Wednesday, June 10, 2009

रिश्तेदार थे, उनका यही कसूर था

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपनी सर्विस रिवाल्वर से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर गोलियां दागने वाला सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह अपरेशन ब्लू स्टार के पहले तक उनका बहुत बड़ा भक्त था। उसके बड़े भाई यदि इंदिरा गांधी की नीतियों की अलोचना करते तो वह भड़क जाता था। इसका खुलासा खुद बेअंत की बेटी अमृतकौर और बेटे जसविन्दर ने किया था, जब पांच साल पहले मैं उनसे पंजाब के मोहाली शहर में मिला। बेअंत का दिमाग उस समय घूमा, जब उसके मामा केहर सिंह ने उसे और सतवंत सिंह को आपरेशन ब्लू स्टार के बाद अकाल तख्त और हरिमंदिर साहिब के दर्शनों के लिए खासतौर से अमृतसर भेजा। बेअंत और सतवंत प्रधानमंत्री निवास पर सुरक्षा ड्यूटी में तैनात थे। इंदिरा गांधी को जब उन्होंने 31 अक्तूबर 1984 को गोलियों से छलनी कर लहूलुहान किया, तो अन्य सुरक्षाकर्मियों ने बेअंत और सतवंत सिंह पर फायर खोल दी। इन दोनों को अस्पताल भेजा गया। बेअंत ने दम तोड़ दिया जबकि सतवंत को पांच साल बाद केहर सिंह के साथ फांसी दे दी गयी।
दिल दहला देने वाले इस हादसे के आरोपियों में से एक बेअंत अन्य सुरक्षाकर्मियों की गोलियों का शिकार हो गया जबकि प्रधानमंत्री की हत्या करने और उसकी साजिश रचने वाले सतवंत और केहर सिंह को मुकदमें के बाद 1989 में तिहाड़ में फांसी दे दी गयी। जिन्होंने इतनी बड़ी साजिश रची और उसे दुस्साहसिक तरीके से अंजाम दिया, उन्हें उनके किये की सजा मिल गयी। इस दिल दहला देने वाली घटना के बीस साल बाद 2004 में मैंने बेअंत सिंह, केहर सिंह और सतवंत सिंह के परिजनों से मुलाकात कर यह जानने की कोशिश की कि क्या घटना के दो दशक बाद उन्हें देश की प्रधानमंत्री की इस तरह हत्या कर दिये जाने पर अफसोस है? मुङो यह जानकर झटका लगा कि उन्हें प्रधानमंत्री की हत्या का रत्ती भर भी प्रायश्चित नहीं था। केहर सिंह की विधवा जसबीर कौर ने कहा कि इंदिरा गांधी नहीं मारी जानी चाहिए थीं, लेकिन अकाल तख्त को भी तहस-नहस नहीं किया जाना चाहिए था। बेअंत सिंह के उस समय सौ वर्षीय पिता सुच्चा सिंह ने आसमान की तरफ हाथ उठाते हुए जवाब दिया कि उस सच्चे बादशाह के घर को ढहाने वाले के साथ एेसा हुआ तो उन्हें कोई अफसोस नहीं है। जब मैं सुच्चा सिंह से चंडीगढ़ के पास स्थित गांव मलोया में मिला तो यह देखकर चौंका कि उनके घर में बीस साल बाद भी जरनैल सिंह भिंडरावाले की बड़ी सी तस्वीर लगी थी।
जगदीश टाइटलर हों या सज्जन कुमार। एचकेएल भगत हों अथवा अन्य नेता, भले ही बाद में सब सफाई देते नजर आए कि उन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों में कोई भूमिका नहीं निभाई, लेकिन तथ्य बताते हैं कि जिनका कोई कसूर नहीं था, उन्हें भी इंदिरा गांधी के मारे जाने के बाद नेताओं, प्रशासन और समाज के बड़े तबके ने खून के आंसू रुलाए थे। सिख विरोधी दंगों में तीन हजार लोगों का मारा जाना कोई छोटी-मोटी बात नहीं थी। हजारों सिख विधवाएं आज भी इंसाफ की बाट जोह रही हैं। अकालियों समेत अन्य राजनीतिक दलों ने सिख विरोधी दंगों का अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक ने में तो खूब इस्तेमाल किया, लेकिन पीड़ित परिवारों को शीघ्र न्याय मिले, इसके लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। नतीजतन दंगों के इतने साल बाद भी बहुत से सिख परिवार इंसाफ के लिए ठोकरे खाते फिर रहे हैं। बहुत से परिवार एेसे हैं, जो दंगों से पहले बहुत साधन संपन्न थे, लेकिन दंगाइयों ने उनका सब कुछ छीन लिया। वे सड़कों पर आ गए।
पुलिस की जांच में यह साफ हो गया था कि इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश रचने वाला केहर सिंह था और साजिश को अंजाम देने वाले बेअंत और सतवंत थे। दिल्ली पुलिस के एक अन्य गिरफ्तार सब इंस्पेक्टर बलबीर सिंह को हालांकि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने केहर और सतवंत के साथ फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेकसूर मानते हुए रिहा कर दिया, लेकिन कैट की सिफारिश के बावजूद सरकार ने बलबीर सिंह को वापस नौकरी पर बहाल नहीं किया। सरकार कैट के आदेश के खिलाफ कोर्ट चली गयी। मामला लंबा खिंचा तो बलबीर सिंह ने दिल्ली के एक गुरूद्वारे में सुरक्षा अधिकारी की नौकरी कर ली, लेकिन करीब चार साल तक वह जेल में रहे और इस बीच उनके परिवार को दुनिया भर की जलालतों का सामना करना पड़ा।
बेअंत सिंह ने घायल होने के बाद दम तोड़ दिया लेकिन बाद में उनके परिवार पर भी बहुत बुरी बीती। उनकी पत्नी विमल खालसा लेडी हार्डिग हास्पीटल में नर्स थी। उन्हें पुलिस ने पूछताछ के लिए वहीं से उठा लिया। तीनों बच्चे अमृतकौर, जसविंदर और सर्वजीत स्कूल गए हुए थे। घर आए तो सारा सामान बिखरा पड़ा था। पुलिस ने घर की सघन तलाशी थी। विमल को कई दिन बाद छोड़ा गया। वह छोटे-छोटे बच्चों को लेकर चंडीगढ़ गई तो कोई उन्हें किराए पर मकान देने को तैयार नहीं हुआ। कई महीने उन्हें मोहाली के जंगल में स्थित एक ट्यूबवल के कमरे में बिताने पड़े। कोई स्कूल इंदिरा गांधी के हत्यारोपी बेअंत सिंह के बच्चों को एडमिशन देने को तैयार नहीं हुआ। बाद में उन्होंने खरड़ के एक मिशनरी स्कूल में दाखिला लिया। हालात एेसे बने कि तीनों भाई-बहनों को बाद में प्राइवेट बी काम और बीए करना पड़ा। हालांकि 1989 में विमल खालसा ने फिल्लौर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता लेकिन दो साल बाद ही रहस्यमय हालात में घर में उनकी मौत हो गई।
केहर सिंह का बड़ा बेटा राजिन्दर सिंह विधि एवं न्याय मंत्रालय में स्टेनोग्राफर था। पिता गिरफ्तार हुए तो बेटे का फर्ज निभाते हुए उन्होंने पैरवी की। सरकार इतनी खफा हुई कि उसका मुंबई तबादला कर दिया गया। उसने छुट्टी ले ली तो केस बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में एक साल के लिए भीतर कर दिया। सरकारी नौकरी गई तो क्वार्टर भी छिन गया। बाद में उन्हें भी अपने परिवार के साथ दिल्ली के एक गुरूद्वारे के छोटे से कमरे में शरण लेनी पड़ी। जाने-माने वकील रामजेठमलानी को उन पर दया आई तो उन्होंने राजिन्दर सिंह को अपने यहां मुंशी रख लिया। ये घटनाएं बताती हैं कि जिन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या की, उनके परिवारजनों को भी समाज, प्रशासन और सरकार ने तरह-तरह से प्रताड़ित किया जबकि उन्हें षड़यंत्र की भनक तक नहीं थी। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि किसी देश की प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन जिन्होंने अपराध किया, उन्हें कानून ने सजा दे दी थी। उनके परिवारों का क्या कसूर था, जिन्हें इस कदर प्रताड़ित किया गया। इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। न समाज के, न प्रशासन के और न ही सरकार के।

