Friday, May 29, 2009

नये भारत के निर्माण की चुनौती


पंद्रह अगस्त 2004 को लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह ने कहा था कि वे एेसा भारत बनाना चाहते हैं, जिसमें सबको इंसाफ मिले। जहां इंसानियत और भाईचारा हो। एक एेसा भारत, जिसमें सभी लोगों को बराबर समझा जाये। एेसा भारत, जो खुशहाल हो। जिसमें अमन चैन हो। जिसमें हरेक को अपनी सलाहियत के मुताबिक काम मिल सके और वह अपना भविष्य बना सके। एक एेसा भारत जो धर्मनिरपेक्ष हो, जिसमें भेदभाव और नाइंसाफी न हो। एक एेसा भारत, जिसमें विविधता में एकता हो। पंद्रह अगस्त 2008 को उसी लालकिले की प्राचीर से देशवासियों को पांचवीं बार संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने 2004 के उस भाषण और सपने को याद किया। कहा कि एेसा भारत बनाने की हमारी पूरी कोशिश रही है। 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ, पंडित नेहरू ने संसद के केन्द्रीय कक्ष में देश का आह्वान किया था कि हमें गरीबी, अज्ञान, रोग और अवसर की असमानता हटाने के लिए सामूहिक रूप से कार्य करना चाहिए। मनमोहन सिंह ने 2008 के अपने संबोधन में दावा किया कि समान अवसरों के साथ एक समावेशी समाज का कार्य अभी भी चल रहा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि मेरी सरकार को अपनी उपलब्धियों के आधार पर यह विश्वास है कि हम इस लक्ष्य की पूर्ति के और पास आ गये हैं।
2004 और 2009 के बीच जो पांच वर्ष गुजरे हैं, उनमें बहुत कुछ घटा है। मनमोहन सिंह कह सकते हैं कि वे जितना करना चाहते थे, बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथियों ने नहीं करने दिया। इस बार उनके पास यह तर्क नहीं होगा। मतदाताओं ने उनमें और कांग्रेस पार्टी में भरोसा जाहिर किया है, इसलिए उन्हें वह सब करके दिखाना होगा, जो उन्होंने कहा है। अपने सपनों के नये भारत के निर्माण की गंभीर चुनौती उनके सामने है। मतदाताओं ही नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया है। वे चाहतीं तो 40 साल के होने जा रहे राहुल गांधी को इस बार प्रधानमंत्री बनाकर गांधी परिवार की अगली पीढ़ी का राजतिलक करा सकती थीं, लेकिन लगता है कि राहुल और सोनिया गांधी इस प्रचार की हवा निकालने पर आमादा है कि इस परिवार में तो लोग जन्म ही प्रधानमंत्री बनने के लिये लेते हैं। दूसरे, मनमोहन सिंह ने पिछली सरकार के समय नये भारत के निर्माण के लिए जो योजनाएं हाथ में ली थीं, वे उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री को पूरा समय देने के पक्ष में दिखाई देते हैं। हालांकि इस बार प्रधानमंत्री की बहुत परवाह नहीं करने वाले कुछ मंत्रियों अर्जुन सिंह, हंसराज भारद्वाज और शिवराज पाटिल को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। हालाँकि एक मामले में सोनिया ने मनमोहन की नहीं मानी.प्रधानमंत्री मोंटेक सिंह आहलूवालिया को वित्तमंत्री बनाना चाहते थे। सोनिया नहीं मानीं। वे इस पद पर जनता के बीच के नेता को लाने की पक्षधर थीं। इसलिए प्रणब मुखर्जी को आम आदमी को राहत देने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। पद संभालते ही वे बजट की तैयारियों में जुट गए हैं।
डा.मनमोहन सिंह को यह समझना होगा कि पूरे देश की उम्मीद भरी निगाहें अब उनकी मंत्री परिषद पर टिकी हैं। वे और सोनिया गांधी यह समझते हैं कि जिस कांग्रेस को 2004 में 145 सीटें मिली थीं, उसकी झोली में 2009 के लोकसभा चुनाव में 206 सीटें कैसे आई हैं। राष्ट्रीय कृषि विकास योजना ने खासकर ग्रामीण भारत में नयी उम्मीद जगायी है। सेहत, शिक्षा, बिजली, सड़क, आवास और सिंचाई के लिये मनमोहन सरकार ने 25 हजार करोड़ रुपये का जो निवेश किया, वह बहुत से गांवों में दिखायी भी दिया। किसानों का 71 हजार करोड़ का कर्जा माफ किया गया। कृषि के लिये 2 लाख 25 हजार करोड़ के कर्जे बैंकों ने जारी किये। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत भी केन्द्र सरकार ने तीन करोड़ से अधिक जरूरतमंद ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराया। इसके अलावा राष्ट्रीय शिक्षा योजना, कौशल विकास मिशन, छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के फैसले ने अपना असर दिखाया। साफ है, इन योजनाओं को और तेज गति से आगे बढ़ाने की चुनौती सरकार के सामने होगी। ग्रामीण रोजगार गारंटी जसी योजना की मांग अब शहरी बेरोजगारों की ओर से भी उठ रही है।
मनमोहन सिंह सरकार के समक्ष चुनौतियां कम नहीं हैं। मुद्रा स्फीति की दर भले ही नीचे आई हो, लेकिन महंगाई सातवें आसमान पर है। तमाम योजनाओं और सरकारी प्रयासों के बावजूद यदि देश के आम आदमी को राहत मिलती नजर नहीं आ रही है, तो कहीं न कहीं उन योजनाओं को लागू करने के तौर-तरीकों में खोट है। नौकरशाही में लालफीताशाही चरम पर है। प्रशासनिक अधिकारी सेवक नहीं, स्वामी की तरह व्यवहार करते हैं, इसलिये प्रसासनिक सुधारों को लागू करना एक चुनौती होगी। मंबई पर हमले जसे खतरों की आशंका खत्म नहीं हुई है। बाहरी और भीतरी आतंकवाद आज एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने है। मनमोहन सिंह सरकार को जहां केन्द्रीय और राज्य के साथ-साथ जिला स्तर तक के खुफिया तंत्र को बेहद चुस्त चौकस बनाना होगा, वहीं अंदरूनी कमजोरियों को भी खत्म कर उन कारणों का समाधान खोजना होगा, जिनके चलते ये हालात उत्पन्न होते रहे हैं।
देश में कुपोषण की समस्या बहुत भारी है। खासकर ग्रामीण और बेहद पिछड़े इलाकों में बच्चों का न तो ठीक से पालन-पोषण होता है और न उनकी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था। हर वर्ग को समान अवसरों की बातें तो की जाती हैं परन्तु मंत्रीमंडल में स्थान दिये जाने से लेकर एक चपरासी की नौकरी पाने तक में वंचित वर्ग को अवसर के लिए तिल-तिल कर तरसना पड़ता है। समावेशी समाज की स्थापना की बात नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक करते नजर आते हैं परन्तु वास्तविकता क्या है, यह समझने की जरूरत है। हकीकत यह है कि असमानता दिन-दूनी रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। जब तक देश से भुखमरी, बेकारी-बेरोजगारी और किसानों की खुदकुशी खत्म नहीं होगी, तब तक कोई प्रधानमंत्री अथवा सरकार यह दावा नहीं कर सकते कि देश तरक्की कर रहा है।
आर्थिक, सामाजिक मोर्चे पर तो मनमोहन सिंह की सरकार को जूझना ही है, वैदेशिक मोर्चे पर भी बहुत पापड़ बेलने होंगे। पड़ोसी देशों की बात करें तो अफगानिस्तान को छोड़कर किसी के बारे में भी विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि वह इस समय हमारे भरोसे की कसौटी पर खरा उतरता है। पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं। पड़ोस में आग लगी हो तो उसकी आंच जरूर प्रभावित करती हैं। भारत की नयी मनमोहन सरकार को एेसे प्रयास करने होंगे कि पड़ोसी देशों में न केवल अमन बहाल हो बल्कि वहां लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई स्थिर सरकारें विकास कार्यो को आगे बढ़ाएं। इसके लिए भारत ने अफगानिस्तान में जिस तरह आगे बढ़कर सहयोग किया है, यदि अवसर मिले तो वसी ही उदारता अन्य देशों में भी दिखानी होगी। इन सब चुनौतियों के बीच जाहिर है, सबकी निगाहें डा. मनमोहन सिंह पर होंगी, जो नये भारत के निर्माण के अपने सपने को मूर्त रूप देना चाहते हैं।

