Sunday, March 29, 2009

वोरा को यकीन, फिर मिलेगा जनादेश

सोनिया गांधी के विश्वासपात्र और कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा को यकीन है कि देश की जनता यूपीए को फिर से पांच साल सरकार चलाने का जनादेश देगी। मैंने श्री वोरा से तीसरे मोर्चे, उनके गठबंधन सहयोगियों, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह समेत कई मसलों पर बातचीत की। रविवार के हरिभूमि में इसे प्रकाशित किया गया है।
यहां पेश हैं कुछ खास अंश:

कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है इस चुनाव में?
अभी उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया चल रही है। इसके पूरा होने के बाद ही कुछ कहना संभव होगा।
कौन से मुद्दे हैं, जिन्हें कांग्रेस जनता के बीच ले जाकर पुन: जनादेश मांगेगी?
डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व और सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में पांच साल चली यूपीए सरकार ने जनता से किए गए सभी वादों को पूरा किया है। पहली बार 72 हजार करोड़ की ऋण माफी हमारी सरकार ने की। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शुरू की, जिसमें साढ़े चार करोड़ लोगों को रोजगार मिला। सूचना का अधिकार दिया गया। स्वास्थ्य, सड़क, ग्रामीण विकास, पिछड़े वर्ग के लिए बड़े पैमाने पर काम किए गए। इन सबको लेकर लोगों के बीच जाएंगे।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा आतंकवाद का सवाल उठा रहा है? यूपीए सरकार के दौरान अनेक शहरों में हमले हुए। मुंबई में हुआ अटैक तो ताजा ही है?
कंधार प्रकरण, अक्षरधाम, लालकिला, संसद और रघुनाथ मंदिर पर हमला किसके समय हुआ? कांग्रेस ने उस समय राजग सरकार को भी आतंकवाद को रोकने के लिए पूरा सहयोग दिया था। आज जो मुद्दा ही नहीं है, उसे ये मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मेरा मानना है कि देशवासी एक काम करने वाली मजबूत सरकार चाहते हैं। डा. मनमोहन सिंह ने देश को ऐसी स्थायी सरकार दी है।
क्या यह सही नहीं है कि जिस तरह क्षेत्रीय दलों का जनाधार बढ़ रहा है, वह राष्ट्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी है। सरकार बनाने के लिए क्षेत्रीय दलों पर उनकी निर्भरता बढ़ रही है?
मैं इससे सहमत नहीं हूं। ये ठीक है कि किसी दल को किसी चुनाव में उतनी सफलता न मिली हो लेकिन इससे उसके राष्ट्रीय स्वरूप, पहचान और अधिकार को तो नहीं छीना जा सकता? कांग्रेस 123 साल पुराना राजनीतिक दल है। मुझे यकीन है कि राष्ट्रीय दलों का जनाधार घटेगा नहीं, बढ़ेगा। जनमानस जानता है कि देश के सामने जो परिस्थितियां आती हैं, उनका मुकाबला राष्ट्रीय दल ही कर सकते हैं। क्षेत्रीय दल अपने बूते सरकार नहीं बना सकते।
गठबंधन के इस दौर में आपको क्या लगता है कि क्षेत्रीय दलों की मनमानी बढ़ी है?
कांग्रेस ने गठबंधन सहयोगियों के साथ मिलकर बहुत अच्छे समन्वय से पांच साल तक यूपीए सरकार चलायी। कुछ दलों ने दबाव की राजनीति की। वे अलग हो गए, तो भी हम उनके शुक्रगुजार हैं कि उन्होंने सरकार चलाने में सहयोग दिया।
यूपी और बिहार को लेकर कांग्रेस के गठबंधन के अनुभव कोई अच्छे नहीं रहे?
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की हरचंद कोशिश की गई, लेकिन समझौता नहीं हो पाया। इस कारण कांग्रेस को अपने उम्मीदवार खड़े करने पड़े। इसके बावजूद सपा नेताओं ने कहा है कि हम कांग्रेस के साथ अच्छे रिश्ते रखना चाहते हैं। धर्मनिरपेक्ष दल नहीं चाहेंगे कि साम्प्रदायिक ताकतों का साया धर्मनिरपेक्षता पर पड़े। सामंजस्य और सद्भाव का वातावरण देश के लिए जरूरी है। पिछले दिनों पीलीभीत में जिस तरह का भाषण दिया गया और माहोल को ख़राब करने की कोशिश की गयी, उसकी भर्त्सना की जानी चाहिए, बी जे पी सद्भाव बिगड़कर वोट हासिल करना चाहती है. गाँधी परिवार ने हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव पर बल दिया है.

