<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486</id><updated>2012-01-30T16:18:24.396+05:30</updated><category term='यूं पी'/><category term='नतीजे'/><category term='तीसरा मोर्चा'/><category term='जूता'/><category term='किस्मत'/><category term='वंशवाद'/><category term='आडवानी'/><category term='मतदाता निराश'/><category term='मायावती'/><category term='भ्रष्टाचार'/><category term='झारखण्ड'/><category term='दिल्ली'/><category term='साख'/><category term='कांग्रेस'/><category term='भाजपा'/><category term='मुलायम'/><category term='नवीन जिंदल'/><category term='मोतीलाल वोरा'/><category term='चिदंबरम'/><category term='बिग बॉस'/><category term='लोकसभा चुनाव'/><category term='वरुण गाँधी'/><category term='कल्याण'/><category term='सोनिया गाँधी'/><category term='कम मतदान'/><category term='नवीन चावला'/><category term='चुनाव आयोग'/><category term='जनादेश'/><category term='चुनाव'/><title type='text'>आजकल</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>128</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-8011407579789023291</id><published>2011-07-10T11:59:00.004+05:30</published><updated>2011-07-10T12:05:39.019+05:30</updated><title type='text'>किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं राहुल गाँधी</title><content type='html'>पिछले महीने 19 तारीख को अपना 41वां जन्मदिन मनाने वाले राहुल गांधी इस वक्त कठिन परीक्षा के दौर से गुजर रहे हैं। वे एेसे मरुस्थल में फसलें लहलाने की मृगतृष्णा पाल बैठे हैं, जहां दूर-दूर तक न पानी है, न खाद और न बीज। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में उन्होंने जमीन की यह जंग एेसे समय शुरू की है, जब आसमान से आग बरस रही है और दिल्ली भी तप रही है। वे गांव, गरीब, किसान और बेरोजगार नौजवानों को यह भरोसा देने की कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस उनके दुख-दर्द को समझती है और उनके साथ है। वे संक्षेप में लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं कि मायावती की बसपा सरकार बिल्डरों, भूमाफियाओं और दलालों के साथ मिलकर उनकी उपजाऊ जमीनों को दिन दहाड़े लूटने में लगी है। लेकिन जब लोग महंगाई और भ्रष्टाचार पर सवाल पूछ बेठते हैं तो उनकी बोलती बंद हो जाती है। उनसे जवाब नहीं सूझता। उनकी यह जंग एेसे समय शुरू हुई है, जब केन्द्र की डा. मनमोहन सिंह सरकार गंभीर आरोपों और संगीन सवालों में घिरी हुई है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जमीन से जुड़ने की कवायद&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राहुल गांधी पर विपक्षी दलों के नेता यह कहकर प्रहार करते रहे हैं कि वे उड़नखटोले से उतरने, भाषण देकर वापस दिल्ली उड़ जाने की हवाई राजनीति करते रहे हैं। जनता के दुख तकलीफों से उनका कोई वास्ता नहीं है। राहुल गांधी ने पिछले सप्ताह दिल्ली से सटे भट्टा पारसौल गांव से जो किसान संदेश यात्रा शुरू की, वह पांच दिन तक चली। इस बीच वे दर्जनों गांवों में गए। लोगों से सीधे बात की। इस बीच न दिल्ली लौटे। न सरकारी अतिथि ग्रहों में गए। न पांच सितारा होटलों से खाना मंगाया और न रात्रि विश्राम के समय एयरकंडीशंड रूम की इच्छा जताई। गांव में जैसा मिला, खा लिया। जहां खाट मिली, सो गए। न पंखे की ख्वाईश, न मच्छरदानी की मांग। हाथ के नल की नीचे बैठकर नहाये। किसानों और ग्रामीणों से सीधे संवाद किया। किसी महिला ने आग्रह किया कि उनके घर चलें तो बेझिझक साथ हो लिये। बच्चों को देखा तो गोद में बैठा लिया। उन्होंने कीचड़ भरे रास्ते पार किये। दलितों और बंजारों के घरों में चैन की नींद ली। जाहिर है, गांव-गरीब और आखिरी पांत के लोगों से सीधे बातचीत कर उनकी दिक्कतों को समझने वाले नेता अब देश में गिने-चुने हैं। खुद राहुल गांधी ने भी ये कवायद अभी शुरू की है और वह भी उस उत्तर प्रदेश से, जहां अगले साल चुनाव होने जा रहे हैं। लोगों ने सवाल पूछने शुरू कर दिये हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस शासित राज्यों में इस तरह कवायद क्यों नहीं करते हैं? क्या वहां समस्याएं नहीं हैं?&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;भट्टा पारसौल ने मौका दिया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सवाल अपनी जगह हैं और पूछने वाले पूछेंगे ही, लेकिन राहुल गांधी इस नए दांव और रूप से विपक्षी दल परेशान हैं। भट्टा पारसौल में पुलिस-पीएसी के अत्याचार के बाद भी वहां पहुंचने वाले वे अकेले नेता थे। बाकी दलों के नेताओं को तो रास्ते में ही गिरफ्तार कर शासन ने वापस दिल्ली पार्सल कर दिया था। राहुल गांधी ने सिर्फ रस्म अदायगी नहीं की। वे दोबारा भट्टा पारसौल पहुंच गए। और इस बार किसी को इसका अंदाजा नहीं था कि वे वहां से पांच दिन की पदयात्रा शुरू करने वाले हैं। उनके इस दांव से बहुजन समाज पार्टी के नेता तमतमाए हुए हैं। गरीबों के घरों में इस तरह उनका रहना मुख्यमंत्री को इतना नागवार गुजरा कि उन्होंने यह आरोप लगा दिया कि फलां गांव में वे दलित के घर में सोए जरूर लेकिन राहुल गांधी ने उनके यहां बना भोजन नहीं छुआ। कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी कि वे गरीब पर बोझ नहीं बनना चाहते थे।&lt;br /&gt;बहरहाल, जिस राहुल गांधी को इलेक्ट्रोनिक मीडिया कांग्रेस का युवराज कहकर हरदम सुर्खियां बनाने और बेचने में लगा रहता है, उसी मीडिया में उनकी इस पद यात्रा को पीपली लाइव बनाने की होड़ लगी रही। एक-एक चैनल के कई-कई संवाददाता और राजनीतिक संपादक गले में गमछा डालकर पसीने पौंछते हुए गांवों से लाइव होकर बताते रहे कि राहुल गांधी दरअसल मिशन 2012 पर हैं और कांग्रेस को फिर से उसके पैरों पर खड़ा करने की जद्दोजहद कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह रही कि पांच दिन के इस गांव दर्शन के दौरान कांग्रेस का कोई भी दूसरा नेता राहुल गांधी के साथ हम कदम नहीं दिखा। बताया गया कि राहुल गांधी ने ही बाकी नेताओं को उनकी पदयात्रा से दूर रहने की हिदायत दी थी। जाहिर है, वे कानून व्यवस्था का बहाना बनाकर मायावती सरकार को कार्रवाई करने का कोई मौका नहीं देना चाहते थे। हालांकि यह कहकर उन्हें भयभीत करने की कोशिश की गई कि अलीगढ़ में धारा 144 लागू है और उन्हें गिरफ्तार भी किया जा सकता है परन्तु उन पर इसका कोई असर नहीं हुआ।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;पसीना क्यों बहा रहे हैं?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राहुल गांधी जुलाई की तपती दोपहरियों में गांव-गांव, गली-गली और घर-घर पहुंचकर पसीना क्चयों बहा रहे हैं, इसकी बारीकियों को समझने की जरूरत है। केन्द्र की मनमोहन सिंह सरकार के निकम्मेपन, भ्रष्टाचार-घोटालों और महंगाई के दावानल के चलते कांग्रेस की लोकप्रियता अर्श से फर्श पर आ चुकी है। पार्टी विश्वसनीयता के गंभीर संकट से जूझ रही है। जिस तरह केन्द्र सरकार और पार्टी के कुछ नेताओं के इशारे पर दिल्ली प्रशासन ने स्वामी रामदेव और अण्णा हजारे की अगुआई में चल रहे सामाजिक आंदोलनों को बदनाम कर कुचलने के कुचक्र रचे, उससे रही-सही छवि भी धूल में मिल गई। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह केन्द्रीय मंत्रीमंडल में फेरबदल की कवायद कर लोगों का ध्यान बंटाने के लिये कुछ लोगों को साइड लाइन करने का दृष्टिभ्रम बनाने का उपक्रम कर रहे हैं परन्तु इससे कुछ होना जाना नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;बिहार में मिला सबक&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;बिहार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का हश्र सबने देखा है। बताते हैं कि वहां अकेले चुनाव लड़ने का फैसला राहुल गांधी का ही था। उसी तरह की जिद उनकी उत्तर प्रदेश को लेकर दिखाई दे रही है। लगता यही है कि वे राज्य की जमीनी हकीकत से पूरी तरह परिचित नहीं हैं और यदि हैं भी तो उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वे पार्टी नेताओं को अपने ही अंदाज में यह सीख देने के लिए मैदान में उतर पड़े हैं कि जनता की लड़ाई लखनऊ या दिल्ली में बैठकर नहीं लड़ी जा सकती। उनके बीच पहुंचकर लड़नी होगी। तभी उनका विश्वास अर्जित किया जा सकता है। दरअसल, राहुल गांधी विधानसभा चुनाव से पहले निष्प्राण पार्टी के कार्यकर्ताओं में प्राण फूंकने की कोशिश कर रहे हैं। वे जानते हैं कि 22 साल से राज्य की सत्ता से बाहर रही कांग्रेस के मूल वोट बैंक को भाजपा, बसपा और सपा टुकड़ों-टुकड़ों में हड़प चुकी हैं। ग्रास रूट लेवल पर खत्म हो चुकी कांग्रेस को तभी फिर से उसके पैरोंपर खड़ा किया जा सकता है, जब राहुल गांधी की तरह लोगों के बीच जाकर उनका भरोसा जीता जाए।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;सोनिया-राहुल की वेदना&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सोनिया गांधी और राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश ही लोकसभा में भेजता है, लेकिन इन दोनों की सबसे बड़ी वेदना यही है कि कांग्रेस 1991 से 1996 तक केन्द्र में सत्तारूढ़ रही और अब 2004 से सत्ता में है परन्तु 1989 के बाद से उत्तर प्रदेश में उसकी वापसी संभव नहीं हो सकी है। कभी वह सपा की पिच्छलग्गू बनी तो कभी बसपा। एेसे फैसलों ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। ये दोनों पार्टियां कांग्रेस का मूल वोट निगल गई। अब राहुल गांधी की निगाह पार्टी के परंपरागत दलित, मुसलिम और सवर्ण वोटों पर है। वे किसानों की समस्याओं को स्वर देकर उनके बीच भी पैठ बनाने की कोशिश में है। मुख्यमंत्री मायावती राहुल गांधी की इस कवायद के खतरे को भांप रही हैं। यही वजह है कि उन्हें राहुल गांधी का दलित-मुसलिम-किसान प्रेम पच नहीं पा रहा है। &lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;जमीनी हकीकत क्या है?