Saturday, May 23, 2009

सहयोगियों की फांस जस की तस

कहते हैं, आगाज अच्छा हो तो अंजाम सुखद रहने की उम्मीद बढ़ जाती है। लगातार दूसरी बार शपथ ग्रहण करके डा. मनमोहन सिंह ने भारतीय राजनीति के इतिहास में अपना एक विशेष स्थान बना लिया है, लेकिन सोलह मई को चुनाव परिणाम मिलने के बाद कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों में जो उल्लास का वातावरण दिखायी दे रहा था, वह शपथ ग्रहण का वक्त आते-आते काफूर हो गया। उनके सहयोगी दलों ने सरकार बनने से पहले ही पदों को लेकर जो मोल-भाव शुरू किये, उसने रंग में भंग डाल दी। यह माना गया था कि पिछली सरकार के दौरान जिन-जिन दलों ने बखेड़े खड़े किये। सरकार के काम काज में रोड़े अटकाये और विभिन्न मुद्दों को लेकर बाधाएं खड़ी की, मतदाताओं ने उन सबको बाहर का रास्ता दिखा दिया। उन दलों को भी समर्थन नहीं दिया, जो सरकार को अस्थिर कर सकते थे। वामपंथियों का हश्र सबके सामने है, जिन्होंने एटमी करार को मुद्दा बनाकर सरकार को गिराने की कोशिश की। मायावती, चंद्रबाबू नायडु और जयललिता जैसे क्षत्रपों को उतनी ताकत नहीं मिली कि वे खेल कर सकें। लालू, पासवान और मुलायम दावे कर रहे थे कि उनके बिना कोई सरकार नहीं बन सकेगी। वे आज तीन में हैं न तेरह में। पिछली लोकसभा में कांग्रेस की 145 सीटें थी, जो बाद में बढ़कर 153 हो गयी थीं। इस बार मतदाताओं ने उसे और ताकत दी। उसके लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़कर 206 तक जा पहुंची है, लेकिन यह संख्या बहुमत से 66 कम है। जाहिर है, बिना गठबंधन सहयोगियों के उसकी सरकार नहीं चल सकती लेकिन कांग्रेस नेताओं के बयानों, शारीरिक भाषा और तौर-तरीकों से एेसे संकेत गये मानों मतदाताओं ने उसे निर्णायक ताकत दे दी है और अब उसे किसी की परवाह नहीं है। बिना शर्त समर्थन देने वाले समाजवादी पार्टी, राजद और दूसरे दलों की यह कहते हुए खिल्ली उड़ायी गयी कि सीबीआई के केसों में फंसे होने के कारण वे समर्थन देने की होड़ लगाये हुए हैं, जबकि कांग्रेस ने उनसे समर्थन मांगा ही नहीं है।
डा. मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को शपथ ग्रहण समारोह से ठीक चौबीस घंटे पहले घटे घटनाक्रम से इसका अंदाजा हो चुका होगा कि भले ही कांग्रेस की ताकत 153 से बढ़कर 206 हो गयी है लेकिन केन्द्र में सरकार का गठन और संचालन उनके लिये बहुत आसान नहीं रहेगा। गठबंधन सरकार आज भी कांग्रेस की उतनी ही बड़ी मजबूरी है, जितनी 2004 में थी। यह ठीक है कि मतदाताओं की समझदारी से कदम-कदम पर मुश्किलें खड़ी करने वाले वाम दलों से इस बार उसे छुटकारा मिल गया है, लेकिन उसे नहीं भूलना चाहिए कि डीएमके, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, नेशनल कांफ्रैंस जैसे दलों के सहयोग की उसे जरूरत है। डीएमके ने 2004 में भी मंत्रालयों और पदों को लेकर ठीक इसी तरह का नाटक किया था, जैसा इस बार किया है। तब उसके मंत्री शपथ लेने के बाद चैन्नई जा बैठे थे और उन्होंने मंत्रालयों का कामकाज तभी संभाला, जब उन्हें मनपसंद विभाग मिल गये। इस बार उन्होंने शपथ ग्रहण करने से पहले ही सब कुछ तय कर लेने का फैसला किया। 2004 में कांग्रेस ने सहयोगी दलों के लिये सरकार में कोई निश्चित कोटा अथवा फार्मूला तय नहीं किया था। चूकि इस बार कांग्रेस की ताकत थोड़ी बढ़ी है, इसलिये उसे लगा कि वह सहयोगी दलों पर अपनी शर्ते थोप सकती है। उसने तीन सांसदों पर एक मंत्री पद का फार्मूला बना दिया। कांग्रेस की लगती यह रही कि उसने इस पर सहयोगी दलों से सहमति लेना भी मुनासिब नहीं समझा।
