फिर बेआबरू हुए एनडी तिवारी

इस महत्वपूर्ण दशक का यह अंतिम साल 2009 बस विदा ही होने वाला है। 3 दिन बाकी हैं। लोग नये साल 2010 का स्वागत करने की तैयारी में जुटे हैं। समाचार-पत्र 2009 की घटनाओं से अटे पड़े हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में भी पिछले कई दिन से बीत रहे इस वर्ष की चर्चित घटनाओं पर रोचक वृत्तचित्र देखने को मिल रहे हैं। एेसे में रविवार की सुबह के समाचार-पत्रों की सुर्खी बने 86 वर्षीय नारायण दत्त तिवारी। मीडिया में सैक्स स्कैंडल उछलने के बाद दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों में उन्हें आंध्र प्रदेश के राज्यपाल पद से इस्तीफा देना पड़ा। सही बात तो यह है कि कांग्रेस नेतृत्व को उनसे इस्तीफे के लिए कहना पड़ा। तिवारी करीब सत्तर साल से सार्वजनिक जीवन में हैं। मात्र सत्रह साल की उम्र में वे स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेते हुए पहली बार जेल गये थे। वे उन कुछ गिने-चुने राजनेताओं में हैं, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय हैं। उन भाग्यशाली राजनेताओं में शुमार हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के ज्यादातर वसंत महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए देखे।
21 मई 1991 में राजीव गांधी की श्री पेरूम्बदूर में लिट्टे के आत्मघाती दस्ते के हाथों हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद की दौड़ में पीवी नरसिंहराव के मुकाबले तिवारी पिछड़ गये थे, जिसका उन्हें हमेशा मलाल रहा। दो साल पहले वे राष्ट्रपति बनना चाहते थे, लेकिन सोनिया गांधी उनके नाम पर राजी नहीं हुईं। उनकी पहली पसंद शिवराज पाटील थे, लेकिन जब वाममोर्चा सहमत नहीं हुआ तो पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभा देवी सिंह पाटील को चुन लिया गया। वे उस समय राजस्थान की राज्यपाल थी। खिन्न एनडी तिवारी को बाद में राज्यपाल पद से संतुष्ट होना पड़ा। उन्हें आंध्र प्रदेश में गर्वनर बनाकर भेजा गया। इस उम्र में, कार्यकाल के बीच में ही इस तरह बेआबरू होकर राजभवन छोड़ना पड़ेगा, उन्होंने सोचा भी नहीं होगा। लेकिन इन हालातों के लिये कोई और नहीं, खुद तिवारी ही जिम्मेदार हैं।
सार्वजनिक जीवन में आने वाले हर व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह नैतिकता के उच्च मानदंडों को स्थापित कर आने वाली पीढ़ी के लिये श्रेष्ठ उदाहरण पेश करे। शुचितापूर्ण, संयमित जीवन जीने वाले राजनेताओं की अपने देश में कमी नहीं है, लेकिन बेहद विलासितापूर्ण और बैड़रूम पालिटिक्चस करने वालों की भी कमी नहीं है। और इसी के चलते राजनीति और नेताओं के स्तर व सम्मान में भारी गिरावट दर्ज की गयी है। आंध्र प्रदेश के राजभवन में जो कुछ घटा, उसने तिवारी ही नहीं, पूरी कांग्रेस को शर्मसार कर दिया है। तेलुगू न्यूज चैनल ने जो कुछ दिखाया, उसमें कितनी हकीकत है, यह तो फोरेंसिक जांच से ही सामने आयेगा, लेकिन कांग्रेस को यदि जरा भी संदेह होता तो तिवारी की इस तरह विदाई नहीं होती। इस प्रकरण ने एक बार फिर सार्वजनिक जीवन जीने वालों के आचरण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं।
लगभग हर बड़े शहर में एकाधिक सरकारी अतिथि-गृह होते हैं। उनके बारे में जिस तरह की चर्चा और धारणा आमतौर पर बनी हुई है, उसे जब-तब इस तरह के होने वाले कर्मकांड पुष्ट ही करते हैं। राज्यपाल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के संवेधानिक मुखिया होते हैं। हर छोटा-बड़ा फैसला राज्यपाल के नाम पर होता है। इस पद की अपनी एक गरिमा और मर्यादा रही है। कुछ् साल पहले तक भी गर्वनर पद पर एेसे किसी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं होती थी, जिसके चरित्र, ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन पर किसी तरह के प्रश्न चिह्न खड़े किये जा सकें। एक दौर एेसा भी था, जब सक्रिय राजनीति में रहने वालों की नियुक्ति राजभवनों में नहीं की जाती थी, लेकिन जिस तरह अन्य संवेधानिक पदों और संस्थानों में गिरावट देखने को मिली है, वैसा ही राजभवनों में भी देखने को मिलने लगा है। राजभवनों की गरिमा और मर्यादा का हनन और पतन दुर्भाग्य से इंदिरा गांधी के शासनकाल में प्रारंभ हुआ, जब जम्मू-कश्मीर से लेकर आंध्र प्रदेश तक की चुनी हुई सरकारों को असंवेधानिक तरीके से बर्खास्त कराया गया। अब तो इंतिहा ही हो गयी है। अधिकांश राजभवनों में ऐसे महामहिम विराजमान हैं, जो कुछ समय पहले तक किसी न किसी राज्य के मुख्यमंत्री थे। केन्द्र में जिस पार्टी की सरकार आती है, वह मौका मिलते ही राजभवनों में अपने प्यादों की तैनाती करती है.
