Wednesday, April 22, 2009

क्या प्रभाकरण का अंत निकट है ?


क्या यह मान लिया जाए कि लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण का खेल अब खत्म ही होने वाला है? श्रीलंका सेना ने देश के उत्तरी इलाके की घेराबंदी कर ली है, जहां प्रभाकरण अपने मुक्ति चीतों के साथ अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। लंबी और इस निर्णायक कार्रवाई में श्रीलंका सरकार ने लिट्टे की कमर तोड़ डाली है। प्रभाकरण दक्षिण भारत में बैठे अपने शुभचिंतकों के जरिए भारत सरकार पर दबाव बनवाने की फिराक में हैं कि वह श्रीलंका सरकार पर युद्ध विराम के लिए दबाव बढ़ाए, लेकिन भारत सरकार के रुख से साफ है कि वह एेसी कोई पहल नहीं करने जा रही है। यही बुधिमतापूर्ण निर्णय भी है, क्योंकि भारत नौवें दशक में वहां शांति सेना भेजकर एक बार अपने हाथ जलवा चुका है। बाद में राजीव गांधी को अपनी जान देकर इसकी बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ी थी। भारत को वहां हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इसमें दो राय नहीं है कि श्रीलंका में हालात बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच गए हैं। श्रीलंका सेना और तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई की लड़ाई में तमिल मूल के नागरिक मारे जा रहे हैं। सेना उन्हें युद्ध क्षेत्र से बाहर निकालने की कोशिश कर रही है ताकि लिट्टे विद्रोहियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई की जा सके, जबकि विद्रोही युद्ध क्षेत्र में फंसे नागरिकों को ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले एक सप्ताह के भीतर पचास हजार से अधिक नागरिक किसी तरह वहां से निकलकर भागे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय रेड़क्रास की मानें तो वहां अभी भी चालीस हजार से एक लाख तक नागरिक फंसे होने की आशंका है। श्रीलंका सेना ने विद्रोहियों को समर्पण के लिए जो चौबीस घंटे का समय दिया था, वह मंगलवार को खत्म हो गया। इसके बावजूद सेना निर्णायक हमला करने से बचने की कोशिश कर रही है, क्योंकि उस पर भारत, अमेरिका, ब्रिटेन सहित कई देशों का दबाव है कि वह खून खराबे से बचे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने श्रीलंका सरकार से कहा है कि वह एेसा कोई कदम न उठाए, जिससे निर्दोष लोगों की कीमती जान चली जाए।
युद्ध क्षेत्र से अंतरविरोधी खबरें आ रही हैं। बुधवार को जानकारी मिली कि लिट्टे के दो कमांडरों दया मास्टर और जार्ज ने सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। उधर लिट्टे ने वीडियो जारी कर दावा किया है कि श्रीलंका सेना की कार्रवाई में करीब एक हजार तमिल नागरिक मारे गए हैं। लिट्टे ने उनकी लाशों के चित्र भी जारी किए हैं। सेना का दावा है कि उसकी कार्रवाई में नागरिक नहीं मारे जा रहे हैं। श्रीलंका सरकार की इस कार्रवाई ने भारतीय राजनीति, खासकर तमिलनाडु में राजनीतिक सरगर्मी बढा दी है। वहां के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने भारत सरकार से कहा है कि वह श्रीलंका सरकार पर युद्ध विराम के लिए दबाव बनाए। उधर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से भी युद्ध क्षेत्न में फंसे हुए लाखों नागरिकों को बचाने के लिए दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। कई देशों ने श्रीलंका सेना और एलटीटीई से कहा है कि युद्ध प्रभावित क्षेत्न से लोगों को निकलने दिया जाए और वहाँ जारी गोलीबारी को रोका जाए। देश के उत्तरी हिस्से में श्रीलंका की सेना और एलटीटीई लड़ाकों के बीच भीषण संघर्ष जारी है। अमेरिका ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि उस इलाके में अभी तक दोनों ओर से गोलीबारी जारी है, जहाँ बड़ी तादाद में आम नागरिक फंसे हुए हैं। युद्ध प्रभावितों की मदद कर रही संस्था, रेडक्रास ने देश के उत्तर में ताज़ा स्थिति को भयावह और त्नासद बताया है। आईसीआरसी के अभियानों के प्रमुख पिए क्रानबुल ने जिनीवा में कहा कि श्रीलंका में संघर्ष वाले इलाक़े लगातार घट रहे हैं मगर वहाँ पर अब भी हजारों आम लोग फँसे हुए हैं। उन्होंने तमिल टाइगर विद्रोहियों पर आरोप लगाया कि वे लोगों को उन क्षेत्नों से निकलने नहीं दे रहे हैं जबकि सरकारी फौजें चिकित्सा आपूर्ति पहुँचाने में बाधा डाल रही है। वहाँ संघर्ष वाला इलाक़ा अब घटकर 12 वर्ग किलोमीटर रह गया है। स्थिति के बारे में क्रानबुल ने कहा कि मुङो याद नहीं आता कि इतनी कम जगह में मैंने इतने ज्यादा लोगों को फँसे देखा हो और वो भी इन हालात में जहाँ उनके पास सुरक्षा पाने की उम्मीद भी बहुत ही कम है। फँसे हुए लोगों में रेड क्रास के भी 80 लोग हैं और उन लोगों ने बताया है कि पिछले कुछ दिनों में सैकड़ों आम लोग मारे गए हैं। आईसीआरसी का कहना है कि आम लोगों की मौत रोकने के लिए दोनों ही पक्षों को तुरन्त कुछ क़दम उठाने चाहिए। उनके मुताबिक़ तमिल विद्रोहियों को फँसे हुए लोगों को बाहर निकलने देना चाहिए और सरकार को उन लोगों तक राहत सामग्री पहुँचने देनी चाहिए.

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

3 comments:

अविनाश वाचस्पति April 22, 2009 at 5:01 PM  

सच्‍चाई देने और

जागरूक करने के

लिए एक उपयोगी

ब्‍लॉग पोस्‍ट योग।

Udan Tashtari April 22, 2009 at 7:51 PM  

आभार इस समाचार के लिए. लेकिन क्या प्रभाकरण के अंत से समस्या मिट जायेगी.

श्यामल सुमन April 23, 2009 at 6:26 AM  

प्रभाकरण मर जाए तो क्या बन जाये बात?
हुई विफल सत्ता जहाँ फिर होगी शुरुआत।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

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पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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