&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;सवाल है कि क्या राहुल गांधी की यह जंग इतनी आसान है, जितनी वे और कांग्रेसी समझ रहे हैं। यदि उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत को समझ लें तो इस सवाल का जवाब तलाशने में आसानी होगी। राज्य विधानसभा की 403 सीटों में से बहुजन समाज पार्टी के पास इस समय 226 सीटें हैं। नब्बे के दशक से अब तक इससे पहले किसी एक दल को अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं हुआ। सब सरकारें गठजोड़ करके बनीं। मायावती बहुमत की अपनी सरकार के चार साल पूरे कर चुकी हैं। दूसरे नम्बर पर समाजवादी पार्टी है, जिसके पास 87 सीटें हैं। 2002 से सत्ता से बाहर भाजपा लगातार इस दौड़ से दूर होती जा रही है और पिछले तुनाव में वह 48 सीटों पर ठहर गई थी। कांग्रेस के राज्य विधानसभा में केवल बीस विधायक हैं। इसी से अंदाजा हो जाता है कि पार्टी की हालत वहां कैसी है? रालोद के पास केवल दस एमएलए हैं, जिसके साथ कांग्रेस गठबंधन के बारे में सोच रही है।&lt;br /&gt;लंबे समय तक यूपी की सत्ता पर काबिज रहने वाली और केन्द्र सरकार के गठन में भी वहां से निर्णायक ताकत अर्जित कर सरकार गठित करने वाली कांग्रेस क्या फिर से अपनी राजनीतिक जमीन हासिल कर सकती है? राजनीति में असंभव कुछ भी नहीं होता। शायद यही सोचकर राहुल गांधी कांग्रेस के लिए बंजर हो चुकी भूमि में फूल महकाने के ख्वाब देख रहे हैं, लेकिन भट्टा पारसौल से लखनऊ का सफर इतना आसान नहीं है। इसका अहसास राहुल गांधी को भी है। यही कारण है कि उन्होंने कांटों भरे रास्ते पर चलने का फैसला लिया है। देखने वाली बात यही है कि पसीना बहाने, लोगों के बीच जाकर उनका भरोसा जीतने की जो कोशिश वे कर रहे हैं, उसे बाकी कांग्रेसी आगे बढ़ाते हैं या नहीं। कांग्रेस को इस जमीनी वास्तविकता का भी अहसास है कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी डेढ़ साल पहले ही अपने तीन चौथाई प्रत्याशी तय कर चुकी हैं। दोनों राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा अभी तक ऊपरी हवा बनाने में ही जुटी हैं। कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रमोद तिवारी राहुल गांधी की पदयात्रा से कुछ ज्यादा ही उत्साहित नजर आ रहे हैं। बिहार के हश्र का जिक्र छेड़ने पर वे कहते हैं कि यूपी की तुलना बिहार से मत करिए। इस बार हम राज्य में अपनी सरकार बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;टूट सकता है भ्रम&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;यह सवाल पूछा जाने लगा है कि राहुल गांधी किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं? किसानों की, गरीबों की, बेरोजगारों की, दलितों की, कांग्रेस की या अपनी? भट्टा पारसौल में पुलिस के अत्याचार ने उन्हें एक अवसर दिया है, जिसे अब वे छोड़ना नहीं चाहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसानों की राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह जैसे परंपरागत किसान नेताओं पर राहुल गांधी ने बढ़त हासिल कर ली है। भाजपा, बसपा और सपा नेता भले ही राहुल गांधी की पदयात्रा को नौटंकी कहकर इसके महत्व को कम आंकने की भूल करें, वास्तविकता यही है कि कांग्रेस महासचिव को जिस तरह का मीडिया कवरेज मिला है, उससे कांग्रेस को फायदा मिलता दिख रहा है। हालांकि राजनतिक विश्लेषक राहुल की इस यात्रा को दूसरे नजरिये से भी देख रहे हैं। उनका कहना है कि उत्तर प्रदेश में उनका सब कुछ दांव पर लगा हुआ है। 2012 के विधानसभा चुनाव राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य तय करने वाले सिद्ध होंगे। उनके करिश्माई नेतृत्व का जो प्रचार मीडिया के जरिए कांग्रेसी करते हैं, उसकी परख अगले साल होने जा रही है। 2012 के चुनाव राहुल गांधी के बारे में बने भ्रम को खत्म भी कर सकते हैं। और इसी की संभावना अधिक है। (लेखक हरिभूमि के स्थानीय संपादक हैं)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-8011407579789023291?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='enclosure' type='' href='http://www.facebook.com/notes/omkar-chaudhary' length='0'/><link rel='enclosure' type='' href='http://www.omkarchaudhary.com' length='0'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/8011407579789023291/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=8011407579789023291' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8011407579789023291'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8011407579789023291'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2011/07/blog-post_10.html' title='किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं राहुल गाँधी'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2226328026365244595</id><published>2011-07-06T21:34:00.002+05:30</published><updated>2011-07-06T21:54:48.060+05:30</updated><title type='text'>यू पी में जमीन तलाशती कांग्रेस</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-EIUxbafo9fk/ThSMQpWaMMI/AAAAAAAAA84/qHdSbhMIEC8/s1600/rahul-gandhi-2009-2-23-11-3-12.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 214px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-EIUxbafo9fk/ThSMQpWaMMI/AAAAAAAAA84/qHdSbhMIEC8/s320/rahul-gandhi-2009-2-23-11-3-12.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5626276052098232514" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राहुल गाँधी पद यात्रा पर हैं. किसानों के बीच जा रहे हैं. उनकी जमीनें लूटे जाने के आरोप माया सरकार पर लगा रहे हैं. विरोधी दलों ने उलटे राहुल और कांग्रेस पर ही निशाना साध दिया है. वो पूछ रहे हैं की कांग्रेस को तभी किसानों की याद क्यों आती जब किसी राज्य में चुनाव होने होते हैं. उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव हैं, कही राहुल गाँधी अपनी पार्टी की खोई हुई जमीन तो तलाश नहीं कर रहे हैं? &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2226328026365244595?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2226328026365244595/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2226328026365244595' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2226328026365244595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2226328026365244595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='यू पी में जमीन तलाशती कांग्रेस'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-EIUxbafo9fk/ThSMQpWaMMI/AAAAAAAAA84/qHdSbhMIEC8/s72-c/rahul-gandhi-2009-2-23-11-3-12.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-7769549116213161087</id><published>2010-08-08T11:49:00.004+05:30</published><updated>2010-08-08T12:14:17.460+05:30</updated><title type='text'>गोली नहीं, बोली से ही निकलेगा हल</title><content type='html'>घाटी की ताजा हिंसा में ग्यारह जून से अब तक करीब पचास लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों की भीड़ कर्फ्यू तोड़कर शासन-प्रशासन के खिलाफ उग्र नारेबाजी कर रही है। सुरक्षाबल और राज्य सरकार जितने बेबस इस समय दिखाई दे रहे हैं, इससे पहले कभी नहीं दिखे। राज्य ही नहीं,केन्द्र सरकार भी हतप्रभ है। अलगाववाद की इस ताजा लहर को पाकिस्तान निश्चय ही हवा दे रहा है, लेकिन विचारणीय बात यह है कि घाटी के बिगड़े हालातों के लिए भारत कब तक पाकिस्तान को कोसता रहेगा? &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/TF5RuFzycKI/AAAAAAAAA3w/ldXSrex2CGQ/s1600/bandook+se+nahi.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 218px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/TF5RuFzycKI/AAAAAAAAA3w/ldXSrex2CGQ/s320/bandook+se+nahi.