नतीजतन डीएमके मंत्रालयों, पदों और संख्या को लेकर सौदेबाजी और ब्लैकमेलिंग पर उतर आया। प्रधानमंत्री ने टी आर बालू और ए राजा को मंत्रीमंडल में शामिल करने से इंकार कर दिया। डीएमके रेलवे, स्वास्थ्य, दूरसंचार जैसे मंत्रालयों की जिद पर अड़ा रहा। प्रधानमंत्री के लिये सबसे बड़ी दिक्कत यह रही कि वे किसी भी सूरत में टी आर बालू और ए राजा को मंत्रीमंडल में नहीं लेना चाहते थे, क्योंकि पिछली सरकार में उनका काम-काज बहुत खराब रहा था। उन पर कई तरह के आरोप हैं। करुणानिधि न केवल इन दोनों बल्कि अपनी बेटी, बेटे और भतीजे दयानिधि मारन को भी मंत्री बनाये जाने की मांग पर अड़ रहे। तनाव इस कदर बढ़ा कि करुणानिधि शपथ ग्रहण समारोह का बायकाट कर बालू समेत कई वरिष्ठ नेताओं के साथ वापस चैन्नई लौट गये। नाराजगी के स्वर अन्य दलों की तरफ से भी सुनाई दिये। जम्मू-कश्मीर के नए सहयोगी नेशनल कांफ्रैंस के नेता, और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस नेताओं पर राजनीतिक शिष्टाचार की अनदेखी का आरोप लगाया। उनकी नाराजगी इसे लेकर थी कि मंत्रीमंडल में उनके पिता फारुख अब्दुल्ला को शामिल करने न करने पर कांग्रेस नेतृत्व ने उन लोगों से बात तक नहीं की। ममता बनर्जी ने सार्वजनिक तौर पर हालांकि कुछ नहीं कहा लेकिन कई मसले हैं, जिन पर कांग्रेस के रख से वह भी नाराज बतायी गयी हैं। समाजवादी पार्टी महासचिव अमर सिंह और राष्ट्रीय जनता दल नेता लालू यादव कांग्रेस के रवैये से आहत हैं ही। लालू यादव ने पिछली सरकार की विदाई कैबिनेट बैठक में मनमोहन सिंह से यह कहते शिकायत दर्ज कराई कि कांग्रेस के कुछ नेता चैनलों पर उनके बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी कर रहे हैं। मंत्रालय को लेकर खबरें शरद पवार की नाराजगी की भी आई, लेकिन उन्हें समझा-बुझा लिया गया।
कांग्रेस नेतृत्व को यह समझना होगा कि लोकसभा में अभी भी उसके पास अपने दम पर बहुमत नहीं है। गठबंधन सरकार चलाने के लिये उसे अब भी सहयोगियों के समर्थन की दरकार है। पिछले कुछ दिनों में उसके प्रमुख नेताओं के बयानों और उनकी बाडी लैंग्वेज से एेसा लगा, जैसे उन्हें इस बार किसी की खास परवाह नहीं है और वे हर लिहाज से मजबूत सरकार बनाने जा रहे हैं। करुणानिधि की मांगों को जायज नहीं ठहराया जा सकता और पदों व मंत्रालयों को लेकर वे जैसी जिद कर रहे हैं, वह भी सीधे-सीधे प्रधानमंत्री के विशेषाधिकारों में हस्तक्षेप है। इसके बावजूद उन्हें मनाना और साथ रखना कांग्रेस की मजबूरी है। यही नहीं मुलायम, लालू, देवगौड़ा, मायावती जैसे उन नेताओं का निरादर भी यूपीए सरकार को आगे चलकर महंगा पड़ सकता है, जो बिना मांगे उसे समर्थन की घोषणा कर चुके हैं। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को इसका अंदाजा हो गया होगा कि करुणानिधि के अलग होने की सूरत में यही मुलायम और लालू इस सरकार के जीवन के लिये कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं। न्यूनतम साझा कार्यक्रम नहीं बनाने से लेकर इस बार कांग्रेस ने कई एेसे फैसले लिये हैं, जिनसे संकेत मिलते हैं कि वह गठबंधन सहयोगियों के प्रति जवाबदेह नहीं रहना चाहती। यह रवैया इस सरकार के दीर्घजीवी होने के मार्ग में बाधक भी बन सकता है। वैस भी डा. मनमोहन सिंह की इस बार की राह बहुत आसान नहीं रहने जा रही है। आर्थिक मोर्चे सहित कई मोर्चो पर उन्हें पहले ही दिन से जूझना होगा। लोगों ने उनमें भरोसा दिखाया है तो उन्हें उस पर खरा भी उतरना है।

1 comments:

dharmendra May 23, 2009 at 5:06 PM  

excellent. sir gandhi pariwar hamesha se self centralised raha hai. ek bar nehru ji ne apne kisi karibi se bola tha ki indira kaphi aatm kendrit hai. aakhir inke ander bhi to yahi khoon hai. itihas gawah hai ki congress ne kitne sarkaro ko giriya hai wo bhi kewal isliye ki kendra ki satta par kewal uska hi adhikar hai. aur ha congress ke ye jitne bhi chatukar hain jinhe gandhi pariwar ki chaplusi karne ke liye hi rakha gaya hai. jinka khud koi mass base nahi hai wo mass leader ke bare me kuch bhi bol rahe hain.jo apni seat nahi nikal sakte. aur ha ye jo regional parties ke bare me bola ja raha hai ki inhone pichli sarkar me khub bargening kiya tha unhe isbar saaf kar diya gya. mera sawal yeh hi aakhir in choti-choti parties ka uday kyon hua. kya iske piche in tthakathit national partio ka haath nahi hai. kya gandhi pariwar ya sanghi hi satta ki malai kha sakte hain.

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फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

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