Tuesday, March 9, 2010

चौदह साल का ये वनवास ख़त्म हो



देश की आधी आबादी के लिए निसंदेह यह ऐतिहासिक दिन है। राम को चौदह साल का वनवास हुआ था। महिलाओं का वनवास काल तो बहुत लंबा हो गया है। 63 साल का। 1996 में पहली बार महिला आरक्षण बिल पेश करने की कोशिश हुई थी। इस हिसाब से इस विधेयक के वनवास का अर्सा भी चौदह साल बैठता है। लंबी जद्दोजहद के बाद यह दिन आया है, जब पंचायतों और स्थानीय निकायों की तरह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिलने का रास्ता साफ होता नजर आने लगा है। भाजपा, वामदलों और कुछ अन्य दलों के सहयोग के अश्वासन के बाद आखिर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पेश करने का निर्णय लिया। सोमवार और मंगलवार को सदन में राजद, सपा, बसपा और जदयू के सदस्यों ने जिस तरह का आचरण किया, उससे लोकतंत्र एक बार फिर शर्मसार हुआ। सभापति और सदन के सम्मान की रक्षा का दायित्व सदस्यों पर है। यदि वे ही इस तरह का आचरण करेंगे तो समझा जा सकता है कि हमारा लोकतंत्र किस तरफ जा रहा है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए श्रेष्ठ संसदीय परंपराओं को बनाए रखना जरूरी है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि आजादी के इतने बरसों बाद भी महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तौर पर वह अधिकार, सम्मान और हिस्सेदारी नहीं मिल सकी, जिसकी वह हकदार है। 1996 के बाद से कई बार सरकारों ने इस अहम बिल को संसद के समक्ष पेश किया, लेकिन हर बार इसे राजनीति का शिकार होना पड़ा। वे बाधाएं अभी भी पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं। पिछड़ों, अति पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और जनता दल यूनाइटेड अब भी बिल का विरोध कर रही हैं। उन्हें आशंका है कि यदि इन वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई तो सदनों में धनाढ्य परिवारों की महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंच जाएंगी। ऐसे में गरीब, पिछड़े, अति पिछड़े और दलित परिवारों की महिलाओं को देश के अहम फैसलों में भागीदारी का अवसर नहीं मिल सकेगा।
निश्चित ही उनकी चिंता जायज है लेकिन सवाल यह है कि भले ही अब तक सदनों में 33 प्रतिशत आरक्षण की कानूनी बाध्यता नहीं है, तो भी क्या इन दलों ने स्वविवेक से अपने संगठनों में और टिकटों के बंटवारे में इन वर्गों की महिलाओं को सम्मानजनक हिस्सेदारी देने की कोशिश की है? जवाब है, नहीं। वस्तुस्थिति यह है कि पिछड़ों का राग अलापने वाली ये पार्टियां ही नहीं, ज्यादातर राजनीतिक दल और उनके नेता महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं रहे हैं। भीतर से वे यह सोचकर भयभीत हैं कि कानून बनते ही 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी और पुरुषों की उतनी ही सीटें कम हो जाएंगी। इसके अलावा जो सीटें दस या पंद्रह साल के लिए महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी, वहां से पुरुष चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। यही वजह है कि सांसदों और दलों ने अतीत में यहां तक सुझाव दे डाले कि सदनों में सीटों की संख्या बढ़ा दी जाए और 33 प्रतिशत सीटों से दो-दो सांसद अथवा विधायकों के चुने जाने की व्यवस्था कर दी जाए ताकि पुरुषों की सीटों और संख्या में कटौती न हो सके। इसी तरह के कई और सुझाव भी दिए गए।
इस तरह की सलाह देने वालों की मानसिकता से साफ है कि वे महिलाओं के लिए सीटें छोड़ने को कतई तैयार नहीं हैं। कांग्रेस, भाजपा और वामदल महिला आरक्षण विधेयक को इसी स्वरूप में पारित कराने पर सहमत हैं। फिर क्या वजह है कि उन्हें अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी करना पड़ रहा है? वजह साफ है। पार्टियों को लगता है कि पुरुष सांसद जेहनी तौर पर इतने बड़े त्याग के लिए अभी भी तैयार नहीं हैं। दूसरे, पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्ग के सांसद आरक्षण के भीतर आरक्षण देने की मांग की अनदेखी किए जाने से नाराज हैं और वे वोटिंग के समय बिल के खिलाफ मत जाहिर करके इसे पारित कराने के मंसूबों पर पानी भी फेर सकते हैं। इसके बावजूद इस बार के हालातों से लग रहा है कि महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा ही नहीं, लोकसभा से भी पारित हो जाएगा। इसका विरोध करने वाले दलों के नेताओं में भी मतभेद नजर आने लगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी लाइन से इतर जाकर बयान दिया है कि कोटे के भीतर कोटा हो जाता तो अच्छा रहता, लेकिन अब इस बिल का विरोध नहीं होना चाहिए। हालांकि शरद यादव अभी भी इसके विरोध में खड़े हैं, लेकिन कुछ खास करने की दशा में नहीं हैं।
जहां तक राज्यसभा और लोकसभा में संख्या बल और इस विधेयक के पारित होने, नहीं होने का प्रश्न है, तो इसके पारित होने में अब किसी को भी शंका नहीं है। 544 सदस्यीय लोकसभा में दो तिहाई समर्थन के लिए 363 सांसदों की दरकार है, जबकि समर्थक सांसदों की संख्या 410 है। इनमें कांग्रेस गठबंधन के 244, भाजपा के 116, वामदलों के 20 और अन्यों की संख्या 30 है। इसी तरह 233 सदस्यीय राज्यसभा में 155 सांसदों के समर्थन की जरूरत है, जबकि इसका समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या 165 है। इनमें कांग्रेस के 71, भाजपा के 45, वामदलों के 22 और अन्यों की तादाद 27 है। जद यू, सपा, बसपा और राजद के सदस्य दोनों सदनों में इसका वैसा ही विरोध कर सकते हैं, जैसा अतीत में करते आए हैं।
दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने के बाद इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति राज्य विधानसभाओं की स्वीकृति और राय के लिए इसे राज्यों को भेजेंगी। इस पर कम से कम आधे राज्यों की सहमति की मुहर लगनी जरूरी है। बीस से ज्यादा राज्यों में कांग्रेस, भाजपा, वामपंथियों और बिल के समर्थक दलों की सरकारें हैं। इसलिए वहां भी इसकी राह में कोई बड़ी मुश्किल पेश आने की शंका नहीं है। यह माना जा सकता है कि इस बिल के लिए इससे बेहतर अवसर और वातावरण न रहा है और न आगे रहने की सभावना है। इस समय राष्ट्रपति महिला हैं। लोकसभा अध्यक्ष पद पर महिला आसीन हैं। यूपीए-कांग्रेस की अध्यक्ष महिला हैं। पांच राजनीतिक दलों की अध्यक्ष इस समय महिला हैं, जिनमें से अधिकांश इस विधेयक के पक्ष में हैं। तो क्या मान लिया जाए कि अब सदनों में महिलाओं को उनका हक मिलने में बड़ी बाधा नहीं है? संकेत तो यही हैं, लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के चिह्नीकरण का काम भी बाकी रहेगा, जो राजनीतिक दलों की सहमति से चुनाव आयोग को करना पड़ेगा और यह काम आसान नहीं होगा। यह यक्ष प्रश्न भी
खड़ा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में ही महिलाओं को उनका हक मिल जाएगा या उसे अभी और इंतजार करना होगा? क्योंकि राज्यों की मुहर वाली प्रक्रिया में भी वक्त लगेगा।
omkarchaudhary@gmail.com