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5502925646968549538" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;क्या इस पर मंथन नहीं होना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकार से कहां-कहां गंभीर चूकें होती रही हैं? उन भूलों को सुधारने की दिशा में जितने ईमानदार प्रयास होने चाहिए थे, क्या किए गए? सबसे अहम सवाल तो यही है कि आखिर कश्मीर को लेकर सरकार की नीति क्या है? हर नेता वहां की समस्या और उत्पन्न हालातों का आकलन अलग-अलग तरह से करके बयानबाजी कर रहा है। इससे हालात बिगड़ेंगे या सुधरेंगे? यह आश्चर्य की बात है कि मौजूदा हालातों को बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अमन बहाली के लिए राजनैतिक पैकेज की जरूरत बता रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने संसद में घाटी को सुलगाने के पीछे पाकिस्तान की बदली हुई रणनीति को जिम्मेदार बताया है। कदम-कदम पर उमर अब्दुल्ला सरकार की नाक में दम करने वाली पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती इस हिंसा पर चुप्पी साधे बैठी हैं तो अलगाववादी नेता पुराना राग अलापने में लगे हैं कि भारतीय सेना को घाटी से बाहर किया जाए। पाकिस्तान भी यही चाहता है ताकि वहां आसानी से मनमर्जी कर सके। &lt;br /&gt;कौन नहीं जानता कि पाकिस्तान कश्मीर को हड़पना चाहता है। इसके लिए वह जहां घाटी के अलगाववादियों को हर तरह की मदद देता है, वहीं कभी हिजबुल, कभी जैश, कभी जेकेएलएफ तो कभी पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी संगठनों को भारत &lt;br /&gt;प्रशासित कश्मीर भेजकर अस्थिरता के हालात पैदा करता रहा है। अक्तूबर 1947 में हरिसिंह ने कश्मीर का भारत में विलय किया था। सच तो यह है कि पाकिस्तान ने कभी कश्मीर को भारत के अविभाज्य अंग के रूप में स्वीकार नहीं किया। &lt;br /&gt;घाटी में हालात तब बिगड़ने शुरू हुए, जब शेख अब्दुल्ला नहीं रहे और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, खासकर 1989 से केन्द्र में अस्थिरता का दौर शुरू हुआ। शेख अब्दुल्ला को घाटी के लोग जितना सम्मान देते थे, उतना फारुख अब्दुल्ला या किसी दूसरे नेता को कभी नहीं मिला। नेशनल कांफ्रैंस पर केन्द्र की कठपुतली होने और चुनाव में धांधली करने के आरोप जरूर लगते रहे। यह हकीकत है कि जम्मू-कश्मीर में 1987 के चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली हुई। कहा तो यहां तक जाता है कि सैय्यद सलाउद्दीन चुनाव जीत गए थे, लेकिन धांधली से उनके स्थान पर नेशनल कांफ्रैंस के प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया। इसके खिलाफ जनाक्रोश भड़का। बहुत से कश्मीरी युवक पाकिस्तान चले गए, जो पाक अधिकृत कश्मीर, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत और पंजाब सूबे में चलाए जा रहे प्रशिक्षण शिविरों में आतंकवाद का प्रशिक्षण लेकर लौटे। उन्होंने सबसे पहले कश्मीरी पंडितों और भारत का समर्थन करने वाले लोगों को निशाना बनाकर घाटी छोड़ने को विवश कर दिया। &lt;br /&gt;कई घटनाएं एक साथ घटीं। सोवियत संघ का विघटन हुआ। ब्रिटेन और अमेरिका की कुटिल चालों के चलते पाकिस्तान को अत्याधुनिक हथियार मिले, जो उसने पहले पंजाब और बाद में कश्मीर में खून-खराबा करने वाले आतंकवादियों को दिए। कश्मीर में एक बार अस्थिरता का दौर शुरू हुआ तो भ्रष्टाचार, अकुशल प्रशासन और हालात से गलत तरीके से निपटने के तौर-तरीकों ने समस्या को और भी उलझा दिया। केन्द्र द्वारा वहां किए गए नित नए प्रयोगों ने हालात और जटिल कर दिए। वास्तविकता तो यह है कि भारत सरकार गफलत में रही और हालातों को उसने हाथों से फिसलने दिया। जमीनी हालात को समझकर आगे बढ़ने के बजाय केवल शक्ति के प्रयोग से समस्या का समाधान निकालने की कोशिशें की जाती रहीं। अलगाववादी हमेशा से ही भीड़ के सहारे हिंसा कराकर सुरक्षाबलों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप चस्पा करके शासन-प्रशासन को रक्षात्मक मुद्रा में लाने का नापाक खेल खेलते रहे हैं। &lt;br /&gt;1996 से 2000 के बीच का एक दौर ऐसा आया था, जब अलगाववादी अलग-थलग पड़ते दिखने लगे थे। उसके अलावा बीच में विधान सभा चुनावों के बाद कम से कम दो मौके और आए जब संवाद के जरिए मसले को हल करने की दिशा में तेजी से बढ़ा जा सकता था, लेकिन वे गंवा दिए गए। वास्तविकता तो यह है कि आम कश्मीरी अब भी अमन और विकास चाहता है। एक बड़ा तबका भारत के साथ जुड़े रहने के पक्ष में है लेकिन पाकिस्तान की कुटिल चालों, आतंकवादी हिंसा, अलगाववादियों की पाक परस्त राजनीति, राज्य के अकुशल नेतृत्व और केन्द्र की ढुलमुल व दिशाहीन नीति ने हालातों को बेहद पेचीदा कर दिया है। कभी धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर नर्क बन चुका है। आम कश्मीरियों को हिंसा, क्रकूरता, नफरत और आक्रमण का शिकार होना पड़ा है। धार्मिक सहिष्णुता को आघात लगा है और कश्मीरी पंडितों व सिखों के पलायन के चलते राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बट्टा लगा है। सह अस्तित्व की भावना भी खत्म हुई है। क्या यह सच नहीं है कि भारत सरकार पाकिस्तान के इस दुष्प्रचार की हवा निकालने में विफल साबित हुई है कि घाटी में इस्लाम खतरे में है? सही तो यह है कि कश्मीर में इस्लाम कभी खतरे में नहीं रहा बल्कि वह और फूला फला। वहां के आम आदमी भी यह स्वीकार करते हैं। &lt;br /&gt;न्याय, समानता, बोलने की आजादी, सहिष्णुता, जीवन और आस्था का अधिकार मानवता के आधारभूत सिद्धांत हैं। अफसोस की बात है कि जेहाद के नाम पर आतंकवादी संगठनों ने इन्हें नष्ट करने के लिए निरंतर प्रयास किए हैं और इस मोर्चे पर हमारी सरकारें कुछ नहीं कर पाईं। घाटी में हालात कैसे सामान्य हो सकते हैं, इसे लेकर कश्मीर और भारत-पाक समस्या की समझ रखने वालों की राय अलग-अलग है। अब तक भारत सरकार, पाकिस्तान और आतंकवादी जमातों की समझ में यह बात आ जानी चाहिए थी कि किसी भी समस्या का समाधान गोली से नहीं हो सकता। हल अगर निकलना है तो बातचीत से ही निकलेगा। संसद में गृहमंत्री ने सही ही कहा है कि अमन बहाली के लिए सरकार को कश्मीरियों का दिल जीतना होगा। लेकिन केवल बयान देने से बात नहीं बनेगी। इस दिशा में तेजी से प्रयास भी करने होंगे। &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-7769549116213161087?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/7769549116213161087/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=7769549116213161087' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/7769549116213161087'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/7769549116213161087'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='गोली नहीं, बोली से ही निकलेगा हल'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/TF5RuFzycKI/AAAAAAAAA3w/ldXSrex2CGQ/s72-c/bandook+se+nahi.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-1960515552062252358</id><published>2010-07-27T16:30:00.003+05:30</published><updated>2010-07-27T16:34:47.785+05:30</updated><title type='text'>तुम्हारा स्वागत है</title><content type='html'>सुबह गुनगुनी धूप &lt;br /&gt;बहुत चुपके से &lt;br /&gt;आ घुसी मेरे बिस्तर में &lt;br /&gt;मैंने देखा, मुस्कुराया &lt;br /&gt;पूरे मन से कहा &lt;br /&gt;हे सूर्य किरण &lt;br /&gt;तुम्हारा स्वागत है. &lt;br /&gt;सैर करने निकला &lt;br /&gt;यह देख हैरान हुआ &lt;br /&gt;वो पसरी थी फूलों पर &lt;br /&gt;पत्तियों पर, कलियों पर &lt;br /&gt;ओंस से सराबोर पत्तों पर. &lt;br /&gt;कुम्हला रहे पंछियों के &lt;br /&gt;रंग बिरंगे पंखों पर. &lt;br /&gt;तितलियों की थिरकन पर &lt;br /&gt;हरियाली भरे रास्तों पर &lt;br /&gt;स्कूल जा रहे बच्चों के &lt;br /&gt;खिलखिलाते चेहरों पर &lt;br /&gt;अल सुबह कबाड़ के ढेर से &lt;br /&gt;फटे पुराने कपडे, बोतल&lt;br /&gt;बचा खुचा खाना बीन रहे &lt;br /&gt;नन्हे नन्हे हाथों पर&lt;br /&gt;जवान उम्र को रिक्शे &lt;br /&gt;पर बैठाकर ढोते हुए &lt;br /&gt;झुर्रियों भरे चेहरे पर &lt;br /&gt;मैंने देखा रात का &lt;br /&gt;अंधकार छंट गया है &lt;br /&gt;दिन के उजाले में &lt;br /&gt;अंधकार मगर बाकी है &lt;br /&gt;पंछी उड़ चले उस ओर&lt;br /&gt;सूर्योदय हो रहा जिस ओर&lt;br /&gt;जगमग प्रकाश था अब &lt;br /&gt;गगन से धरा तक &lt;br /&gt;उस गुनगुनी धूप को देख &lt;br /&gt;मै ही नहीं मुस्कुराया &lt;br /&gt;मुस्कुरा उठी थी &lt;br /&gt;पूरी कायनात ही.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-1960515552062252358?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/1960515552062252358/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=1960515552062252358' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/1960515552062252358'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/1960515552062252358'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='तुम्हारा स्वागत है'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-193279167238607948</id><published>2010-05-13T15:00:00.002+05:30</published><updated>2010-05-13T15:08:10.438+05:30</updated><title type='text'>मनमोहन के अजब गजब मंत्री</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S-vIKK_D5aI/AAAAAAAAAsg/RF8XaYA1rKk/s1600/JAIRAM_RAMESH_4089f.