Tuesday, March 30, 2010

लालू मुलायम को विलेन न बनाएं


एक पुरानी कहावत है, सूत न कपास-जुलाहे से लटठ्म लट्ठा। वैसा ही कुछ आजकल भारतीय राजनीति में दिखाई दे रहा है। महिलाओं के लिए लोकसभा और विधान सभाओं में तैंतीस प्रतिशत सीटें आरक्षित करने संबंधी विधेयक भले ही राज्यसभा में पारित हो गया है, लेकिन अभी उसके लागू होने में बहुत से पेंच हैं। मुलायम सिंह यादव ने उद्योगपतियों, नौकरशाहों और धनाढ््य परिवारों की महिलाओं के चुनकर आने की आशंका जताई, यहां तक तो किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन इसके आगे उन्होंने जो कुछ कहा-वह आपत्तिजनक है। एेसी महिलाओं को देखकर लड़के सीटी बजाएंगे, यह कहना किसी को शोभा नहीं देता, लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। मुलायम ने जिन शब्दों का प्रयोग किया, उन्हें शालीन नहीं कहा जा सकता लेकिन उन सहित एक बड़ा वर्ग चुनकर आने वाली महिलाओं की राजनीतिक मसलों पर समझ को लेकर जो चिंता जाहिर कर रहा है, उसे आप सिरे से खारिज नहीं कर सकते। संसद और विधानसभाओं में हालांकि इस समय भी जिस तरह के लोग आ रहे हैं, उनके बारे में आप दावा नहीं कर सकते कि उन सबको राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और समस्याओं की समझ होगी ही। तो भी महिला आरक्षण विधेयक ने भारतीय संसदीय प्रणाली में होने जा रहे आमूल परिवर्तनों पर एक बहस तो छेड़ ही दी है।
तय मानिए कि लोकसभा में इस विधेयक को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि मुलायम, लालू, शरद यादव ही नहीं, मायावती भी इसका विरोध कर रही हैं। अब तो कांग्रेस और भाजपा के सांसदों ने भी खुलेआम इसकी मुखालफत शुरू कर दी है। इन दलों के अधिकांश पुरुष सांसद और पदाधिकारी यह कहने में संकोच नहीं कर रहे हैं कि उन्हें अपने ही डैथ वारंट पर हस्ताक्षर करने को विवश होना पड़ रहा है। पंचायतों में पिछड़े और दलित वर्ग की महिलाओं को आरक्षण दिया गया है, लेकिन सवाल यह है कि जहां देश के भाग्य का निर्णय होता है, कानून बनते हैं, उन सदनों में उन्हें प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था आखिर कांग्रेस, भाजपा और वामदल क्यों नहीं करना चाहते हैं? लालू, मुलायम, शरद और माया जैसे क्षत्रप इसका इस कदर विरोध क्यों कर रहे हैं? भारतीय राजनीति की इन उलटबांसियों को गहराई से समझने की जरूरत है। जिस कांग्रेस ने पिछले साठ साल में कभी महिलाओं को आरक्षण देने के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई, उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी इसे अब अपनी प्रतिष्ठा का सवाल क्यों बना रही हैं? कांग्रेस और भाजपा के प्रभावशाली नेताओं और मजबूत सांसदों व विधायकों तक में असुरक्षा का भाव पैदा क्यों होने लगा है?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सोनिया गांधी राहुल गांधी को नेता के तौर पर प्रतिष्ठापित करने की दिशा में अग्रसर हैं। पार्टी के भीतर से उन्हें कोई चुनौती नहीं है लेकिन जहां तक देश को संभालने का सवाल है, उसके लिए किसी भी राजनेता के पास एक दृष्टि की आवश्यकता होती है। राहुल गांधी कोई तपे-तपाए राजनीतिज्ञ नहीं हैं। पार्टी को भी कारपोरेट मैनेजिंग स्किल के तौर-तरीकों से चलाना चाहते हैं। उन तौर-तरीकों में पार्टी के तपे-तपाए राजनीतिज्ञ, संसदविद् और कद्दावर नेता राहुल गांधी के साथ सहज अनुभव नहीं करते हैं। कांग्रेस पार्टी ही नहीं, भाजपा में भी राज्यवार एेसे नेताओं की कमी नहीं है, जो हाईकमान को भले ही फूटी आंखों नहीं सुहाते हैं, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में उनका अपना जनाधार और प्रभाव है। हाईकमान को भी पता है कि वे ही उन क्षेत्रों से सीटें निकाल सकते हैं। महिला आरक्षण कानून लागू होने की सूरत में एेसे नेताओं की सीटें जब भी आरक्षित होंगी, उन्हें हाईकमान के रहमोकरम पर रहना पड़ेगा। एेसे में पार्टी नेतृत्व आसानी से उन्हें एेसी जगह से टिकट थमाकर साइड लाइन लगाने में सफल हो जाएगा, जहां से उसके जीतने की संभावना नगण्य होगी।
