Wednesday, November 25, 2009

क्या हमने 26/11 से कुछ सीखा


पिछले साल बुधवार 26/11 की उस स्याह और खौफनाक रात को कैसे भुलाया जा सकता है। मुंबई पर हुए आतंकी हमले को भारतीय कभी नहीं भुला सकेंगे। समुद्री रास्ते से कराची से मुंबई पहुंचे दस आतंकवादियों अजमल आमिर कसाब, इस्माइल खान, हफीज अरशद, जावेद, नजीर, शोएब, नासिर, बाबर रहमान, अब्दुल रहमान और फराहदुल्ला ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (सीएसटी), लियोपोल्ड कैफे, नरीमन हाउस, होटल ट्राइडेंट आबेराय और होटल ताज में जो नरसंहार किया, उसके जख्म अभी तक भी हरे हैं। जांच-पड़ताल और जीवित पकड़े गए अजमल कसाब से हुई पूछताछ से यह साबित हो चुका है कि भारत को दहला देने वाले इस सुनियोजित षड़यंत्र के तार सीधे पाकिस्तान से जुड़े थे। वहीं से मोबाइल फोनों पर आतंकवादियों के आका उन्हें संचालित कर रहे थे। आतंकियों की क्रूरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि 60 घंटे तक चली वारदात में 173 लोगों को अपने बहुमूल्य जीवन से हाथ धोना पड़ा। इनमें पुलिस अफसर, कमांडो, होटल कर्मचारी, उनके परिजन और अन्य नागरिकों के अलावा कई विदेशी मेहमान शामिल थे। यह सही है कि इस घटना ने भारतीय सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों को कई सीख दी है। सरकार ने इस तरह की वारदातों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए कई कदम भी उठाए हैं, लेकिन इस घटना के एक साल पूरा होने के बाद यह सवाल जरूर उठ रहा है कि इतनी खौफनाक वारदात के बाद भी क्या हालात बदले हैं। क्या हम लोगों ने कुछ सीखा है। क्या आम भारतीय पहले के मुकाबले अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। क्या मुंबई जैसे हमलों का खतरा टल गया है। क्या सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के तौर-तरीकों में अंतर आया है?
यह सही है कि 26 नवम्बर 2008 के बाद मुंबई जैसी बड़ी आतंकवादी वारदात देश में नहीं हुई है और इस बीच सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों ने आतंकवादियों को पहले ही दबोचकर कई षड़यंत्रों को विफल करने में सफलता प्राप्त की है, लेकिन न तो सीमा पार से घुसपैठ में कमी आई है और न ही छिटपुट वारदातें बंद हो रही हैं। यह सही है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल और सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ा है। केन्द्रीय खुफिया तंत्र की सूचनाओं पर अब राज्य उतनी लापरवाही भी नहीं दिखा रहे हैं, जैसी पहले दिखाते थे। इस बीच केन्द्र ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन किया गया है। देश के समुद्री किनारों की सुरक्षा चाक-चौबंद करने के लिए सैंकड़ों चौकियां बनाई जा रही हैं। समुद्री मार्गो की निगरानी के लिए हवाई बेड़े को लगाया गया है, लेकिन जहां तक आम आदमी और उसकी सुरक्षा का सवाल है, वह अभी भी भगवान भरोसे ही है। मीडिया के जरिए सरकार भले ही यह दिखावा करे कि वह पूरी तरह सजग और चाक-चौबंद है परन्तु वस्तुस्थिति यही है कि मुंबई जैसे
हमलों के बाद सरकार में बैठे लोगों की सुरक्षा का ताम-झाम जरूर बढ़ जाता है-आम आदमी की हालत जस की तस रहती है। त्योहारों, विशेष अवसरों को छोड़ दें तो न सुरक्षा एजेंसियां रूटीन में रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, होटलों, धर्मशालाओं आदि की चैकिंग करती हैं और न ही उन्हें इस सबकी चिंता है।
खुद प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी चिदम्बरम हाल में कह चुके हैं कि सीमा पार बैठे षड़यंत्रकारी फिर मुंबई जैसे हमलों की साजिशों को अंजाम देने की फिराक में हैं। प्रधानमंत्री ने वाशिंगटन में भी कहा है कि पाकिस्तान मुंबई हमलों की जांच में सहयोग नहीं कर रहा और उससे तब तक बातचीत संभव नहीं है, जब तक वह हाफिज सईद और इस वारदात से जुड़े दूसरे तमाम चेहरों को गिरफ्तार कर सजा नहीं दे देता। इन बयानों से साफ है कि तमाम कोशिशों के बावजूद भारतीय निजाम पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव बना पाने में नाकाम रहा है। यहां तक कि विश्व भर से आतंकवाद का सफाया करने का दम भरने वाले अमेरिका पर भी भारत सरकार यह दबाव बनाने में विफल रही है कि वह अपने प्रभाव का उपयोग कर पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव बनाए।
