Monday, February 1, 2010

क्या मुंबई उनकी जागीर है ?


कभी-कभी लगता है कि हमारे देश में अराजकता फैलाने वाले कुछ बाहुबलि किस्म के क्षत्रपों के लिए जैसे कानून है ही नहीं। बाल ठाकरे और राज ठाकरे ने मुंबई में जिस तरह का अराजक माहौल पैदा कर दिया है, उसे देखकर आश्चर्य होता है। इससे भी बढ़कर ताज्जुब इस बात का होता है कि वहां की सरकार पंगु बनी हुई है। बाल ठाकरे कभी मुकेश अंबानी को धमकाते हैं, कभी सचिन तेंदुलकर को तो कभी शाहरुख खान को। मुकेश अंबानी देश के कारपोरेट जगत का ऐसा चेहरा हैं, जिनकी दुनिया भर में ख्याति है। सचिन तेंदुलकर को केवल भारत के उनके प्रशंसक ही नहीं, विश्व भर के उनके चाहने वाले क्रिकेट का भगवान मानते हैं। पिछले बीस साल से वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहे हैं और उन्होंने जहां तमाम तरह के रिकार्ड कायम किए हैं, वहीं भारतीय क्रिकेट को बुलंदियों पर पहुंचाकर उसे सम्मान दिलाया है। शाहरुख एेसे चमकते सितारे हैं, जिन्हें संसार भर में मान-सम्मान मिला है। अलग-अलग कारणों से बाल ठाकरे ने इन तीन हस्तियों को धमकाने की चेष्टा की है। बाल ठाकरे मुंबई के मठाधीश बने हुए हैं। यह जानकर आश्चर्य होता है कि पिछले तीन विधानसभा चुनाव में मुंबई और महाराष्ट्र के लोगों ने उन्हें सबक सिखाया है, फिर भी उनकी और उनके भतीजे राज ठाकरे की समझ में यह बात नहीं आ रही है कि लोग चरमपंथी विचारधारा और माफिया डान की धमकाने वाली शैली को पसंद नहीं करते हैं। राज ठाकरे और बाल ठाकरे को यह भ्रम हो गया है कि मुंबई और मराठावाद के वे जितने बड़े पैरोकार बनकर उबरेंगे और मुंबईकर के नाम पर लोगों को हड़काएंगे, आम मुंबईवासी शायद उन्हें उतना ही पसंद करेंगे। सही बात तो यह है कि इस तरह नफरत फैलाकर, क्षेत्र, भाषा और धर्म के नाम पर लोगों को बांटकर वे लोगों की नजरों में अपना कद घटा रहे हैं। मुंबई में रहने वाले नामचीन लोगों को शांति से अपना काम करना है। यह सोचकर वे कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। इसे ठाकरे परिवार लोगों की बुजदिली मानकर और दबाने की कोशिश करता है। शाहरुख खान हों या सचिन तेंदुलकर, उन्होंने एेसी कोई बात नहीं कही जो देश विरोधी हो। क्या संविधान में हरेक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है? शाहरुख और सचिन भी उतने ही मुंबईकर हैं, जितना ठाकरे का परिवार। किसी को भी किसी को धमकाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। शाहरुख ने केवल इतना कहा था कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों को भी आईपीएल में खिलाया जाना चाहिए। बोली के समय उनके साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ, उससे किसी को भी दुख पहुंच सकता है। लगभग यही बात गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने भी कही है। बाल ठाकरे ने उनके खिलाफ जबान क्यों नहीं खोली? अब ठाकरे सिनेमाघरों के मालिकों को धमकाने पर उतर आए हैं। उन्होंने पत्र लिखकर मुंबई के सिनेमाघर मालिको से कहा है कि वे शाहरुख की फिल्में नहीं लगाएं। योगगुरू बाबा रामदेव ने तो साफ कहा है कि मुंबई सबकी है और वहां किसी की दादागीरी नहीं चलनी चाहिए। लखनऊ में रामदेव ने सही ही कहा कि वे लोग घोर असंवैधानिक काम कर रहे हैं। उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। इसके लिए जरूरत पड़े तो राज्यों को विशेष कानून बनाना चाहिए। रामदेव ने कहा कि जाति-धर्म और क्षेत्न के नाम पर देश को बांटने की कोशिश की जा रही है। ये देश के लिए खतरनाक है। अच्छी बात है की संघ ने हिंदी भाषी उत्तर भारतियों की रक्षा का प्रण लिया है लेकिन यह सवाल तो उनसे भी पूछा ही जाएगा कि इतने लम्बे समय तक संगठन चुप्पी क्यों साधे रहा. क्या किसी को भी इस तरह किसी को सरेआम धमकाने की इजाजत दी जानी चाहिए. महाराष्ट्र में सर्कार ओउर पुलिस प्रशासन नाम की कोई व्यवस्था काम कर रही की नहीं ?

3 comments:

निर्मला कपिला February 1, 2010 at 4:38 PM  

बहुत सही बात कही है आपने । सिवा तोद फोड और नफरत फैलाने के इन लोगों ने देह्स क्या मुम्बई के लिये भी क्या किया है जब आतन्की आते हैं तो ये लोग मुंह छुपा कर बठ जाते हैं तब बाकी राज्यों के लोग बचाने और मरने को आगे होते हैं लानत है ऐसे देश द्रोहियों पर जो देश को तोडना चाहते हैं धन्यवाद्

Manvinder February 1, 2010 at 5:22 PM  

इन लोगों को अपनी राजनीती चमकाने का यही एक तरीका नजर आता है .....इससे ज्यादा इनका दिमाग नहीं चलता ......इनकी सोच पर तरस आता है

ASHA RANI February 2, 2010 at 10:25 AM  

Aise Mumbai ke thekedaron ko to mumbai se tadipar kara dena chahiye, aur jab tak ye sudhar na jayen vishvamankon ko mumbai me nahi ghusane dena chahiye.

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