राहुल गांधी की आगे की राजनीतिक यात्रा में संसद में आने वाली तैंतीस प्रतिशत महिलाएं बाधक नहीं होंगी, सोनिया और कांग्रेस के प्रबंधकों को एेसा लगता है। राहुल गांधी की लीडरशिप को किस तरह के नेताओं से परोक्ष या प्रत्यक्ष चुनौती मिल सकती है? लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, शरद पवार, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, मायावती और इसी तरह के वे नेता, जिनका अपना जनाधार रहा है और जो जमीन से संघर्ष करते हुए जमीनी अनुभवों के साथ यहां तक पहुंचे हैं। बहुमत नहीं मिलने की सूरत में चाहे गठबंधन सरकार गठित करने की राजनीतिक मजबूरी हो अथवा देश की प्रमुख समस्याओं पर अहम निर्णय लेने का सवाल, इस तरह के क्षत्रपों और नेताओं की वह अनदेखी नहीं कर पाएंगे। अब सवाल है कि इस तरह के कद्दावर नेताओं को कमजोर कैसे किया जा सकता है? महिला आरक्षण बिल में पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था नहीं करने के पीछे सोची-समझी रणनीति है। कांग्रेस ही नहीं, भाजपा और वामपंथी दल भी इन वर्गो की राजनीति करने वाले नेताओं को या तो पूरी तरह कमजोर कर देना चाहते हैं या भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका ही खत्म कर देना चाहते हैं। कद्दावर नेताओं को घेरने और उन्हें सदनों से बाहर करने का इंतजाम इस बिल से स्वत: ही हो जाने वाला है।
कारपोरेट जगत के लिए इन कद्दावर क्षत्रप नेताओं को साधना इतना असान नहीं होता है। वे बार्गेनिंग की स्थिति में हैं, लेकिन यदि ये राजनीतिक रूप से कमजोर होते हैं और दूसरे दलों के टिकट पर फिल्म जगत, उद्योगपतियों के परिवारों से या नौकरशाहों की रिश्तेदार महिलाएं यदि उनकी सीटों और क्षेत्रों से जीतकर आती हैं तो कारपोरेट जगत हो या दूसरे घराने, उनके लिए उन्हें मैनेज करना उतना मुश्किल नहीं होगा। महिलाएं स्वभावत: राजनीतिक मामलों में उतनी दिलचस्पी नहीं लेती हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह भी होने वाली है कि पैसे वाले घरों की महिलाएं ही संसद और विधानसभाओं में भारी तादाद में पहुंचेंगी। गरीब, वंचित, पिछड़े, दलित व अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाएं नहीं क्योंकि साजिशन न तो उनके लिए कोटे में कोटे की व्यवस्था की गई है और न उनके पास उतने संसाधन होंगे कि वे धनाढ््य परिवारों की महिलाओं का मुकाबला कर सकें। नौकरशाहों, उद्योग घरानों और फिल्म क्षेत्र से आने वाली महिला सांसदों को कारपोरेट घराने और प्रमुख राजनीतिक दल ज्यादा सहज तरीके से मैनेज कर पाएंगे। वे संसद में भी और सरकार का हिस्सा बनने के बाद भी उनके हितों की पैरवी कर सकेंगी। इसलिए मुलायम सिंह, शरद यादव और लालू यादव के शब्दों पर जाने के बजाय यदि उनकी पीड़ा और चिंता को समझने की कोशिश करेंगे तो समझ में आएगा कि वे पूरी तरह गलत नहीं हैं। इस बिल के जरिए खासकर क्षेत्रीय दलों के कद्दावर नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका शनै: शनै: समाप्त करने का बंदोबस्त किया जा रहा है।
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Tuesday, March 9, 2010

चौदह साल का ये वनवास ख़त्म हो