5 comments:

अनुनाद सिंह March 9, 2010 at 8:15 PM  

इसे वनवास मत कहिये। कुछ वोटांधों ने इस देश की सामाजिक प्रगति को चौदह वर्ष के लिये रोके रखा - यह कहना ठीक होगा।

dharmendra March 9, 2010 at 8:49 PM  

lalu aur mulayam ki demand sahi lekin inki niyat par shak hai.

ASHA RANI March 10, 2010 at 7:58 AM  

kya kabhi desh arakshan ki badhyta se mukt nahi ho payega? kash ye duniya sabke liye saman avasron ki vyvastha karti.

Nitin Sabrangi नितिन सबरंगी March 17, 2010 at 6:49 PM  

जो विरोध कर रहे हैं उनके कृत्यों ओर उनकी मानसिकता को सभी जानते हैं। खुद उनकी अपनी बिरादरी के लोगों से लेकर जनता तक। यही वजह भी रही कि उनके साथ कोई खड़ा नहीं हो सका। फिर अस्तित्व को बचाये रखने की जद्दोजहद कर रहे व अपनी थाली का निवाला छिनने का डर कई नेताओं को सता रहा है। निःसंदेह महिलाओं के हक में यह ऐतिहासिक आगाज़ है। आपने महिलाओं से लेकर राजनीति का जा तानाबाना कलम के जरिये उकेरा वह तारीफ-ए-काबिल है।

akhil March 25, 2010 at 7:52 PM  

i would like to draw your kind attention towards the mulayam's statement as he was narrating in his ugly words that if the girls of industrialiss,big houses come in,then the boys of mulayam clan will blow whistle.
how shameful!these are the leaders of our country who even not deserving to be the front runner of a family even!
thanks to your good messaging write up.
akhilesh vashishtha

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