Thursday, March 12, 2009

यह अब तक की सबसे अच्छी टीम

सौरव गांगुली महेन्द्र सिंह धोनी की अगुआई वाली इस टीम को अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम मानने को तैयार नहीं हैं। यह सही है कि इस टीम में सुनील गावस्कर, कपिलदेव, नवाब पटौदी, अजहरूद्दीन और गुंडप्पा विश्वनाथ जैसे खिलाड़ी नहीं हैं, जो अपने-अपने समय के सर्वकालिक महान क्रिकेटर रहे हैं लेकिन दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर, सबसे विस्फोटक बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग, महेन्द्र सिंह धोनी, युवराज सिंह जैसे बल्लेबाज इस टीम का अहम हिस्सा हैं, जिन्होंने अपने बेहतरीन प्रदर्शन और अनुकरणीय सोच, रवैये व व्यवहार से टीम को दुनिया की चोटी की तीन टीमों में ला खड़ा किया है। गावस्कर निसंदेह पहले एेसे भारतीय बल्लेबाज रहे, जिन्होंने रनों का सबसे बड़ा पहाड़ खड़ा किया और डान ब्रेडमैन को पछाड़ते हुए सर्वाधिक टैस्ट शतक लगाने का गौरव हासिल किया। विश्वनाथ और अजहरूद्दीन जैसा कलाई का जादूगर कोई दूसरा नहीं हुआ। महान आल राउंडर कपिलदेव की गिनती भारत के सबसे सफल कप्तानों में तो नहीं होती लेकिन 1983 में उनके नेतृत्व वाली टीम ने जो करिश्मा कर दिखाया, उससे पहले या बाद में और कोई टीम नहीं कर सकी। इसलिए भारतीय क्रिकेट में कपिलदेव का विशेष स्थान है। जिस तरह का जुझारूपन और जीतने की ललक उनमें दिखाई देती थी, वैसी ही ललक, धुन और जिद मौजूदा कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी में नजर आती है। उनमें गजब की नेतृत्व क्षमता है। मैदान में जूझते रहने और आसानी से हार नहीं मानने का जज्बा है। इस टीम की विशेषता यही है कि वह किसी एक खिलाड़ी पर निर्भर नहीं है। एक दौर था, जब गावस्कर के जल्द आउट होते ही टीम बिखर जाती थी। उनके बाद सचिन तेंदुलकर के शुरुआती दस साला दौर में भी एेसा हुआ। अब कह सकते हैं कि यह टीम सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली के बिना भी जीतना जान गई है। सौरव गांगुली इस टीम की कामयाबी को नहीं पचा पा रहे हैं तो यह उनकी दिमागी समस्या है। हकीकत यह है कि यही वह टीम है, जो देश के लिए एक बार फिर विश्वकप लाने का हौंसला और काबिलियत रखती है।

जब टीम न्यूजीलैंड के लिए रवाना हो रही थी, सौरव गांगुली ने यह चुनौती भी दी थी कि पिछले एक साल से भारतीय उपमहाद्वीप में यह टीम जिस तरह का प्रदर्शन करती रही है, वैसा ही प्रदर्शन न्यूजीलैंड में करके दिखाए। जानकारों ने टीम को यह कहते हुए काफी डराया कि ब्रायन लारा और सचिन तेंदुलकर जैसे बल्लेबाज वहां अब तक शतक नहीं नहीं लगा पाए हैं। लारा तो खैर संन्यास ले चुके हैं लेकिन तेंदुलकर ने क्राइस्टचर्च में 163 रनों की जो पारी खेली है, वह जवाब देने के लिए काफी है। शुरू के दो ट्वेंटी-ट्वेंटी मैचों में धोनी के धुरंधर जिस तरह पराजित हुए, उससे लगा कि सौरव गांगुली गलत नहीं कह रहे थे, लेकिन वनडे सीरीज में इस टीम ने जिस अंदाज में वापसी करते हुए अब तक हुए सभी मैचों में मेजबान टीम न्यूजीलैंड को सफाया किया है, उससे सौरव जैसे खिसियाए हुए खिलाड़ी ही नहीं, क्रिकेट खेलने वाले सभी देश हतप्रभ हैं। कड़ाके की ठंड, बार-बार आने वाली बारिश और तेज हवाओं के बीच सचिन तेंदुलकर, महेन्द्र सिंह धोनी, वीरेन्द्र सहवाग, गौतम गंभीर और युवराज सिंह ने जिस बेखौफ अंदाज में धमाकेदार पारियां खेलते हुए न्यूजीलैंड टीम के आक्रमण को रौंदा है, उसकी धमक कंगारुओं के देश से लेकर दक्षिण अफ्रीका, इंगलैंड और वेस्ट इंडीज तक जा पहुंची है। अब सौरव जैसे जले-भुने खिलाड़ी और आलोचक यह चुनौती देने की हिमाकत नहीं कर पाएंगे कि धोनी ब्रिगेड उछाल वाली तेज पिचों पर जीतकर दिखाएं। टीम इंडिया ने वह कारनामा कर दिखाया है, जो आज तक कोई भारतीय टीम न्यूजीलैंड में नहीं कर सकी। वनडे सीरीज जीतने का कारनामा। पांच वनडे मैचों की सीरीज में अब तक चार मैच हुए हैं। एक बारिश की भेंट चढ़ गया, नहीं तो उसमें भी भारत का ही पलड़ा भारी था। बाकी तीन मैचों में टीम इंडिया ने न्यूजीलैंड को संभलने का मौका तक नहीं दिया। अब सबकी नजर पांचवें एकदिनी मुकाबले पर टिक गई हैं।