देश की आधी आबादी के लिए निसंदेह यह ऐतिहासिक दिन है। राम को चौदह साल का वनवास हुआ था। महिलाओं का वनवास काल तो बहुत लंबा हो गया है। 63 साल का। 1996 में पहली बार महिला आरक्षण बिल पेश करने की कोशिश हुई थी। इस हिसाब से इस विधेयक के वनवास का अर्सा भी चौदह साल बैठता है। लंबी जद्दोजहद के बाद यह दिन आया है, जब पंचायतों और स्थानीय निकायों की तरह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिलने का रास्ता साफ होता नजर आने लगा है। भाजपा, वामदलों और कुछ अन्य दलों के सहयोग के अश्वासन के बाद आखिर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पेश करने का निर्णय लिया। सोमवार और मंगलवार को सदन में राजद, सपा, बसपा और जदयू के सदस्यों ने जिस तरह का आचरण किया, उससे लोकतंत्र एक बार फिर शर्मसार हुआ। सभापति और सदन के सम्मान की रक्षा का दायित्व सदस्यों पर है। यदि वे ही इस तरह का आचरण करेंगे तो समझा जा सकता है कि हमारा लोकतंत्र किस तरफ जा रहा है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए श्रेष्ठ संसदीय परंपराओं को बनाए रखना जरूरी है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि आजादी के इतने बरसों बाद भी महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तौर पर वह अधिकार, सम्मान और हिस्सेदारी नहीं मिल सकी, जिसकी वह हकदार है। 1996 के बाद से कई बार सरकारों ने इस अहम बिल को संसद के समक्ष पेश किया, लेकिन हर बार इसे राजनीति का शिकार होना पड़ा। वे बाधाएं अभी भी पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं। पिछड़ों, अति पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और जनता दल यूनाइटेड अब भी बिल का विरोध कर रही हैं। उन्हें आशंका है कि यदि इन वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई तो सदनों में धनाढ्य परिवारों की महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंच जाएंगी। ऐसे में गरीब, पिछड़े, अति पिछड़े और दलित परिवारों की महिलाओं को देश के अहम फैसलों में भागीदारी का अवसर नहीं मिल सकेगा।
निश्चित ही उनकी चिंता जायज है लेकिन सवाल यह है कि भले ही अब तक सदनों में 33 प्रतिशत आरक्षण की कानूनी बाध्यता नहीं है, तो भी क्या इन दलों ने स्वविवेक से अपने संगठनों में और टिकटों के बंटवारे में इन वर्गों की महिलाओं को सम्मानजनक हिस्सेदारी देने की कोशिश की है? जवाब है, नहीं। वस्तुस्थिति यह है कि पिछड़ों का राग अलापने वाली ये पार्टियां ही नहीं, ज्यादातर राजनीतिक दल और उनके नेता महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं रहे हैं। भीतर से वे यह सोचकर भयभीत हैं कि कानून बनते ही 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी और पुरुषों की उतनी ही सीटें कम हो जाएंगी। इसके अलावा जो सीटें दस या पंद्रह साल के लिए महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी, वहां से पुरुष चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। यही वजह है कि सांसदों और दलों ने अतीत में यहां तक सुझाव दे डाले कि सदनों में सीटों की संख्या बढ़ा दी जाए और 33 प्रतिशत सीटों से दो-दो सांसद अथवा विधायकों के चुने जाने की व्यवस्था कर दी जाए ताकि पुरुषों की सीटों और संख्या में कटौती न हो सके। इसी तरह के कई और सुझाव भी दिए गए।