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 258px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S-vIKK_D5aI/AAAAAAAAAsg/RF8XaYA1rKk/s320/JAIRAM_RAMESH_4089f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5470686249444697506" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार 22 मई को अपना एक साल पूरा करने जा रही है। उनकी पहली सरकार से इस सरकार की तुलना शुरू हो चुकी है। जाहिर है, उनकी दूसरी सरकार का पहला साल काफी मुश्किल और चुनौती भरा रहा है। महंगाई चरम पर रही। आम आदमी को राहत नहीं मिली। पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया। संसद में विपक्ष एकजुट हुआ। काफी सालों बाद वित्त विधेयक पर किसी सरकार को विपक्ष के कट मोशन का सामना करना पड़ा। अन्य मुश्किलों के अलावा जो सबसे बड़ी दिक्चकत मनमोहन सिंह के सामने आई, वह थी कुछ मंत्रियों और घटक दलों के नेताओं की स्वेच्छाचारिता। लगता ही नहीं है कि मंत्री कैबिनेट की सामूहित जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध हैं। एनसीपी नेता, कृषि मंत्री शरद पवार के बयानों ने जहां चीनी, चावल, दाल और दूध जसी जरूरत की खाद्य वस्तुओं की महंगाई और ज्यादा बढ़ाने का काम किया, वहीं तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी पर पश्चिम बंगाल की राजनीति हावी रहे। उन्होंने कई मुद्दों पर मनमोहन सरकार के समक्ष कठिनाई पेश की। डीएमके प्रमुख, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के पुत्र अलागिरी की संसद से अनुपस्थिति ने भी विपक्ष को मुद्दा दे दिया। आईपीएल की फ्रैंचाइजी को लेकर जहां विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर को मंत्री पद छोड़ना पड़ा, वहीं शरद पवार और उन्हीं की पार्टी के कोटे के दूसरे मंत्री प्रफुल्ल पटेल भी संदेह के घेरे में घिरते नजर आए। कमलनाथ और जयराम रमेश के बीच राष्ट्रीय राजमार्गो के निर्माण में अडंगेबाजी पर किच-किच हुई तो जयराम रमेश बड़बोलेपन के कारण चर्चा में रहे। भोपाल के एक दीक्षांत समारोह में उन्होंने गाउन उतार फैंका तो बीटी बैंगन मुद्दे पर बुलाई गई बैठक में उन्होंने एक वज्ञानिक के बार-बार सवाल उठाने पर धमकी तक दे डाली कि यदि वे बाज नहीं आए तो उन्हें उठवाकर बाहर फिंकवा देंगे। वही जयराम रमेश अपने बड़बोलेपन की वजह से इस समय मुश्किलों में फंसे हुए हैं। चीन यात्रा पर गए तो अपने ही गृह मंत्रालय की यह कहकर आलोचना कर आए कि चीनी कंपनियों को अनुमति देते समय भारत का गृह मंत्रालय कुछ ज्यादा ही घबरा जाता है। जाहिर है, मामले को तूल पकड़ना ही था। विपक्ष ने तो उन्हें बर्खास्त करने की मांग की ही, खुद गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखकर आशंका जाहिर की कि इस तरह के बयानों से भारत के चीन के साथ रिश्तों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। अब जयराम रमेश सफाई देते घूम रहे हैं। वे प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के अलावा गृहमंत्री से मिलकर माफी मांग चुके हैं। प्रधानमंत्री ने तो बाकायदा उन्हें फटकार लगाई है। कांग्रेस कोर ग्रुप की बैठक में भी इस पर गंभीर मंत्रणा हुई है। ताजा खबर यह आ रही है कि जयराम रमेश ने सोमवार को प्रधानमंत्री से मुलाकात कर इस्तीफे की पेशकश की थी, जिसे प्रधानमंत्री ने अस्वीकार कर दिया। फिलहाल यह मसला भले ही निपटा हुआ दिख रहा हो, लेकिन जयराम रमेश को लेकर सरकार की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। एक तो सरकार को यह शर्मिंदगी ङोलनी पड़ रही है कि उनके मंत्नी कहीं भी कुछ भी बोल रहे हैं। दूसरे, बीजेपी ने मामले को गंभीर बनाते हुए रमेश पर चीनी कंपनियों के लाबिइंग का आरोप पर मढ़ दिया है। ऐसे में सरकार और कांग्रेस पार्टी अपने मंत्नियों की टिप्पणियों और उनके कामकाज के तौर तरीकों पर लगातार उठ रहे सवालों से बेहद परेशान है। &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-193279167238607948?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/193279167238607948/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=193279167238607948' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/193279167238607948'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/193279167238607948'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='मनमोहन के अजब गजब मंत्री'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S-vIKK_D5aI/AAAAAAAAAsg/RF8XaYA1rKk/s72-c/JAIRAM_RAMESH_4089f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2184154304717830294</id><published>2010-03-30T10:22:00.004+05:30</published><updated>2010-03-30T10:42:11.618+05:30</updated><title type='text'>लालू मुलायम को विलेन न बनाएं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S7GIByy5dXI/AAAAAAAAAsY/h8DiGpqgsPI/s1600/3apr41u.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 218px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S7GIByy5dXI/AAAAAAAAAsY/h8DiGpqgsPI/s320/3apr41u.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5454290188118881650" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;एक पुरानी कहावत है, सूत न कपास-जुलाहे से लटठ्म लट्ठा। वैसा ही कुछ आजकल भारतीय राजनीति में दिखाई दे रहा है। महिलाओं के लिए लोकसभा और विधान सभाओं में तैंतीस प्रतिशत सीटें आरक्षित करने संबंधी विधेयक भले ही राज्यसभा में पारित हो गया है, लेकिन अभी उसके लागू होने में बहुत से पेंच हैं। मुलायम सिंह यादव ने उद्योगपतियों, नौकरशाहों और धनाढ््य परिवारों की महिलाओं के चुनकर आने की आशंका जताई, यहां तक तो किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, लेकिन इसके आगे उन्होंने जो कुछ कहा-वह आपत्तिजनक है। एेसी महिलाओं को देखकर लड़के सीटी बजाएंगे, यह कहना किसी को शोभा नहीं देता, लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। मुलायम ने जिन शब्दों का प्रयोग किया, उन्हें शालीन नहीं कहा जा सकता लेकिन उन सहित एक बड़ा वर्ग चुनकर आने वाली महिलाओं की राजनीतिक मसलों पर समझ को लेकर जो चिंता जाहिर कर रहा है, उसे आप सिरे से खारिज नहीं कर सकते। संसद और विधानसभाओं में हालांकि इस समय भी जिस तरह के लोग आ रहे हैं, उनके बारे में आप दावा नहीं कर सकते कि उन सबको राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और समस्याओं की समझ होगी ही। तो भी महिला आरक्षण विधेयक ने भारतीय संसदीय प्रणाली में होने जा रहे आमूल परिवर्तनों पर एक बहस तो छेड़ ही दी है। &lt;br /&gt;तय मानिए कि लोकसभा में इस विधेयक को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि मुलायम, लालू, शरद यादव ही नहीं, मायावती भी इसका विरोध कर रही हैं। अब तो कांग्रेस और भाजपा के सांसदों ने भी खुलेआम इसकी मुखालफत शुरू कर दी है। इन दलों के अधिकांश पुरुष सांसद और पदाधिकारी यह कहने में संकोच नहीं कर रहे हैं कि उन्हें अपने ही डैथ वारंट पर हस्ताक्षर करने को विवश होना पड़ रहा है। पंचायतों में पिछड़े और दलित वर्ग की महिलाओं को आरक्षण दिया गया है, लेकिन सवाल यह है कि जहां देश के भाग्य का निर्णय होता है, कानून बनते हैं, उन सदनों में उन्हें प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था आखिर कांग्रेस, भाजपा और वामदल क्यों नहीं करना चाहते हैं? लालू, मुलायम, शरद और माया जैसे क्षत्रप इसका इस कदर विरोध क्यों कर रहे हैं? भारतीय राजनीति की इन उलटबांसियों को गहराई से समझने की जरूरत है। जिस कांग्रेस ने पिछले साठ साल में कभी महिलाओं को आरक्षण देने के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई, उसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी इसे अब अपनी प्रतिष्ठा का सवाल क्यों बना रही हैं? कांग्रेस और भाजपा के प्रभावशाली नेताओं और मजबूत सांसदों व विधायकों तक में असुरक्षा का भाव पैदा क्यों होने लगा है? &lt;br /&gt;राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सोनिया गांधी राहुल गांधी को नेता के तौर पर प्रतिष्ठापित करने की दिशा में अग्रसर हैं। पार्टी के भीतर से उन्हें कोई चुनौती नहीं है लेकिन जहां तक देश को संभालने का सवाल है, उसके लिए किसी भी राजनेता के पास एक दृष्टि की आवश्यकता होती है। राहुल गांधी कोई तपे-तपाए राजनीतिज्ञ नहीं हैं। पार्टी को भी कारपोरेट मैनेजिंग स्किल के तौर-तरीकों से चलाना चाहते हैं। उन तौर-तरीकों में पार्टी के तपे-तपाए राजनीतिज्ञ, संसदविद् और कद्दावर नेता राहुल गांधी के साथ सहज अनुभव नहीं करते हैं। कांग्रेस पार्टी ही नहीं, भाजपा में भी राज्यवार एेसे नेताओं की कमी नहीं है, जो हाईकमान को भले ही फूटी आंखों नहीं सुहाते हैं, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में उनका अपना जनाधार और प्रभाव है। हाईकमान को भी पता है कि वे ही उन क्षेत्रों से सीटें निकाल सकते हैं। महिला आरक्षण कानून लागू होने की सूरत में एेसे नेताओं की सीटें जब भी आरक्षित होंगी, उन्हें हाईकमान के रहमोकरम पर रहना पड़ेगा। एेसे में पार्टी नेतृत्व आसानी से उन्हें एेसी जगह से टिकट थमाकर साइड लाइन लगाने में सफल हो जाएगा, जहां से उसके जीतने की संभावना नगण्य होगी। &lt;br /&gt;राहुल गांधी की आगे की राजनीतिक यात्रा में संसद में आने वाली तैंतीस प्रतिशत महिलाएं बाधक नहीं होंगी, सोनिया और कांग्रेस के प्रबंधकों को एेसा लगता है। राहुल गांधी की लीडरशिप को किस तरह के नेताओं से परोक्ष या प्रत्यक्ष चुनौती मिल सकती है? लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, शरद पवार, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार, मायावती और इसी तरह के वे नेता, जिनका अपना जनाधार रहा है और जो जमीन से संघर्ष करते हुए जमीनी अनुभवों के साथ यहां तक पहुंचे हैं। बहुमत नहीं मिलने की सूरत में चाहे गठबंधन सरकार गठित करने की राजनीतिक मजबूरी हो अथवा देश की प्रमुख समस्याओं पर अहम निर्णय लेने का सवाल, इस तरह के क्षत्रपों और नेताओं की वह अनदेखी नहीं कर पाएंगे। अब सवाल है कि इस तरह के कद्दावर नेताओं को कमजोर कैसे किया जा सकता है? महिला आरक्षण बिल में पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था नहीं करने के पीछे सोची-समझी रणनीति है। कांग्रेस ही नहीं, भाजपा और वामपंथी दल भी इन वर्गो की राजनीति करने वाले नेताओं को या तो पूरी तरह कमजोर कर देना चाहते हैं या भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका ही खत्म कर देना चाहते हैं। कद्दावर नेताओं को घेरने और उन्हें सदनों से बाहर करने का इंतजाम इस बिल से स्वत: ही हो जाने वाला है। &lt;br /&gt;कारपोरेट जगत के लिए इन कद्दावर