जहां तक आंध्र प्रदेश के राजभवन में हुई घटना का सवाल है, यह वास्तव में अभूतपूर्व है। यदि यह घटना सही है तो कहना होगा कि राजनीति पतन के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी है। एनडी तिवारी 86 वर्ष के हैं। सहज ही विश्वास नहीं होता कि कोई व्यक्ति उम्र के अंतिम पड़ाव पर इस तरह की हरकत कर सकता है, लेकिन यह कोई अकेली घटना है, जिस पर इस कदर परेशान होकर स्यापा किया जाये। भारतीय राजनीति में नेताओं के सैक्स स्कैंडल, वीडियो, फोटो और पोस्टर पहले भी सामने आते रहे हैं। 2006 में घाटी में एक एेसा ही वीडियो सामने आया था, जिसमें राजनेताओं और नौकरशाहों को कम उम्र की युवतियों के साथ रंगरेलियां मनाते हुए दिखाया गया था। उस पर पूरी घाटी में जबरदस्त बवाल हुआ था। तब उमर अब्दुल्ला का नाम भी उछाला गया था। बाद में सीबीआई ने कहा कि उमर उनमें नहीं हैं। 2005 में संघ से भाजपा में आए संजय जोशी की भी एक सीडी प्रकट हुई थी। बाद में फोरेंसिक जांच में उसे नकली पाया गया। उत्तर प्रदेश के मधुमिता शुक्ला हत्याकांड को कैसे भुलाया जा सकता है? अमरमणि त्रिपाठी मधुमिता हत्याकांड में इस समय उम्रकैद की सजा भुगत रहे हैं। मेरठ की कविता चौधरी के साथ यूपी के कई जाने-माने नेताओं के रिश्तों की सैक्चस सीडी महीनों चर्चा में रही। कविता चौधरी की हत्या कर दी गयी। उसकी हत्या के आरोप में गिरफ्तार रवीन्द्र प्रधान भी गाजियाबाद की डासना जेल में रहस्यमय हालातों में मारे गये। नारायण दत्त तिवारी जिस समय उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे, उनके मंत्री हरक सिंह रावत भी एक महिला के साथ रिश्तों को लेकर फंसे थे। उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 1978 में बाबू जगजीवन राम के बेटे का एक किस्सा सूर्या पत्रिका में छपा तो पूरा देश सन्न रह गया था। राजग शासनकाल में तहलका टेप कांड ने इसी तरह की सनसनी फैलायी थी, जिसमें कई सैन्य व अन्य अधिकारी काल गर्ल की मांग करते और उनसे फ्लर्ट करते दिखाये गये थे।
कहने का आशय यह है कि राजनीति और नौकरशाही में एेसे लोगों की आज कोई कमी नहीं है, जो सार्वजनिक जीवन में उच्च मानदंडों की स्थापना के प्रति न तो चिंतित हैं और न उनका इस सबसे सरोकार है। इस तरह के मामलों को देखकर एक अहम सवाल यह भी उठता है कि इस तरह चरित्र के लोगों को राजनीतिक दल प्रश्रय क्यों देते हैं? घटना के मीडिया में उछलने के बाद चेहरे पर कालिख नहीं लगे, इससे बचने के लिये राजनीतिक दल भले ही एेसे लोगों को पद से हटाने, उन्हें निलंबित करने और सार्वजनिक जीवन में उच्च मानदंड स्थापित करने का विधवा विलाप करते नजर आते हों, हकीकत यही है कि एेसा करके वे सिर्फ और सिर्फ लोगों के खौफ से करते हैं। क्या कांग्रेस नेतृत्व को पहले से जानकारी नहीं थी कि एनडी तिवारी के बारे में किस तरह की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में उड़ती रहती हैं? उनके नाम के साथ इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं जुड़ी है। जब कांग्रेस नेतृत्व को उनके किस्सों और चरित्र की जानकारी थी तो उन्हें पहले उत्तराखंड का मुख्यमंत्री और बाद में आंध्र प्रदेश का गर्वनर क्यों बनाकर भेजा गया?
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