इस तरह की सलाह देने वालों की मानसिकता से साफ है कि वे महिलाओं के लिए सीटें छोड़ने को कतई तैयार नहीं हैं। कांग्रेस, भाजपा और वामदल महिला आरक्षण विधेयक को इसी स्वरूप में पारित कराने पर सहमत हैं। फिर क्या वजह है कि उन्हें अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी करना पड़ रहा है? वजह साफ है। पार्टियों को लगता है कि पुरुष सांसद जेहनी तौर पर इतने बड़े त्याग के लिए अभी भी तैयार नहीं हैं। दूसरे, पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्ग के सांसद आरक्षण के भीतर आरक्षण देने की मांग की अनदेखी किए जाने से नाराज हैं और वे वोटिंग के समय बिल के खिलाफ मत जाहिर करके इसे पारित कराने के मंसूबों पर पानी भी फेर सकते हैं। इसके बावजूद इस बार के हालातों से लग रहा है कि महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा ही नहीं, लोकसभा से भी पारित हो जाएगा। इसका विरोध करने वाले दलों के नेताओं में भी मतभेद नजर आने लगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी लाइन से इतर जाकर बयान दिया है कि कोटे के भीतर कोटा हो जाता तो अच्छा रहता, लेकिन अब इस बिल का विरोध नहीं होना चाहिए। हालांकि शरद यादव अभी भी इसके विरोध में खड़े हैं, लेकिन कुछ खास करने की दशा में नहीं हैं।
जहां तक राज्यसभा और लोकसभा में संख्या बल और इस विधेयक के पारित होने, नहीं होने का प्रश्न है, तो इसके पारित होने में अब किसी को भी शंका नहीं है। 544 सदस्यीय लोकसभा में दो तिहाई समर्थन के लिए 363 सांसदों की दरकार है, जबकि समर्थक सांसदों की संख्या 410 है। इनमें कांग्रेस गठबंधन के 244, भाजपा के 116, वामदलों के 20 और अन्यों की संख्या 30 है। इसी तरह 233 सदस्यीय राज्यसभा में 155 सांसदों के समर्थन की जरूरत है, जबकि इसका समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या 165 है। इनमें कांग्रेस के 71, भाजपा के 45, वामदलों के 22 और अन्यों की तादाद 27 है। जद यू, सपा, बसपा और राजद के सदस्य दोनों सदनों में इसका वैसा ही विरोध कर सकते हैं, जैसा अतीत में करते आए हैं।
दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने के बाद इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति राज्य विधानसभाओं की स्वीकृति और राय के लिए इसे राज्यों को भेजेंगी। इस पर कम से कम आधे राज्यों की सहमति की मुहर लगनी जरूरी है। बीस से ज्यादा राज्यों में कांग्रेस, भाजपा, वामपंथियों और बिल के समर्थक दलों की सरकारें हैं। इसलिए वहां भी इसकी राह में कोई बड़ी मुश्किल पेश आने की शंका नहीं है। यह माना जा सकता है कि इस बिल के लिए इससे बेहतर अवसर और वातावरण न रहा है और न आगे रहने की सभावना है। इस समय राष्ट्रपति महिला हैं। लोकसभा अध्यक्ष पद पर महिला आसीन हैं। यूपीए-कांग्रेस की अध्यक्ष महिला हैं। पांच राजनीतिक दलों की अध्यक्ष इस समय महिला हैं, जिनमें से अधिकांश इस विधेयक के पक्ष में हैं। तो क्या मान लिया जाए कि अब सदनों में महिलाओं को उनका हक मिलने में बड़ी बाधा नहीं है? संकेत तो यही हैं, लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के चिह्नीकरण का काम भी बाकी रहेगा, जो राजनीतिक दलों की सहमति से चुनाव आयोग को करना पड़ेगा और यह काम आसान नहीं होगा। यह यक्ष प्रश्न भी
खड़ा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में ही महिलाओं को उनका हक मिल जाएगा या उसे अभी और इंतजार करना होगा? क्योंकि राज्यों की मुहर वाली प्रक्रिया में भी वक्त लगेगा।
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Wednesday, March 3, 2010

ये जिद पड़ सकती है भारी