क्या आप मानते हैं कि तीसरा मोर्चा क्या यूपीए और राजग के लिए चुनौती बन सकता है?
पहले तो मैं यही जानना चाहता हूं कि पहला और दूसरा मोर्चा कहां है? फिर ये तीसरा मोर्चा आया कहां से है? इसमें जो दल शामिल हैं, वे कितने एकजुट हैं? उनमें से कितने प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं, यह समझ पाना मुश्किल है। हमें इस मोर्चे से कोई भय नहीं है। उनमें एका नहीं है। मायावती के भोज में जयललिता नहीं आई। न उनका कोई प्रतिनिधि आया। इसी से इसके भविष्य की कल्पना की जा सकती है।
क्या कांग्रेस फिर से सरकार बनाने को लेकर आश्वस्त है?
कांग्रेस फिर से सरकार बनाने को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है। इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है कि देश की जनता फिर से कांग्रेसनीत यूपीए गठबंधन को स्थायी सरकार बनाने के लिए जनादेश देगी।
युवा नेतृत्व को आगे लाने की बात भी बड़े जोर-शोर से उठायी जा रही है?
राहुल जी के कांग्रेस महासचिव बनने के बाद युवाओं में जिस तरह उत्साह का संचार हुआ है, उससे देखकर लगता है कि युवा वर्ग पूरी तरह राष्ट्र के नव निर्माण में अपना योगदान देने को तत्पर है। राहुल गांधी के व्यक्तित्व और कृतित्व का युवाओं पर प्रभाव पड़ा है। वे स्पष्ट वक्ता हैं। बिना लाग-लपेट के अपनी बात कहते हैं, लोग उन्हें सुनना पसंद करते हैं। इस लोकसभा चुनाव में उनके व्यक्तित्व का प्रभाव देखने को जरूर मिलेगा।

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com
omkar.chaudhary@yahoo.co.in

6 comments:

अविनाश वाचस्पति March 29, 2009 at 7:14 PM  

इतना यकीन यकीनन ठीक नहीं है
ओवर विश्‍वास बन गई गर घास तो।

खैर काम तो किया है अपना गुणगान करना
क्‍या आसान काम है, दूसरों की बुराईयां करना
और भी मुश्किल, लेकिन जीतना आसान
इतना सब होने पर भी गठबंधन परेशानियों की
क्‍यों बन गई है गांठ ?

dharmendra March 29, 2009 at 7:52 PM  

2004 me inke tarah bjp ka bhi india shining joro par tha. lekin mila kya. inke jaise massless leader isi tarah sapna dekhte hain kyonki malai jo khani hai. aur aise bhi inka kam hi false prachar karna hai. rojgar gurantee yojna hai kaha. kya bihar aur jharkhand india se bahar hai kya. waha jakar dekhe rojgar kitne logo ke pas hain. ha, right to information me really me kabileytarif work hua hai. lekin ispar bhi inki sarkar girgit ki tarah rang badalti rahi hai.

हरि March 29, 2009 at 8:47 PM  

चुनाव का मौका है, वोरा जी सधे हुए राजनेता हैं और आप सधे हुए कलमकार।

Anonymous,  March 29, 2009 at 11:03 PM  

वोराजी के दावों पर यकीन करने को मन करता है .
लेकिन कुछ आशंका हैं -upa का कुनबा बिखरने
के बाद भविष्य वैसा नहीं दीखता जैसा वोरा जी
बता रहे हैं.निर्मल

nirmal,  March 29, 2009 at 11:06 PM  

वोराजी के दावों पर यकीन करने को मन करता है .
लेकिन कुछ आशंका हैं -upa का कुनबा बिखरने
के बाद भविष्य वैसा नहीं दीखता जैसा वोरा जी
बता रहे हैं.निर्मल

Vidhu March 30, 2009 at 1:46 PM  

आद.वोरा जी जो भी कहतें हैं हमेशा ही अपने तगडे अनुभवं के बिना पर ही ...सरकार ने काम अच्छे करें हैं इसमे कोई संदेह नही ...जो लोग दूसरी पार्टी के समर्थक हें वो भी अक्सर चाहते रहें हें कि केन्द्र मेंयु पी ऐ कि सरकार काम करे ...सरकार चलाना कोई कुनबा चलाना नही ...एक ताकत होंसले और जिम्मेदारी भरा काम है ...और जिन लोगों मैं बर्दाश्त करने कि ताक़त होगी देश वोही चला सकतें हैं क्षणे रुष्ट क्षणे तुष्ट वाले नही आगे जनता कि मर्जी ..जिसे चुनेगी अपनी बुद्धिमत्ता से ...

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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