सवाल उठने लगे हैं। लगता है, इसकी परवाह किसी को नहीं है कि सदनों की कार्रवाई पर कितना पैसा खर्च होता है। सत्ता-पक्ष और विपक्ष के लिए राजनीतिक हित ज्यादा अहम हो गए हैं। अब तो यह आलम है कि रोज एक बहाने की तलाश होती है। उसे तूल दिया जाता है। बहस नहीं होती, शोर होता है। नारेबाजी होती है। एक-दूसरे पर बाहें चढ़ाई जाती हैं और स्पीकर ‘ये क्या हो रहा है?’ और ‘आप बैठकर उनकी सुनते क्यों नहीं हैं?’ कहते हुए नजर आते हैं। निरंकुश सदस्य चेयर की अनदेखी कर कार्रवाई ठप कर देते हैं।
आखिर संसद और विधानसभाएं राजनीति का अखाड़ा क्यों बनती जा रही हैं? सत्तापक्ष और विपक्ष इन हालातों के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराने में लगे हैं। आंकड़े यह बताने को काफी हैं कि पिछले दस-पंद्रह वर्षो में सदनों में गंभीर कामकाज के घंटे और दिन घटे हैं- शोर शराबे, हंगामे, स्थगन और टोकाटाकी की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं। आलम यह है कि जब किसी गंभीर विषय पर बहस की नौबत आती है तो सदन में गिने-चुने सदस्य ही दिखाई देते हैं। वित्त विधेयकों चर्चा के समय कोरम तक पूरा नहीं हो पाता।
पक्ष-विपक्ष अपने-अपने राजनीतिक हितों को साधने में लगे हैं और चाहे अनचाहे सदन हंगामे और आरोप प्रत्यारोपों के अखाड़े बन गए हैं। अकेले संसद की एक दिन की कार्रवाई पर ही एक करोड़ तेईस लाख (1,23 करोड़) रुपया खर्च होता है।
दरअसल, संसद में यह हालात एकदम पैदा नहीं हुए हैं। 1988 तक भी सब ठीक चल रहा था। साल में लगभग 100 दिन संसद बैठकर कामकाज निबटाती ही थी लेकिन उसके बाद कभी 100 दिन नहीं बैठी जबकि अमेरिकी कांग्रेस साल में डेढ़ सौ दिन काम करती है तो ब्रिटेन की हाउस आफ कामैंस करीब पौने दो सौ दिन। भारतीय संसद में कामकाज के दिन घटकर 80 रह गए हैं। और उनमें से भी अधिकांश समय हंगामे की भेंट चढ़ जाता है। दुखद स्थिति तो यह है कि गंभीर विषयों एवं विधेयकों तक पर संसद में गंभीर व सार्थक बहसें नहीं होतीं। अकाल जैसे मुद्दे पर बहस के समय सदन में 100 सांसद भी नहीं थे। इसके उलट हंगामे के समय उपस्थिति ठीक रहती है। निश्चित ही सदनों में सदस्यों और राजनीतिक दलों की कार्यशैली, भूमिका और रवये के साथ-साथ जिम्मेदारी तथा जवाबदेही पर देश में इस वक्त एक गंभीर बहस की जरूरत है।
ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

5 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन February 11, 2009 at 3:05 PM  

अखाडा सदनों को बनाना कहाँ है. वो तो वो बहुत पहले से बने हुए हैं.

हरि जोशी February 11, 2009 at 7:12 PM  

एक बार चुन कर पांच साल के राजा हो जाते हैं;अच्‍छी पोस्‍ट लिखी है आपने। आपने सच कहा है-सदनों में सदस्यों और राजनीतिक दलों की कार्यशैली, भूमिका और रवये के साथ-साथ जिम्मेदारी तथा जवाबदेही पर देश में इस वक्त एक गंभीर बहस की जरूरत है।

parul February 11, 2009 at 7:58 PM  

apka yha lekh sir sadan tak bhi pachuna chaiye . acha likh h sir

Manvinder February 12, 2009 at 2:47 PM  

आप का ब्लॉग जल्दी जल्दी रंग badal रहा है ...बहुत sunder .....
सदनों में सदस्यों और राजनीतिक दलों की कार्यशैली, भूमिका और रवये के साथ-साथ जिम्मेदारी तथा जवाबदेही पर देश में इस वक्त एक गंभीर बहस की जरूरत है। इस पर कुछ होना चाहिए ....
अच्छी post के लिए badhaaee

अविनाश वाचस्पति February 14, 2009 at 10:30 PM  

इष्‍ट जी सही कह रहे हैं
आखिर हैं तो वे देव ही
बस पहलवानों को बदल
डालना बाकी भर शेष है

जो लिखा

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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