8 comments:

Ratan Singh Shekhawat June 10, 2009 at 4:58 PM  

बहुत सही मुद्दा उठाया है आपने !

बसंत आर्य June 10, 2009 at 5:05 PM  

हृदयविदारक लगी ये बातें मुझे तो भाई साहब.

ASHA RANI June 11, 2009 at 7:09 AM  

jab kisi burai ke saath naam judta hai samaj saath chhod deta hai, achchhe ke sath jude sir aankho par bithata hai, sarkaren bhi jab isi ka anusaran karane lage to nirdosho ko nyay kaun de, hifazat kaun kare, bilkul sahi tasvir dikhai aapne dhanyvad

Uttama June 11, 2009 at 2:35 PM  

रोचक जानकारी दी है आपने

Ankur's Arena June 12, 2009 at 7:45 PM  
This comment has been removed by the author.
Ankur's Arena June 12, 2009 at 7:47 PM  

खूबसूरत लेख है
वाजिब सवाल हैं
तकलीफ बस इतनी कि
मरहम कम
और दर्द बेहिसाब हैं

अक्षय-मन June 14, 2009 at 7:42 PM  

बहुत ही सटीक मुद्दा लिया है आपने.....
अपनी बात कहने में पूरे सफल हुए हैं..........
चाहता हूं ये बात जन-जन तक पहुंचे
मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है.......

अक्षय-मन

Trilochan Singh May 24, 2017 at 12:53 PM  

sahi me bahut accha lekh likha apne. bt isme me kucch kehna chahta hu if u dont mind. aapke samne apki maa ki koi izzat lute . behan ko koi nanga kr de. jise aap bahut pavitra mante ho us place pr gande joote lekar jaye.jiske aage aap shish jhukate ho use koi barbad kr de. jb rakshak he bhakshak bn jaaye plz bataiye kiya aap banduk nhi uthayenge.

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

ऊपर वापिस लौटें