Friday, July 10, 2009

ज़रदारी के बयान पर खामोशी क्यों


हर कोई हैरान है। इस पर भी कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने यह सच स्वीकार कर लिया कि आतंकवादी पाकिस्तान ने ही पाले-पोसे हैं और इस पर भी कि भारत सरकार पाक की इस स्वीकारोक्ति के बाद भी खामोश बनी हुई है। हैरानी यह देखकर भी हुई कि जी-आठ देशों ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ी जा रही जंग में पाकिस्तान को पूरा सहयोग करने का एेलान किया है। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक सहायता में तीन गुना वृद्धि कर चुका है। सवाल यह है कि जरदारी के खुलासे के बाद पाकिस्तान को आतंकवाद का पोषक मानें या उससे पीड़ित? जरदारी के बयान के बाद आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान की भूमिका पर क्या किसी को शंका होनी चाहिए? भारत तीस साल से पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार है। भारत कहता आया है कि पाकिस्तान न केवल आतंकियों की जमात तैयार करने में लगा है बल्कि उसने इसे सरकारी नीति में शामिल कर लिया है। आईएसआई और सेना के पूर्व अधिकारी आतंकवादियों को भर्ती करते हैं। उन्हें प्रशिक्षण देते हैं। अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र चलाने की सघन ट्रेनिंग के बाद उन्हें मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, बंगलुरू, अयोध्या, संसद, लालकिला जैसे टारगेट दिये जाते हैं। वे अवैध रूप से भारतीय सीमा में घुसपैठ करते हैं। मासूमों का कत्लेआम करते हैं। आतंकियों को घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तानी सेना हर हथकंडा अपनाती है। शुरू में पश्चिमी देशों ने भारत के इन खुलासों को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन 2001 में जैसे ही अमेरिका पर अटैक हुआ, उनकी समझ में आ गया कि पाकिस्तान की धरती पर किस तरह के सांप-सपोले तैयार किए जा रहे हैं। वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला करने वाले आतंकवादियों में से अधिकांश के तार किसी न किसी तरह से पाकिस्तान से जुड़े थे।
आसिफ अली जरदारी ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए जो कटु सत्य स्वीकार किया, उसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति दो ही सूरतों में इस तरह की सच्चाई स्वीकार करता है। या तो उसे इसका इल्म ही न हो कि वह जो कहने जा रहा है, उसके नतीजे क्या होंगे या फिर वह व्यक्ति एेसा खुलासा कर सकता है, जिसे शासन चलाने में दिक्कतें पेश आ रही हों और उसके मातहत काम करने वाले उसकी सुन ही नहीं रहे हों। जरदारी किन हालातों में इस पद तक पहुंचे हैं, यह किसी से दबी-छुपी बात नहीं है। उन्होंने बेनजीर भुट्टो को आतंकवाद के हाथों खोया है। कई साल के वनवास के बाद जब वे पाकिस्तान लौटी तो आत्मघाती हमले में मारी गईं। उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति थे। सेना, शासन-प्रशासन सब उनके इशारे पर काम करता था। अपनी हत्या से पहले बेनजीर यह आरोप लगा चुकी थीं कि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी जा रही है। उनकी हत्या के बाद इस तरह के आरोप लगे कि आईएसआई के कुछ अधिकारी नहीं चाहते थे कि बेनजीर की सत्ता में वापसी हो। बेनजीर की हत्या के बाद आम चुनाव हुए। उनकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को जनादेश मिला। यूसुफ रजा गिलानी प्रधानमंत्री बने और बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति।
