Monday, June 15, 2009

धोनी नहीं, बीसीसीआई को कोसें

पिछली टी-ट्वेंटी विश्व चैम्पियन टीम इंडिया सुपर-8 मुकाबले के तीन में से दो शुरुआती मैच हारने के बाद मुकाबले से बाहर हो गई है। इस बार वह सेमीफाइनल में भी नहीं पहुंच पायी। जाहिर है, उन करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह बुरी खबर है, जो भारतीय टीम को सिर्फ और सिर्फ जीतते हुए देखना चाहते हैं। जीत का यह चस्का टीम इंडिया के साथ-साथ भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को भी लग चुका है। पिछले दो साल से इस टीम के प्रदर्शन में निरंतरता रही है। उसने आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, पाकिस्तान, न्यूजीलैंड से लेकर इंग्लैंड जैसी श्रेष्ठ टीमों को परास्त किया है। पिछले टी-ट्वेंटी विश्व कप को जीतकर तो जैसे धोनी की अगुआई वाली यूथ ब्रिगेड ने तहलका ही मचा दिया था। सब जानते हैं कि वनडे की विश्व चैम्पियन आस्ट्रेलिया टीम का मान मर्दन सबसे पहले टीम इंडिया ने ही किया था। विदेशी जमीन पर जिस तरह की जीतें इस टीम ने दर्ज की हैं, उससे लोगों का उस पर भरोसा पुख्ता हुआ। यही वजह है कि भारतीयों की उम्मीदें इस बार भी सातवें आसमान पर थीं। वे धोनी के धुरंधरों के हाथ में इस बार भी टी-ट्वेंटी कप की चमचमाती हुई ट्राफी देखना चाहते थे।
यह नामुमकिन भी नहीं था। जिस तरह का प्रदर्शन यह टीम करती आई है, उससे लग रहा था कि इस टूर्नामैंट में भी ये खिलाड़ी वैसा ही करिश्मा दोहरा सकते हैं। एक-दो फेरबदल करके धोनी को लगभग वही टीम दी गई, जो पिछली बार विश्व कप लेकर मुंबई लौटी थी। जिसका मुंबई में शानदार स्वागत किया गया था। हालांकि यह कहने वालों की कमी नहीं है कि सचिन तेंदुलकर जैसे अनुभवी क्रिकेटर को टी-टवेंटी टीम में भी रखा जाना चाहिए लेकिन लगता है, खुद मास्टर ब्लास्टर ही यह नहीं चाहते कि उनकी वजह से इस टीम के बेटिंग आर्डर में किसी तरह की छेड़छाड़ की जाए। वे भारत के लिए लंबे अरसे से ओपनिंग करते रहे हैं। इस टूर्नामैंट से पहले वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर की जोड़ी अच्छे तालमेल से खेलते हुए अच्छी शुरुआत देती रही है। यह अलग बात है कि कंधे की चोट के कारण सहवाग को लंदन से वापस लौटना पड़ा और धोनी को उनके स्थान पर मुंबई के रोहित शर्मा को खिलाना पड़ा। सहवाग ने चोट छिपाई या बीसीसीआई ने धोनी को विश्वास में नहीं लिया, यह जांच का विषय है क्योंकि इसी प्रकरण के बाद से धोनी काफी उखड़े-उखड़े नजर आए।
टी-टवेंटी के इस विश्व खिताबी मुकाबले में टीम इंडिया के सुपर-8 मुकाबले में ही बाहर हो जाने के बाद जाहिर है, कई तरह के सवाल उठेंगे। वह उठने शुरू भी हो चुके हैं। सवाल उठने भी चाहिए क्योंकि इसी से सुधार की शुरुआत होती है। धोनी पर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। उन पर बेवजह बेटिंग आर्डर से छेड़छाड़ करने, आउट आफ फार्म गेंदबाजों को खिलाने, खुद अच्छा प्रदर्शन नहीं करने, इंग्लैंड के साथ होने वाले करो या मरो वाले मैच से पहले प्रेक्टिस नहीं करने जैसे कितने ही आरोप लगाए गए हैं। बीस ओवरों वाले इन मैचों में निर्णय तुरंत लेने होते हैं। उसमें आप इंतजार नहीं कर सकते। इंग्लैंड के खिलाफ जिस मैच में तीन रन से हारने के बाद टीम टूर्नामैंट से बाहर हुई, उसमें रवीन्द्र जड़ेजा जैसे कम अनुभवी बल्लेबाज को जबरदस्त फार्म में चल रहे अनुभवी युवराज सिंह से पहले भेजने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि 35 गेंदों में सिर्फ 25 रन बनाने वाले जड़ेजा ने बहुत धीमा खेला, जबकि उस समय तेज खेलकर टीम पर प्रति ओवर रन रेट का बोझा कम करने की जरूरत थी। धोनी ने भी माना है कि उनका यह फैसला गलत साबित हुआ। उन्होंने उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करने पर देशवासियों से माफी भी मांगी है।