महंगाई पर विपक्ष संसद से सड़कों तक पर विरोध कर रहा है। आम आदमी महंगाई की मार से बुरी तरह कराह रहा है। उसे उम्मीद थी कि आम बजट में कुछ एेसे प्रावधान जरूर होंगे, जिनसे राहत मिल सके, लेकिन बजट आफत बनकर उनके ऊपर गिरा। वित्त मंत्री ने पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद और सीमा शुल्क बढ़ाकर जले पर नमक छिड़कने का काम कर डाला। आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रणब मुखर्जी ही नहीं, प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी रोल बैक करने को तैयार नहीं हैं। संयुक्त अरब अमीरात की अपनी यात्रा के दौरान ही उन्होंने एेलान कर दिया कि पेट्रोलियम पदार्थो के मूल्यों में की गई बढोत्तरी को वापस नहीं लिया जाएगा। सोनिया गांधी ने कोर कमेटी की बैठक बुलाई, लोगों को लगा कि शायद वे सरकार को रोल बैक करने को कहेंगी, लेकिन कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा बुलंद कर दो-दो बार केन्द्र में सरकार गठित करने का जनादेश लेने वाली पार्टी की मुखिया ने भी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की हां में हां मिलाई। अब विपक्ष के विरोध की परवाह न करते हुए कांग्रेस ने खुला एेलान कर दिया है कि बढ़ाई गई कीमतें वापस नहीं ली जाएंगी। सरकार ने अपनी पार्टी को यह पहाड़ा पढ़ा दिया है कि इस वर्ष यदि आर्थिक विकास दर आठ प्रतिशत के पार ले जानी है और राजकोषीय घाटा कम करके पांच प्रतिशत के स्तर पर लाना है तो कड़े उपाय करने ही होंगे। कांग्रेस को लगता है कि यही एेसा साल है, जिसमें कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। अगले साल पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाड़ु तक में विधानसभा चुनाव होने हैं, लिहाजा अगले साल तो बजट में रियायतों की घोषणा करनी ही पड़ेगी। यानी जब वोट लेना हो, तब मतदाताओं पर मेहरबानी दिखाइए और जब मतलब निकल जाए तो विकास दर का रोना रोकर उसे महंगाई के बोझ में दबा दीजिए। विपक्षी दल काफी आक्रामक मूड़ में हैं। 1975 में देश पर इमरजंसी थोपे जाने के वक्त समूचा विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ इस तरह एकजुट हुआ था। आज आलम यह है कि भाजपा के साथ उसके सहयोगियों के अलावा वामपंथी पार्टियां, राजद, सपा, टीडीपी, और बसपा सहित लगभग सभी छोटे दल भी एकजुट होकर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। कांग्रेस के पास विपक्षी दलों के इस आरोप का कोई जवाब नहीं है कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में आती है, महंगाई बढ़ जाती है। इस बार तो महंगाई ने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। विपक्ष इसके लिए सरकारी नीतियों को जिम्मेदार बताते हुए कह रहे हैं कि एेसा आर्थिक कुप्रबंधन उसने कभी नहीं देखा। बुधवार को भी विपक्ष ने संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी। लोकसभा और राज्यसभा को पहले बारह बजे तक स्थगित किया गया। फिर दो बजे तक. विपक्ष के कड़े रुख के बाद कांग्रेस के सूत्र कुछ चुनींदा टीवी चैनलों के माध्यम से यह संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार पेट्रोल के दामों में तो कमी नहीं करेगी, लेकिन डीजल के दाम एक रुपया कम करने का एेलान कर सकती है। सरकार नहीं चाहती कि इसका श्रेय विपक्षी दलों को मिले। सरकार इसका श्रेय सोनिया गांधी को देना चाहती है। इसलिए विपक्ष के तेवर ढीले होने पर ही इस तरह का एेलान किया जा सकता है। भारतीय गणतंत्र की यह अजीब विडंबना है कि जिस पार्टी की सरकार मनमानी पर उतारू है, उसकी मुखिया ज्वलंत समस्या पर गहरी खामोशी अख्तियार किए हुए है। सरकार को यह समझना होगा कि उसके लिए विपक्ष की एकजुटता और लोगों की गहरी नाराजगी खतरे की घंटी साबित हो सकती है।
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शिवेंद्र पर यह अत्याचार क्यों ?