क्षत्रप नेताओं को साधना इतना असान नहीं होता है। वे बार्गेनिंग की स्थिति में हैं, लेकिन यदि ये राजनीतिक रूप से कमजोर होते हैं और दूसरे दलों के टिकट पर फिल्म जगत, उद्योगपतियों के परिवारों से या नौकरशाहों की रिश्तेदार महिलाएं यदि उनकी सीटों और क्षेत्रों से जीतकर आती हैं तो कारपोरेट जगत हो या दूसरे घराने, उनके लिए उन्हें मैनेज करना उतना मुश्किल नहीं होगा। महिलाएं स्वभावत: राजनीतिक मामलों में उतनी दिलचस्पी नहीं लेती हैं। सबसे बड़ी दिक्कत यह भी होने वाली है कि पैसे वाले घरों की महिलाएं ही संसद और विधानसभाओं में भारी तादाद में पहुंचेंगी। गरीब, वंचित, पिछड़े, दलित व अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाएं नहीं क्योंकि साजिशन न तो उनके लिए कोटे में कोटे की व्यवस्था की गई है और न उनके पास उतने संसाधन होंगे कि वे धनाढ््य परिवारों की महिलाओं का मुकाबला कर सकें। नौकरशाहों, उद्योग घरानों और फिल्म क्षेत्र से आने वाली महिला सांसदों को कारपोरेट घराने और प्रमुख राजनीतिक दल ज्यादा सहज तरीके से मैनेज कर पाएंगे। वे संसद में भी और सरकार का हिस्सा बनने के बाद भी उनके हितों की पैरवी कर सकेंगी। इसलिए मुलायम सिंह, शरद यादव और लालू यादव के शब्दों पर जाने के बजाय यदि उनकी पीड़ा और चिंता को समझने की कोशिश करेंगे तो समझ में आएगा कि वे पूरी तरह गलत नहीं हैं। इस बिल के जरिए खासकर क्षेत्रीय दलों के कद्दावर नेताओं की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका शनै: शनै: समाप्त करने का बंदोबस्त किया जा रहा है।&lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2184154304717830294?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2184154304717830294/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2184154304717830294' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2184154304717830294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2184154304717830294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/03/blog-post_30.html' title='लालू मुलायम को विलेन न बनाएं'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S7GIByy5dXI/AAAAAAAAAsY/h8DiGpqgsPI/s72-c/3apr41u.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-9133841200336198126</id><published>2010-03-09T18:27:00.005+05:30</published><updated>2010-03-09T19:16:25.395+05:30</updated><title type='text'>चौदह साल का ये वनवास ख़त्म हो</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S5ZRHKfHEiI/AAAAAAAAAsQ/fokQ6MvpvLY/s1600-h/indian_women.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 240px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S5ZRHKfHEiI/AAAAAAAAAsQ/fokQ6MvpvLY/s320/indian_women.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5446629982866969122" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश की आधी आबादी के लिए निसंदेह यह ऐतिहासिक दिन है। राम को चौदह साल का वनवास हुआ था। महिलाओं का वनवास काल तो बहुत लंबा हो गया है। 63 साल का। 1996 में पहली बार महिला आरक्षण बिल पेश करने की कोशिश हुई थी। इस हिसाब से इस विधेयक के वनवास का अर्सा भी चौदह साल बैठता है। लंबी जद्दोजहद के बाद यह दिन आया है, जब पंचायतों और स्थानीय निकायों की तरह लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी महिलाओं को वाजिब हिस्सेदारी मिलने का रास्ता साफ होता नजर आने लगा है। भाजपा, वामदलों और कुछ अन्य दलों के सहयोग के अश्वासन के बाद आखिर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पेश करने का निर्णय लिया। सोमवार और मंगलवार को सदन में राजद, सपा, बसपा और जदयू के सदस्यों ने जिस तरह का आचरण किया, उससे लोकतंत्र एक बार फिर शर्मसार हुआ। सभापति और सदन के सम्मान की रक्षा का दायित्व सदस्यों पर है। यदि वे ही इस तरह का आचरण करेंगे तो समझा जा सकता है कि हमारा लोकतंत्र किस तरफ जा रहा है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए श्रेष्ठ संसदीय परंपराओं को बनाए रखना जरूरी है। &lt;br /&gt;भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन बड़े अफसोस की बात है कि आजादी के इतने बरसों बाद भी महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक तौर पर वह अधिकार, सम्मान और हिस्सेदारी नहीं मिल सकी, जिसकी वह हकदार है। 1996 के बाद से कई बार सरकारों ने इस अहम बिल को संसद के समक्ष पेश किया, लेकिन हर बार इसे राजनीति का शिकार होना पड़ा। वे बाधाएं अभी भी पूरी तरह दूर नहीं हुई हैं। पिछड़ों, अति पिछड़ों और दलितों की राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और जनता दल यूनाइटेड अब भी बिल का विरोध कर रही हैं। उन्हें आशंका है कि यदि इन वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था नहीं की गई तो सदनों में धनाढ्य परिवारों की महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंच जाएंगी। ऐसे में गरीब, पिछड़े, अति पिछड़े और दलित परिवारों की महिलाओं को देश के अहम फैसलों में भागीदारी का अवसर नहीं मिल सकेगा। &lt;br /&gt;निश्चित ही उनकी चिंता जायज है लेकिन सवाल यह है कि भले ही अब तक सदनों में 33 प्रतिशत आरक्षण की कानूनी बाध्यता नहीं है, तो भी क्या इन दलों ने स्वविवेक से अपने संगठनों में और टिकटों के बंटवारे में इन वर्गों की महिलाओं को सम्मानजनक हिस्सेदारी देने की कोशिश की है? जवाब है, नहीं। वस्तुस्थिति यह है कि पिछड़ों का राग अलापने वाली ये पार्टियां ही नहीं, ज्यादातर राजनीतिक दल और उनके नेता महिलाओं को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं रहे हैं। भीतर से वे यह सोचकर भयभीत हैं कि कानून बनते ही 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी और पुरुषों की उतनी ही सीटें कम हो जाएंगी। इसके अलावा जो सीटें दस या पंद्रह साल के लिए महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी, वहां से पुरुष चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। यही वजह है कि सांसदों और दलों ने अतीत में यहां तक सुझाव दे डाले कि सदनों में सीटों की संख्या बढ़ा दी जाए और 33 प्रतिशत सीटों से दो-दो सांसद अथवा विधायकों के चुने जाने की व्यवस्था कर दी जाए ताकि पुरुषों की सीटों और संख्या में कटौती न हो सके। इसी तरह के कई और सुझाव भी दिए गए। &lt;br /&gt;इस तरह की सलाह देने वालों की मानसिकता से साफ है कि वे महिलाओं के लिए सीटें छोड़ने को कतई तैयार नहीं हैं। कांग्रेस, भाजपा और वामदल महिला आरक्षण विधेयक को इसी स्वरूप में पारित कराने पर सहमत हैं। फिर क्या वजह है कि उन्हें अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी करना पड़ रहा है? वजह साफ है। पार्टियों को लगता है कि पुरुष सांसद जेहनी तौर पर इतने बड़े त्याग के लिए अभी भी तैयार नहीं हैं। दूसरे, पिछड़े, अति पिछड़े और दलित वर्ग के सांसद आरक्षण के भीतर आरक्षण देने की मांग की अनदेखी किए जाने से नाराज हैं और वे वोटिंग के समय बिल के खिलाफ मत जाहिर करके इसे पारित कराने के मंसूबों पर पानी भी फेर सकते हैं। इसके बावजूद इस बार के हालातों से लग रहा है कि महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा ही नहीं, लोकसभा से भी पारित हो जाएगा। इसका विरोध करने वाले दलों के नेताओं में भी मतभेद नजर आने लगे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पार्टी लाइन से इतर जाकर बयान दिया है कि कोटे के भीतर कोटा हो जाता तो अच्छा रहता, लेकिन अब इस बिल का विरोध नहीं होना चाहिए। हालांकि शरद यादव अभी भी इसके विरोध में खड़े हैं, लेकिन कुछ खास करने की दशा में नहीं हैं। &lt;br /&gt;जहां तक राज्यसभा और लोकसभा में संख्या बल और इस विधेयक के पारित होने, नहीं होने का प्रश्न है, तो इसके पारित होने में अब किसी को भी शंका नहीं है। 544 सदस्यीय लोकसभा में दो तिहाई समर्थन के लिए 363 सांसदों की दरकार है, जबकि समर्थक सांसदों की संख्या 410 है। इनमें कांग्रेस गठबंधन के 244, भाजपा के 116, वामदलों के 20 और अन्यों की संख्या 30 है। इसी तरह 233 सदस्यीय राज्यसभा में 155 सांसदों के समर्थन की जरूरत है, जबकि इसका समर्थन करने वाले सांसदों की संख्या 165 है। इनमें कांग्रेस के 71, भाजपा के 45, वामदलों के 22 और अन्यों की तादाद 27 है। जद यू, सपा, बसपा और राजद के सदस्य दोनों सदनों में इसका वैसा ही विरोध कर सकते हैं, जैसा अतीत में करते आए हैं। &lt;br /&gt;दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने के बाद इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। राष्ट्रपति राज्य विधानसभाओं की स्वीकृति और राय के लिए इसे राज्यों को भेजेंगी। इस पर कम से कम आधे राज्यों की सहमति की मुहर लगनी जरूरी है। बीस से ज्यादा राज्यों में कांग्रेस, भाजपा, वामपंथियों और बिल के समर्थक दलों की सरकारें हैं। इसलिए वहां भी इसकी राह में कोई बड़ी मुश्किल पेश आने की शंका नहीं है। यह माना जा सकता है कि इस बिल के लिए इससे बेहतर अवसर और वातावरण न रहा है और न आगे रहने की सभावना है। इस समय राष्ट्रपति महिला हैं। लोकसभा अध्यक्ष पद पर महिला आसीन हैं। यूपीए-कांग्रेस की अध्यक्ष महिला हैं। पांच राजनीतिक दलों की अध्यक्ष इस समय महिला हैं, जिनमें से अधिकांश इस विधेयक के पक्ष में हैं। तो क्या मान लिया जाए कि अब सदनों में महिलाओं को उनका हक मिलने में बड़ी बाधा नहीं है? संकेत तो यही हैं, लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के चिह्नीकरण का काम भी बाकी रहेगा, जो राजनीतिक दलों की सहमति से चुनाव आयोग को करना पड़ेगा और यह काम आसान नहीं होगा। यह यक्ष प्रश्न भी &lt;br /&gt;खड़ा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में ही महिलाओं को उनका हक मिल जाएगा या उसे अभी और इंतजार करना होगा? क्योंकि राज्यों की मुहर वाली प्रक्रिया में भी वक्त लगेगा। &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-9133841200336198126?