धोनी बेहतरीन खिलाड़ी और एक सुलङो हुए कप्तान हैं। उनके नेतृत्व में भारतीय टीम ने विदेशी धरती पर जाकर वह कारनामा कर दिखाया है, जो बरसों से कोई टीम या कप्तान नहीं कर सका। वह आगे बढ़कर खुद कमान संभालते रहे हैं। उनकी और उनके निर्णयों की आलोचना करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि धोनी की यह यूथ ब्रिगेड ही पिछली बार टी-टवेंटी विश्व कप जीतकर लायी थी। इसी टीम ने देश को विश्व चैम्पियन होने का गौरव दिलाया था। एेसा नहीं है कि सेमीफाइनल से पहले ही किसी टूर्नामैंट से बाहर हो जाने से दुख नहीं होता, लेकिन यह कोई पहली एेसी टीम नहीं है, जो इस तरह विदा हुई हो। आस्ट्रेलिया जैसी विश्व चैम्पियन तो इस बार लीग मुकाबलों में ही बाहर हो गई। यह समय दरअसल, कप्तान और टीम की हौसला अफजाई का है न कि जाने-अनजाने उनकी आलोचना करके उनका मनोबल गिराने का।
प्रशंसकों के लिए यह जानना जरूरी है कि जिस तरह कोई भी सफलता स्थायी नहीं होती, उसी तरह असफलता भी चिरकाल के लिए नहीं होती है। धोनी के जज्बे को सलाम किया जाना चाहिए, जिन्होंने टूर्नामैंट से बाहर होने के बाद जहां एक तरफ देशवासियों से माफी मांगी वहीं यह भरोसा भी जताया कि अगली बार भारतीय टीम टी-टवेंटी विश्व कप जीतकर दिखाएगी। बजाय इसके कि खिलाड़ियों की आलोचना करें और कप्तान के फैसलों में मीन-मेख निकालें, हमें उन कारणों की तह में जाना चाहिए, जिनके चलते इस बार टीम इंडिया सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच सकी। सचिन तेंदुलकर हों या सौरव गांगुली, गावस्कर हों या अनिल कुंबले-हरेक को यह विश्वास था कि टीम इस बार भी फाइनल खेलेगी। सचिन ने तो यहां तक कहा कि यह टीम किसी भी टीम को हराने में सक्षम है। फिर एेसा क्या हुआ कि वह मुकाबले से इस तरह बाहर हो गई?
इसका जवाब धोनी नहीं, बीसीसीआई से पूछा जाना चाहिए। धोनी पर केवल यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने अच्छी कप्तानी नहीं की लेकिन इन हालातों की असल जनक बीसीसीआई ही है जिसने खिलाड़ियों को नोट बनाने वाली मशीन में तब्दील करके रख दिया है। क्या किसी ने इस पर ध्यान दिया है कि इन खिलाड़ियों को कितना क्रिकेट खेलना पड़ रहा है? पिछले दो साल में उन्हें आराम के लिए पर्याप्त समय तक नहीं मिल पाया है। एक से दूसरे टूर्नामैंट के बीच थोड़ा बहुत समय होता भी है तो उसमें उन्हें अपने विज्ञापन अनुबंधों के तहत शूटिंग वगैरा के लिए समय निकालना पड़ता है। टी-ट्वेंटी विश्व कप से ठीक पहले आईपीएल का चालीस दिन से भी लंबा टूर्नामैंट दक्षिण अफ्रीका में होकर निपटा है। वहां से खिलाड़ी लौटे तो उन्हें लंदन की फ्लाइट पकड़नी पड़ी। बीसीसीआई की समझ में अब यह बात भी आ जानी चाहिए कि विश्व कप जैसे टूर्नामैंट से पहले यदि टीम इंडिया के खिलाड़ी अलग-अलग टीमों का हिस्सा बनकर एक-दूसरे के खिलाफ जी-जान लगाकर खेलेंगे तो फिर इतनी जल्दी एक टीम के रूप में उनका खेलना आसान नहीं होगा। जैसी एकजुटता पिछले विश्व कप में दिखी थी, वैसी इस बार सिरे से गायब थी। बैटिंग, बालिंग और फील्डिंग में खिलाड़ियों पर थकान साफ साफ नजर आ रही थी। इसलिए कोसना है तो धोनी को नहीं, बीसीसीआई को कोसें।

3 comments:

Udan Tashtari June 15, 2009 at 5:33 PM  

किसी को भी क्या कोसें..चलता है खेल में.

SALEEM AKHTER SIDDIQUI June 15, 2009 at 5:44 PM  

kisi ko bhi kos lein. kosne se kuch nahin hoga. nuksan to cricket ka ho raha hai.

राजकुमार ग्वालानी June 15, 2009 at 11:57 PM  

लगातार मैच खेलने के बाद कैसे उम्मीद की जा सकती है कि टीम जीतेगी। खेलने की एक सीमा होती है। लेकिन पैसों के पीछे भागने वाले खिलाडिय़ों को इससे क्या? जितने ज्यादा मैच उतने ज्यादा पैसे। ऐसे में कोई क्यों करेगा ज्यादा मैचों का विरोध। देश से तो कोई लेना-देना है नहीं अपने क्रिकेटरों को जो उनको दर्द हो। हार का दर्द को खेल प्रेमियों को होता है। एक नजर इधर पर देखें
रणजी खेलकर ही एक पीढ़ी तर सकती है

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