जाहिर है, मुशर्रफ और उनकी सरकार के उन चेहरों की विदाई हो गई जो लंबे समय से पाकिस्तानी निजाम पर काबिज थे। वैसे तो मुशर्रफ के रहते हुए ही तालिबान, अलकायदा और कुछ दूसरे चरमपंथी संगठनों ने आंखें तरेरनी शुरू कर दी थी लेकिन जैसे ही बेनजीर की पार्टी सत्ता में आई, इन जमातों ने खुलकर खून-खराबा शुरू कर दिया। मुशर्रफ की विदाई और जरदारी की ताजपोशी अमेरिका की इस शर्त पर हुई थी कि यह सरकार एक तो मुशर्रफ के खिलाफ किसी तरह की बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करेगी। दूसरे, पाक सरकार अफगानिस्तान सीमा पर चल रही अमेरिकी कार्रवाई में सहयोग देगी। जाहिर है, चरमपंथी संगठनों को पाकिस्तान सरकार द्वारा अमेरिकी हकूमत के इशारों पर नाचना नागवार गुजरा। उन्होंने स्वात ही नहीं, लाहौर, इस्लामाबाद, कराची से लेकर देश के सभी प्रमुख शहरों में बड़े धमाके किए। विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद पांच सितारा होटलों, विदेशी दूतावासों, पुलिस, सेना और अधिकारियों पर अटैक शुरू कर दिए। आज पाकिस्तान में हालात कितने भयावह हैं, यह पूरी दुनिया जान चुकी है। श्रीलंका की क्रिकेट टीम को दौरा बीच में ही छोड़कर किन हालातों में स्वदेश लौटना पड़ा, यह सबने देखा। जब से यह सरकार बनी है, तब से देश में पूरा निजाम ठप है। विदेशियों की आमद में भारी कमी दर्ज की गई है।
राष्ट्रपति जरदारी बच्चे नहीं हैं। जानते हैं कि जो कह रहे हैं, उसके नतीजे क्या होंगे। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने उनके बयान पर सफाई देकर मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की है परन्तु कमान से तीर निकल चुका है। जुबान से निकली बात पर कितनी भी लीपा-पोती की कोशिश की जाए, उससे पल्टा नहीं जा सकता। उन्होंने जो कुछ कहा, उसके अर्थ साफ हैं। उनके निशाने पर पूर्व राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ ही नहीं, उनके पूर्ववर्ती शासनाध्यक्ष भी हैं, जिन्होंने भारत और अफगानिस्तान को अस्थिर करने के लिए आतंकवादियों को न केवल पाला-पोसा, बल्कि संरक्षण भी दिया। पाकिस्तान के चेहरे पर पड़ा नकाब तब उतरना शुरू हुआ था, जब सीमा पार से भेजे गए आतंकियों की पहचान भारत ने की और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाक को बेनकाब किया। जरदारी ने कहा कि पाकिस्तान ने अपने सामरिक हितों को साधने के लिए ही आतंकवादियों को पाला-पोसा लेकिन आतंकियों ने 9-11 की घटना के बाद उन्होंने पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया।
दरअसल, पाकिस्तानी निजाम की समझ में अब आ रहा है कि आतंकवादियों को पाल-पोस और प्रश्रय देकर उसने कितनी बड़ी भूल की है। अलकायदा, तालिबान, लश्कर ए तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन सहित अनेक आतंकवादी संगठनों को वहां से लगातार खाद-पानी मिलता रहा। ओसामा बिन लादेन हों या मुल्ला उमर, हिजबुल-लश्कर और जमात उद दावा के हाफिज मोहम्मद सईद हों या बैतुल्लाह-वे तभी तक शांत थे, जब तक पाकिस्तान उन्हें मनमानी करने की छूट दिए हुआ था। जैसे ही अमेरिकी सेनाओं ने उन पर शिकंजा कसा, इन सभी चरमपंथी संगठनों की बंदूक की नालें पाकिस्तानी निजाम की ओर तन गई। अभी भी पाकिस्तानी सेना और आईएसआई में एेसे बहुत से अफसर हैं, जो चरमपंथियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। वे नहीं चाहते कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग उनकी करतूतों का इस तरह खुलासा करें क्योंकि इससे मुशर्रफ सहित अनेक चेहरों पर पड़े नकाब उतर जाने का खतरा है। जरदारी के बयान पर खामोशी औढ़ने के बजाय भारत को सारे विश्व को बताना चाहिए कि पाकिस्तान ने प्रशिक्षित आतंकियों को भेजकर किस तरह यहां मासूमों की हत्या कराई और मुंबई जैसे हमले करवाकर भारत को अस्थिर करने का षड़यंत्र रचा। जब तक पाकिस्तान आतंकियों के ढाचे को पूरी तरह खत्म नहीं कर दे, तब तक भारत को उससे किसी स्तर की बातचीत भी नहीं करनी चाहिए।

3 comments:

ASHA RANI July 12, 2009 at 7:58 AM  

sahi kaha aapne. magar sarkar samjh nahi pa rahi use kya karana chahiye, aap jhinjhodte rahiye shayad kabhi khamoshi toote.

annu July 14, 2009 at 2:59 PM  

sahi aur satik post. ush pahlu se rubaru karwat, jo kam hi log dekhte hain.
- anita bharati, jaipur

Murari Pareek July 15, 2009 at 3:14 PM  

pakistaan imaandari se agar sab sweekar kar antakwaad hataane me sath de to antakwaad ki jaden hataai ja sakti hain !! par bhule se nikle shabdo ko bhi sudharne lage hain to kya ummeed ki jaye!!

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

ऊपर वापिस लौटें