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/9133841200336198126/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=9133841200336198126' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/9133841200336198126'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/9133841200336198126'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/03/blog-post_09.html' title='चौदह साल का ये वनवास ख़त्म हो'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S5ZRHKfHEiI/AAAAAAAAAsQ/fokQ6MvpvLY/s72-c/indian_women.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-5373895511440431645</id><published>2010-03-03T16:30:00.002+05:30</published><updated>2010-03-03T16:39:05.373+05:30</updated><title type='text'>ये जिद पड़ सकती है भारी</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S45DQ7qvqUI/AAAAAAAAAsI/JW_7oBFt07k/s1600-h/manmohan-singh-sonia-gandhi-pranab-mukherjee-2009-5-17-8-21-11.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 171px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S45DQ7qvqUI/AAAAAAAAAsI/JW_7oBFt07k/s320/manmohan-singh-sonia-gandhi-pranab-mukherjee-2009-5-17-8-21-11.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5444362957711452482" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;महंगाई पर विपक्ष संसद से सड़कों तक पर विरोध कर रहा है। आम आदमी महंगाई की मार से बुरी तरह कराह रहा है। उसे उम्मीद थी कि आम बजट में कुछ एेसे प्रावधान जरूर होंगे, जिनसे राहत मिल सके, लेकिन बजट आफत बनकर उनके ऊपर गिरा। वित्त मंत्री ने पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद और सीमा शुल्क बढ़ाकर जले पर नमक छिड़कने का काम कर डाला। आश्चर्य की बात तो यह है कि प्रणब मुखर्जी ही नहीं, प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी रोल बैक करने को तैयार नहीं हैं। संयुक्त अरब अमीरात की अपनी यात्रा के दौरान ही उन्होंने एेलान कर दिया कि पेट्रोलियम पदार्थो के मूल्यों में की गई बढोत्तरी को वापस नहीं लिया जाएगा। सोनिया गांधी ने कोर कमेटी की बैठक बुलाई, लोगों को लगा कि शायद वे सरकार को रोल बैक करने को कहेंगी, लेकिन कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा बुलंद कर दो-दो बार केन्द्र में सरकार गठित करने का जनादेश लेने वाली पार्टी की मुखिया ने भी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की हां में हां मिलाई। अब विपक्ष के विरोध की परवाह न करते हुए कांग्रेस ने खुला एेलान कर दिया है कि बढ़ाई गई कीमतें वापस नहीं ली जाएंगी। सरकार ने अपनी पार्टी को यह पहाड़ा पढ़ा दिया है कि इस वर्ष यदि आर्थिक विकास दर आठ प्रतिशत के पार ले जानी है और राजकोषीय घाटा कम करके पांच प्रतिशत के स्तर पर लाना है तो कड़े उपाय करने ही होंगे। कांग्रेस को लगता है कि यही एेसा साल है, जिसमें कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। अगले साल पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाड़ु तक में विधानसभा चुनाव होने हैं, लिहाजा अगले साल तो बजट में रियायतों की घोषणा करनी ही पड़ेगी। यानी जब वोट लेना हो, तब मतदाताओं पर मेहरबानी दिखाइए और जब मतलब निकल जाए तो विकास दर का रोना रोकर उसे महंगाई के बोझ में दबा दीजिए। विपक्षी दल काफी आक्रामक मूड़ में हैं। 1975 में देश पर इमरजंसी थोपे जाने के वक्त समूचा विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ इस तरह एकजुट हुआ था। आज आलम यह है कि भाजपा के साथ उसके सहयोगियों के अलावा वामपंथी पार्टियां, राजद, सपा, टीडीपी, और बसपा सहित लगभग सभी छोटे दल भी एकजुट होकर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। कांग्रेस के पास विपक्षी दलों के इस आरोप का कोई जवाब नहीं है कि जब-जब कांग्रेस सत्ता में आती है, महंगाई बढ़ जाती है। इस बार तो महंगाई ने सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। विपक्ष इसके लिए सरकारी नीतियों को जिम्मेदार बताते हुए कह रहे हैं कि एेसा आर्थिक कुप्रबंधन उसने कभी नहीं देखा। बुधवार को भी विपक्ष ने संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी। लोकसभा और राज्यसभा को पहले बारह बजे तक स्थगित किया गया। फिर दो बजे तक. विपक्ष के कड़े रुख के बाद कांग्रेस के सूत्र कुछ चुनींदा टीवी चैनलों के माध्यम से यह संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार पेट्रोल के दामों में तो कमी नहीं करेगी, लेकिन डीजल के दाम एक रुपया कम करने का एेलान कर सकती है। सरकार नहीं चाहती कि इसका श्रेय विपक्षी दलों को मिले। सरकार इसका श्रेय सोनिया गांधी को देना चाहती है। इसलिए विपक्ष के तेवर ढीले होने पर ही इस तरह का एेलान किया जा सकता है। भारतीय गणतंत्र की यह अजीब विडंबना है कि जिस पार्टी की सरकार मनमानी पर उतारू है, उसकी मुखिया ज्वलंत समस्या पर गहरी खामोशी अख्तियार किए हुए है। सरकार को यह समझना होगा कि उसके लिए विपक्ष की एकजुटता और लोगों की गहरी नाराजगी खतरे की घंटी साबित हो सकती है।&lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-5373895511440431645?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/5373895511440431645/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=5373895511440431645' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5373895511440431645'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5373895511440431645'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/03/blog-post_03.html' title='ये जिद पड़ सकती है भारी'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S45DQ7qvqUI/AAAAAAAAAsI/JW_7oBFt07k/s72-c/manmohan-singh-sonia-gandhi-pranab-mukherjee-2009-5-17-8-21-11.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-5778667333220210543</id><published>2010-03-03T00:31:00.003+05:30</published><updated>2010-03-03T00:54:15.574+05:30</updated><title type='text'>शिवेंद्र पर यह अत्याचार क्यों ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S41kTDFvyJI/AAAAAAAAAsA/o_QwK7H5eFU/s1600-h/shivendra+singh.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 263px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S41kTDFvyJI/AAAAAAAAAsA/o_QwK7H5eFU/s320/shivendra+singh.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5444117802970499218" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पाकिस्तान के खिलाफ पहला गोल दागकर भारतीय हाकी टीम को पूरी तरह लय में ले आने वाले स्टार फारवर्ड शिवेन्द्र सिंह पर दो मैचों का प्रतिबंध किसी के भी गले से नहीं उतर रहा है। मैच डायरेक्टर ने आरोप लगाया है कि उन्होंने जानबूझकर पाकिस्तानी खिलाड़ी फरीद अहमद को स्टिक से चोट पहुंचाई। यह बड़े ताज्जुब की बात है कि न पाकिस्तानी टीम ने इसकी शिकायत की और न फील्ड अम्पायरों ने। इसके बावजूद मैच डायरेक्टर केन रीड ने इस महत्वपूर्ण भारतीय खिलाड़ी पर पहले तीन मैचों का प्रतिबंध लगा दिया और अपील करने के बाद उसे घटाकर दो मैच कर दिया। नतीजतन शिवेन्द्र सिंह न तो मंगलवार को आस्ट्रेलिया के खिलाफ हुए प्रतिष्टापूर्ण मैच में खेल सके और न गुरुवार को स्पेन के खिलाफ खेल पाएंगे। इस नादिरशाही फैसले से एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि पश्चिमी देशों के खेल अधिकारी भारतीय महाद्वीपीय खिलाड़ियों के खिलाफ सजा सुनाने के बहाने ढूंढ़ते रहते हैं। वरना क्या जरूरत थी शिवेन्द्र सिंह के खिलाफ इतनी बड़ी सजा सुनाने की। विश्व कप के मैचों में यदि बेवजह इस तरह किसी विशेषज्ञ फारवर्ड खिलाड़ी को टीम से बाहर बैठने को विवश कर दिया जाता है तो उससे पूरी टीम के मनोबल पर बुरा असर पड़ता है। यही नहीं, उसके ओवर आल परफारमैंस पर भी प्रभाव पड़ता है। जैसी कि उम्मीद थी, पूर्व हाकी खिलाड़ियों, कप्तानों और हाकी विशेषज्ञों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। खुद शिवेन्द्र सिंह ने भी इस पर हैरत जताते हुए कहा कि उनकी स्टिक पाकिस्तानी खिलाड़ी को लग गई है, इसका उन्हें आभास तक नहीं था. उन्होंने बताया कि एक पाकिस्तानी खिलाडी ने जब उन्हें पैर से बाधा पहुंचाई तो वह गिरने लगे. इस से बचने के लिए उन्होंने संतुलन बनाने के लिए स्टिक वाला हाथ ऊपर को किया. संभवत : उसी दौरान स्टिक पाकिस्तानी खिलाडी को छू गई. उसे कोई चोट भी नहीं आई. न उन्होंने उसे चोट पहुँचाने कि मंशा से ऐसा किया. फिर भी यदि उन पर पाबन्दी थोपी जा रही है तो उन्हें इसका पूरी ज़िन्दगी अफ़सोस रहेगा. इसका आभास भी उन्हें तब हुआ, जब डीनर के समय कोच ने उन्हें बताया कि मैच डायरेक्टर ने सुबह उन्हें सुनवाई के लिए तलब किया है। दिलचस्प और आश्चर्यजनक बात यह है कि केन रीड ने शिवेन्द्र सिंह की सफाई को मानने से इंकार कर दिया। शिवेंद्र सिंह ने कहा कि जिस अपराध के लिए ग्रीनकार्ड की भी आशंका नहीं थी, उसके लिए इतनी बड़ी सजा सुना दी गई। इसका मलाल उन्हें ताउम्र रहेगा। कहा तो यह भी जा रहा है कि एफआईएच में भारत का प्रतिनिधित्व नहीं होने की वजह से उनके साथ यह नाइंसाफी हुई है। एक और दिलचस्प बात यह है कि दूसरे हाफ में भारतीय खिलाड़ी गुरविंदर सिंह चांडी को भी पाकिस्तानी खिलाड़ी ने चोट पहुंचाई थी, लेकिन उसे नोटिस नहीं किया गया। जफर इकबाल और मीररंजन नेगी जैसे पूर्व खिलाड़ियों ने भी कहा है कि यदि एफआईएच में भारत की नुमाइंदगी होती तो भारतीय क्रिकेट बोर्ड की तरह हाकी इंडिया भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक दमदार होता। शिवेंद्र को इसका मलाल है कि वह आस्ट्रेलिया के खिलाफ नहीं खेल सका। वह उसके खिलाफ खेलने की खास तैयारी कर रहा था। आस्ट्रेलियाई काफी तेज-तर्रार हाकी खेलते हैं जिससे फारवर्ड पंक्ति के लिए गोल करने के मौके बनते हैं। शिवेन्द्र को मैच में गोल करने का यकीन था। हाकी प्रशंसकों में तो इससे गहरी निराशा और नाराजगी है ही, हाटी टीम के कप्तान राजपाल सिंह और कोच होजे ब्राजा ने भी इतनी कड़ी सजा को गलत करार दिया. मंगलवार को आस्ट्रेलिया के हाथों भारतीय टीम पांच दो  के बड़े अंतर से हार गई. यदि शिवेंद्र मैदान में होता तो शायद टीम की यह हालत नहीं होती. &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-5778667333220210543?