इस टीम पर भरोसा किया जा सकता है कि यह वो कारनामा दोहरा सकती है, जो 1983 में कपिलदेव की टीम ने कर दिखाया था। विश्वकप लाने का। यह सही है कि सौरव गांगुली को अब तक का सबसे सफल कप्तान माना जाता है और उनके नेतृत्व वाली टीम 2003 के विश्वकप के बहुत करीब तक पहुंचने में सफल रही थी। फाइनल मुकाबले तक, लेकिन उसमें क्या हुआ? आस्ट्रेलिया ने लगभग एकतरफा जीत हासिल की। अभी ज्यादा वक्त नहीं बीता है। लोगों को अच्छे से याद है कि शुरुआती झटकों के बाद पूरी टीम किस कदर दबाव में आकर बिखर जाती थी। खुद सौरव, राहुल द्रविड और तेंदुलकर तक दबाव में आकर खेलने लगते थे। तेंदुलकर पर तो अब तक यह आरोप लगते रहे हैं कि जब भी टीम संकट में होती थी, उनका बल्ला नहीं चलता था। क्या मौजूदा टीम पर इस तरह का आरोप चस्पा किया जा सकता है? बिल्कुल नहीं। इसकी विशेषता ही यह है कि यह किसी एक या दो खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर निर्भर नहीं है। फंसे और लगभग हारे हुए मैच को किस तरह जीत में बदला जाता है, किसी को इस पर शोध करना हो तो उसे धोनी-ब्रिगेड के फंसे हुए मैचों को देखना चाहिए। पठान भाइयों की उस पारी को कौन भुला सकता है, जो उन्होंने श्रीलंका में पहले ट्वेंटी-ट्वेंटी मैच में उस समय खेली, जब पंद्रहवें ओवर में 115 रन पर भारत के साथ विकेट गिर चुके थे और केवल चार ओवर में इरफान और यूसुफ पठान ने 59 रनों की तूफानी पारी खेलकर भारत को जीत दिला दी। यही इस बदली हुई टीम की सबसे बड़ी विशेषता है। यह हार नहीं मानती। और अगर सचिन तेंदुलकर इसे अब तक का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजी क्रम मानते हैं तो यकीन करना ही होगा कि यही अब तक की सर्वश्रेष्ठ टीम है। इसी पर आप और हम विश्वकप जीतने का भरोसा कर सकते हैं।

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

6 comments:

झकाझक March 12, 2009 at 7:22 PM  

यह भी तो हो सकता है
कि पेट का पाचन ही
हो खराब
उसके खराब होने पर
दिमाग दुरुस्‍त काम करेगा
क्‍या गारंटी है ?

खिसियाए सौरव नहीं
खिसका उनका दिमाग है
जिसमें कहने को तो आग है
पर वो आग के नाम पर झाग है
और झाग .....

असफल दिमागी पहलवान भी वही हैं
वे भी हार कहां मानते हैं
फर्क सिर्फ इतना है कि
हारते हैं तो भी वे
हार पहनकर चले आते हैं
उनका नखरे दिखाना
खंबे नोचना - सब जायज है।

जानते होंगे आप
युद्ध और प्रेम में सब जायज होता है
दूसरा तो सदा ही नाजायज होता है
बिना आंसुओं के आंसू भरके रोता है।

Gagagn Sharma, Kuchh Alag sa March 12, 2009 at 8:11 PM  

पूरी तरह सहमत हूं आपसे।

Manvinder March 12, 2009 at 8:52 PM  

सौरव गांगुली इस टीम की कामयाबी को नहीं पचा पा रहे हैं तो यह उनकी दिमागी समस्या है। हकीकत यह है कि यही वह टीम है, जो देश के लिए एक बार फिर विश्वकप लाने का हौंसला और काबिलियत रखती है।
निशब्द हूँ सारी बात तो आपने कह दी....सुंदर पोस्ट के लिए बधाई

अनूप शुक्ल March 12, 2009 at 9:28 PM  

सुन्दर विवरण पेश किया है आपने। सहमत!

हरि March 13, 2009 at 2:37 PM  

दरअसल सफलता अवगुणों पर पर्दा डाल देती है।

parul March 14, 2009 at 2:18 PM  

sir kabhi glat kha hi nahi sakte

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