जहां तक आतंकवादी वारदातों से निपटने के लिए किए जा रहे इंतजामों का सवाल है, वे भी अपर्याप्त हैं। केन्द्र ने मुंबई, कोलकाता, चैन्नई और हैदराबाद में एनएसजी के नए हब बनाने का एेलान किया है, जिनमें से प्रत्येक में 240 कमांडों रहेंगे। इस तरह की व्यवस्था असम, कश्मीर और दूसरे पूर्वात्तर राज्यों में नहीं की जा रही है, जबकि वहां आतंकवादी वारदातें होती ही रहती हैं। एनएसजी और दूसरे सुरक्षा बलों को उस तरह के हथियार, बुलेट प्रूफ जकेट और हैलीकाप्टर आदि उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं, जैसे अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी देशों की सुरक्षा एजेंसियों के पास हैं। यह सर्वविदित है कि दिल्ली के मानेसर से मुंबई पहुंचने में एनएसजी को पूरी रात ही लग गई थी। उन्हें समय से विमान भी उपलब्ध नहीं कराया जा सका था। हमारी सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य, चुस्त-चौकस और तैयारी में होती तो अव्वल तो दस हथियारबंद आतंकवादी समुद्री रास्ते से देश में प्रवेश ही नहीं कर पाते और पांच जगहों पर तबाही की इबारत लिखने की मंशा से घुस भी गए थे तो साठ घंटे तक एके 47 और हैंड ग्रेनेडों से मौत और तबाही का वह खेल नहीं खेल पाते।
यह तथ्य किसी से छिपे नहीं हैं कि हमारे यहां सुरक्षा बेड़े की हालत कितना खस्ता है। भारतीय पुलिस सेवा में साढ़े पांच सौ से अधिक अधिकारियों की कमी है। राज्य पुलिस सुधारों को लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं। पुलिस के आधुनिकीकरण की मुहिम जिस तेजी से आगे बढ़नी चाहिए थी, नहीं बढ़ पा रही है। बदले हुए हालातों में जिस तरह के प्रशिक्षण की जरूरत है, वैसा सुरक्षा बलों को नहीं दिया जा रहा। यही हालत न्याय व्यवस्था की है। राज्य सरकारें मुकदमों के भारी ढेर को कम करने की दिशा में गंभीर दिखाई नहीं देती। जितनी अदालतों, जजों, बुनियादी ढांचे की जरूरत है, उनके आधे से काम चलाने की कोशिशें हो रही हैं। इस वजह से आतंकवादियों और गंभीर वारदातों के अपराधियों तक को जल्द समय रहते सजा नहीं मिल पाती है. न्याय के लिए पीड़ितों को कई कई साल तक भटकना पड़ता है.
यह सही है कि पी चिदम्बरम ने गृह मंत्रालय को सक्रिय कर दिया है। अब खुफिया अधिकारियों की प्रतिदिन बैठक होती है और राज्यों को जो सूचनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, उनके रिमाइंडर भी भेजे जाने लगे हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। यह सोचकर इतराने से काम नहीं चलेगा कि मुस्तैदी के कारण आतंकवादी मुंबई के बाद वैसा हमला करने में नाकाम रहे हैं। राज्यों पर इसके लिए दबाव बनाना होगा कि वे अपने सुरक्षा और खुफिया तंत्र को सुदृढ़ और जवाबदेह बनाएं। खाली पदों को भरें। पुलिस तंत्र को सक्षम बनाएं। उन्हें अत्याधुनिक शस्त्रों से लैस करें। मुंबई हमले के समय विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय का जो अभाव दिखाई दिया था, उसके कारणों को समझते हुए उसे ठीक करें और छोटी से छोटी सूचना पर त्वरित कार्रवाई करने की कार्य संस्कृति विकसित करें।

2 comments:

Parul November 25, 2009 at 5:18 PM  

mujhe nahi lagta ki 26/11 jaise hadse ki punravrati phir nahi hogi..
jan aur tantra ki sakriyta ka parikshan to aisi hi tithiyon se hota aaya hai aur shayad aage bhi hoga...aur vishesh tithiyon ki tarah hum kewal ise bhi isi roop mein mna rahe hai...aur sikh mein bas ek mombatti jala rahe hai...jabki jarurat man ki lau jalane ki hai,aisi lau jo har din jali rahe.aur yahi sacchi shradhanjali bhi hai un shahidon ko..

Manvinder November 26, 2009 at 6:07 PM  

दिल आज भी दुखने लगता है। उन लोगों के लिए जो इस दिन ‘ाहीद हो गये, असमय मृत्यु को प्राप्त हो गए(

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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