Monday, August 10, 2009

भारत-पाक और अमेरिकी हस्तक्षेप


सोलह जुलाई को शर्म अल शेख में जारी साझा बयान को एक महीना भी नहीं हुआ और पाकिस्तान अपनी असलियत पर उतर आया है। सैय्यद यूसुफ रजा गिलानी ने डा. मनमोहन सिंह को आश्वसान दिया था कि मुंबई हमले के दोषियों को किसी सूरत में नहीं बख्शा जाएगा। मनमोहन सिंह ने विपक्ष की चिंताओं के जवाब में संसद में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि भारत उस समय तक पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत शुरू नहीं करेगा, जब तक वह अपना वादा पूरा नहीं कर देता। देश शर्म अल शेख में जारी हुए बयान को शंका की दृष्टि से देख रहा है। बयान की भाषा से साफ है कि भारतीय नेतृत्व बयान जारी करने के लिए दबाव रहा है। आतंकवाद को बातचीत की प्रक्रिया से अलग रखने और बयान में ब्लूचिस्तान का जिक्र आने से साफ है कि इसमें अमेरिका की अहम भूमिका रही है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सरहद पर तालिबान और अलकायदा से छिड़ी जंग में फंसा अमेरिका पाकिस्तान को खुश रखना चाहता है। इसके लिए वह भारत की चिंताओं, हितों और स्वतंत्र विदेश नीति तक को दांव पर लगा रहा है। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़े और पाक हकूमत को भारत के साथ लगती सीमा पर सेना तैनात करने का बहाना मिल जाए।
अमेरिका जिस तरह भारत के मामलों में दखलांदाजी कर रहा है, वह आगे चलकर बेहद घातक सिद्ध हो सकती है। साझा बयान को आनन-फानन में तैयार करवाया गया। जल्दबाजी में खराब ड्राफ्टिंग की बात खुद विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार की। विपक्षी दल प्रधानमंत्री के इस तर्क से सहमत नहीं है कि जब ब्लूचिस्तान में हमारी कोई दखल ही नहीं है तो भारत को साझा बयान में उसका जिक्र कर देने भर से क्यों चिंतित होना चाहिए। रक्षा विशेषज्ञ और विदेश नीति के जानकार पहले ही इसे प्रधानमंत्री की एेतिहासिक भूल और चूक बता चुके हैं।
विपक्ष और रक्षा विशेषज्ञों की शंका बेवजह नहीं है। अभी साझा बयान में पाकिस्तान द्वारा दिए गए आश्वासन की स्याही सूखी भी नहीं है कि मुंबई हमले के प्रमुख षड़यंत्रकारी जमात उद दावा के चीफ हाफिज सईद को लाहौर उच्च न्यायालय के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी क्लीन चिट दे दी। आश्चर्य की बात तो यह है कि पाकिस्तान सरकार ने हाफिज सईद को रिहा किए जाने के फैसले के खिलाफ कोर्ट में पुख्ता सबूत पेश ही नहीं किए, जो भारत पहले ही सौंप चुका है। सबूतों की चौथी खेप हाल ही में उसे सौंपी गई है। इससे भी आश्चर्य का विषय यह है कि वहां के गृहमंत्री और विदेशमंत्री भारत से सईद के खिलाफ और पुख्ता सबूतों की मांग कर रहे हैं। पाकिस्तानी मंत्रियों के रवये से साफ है कि भारत द्वारा पहले सौंपे गए सबूतों को लेकर वे कतई संजीदा नहीं हैं। मुंबई हमले को लेकर पहले ही दिन से पाकिस्तान का रवया असहयोग का बना हुआ है। उसमें आज भी कोई बदलाव नहीं दिख रहा।
यह सही है कि जार्ज बुश ने उस समय भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद से तमाम तरह की पाबंदियों का सामना कर रहे भारत को प्रतिबंधमुक्त कराने में अहम भूमिका निभाई। दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु करार हुआ। ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए इस असैन्य परमाणु करार की जितनी जरूरत भारत को है, उससे कम अमेरिका को भी नहीं है। वह ऊर्जा उत्पादन के रिएक्टर, तकनीक, यूरेनियम वगैरा भारत को बेचेगा तो उससे अरबों डालर कमाएगा। उसके इंजीनियरों को यहां स्थापित होने वाले रिएक्यटरों में काम मिलेगा। यह सच है कि दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग के नए युग की शुरुआत हुई है परन्तु अमेरिका ने जिस तरह भारत की विदेश और सामरिक नीति को प्रभावित करना शुरू किया है, उसके बहुत घातक परिणाम होने जा रहे हैं।
अभी तक को भारत यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवादी भेजकर यहां खून खराबा कराता रहा है। ब्लूचिस्तान का जिक्र साझा बयान में आने से अब ठीक यही आरोप पाकिस्तान भारत पर मंढने से नहीं चूकेगा। यानि अमेरिकी हस्तक्षेप ने भारत के हाथ से एक बड़ा कूटनीतिक अस्त्र छीन लिया है। रक्षा विशेषज्ञ हिलेरी क्लिंटन की यात्रा के समय उस हुए उस समझौते को भी घातक मान रहे हैं, जिसमें कहा गया है कि एंड यूज मानिटरिंग अरेजमेंट को आगे से भारत द्वारा अमेरिकी रक्षा प्रोद्योगिकी और उपकरणों को खरीदने के उद्देश्य से भारत द्वारा स्वीकृति पत्र के रूप में माना जाएगा। इसका मतलब यही है भारत जो भी रक्षा सामग्री खरीदेगा, उसमें यह पूर्व शर्त होगी कि भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठानों और उपकरणों की अमेरिकी सरकार द्वारा एंड यूज मानिटरिंग की जाएगी। इसे देश की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन नहीं मानें तो क्या मानें?
एटमी परमाणु करार के समय यह आशंका प्रकट की जा रही थी कि अमेरिका और अन्य ईंधन व प्रोद्योगिकी आपूर्तिकर्ता देश इसके बदले में भारत को एनपीटी और सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने को बाध्य करेंगे। प्रधानमंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि एेसी कोई शर्त भारत पर नहीं थोपी गई है, लेकिन जी-आठ राष्ट्रों की बैठक में इन राष्ट्रों ने साफ कर दिया कि भारत को पुर्नसंस्करण व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं वाली प्रोद्योगिकी तभी दी जाएगी, जब वह एनपीटी पर हस्ताक्षर करेगा। इसका सीधा सा मतलब यही निकलता है कि अमेरिका ने भारत के साथ धोखाधड़ी की है। इन घटनाओं से साफ है कि अमेरिकी हस्तक्षेप और दबाव के चलते सरकार ने विदेश नीति और सामरिक हितों के मूलभूत आधार को ही हिला कर रख दिया है। यही हाल रहा तो अमेरिकी हस्तक्षेप भारत को कहीं का नहीं छोड़ेगा।

2 comments:

Manvinder August 10, 2009 at 7:23 PM  

America hamesha se hi bhaarat ke anduruni mamlo mai dakhal deta rha hai.....yah uski purani aadat hai...dusre desh bhi iska fayada utha lete hain.....achche lekh ke liye aapko badhaaee

ASHA RANI August 11, 2009 at 5:17 PM  

Aaj jarurat hai SARDAR PATELON ki.

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