3 comments:

Desh Premi May 29, 2009 at 4:29 PM  

बिल्कुल सही कहा आपने, अभी सभी को पता चलेगा की इस गठबंधन में कितना दम है .
वैसे , अगर देखा जाए तो ये मौका कॉंग्रेस को पुनर्जनम देने के लिए बहुत हे सुनहरा है. कम से कम 5 साल तो बढ़िया काम करे जिसके दम पे अगला 20 साल चुनाव लड़ सके!!!
चलिए अपने देश की ख़ुसी के लिए यही शुभ कामना करते हैं

राष्ट्रहित के लिए आइये आपका स्वागत है
http://rashtravad.blogspot.com/
आपने सुझाओं और संवेदनाओं से हमें अनुग्रहित करे।

Manvinder May 30, 2009 at 11:00 AM  

bahut sahi likha hai .....cogress ke liye bhi or desh ke liye bhi....yah kaafi sukhad rhega....acchi jankari ke liye shukriya

annu May 30, 2009 at 3:40 PM  

मनमोहन सिंह कह सकते हैं कि वे जितना करना चाहते थे, बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथियों ने नहीं करने दिया। इस बार उनके पास यह तर्क नहीं होगा। मतदाताओं ने उनमें और कांग्रेस पार्टी में भरोसा जाहिर किया है, इसलिए उन्हें वह सब करके दिखाना होगा.

bilkul satik tippani.badhai.

- anita bharati, jaipur

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

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