पाकिस्तान के खिलाफ पहला गोल दागकर भारतीय हाकी टीम को पूरी तरह लय में ले आने वाले स्टार फारवर्ड शिवेन्द्र सिंह पर दो मैचों का प्रतिबंध किसी के भी गले से नहीं उतर रहा है। मैच डायरेक्टर ने आरोप लगाया है कि उन्होंने जानबूझकर पाकिस्तानी खिलाड़ी फरीद अहमद को स्टिक से चोट पहुंचाई। यह बड़े ताज्जुब की बात है कि न पाकिस्तानी टीम ने इसकी शिकायत की और न फील्ड अम्पायरों ने। इसके बावजूद मैच डायरेक्टर केन रीड ने इस महत्वपूर्ण भारतीय खिलाड़ी पर पहले तीन मैचों का प्रतिबंध लगा दिया और अपील करने के बाद उसे घटाकर दो मैच कर दिया। नतीजतन शिवेन्द्र सिंह न तो मंगलवार को आस्ट्रेलिया के खिलाफ हुए प्रतिष्टापूर्ण मैच में खेल सके और न गुरुवार को स्पेन के खिलाफ खेल पाएंगे। इस नादिरशाही फैसले से एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि पश्चिमी देशों के खेल अधिकारी भारतीय महाद्वीपीय खिलाड़ियों के खिलाफ सजा सुनाने के बहाने ढूंढ़ते रहते हैं। वरना क्या जरूरत थी शिवेन्द्र सिंह के खिलाफ इतनी बड़ी सजा सुनाने की। विश्व कप के मैचों में यदि बेवजह इस तरह किसी विशेषज्ञ फारवर्ड खिलाड़ी को टीम से बाहर बैठने को विवश कर दिया जाता है तो उससे पूरी टीम के मनोबल पर बुरा असर पड़ता है। यही नहीं, उसके ओवर आल परफारमैंस पर भी प्रभाव पड़ता है। जैसी कि उम्मीद थी, पूर्व हाकी खिलाड़ियों, कप्तानों और हाकी विशेषज्ञों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। खुद शिवेन्द्र सिंह ने भी इस पर हैरत जताते हुए कहा कि उनकी स्टिक पाकिस्तानी खिलाड़ी को लग गई है, इसका उन्हें आभास तक नहीं था. उन्होंने बताया कि एक पाकिस्तानी खिलाडी ने जब उन्हें पैर से बाधा पहुंचाई तो वह गिरने लगे. इस से बचने के लिए उन्होंने संतुलन बनाने के लिए स्टिक वाला हाथ ऊपर को किया. संभवत : उसी दौरान स्टिक पाकिस्तानी खिलाडी को छू गई. उसे कोई चोट भी नहीं आई. न उन्होंने उसे चोट पहुँचाने कि मंशा से ऐसा किया. फिर भी यदि उन पर पाबन्दी थोपी जा रही है तो उन्हें इसका पूरी ज़िन्दगी अफ़सोस रहेगा. इसका आभास भी उन्हें तब हुआ, जब डीनर के समय कोच ने उन्हें बताया कि मैच डायरेक्टर ने सुबह उन्हें सुनवाई के लिए तलब किया है। दिलचस्प और आश्चर्यजनक बात यह है कि केन रीड ने शिवेन्द्र सिंह की सफाई को मानने से इंकार कर दिया। शिवेंद्र सिंह ने कहा कि जिस अपराध के लिए ग्रीनकार्ड की भी आशंका नहीं थी, उसके लिए इतनी बड़ी सजा सुना दी गई। इसका मलाल उन्हें ताउम्र रहेगा। कहा तो यह भी जा रहा है कि एफआईएच में भारत का प्रतिनिधित्व नहीं होने की वजह से उनके साथ यह नाइंसाफी हुई है। एक और दिलचस्प बात यह है कि दूसरे हाफ में भारतीय खिलाड़ी गुरविंदर सिंह चांडी को भी पाकिस्तानी खिलाड़ी ने चोट पहुंचाई थी, लेकिन उसे नोटिस नहीं किया गया। जफर इकबाल और मीररंजन नेगी जैसे पूर्व खिलाड़ियों ने भी कहा है कि यदि एफआईएच में भारत की नुमाइंदगी होती तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड की तरह हाकी इंडिया भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक दमदार होता। शिवेंद्र को इसका मलाल है कि वह आस्ट्रेलिया के खिलाफ नहीं खेल सका। वह उसके खिलाफ खेलने की खास तैयारी कर रहा था। आस्ट्रेलियाई काफी तेज-तर्रार हाकी खेलते हैं जिससे फारवर्ड पंक्ति के लिए गोल करने के मौके बनते हैं। शिवेन्द्र को मैच में गोल करने का यकीन था। हाकी प्रशंसकों में तो इससे गहरी निराशा और नाराजगी है ही, हाटी टीम के कप्तान राजपाल सिंह और कोच होजे ब्राजा ने भी इतनी कड़ी सजा को गलत करार दिया. मंगलवार को आस्ट्रेलिया के हाथों भारतीय टीम पांच दो के बड़े अंतर से हार गई. यदि शिवेंद्र मैदान में होता तो शायद टीम की यह हालत नहीं होती.
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