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/5778667333220210543/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=5778667333220210543' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5778667333220210543'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5778667333220210543'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='शिवेंद्र पर यह अत्याचार क्यों ?'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S41kTDFvyJI/AAAAAAAAAsA/o_QwK7H5eFU/s72-c/shivendra+singh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-6443977578160257028</id><published>2010-02-25T00:47:00.005+05:30</published><updated>2010-02-25T01:01:27.962+05:30</updated><title type='text'>बेशकीमती कोहिनूर है सचिन</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4V-etb-TFI/AAAAAAAAArY/ymNk_SlCuK8/s1600-h/sachin.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 201px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4V-etb-TFI/AAAAAAAAArY/ymNk_SlCuK8/s320/sachin.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5441894790805212242" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रधानमंत्री ने कहा, सचिन तेंदुलकर जैसा कोई नहीं है और उन पर देशवासियों को गर्व है। उसके कुछ ही देर बाद राष्ट्रपति का बधाई संदेश भी आ गया। जिस समय न्यूज चैनलों पर सचिन की महानता के गुणगान हो रहे थे, खुद तेंदुलकर उस समय दो सौ रनों की नाबाद मैराथन पारी खेलने के बावजूद मैदान पर उसी उत्साह के साथ फील्डिंग करते नजर आ रहे थे। छोटे कद के इस महान खिलाड़ी ने ग्वालियर में दक्षिण अफ्रीकी टीम के खिलाफ दूसरे वनडे में वह कारनामा कर दिखाया, जिसके सपने हर बड़ा खिलाड़ी देखता है। वनडे में दोहरा शतक लगाने का असाधारण करिश्मा। इसके आस-पास तक तो कई आए, लेकिन अंतत: इसे अंजाम दिया बीस साल से अनवरत क्रिकेट खेल रहे 36 वर्षीय सचिन रमेश तेंदुलकर ने। पाकिस्तान के अनवर सईद, विवियन रिचर्डस, सनथ जयसूर्या और खुद सचिन 186 से 194 तक रनों तक का पहाड़ चढ़ लिए थे, लेकिन पहाड़ को फतेह किया मास्टर ब्लास्टर ने।&lt;br /&gt;देश कई तरह के संकटों से जूझ रहा है। आंतरिक सुरक्षा का सवाल बड़ा है। महंगाई से हर कोई कराह रहा है। इस मुद्दे पर संसद गर्म है। विपक्ष काम-काज रोककर इस पर बहस का दबाव बनाए हुए है। दोपहर में रेल मंत्री ममता बनर्जी ने राहत भरा बजट पेश कर देशवासियों की दुख तकलीफों को थोड़ा कम करने की कोशिश की थी। टीवी चैनलों पर उस समय रेल बजट पर टीका टिप्पणियों का दौर चल ही रहा था कि खबर आई कि सचिन ने ग्वालियर वन डे में 46 वां शतक पूरा कर लिया है। रिमोट पर चैनल बदले जाने लगे। लोगों की नजरें सचिन पर जा टिकीं। उस सचिन पर जिसने पिछले एक साल में कई नए कीर्तिमान स्थापित कर डाले हैं। पिछले एक साल में दस टैस्ट मैचों में उन्होंने छह शतक ठोक डाले हैं। जिनमें से चार तो लगातार चार मैचों के हैं। टैस्ट में 47 शतक और वनडे में 46 शतक वे अपने नाम कर चुके हैं। अब शतकों के शतक से वे मात्र सात शतक दूर हैं। जिस तरह उनका बल्ला बोल रहा है, लगता है अगले साल तक यह करिश्माई खिलाड़ी इस कारनामे को भी अंजाम दे चुका होगा।&lt;br /&gt;पूरा देश उनके कीर्तिमानों पर आह्लादित है। वे कोई नया कारनामा करते हैं तो लोग अपनी दुख तकलीफों को भूल जाते हैं। एेसे ही जैसे कुछ ही पलों के लिए सही, लोग महंगाई को भूल गए। उन्हें लगता है, जैसे ये उपलब्धि सचिन की नहीं, उनकी अपनी है। सचिन हर परिवार के अपने हो गए हैं। सुनील गावस्कर को सचिन अपना प्रेरक मानते रहे हैं। वो गावस्कर कह रहे थे कि मेरा मन कर रहा है की मई सचिन के पांव छू लूँ। नाना पाटेकर कह रहे थे कि मैं मरूंगा तो अपनी आंखें दानकर जाऊंगा ताकि मरने के बाद भी सचिन को खेलते हुए देखता रहूं। गायक अभिजित की टिप्पणी थी कि सचिन व्यक्ति &lt;br /&gt;नहीं, सच में भगवान हैं। खुद भगवान भी आकर बल्लेबाजी करते तो शायद इस तरह न खेल पाते। जितने मुंह, उतनी बातें। सच में इस खिलाड़ी ने भारतीयों का मस्तक पूरी दुनिया में ऊंचा किया है। सचिन भारतीय है, इस पर हर भारतीय ही नहीं, समूचे महाद्वीप को गर्व है। पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर रमीज राजा ने कहा कि जब मास्टर ब्लास्टर ने सईद अनवर का 194 रन का रिकार्ड तोड़ा तो पाकिस्तान में दुआ की जा रही थी कि वह दोहरा शतक जरूर बनाएं। और दुआ कुबूल हो गई। &lt;br /&gt;दुआएं सरहद पार ही नहीं की जा रही थीं, स्टेडियम में बैठे उनके संगी-साथी, हजारों की भीड़, टेलीविजन चैनलों से चिपके करोड़ों लोग भी प्रार्थना कर रहे थे कि उनकी मुराद पूरी करा दे। सचिन जिस तरह खेल रहे थे, उसमें लग रहा था कि वह वन डे में दो सौ रन बनाने का कारनामा आज जरूर कर दिखाएंगे। और एेसा हुआ। जिस समय पूरी दुनिया सचिन को बधाई दे रही थी, पता नहीं अपनी क्षुद्र राजनीति के लिए इस जीनियस को भी निशाने पर लेने वाले वे लोग कहां दुबक गए थे, जिन्होंने पिछले दिनों उनके खिलाफ तुच्छ बयानबाजी कर अपनी जगहंसाई कराई थी। शाबास, सचिन लगे रहो। पूरे देश को आप पर गर्व है। &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-6443977578160257028?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/6443977578160257028/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=6443977578160257028' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6443977578160257028'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6443977578160257028'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/02/blog-post_25.html' title='बेशकीमती कोहिनूर है सचिन'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4V-etb-TFI/AAAAAAAAArY/ymNk_SlCuK8/s72-c/sachin.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-5492077766029386219</id><published>2010-02-16T17:42:00.004+05:30</published><updated>2010-02-16T20:04:57.748+05:30</updated><title type='text'>निपटना ही होगा माओवादियों से</title><content type='html'>मुंबई पर हमले के चौदह महीने बाद तक देश में कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं हुआ। अब पुणे में एक बेकरी को निशाना बनाया गया तो तमाम तरह की नुक्ताचीनी शुरू हो गई। कुछ आलोचकों ने तो पाकिस्तान के साथ 25 फरवरी को नई दिल्ली में प्रस्तावित बातचीत को रद्द कर देने तक की सलाह दे डाली, जबकि वह भी जानते हैं कि आतंकवाद की आग में इस समय खुद पाकिस्तान भी झुलस रहा है। हालांकि यह भी सच है कि इस आग से खेलने का खेल भी उसी ने शुरू किया था। हाल में प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने कहा था कि माओवादी हिंसा देश की एकता-अखंडता और आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा और चुनौती बन गई है। आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों की बैठक के फौरन बाद गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने नक्सली हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ अलग से बैठक आयोजित की लेकिन बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्रियों ने उसमें हिस्सा लेना तक मुनासिब नहीं समझा। इससे पता चलता है कि राज्य सरकारें इस गंभीर होती जा रही समस्या के प्रति कितनी संजीदा हैं। &lt;br /&gt;पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में इस समय नक्चसलवादी हिंसा का तांडव मचाए हुए हैं। सोमवार को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में ईस्टर्न फ्रंटियर राइफल्स के शिविर पर दो दर्जन से अधिक हथियारबंद नक्सलियों ने हमला कर बीस से अधिक जवानों को मार डाला। गृह मंत्नी पी. चिंदबरम ने इसकी निंदा करते हुए कहा कि मिदनापुर जिले में हुआ यह हमला और इस तरह के सभी हमले नक्सलियों की वास्तविक प्रकृति और चरित्न को उजागर करते हैं। चिदंबरम ने कहा कि शिविर से 40 से अधिक हथियारों के लूटे जाने की खबर है। गौरतलब है कि भाकपा-माओवादी के नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी ने इस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए धमकी दी है कि जब तक माओवादियों के खिलाफ की जा रही सैन्य कार्रवाई नहीं रुकेगी, तब तक इस तरह के हमले जारी रहेंगे। &lt;br /&gt;नौ फरवरी को पी चिदम्बरम ने नक्सलियों के खिलाफ संयुक्त अभियान के लिए कोलकाता में उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार के शीर्ष अधिकारियों के साथ बैठक की थी। इसके ठीक छह दिन के भीतर यह हमला हुआ है। चिदम्बरम ने कोतकाता में कहा था कि यदि नक्सलवादी हिंसा की गतिविधियों को छोड़ने को तैयार हों तो सरकार उनके साथ किसी भी विषय पर वार्ता के लिए तैयार है। चिदंबरम इन अटकलों को खारिज किया था कि नक्सलियों के खिलाफ प्रभावित राज्यों में जारी अभियान में उनकी हत्या कर दी जाएगी। गृहमंत्री ने इस तरह की मीडिया रिपोर्टों पर साफ कहा कि वे हमारे लोग हैं, हमें उनके जीवन की चिंता है। इसका उद्देश्य नक्सल प्रभावित इलाकों में नागरिक प्रशासन को फिर से स्थापित करना है। नक्सलियों के इस ताजा हमले से साफ हो गया है कि वे शासन को न केवल सीधी चुनौती दे रहे हैं बल्कि सुरक्षाकर्मियों के मनोबल को तोड़कर इस अभियान को भोथरा कर देना चाहते हैं। साफ है कि नक्सली हिंसा आतंकवाद से भी बड़ी चुनौती बनती जा रही है और अब समय आ गया है, जब सरकार को इससे निपटने के लिए कई मोरचों पर गंभीर प्रयास करने ही होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-5492077766029386219?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/5492077766029386219/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=5492077766029386219' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5492077766029386219'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5492077766029386219'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/02/blog-post_16.html' title='निपटना ही होगा माओवादियों से'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-3306360451643114123</id><published>2010-02-13T23:50:00.004+05:30</published><updated>2010-02-14T00:14:31.953+05:30</updated><title type='text'>संयोग या सुनियोजित साजिश ?</title><content type='html'>यह महज संयोग है या सोची समझी साजिश कि पुणे के कोरेगांव इलाके में जर्मन बेकरी में एेसे समय बम विस्फोट हुआ, जब भारत और पाकिस्तान के बीच सचिव स्तर की बातचीत की तारीख तय हुए चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे। इस विस्फोट के पीछे पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी संगठनों का हाथ है कि नहीं, फोरेंसिक जांच के बाद जल्द ही इसका खुलासा होने वाला है, लेकिन शक की सुईं एक बार फिर लश्कर ए तैयबा, इंडियन मुजाहिदीन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की ओर घूमती नजर आ रही है। ये ही वे जमातें हैं, जो नहीं चाहतीं कि भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरें। 26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय बातचीत बंद थी। भारत का साफ कहना था कि जब तक पाकिस्तान मुंबई के हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं करता, तब तक बातचीत नहीं होगी, लेकिन हाल ही में भारत ने सचिव स्तर की बातचीत का प्रस्ताव रखा, जिसे पाक सरकार ने स्वीकार कर लिया। 25 फरवरी को नई दिल्ली में यह बातचीत होनी है, लेकिन पुणे के आतंकी हमले में अगर पाकिस्तान के आतंकी संगठनों और आईएसआई की भूमिका उजागर हुई तो बहुत संभव है, शुरू होने से पहले ही वार्ता फिर टूट जाए।&lt;br /&gt;पुणे में यह पहली आतंकवादी वारदात है। मुंबई और महाराष्ट्र लगातार आतंकवादियों के निशाने पर रहा है। 26 नवम्बर 2008 का आतंकी हमला सबसे सुनियोजित और बड़ा था, जिसमें दस आतंकवादियों ने तीन दिन तक सेना, अर्धसैनिक बलों, एनएसजी कमांडो और मुंबई पुलिस से टक्कर ली। उस वारदात में पौने दो सौ से अधिक लोग मारे गए, जिनमें बीस से अधिक विदेशी थे। जांच में साफ हो गया था कि उस वारदात के तार सीधे पाकिस्तान से जुड़े थे। सभी दस आतंकवादी कराची से समुद्री रास्ते से मुंबई पहुंचे थे, जिनमें से नौ मारे गए और आमिर अजमल कसाब को जीवित पकड़ लिया गया, जिस पर इस समय मुंबई की विशेष अदालत में मुकदमा चल रहा है। &lt;br /&gt;भारत कहता आया है कि पाकिस्तान सरकार ने मुंबई की वारदात के बाद भले ही कहा हो कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने देगा, हकीकत यह है कि वहां आतंकवादियों का नेटवर्क जस का तस काम कर रहा है। मुंबई हमले के मास्टर माइंड हाफिज सईद को वहां खुली छूट है। वह पाक अधिकृत पाकिस्तान जाकर अभी भी भारत विरोधी भड़काऊ भाषण दे रहा है। यह अपने आप में हैरत की बात है कि पाकिस्तान अभी भी वहां सक्रिय भारत विरोधी जमातों और आतंकी संगठनों पर नकेल कसने के बजाय उन्हें हवा दे रहा है। पाक प्रधानमंत्री का बयान आता है कि कश्मीर का मसला फलीस्तीन जैसा ही है और जब तक इसे हल नहीं किया जाएगा, तब तक दक्षिण व दक्षिण पूर्वी एशिया में शांति बहाल नहीं होगी। साफ है कि आतंकवाद की आग में झुलस रहे पाकिस्तान को अब भी अक्ल नहीं आ रही है। पुणे की इस ताजा घटना से साफ हो गया है कि खतरा टला नहीं है, बल्कि और बढ़ गया है। गृहमंत्री पी चिदम्बरम और पीएमओ की सक्रियता के चलते पिछले करीब सवा साल में कोई बड़ी वारदात नहीं हो सकी लेकिन इस तरह के हमलों की आशंका लगातार बनी रही है। इस घटना से साफ हो गया है कि न केवल केन्द्रीय एजेंसियों को बेहद सतर्क रहना होगा, बल्कि राज्यों को भी अपनी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को चुस्त चौकस करना होगा। पुणे की घटना के बाद जाहिर है, हालात एक बार फिर बदल गए हैं। यूपीए सरकार को पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के बारे में पुर्नविचार करना होगा, नहीं तो विपक्षी दल, खासकर भाजपा के तीखे सवालों का सामना उसे संसद के भीतर और बाहर करना होगा। इस घटना के बाद भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। उसने जानना चाहा है कि क्या सरकार रिलैक्स हो गई है। और सरकार स्पष्ट करे कि यह सब आखिर कब तक चलता रहेगा?&lt;br /&gt;इस घटना से एक बात और स्पस्ट हुई है कि मुंबई कि तरह पुणे में भी आतंकवादियों के निशाने पर विदेशी ही थे. जर्मन बेकरी, जहाँ ये विस्फोट किया गया है, पर विदेशी बड़ी संख्या में आते हैं. इसके अलावा करीब ही यहूदियों का निवास है. पुणे में खासकर यूरोपियन देशों के नागरिक बड़ी तादाद में रहते हैं. आतंकवादी चाहते हैं कि विदेशियों में खौफ पैदा कर यह सन्देश भेजा जाए कि भारत उनके लिए सुरक्षित जगह नहीं है. भारत सरकार को इस घटना से सतर्क हो जाना चाहिए. आतंकवादियों का अगला टार्गेट निश्चित रूप से कामनवेल्थ गेम्स होंगे. पाकिस्तान नहीं चाहेगा कि भारत सफलता पूर्वक कामनवेल्थ गेम्स आयोजित कर दुनिया भर में यह सिद्ध करे कि यहाँ सुरक्षा के कोई खतरा नहीं है. इस समय दक्षिण अफ्रीका की टीम भारत दौरे पर है. रविवार से कोलकाता में दूसरा टेस्ट शुरू हो रहा है. दोनों टीमों की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है लेकिन भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आतंकवादी लाहोर जैसी कोई हरकत नहीं करने पाएं जिसके बाद श्रीलंकन टीम को दौरा बीच में ही छोड़कर स्वदेश लौटना पड़ा था. उसके बाद से किसी देश की टीम ने पाकिस्तान जाने की  हिम्मत नहीं की है. &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-3306360451643114123?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/3306360451643114123/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=3306360451643114123' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3306360451643114123'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3306360451643114123'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html' title='संयोग या सुनियोजित साजिश ?'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2992817046882856726</id><published>2010-02-09T19:31:00.004+05:30</published><updated>2010-02-09T19:55:31.523+05:30</updated><title type='text'>इन उत्सवों को संभालिए</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S3FwQ_mwcJI/AAAAAAAAAqk/Iw9Mis3XKxs/s1600-h/DSC_0068.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 235px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S3FwQ_mwcJI/AAAAAAAAAqk/Iw9Mis3XKxs/s320/DSC_0068.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5436249662467109010" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;रुचिका गेहरोत्रा कांड के आरोपी पूर्व डीजीपी एसपीएस राठौर पर सोमवार को अदालत के बाहर चाकू से प्रहार करने वाले 28 वर्षीय युवक उत्सव शर्मा के संबंध में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की फाइन आर्ट्स फैकल्टी में बीएफए का वह गोल्ड मेडलिस्ट रहा है। उसकी शार्ट फिल्म चाय ब्रेक को प्रतिष्ठित अवार्ड के लिए चुना गया है। वह मेधावी छात्र है और इस समय भले ही डिप्रेशन से ग्रस्त है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वह अहमदाबाद के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल स्कूल आफ डिजायनिंग का छात्र है। अब तक की पूछताछ से पता चला है कि पिछले महीने वह पंचकूला पहुंचा और वहां की जाट धर्मशाला में रहकर एसपीएस राठौर के बारे में जानकारियां जुटा रहा था। धर्मशाला के केयरटेकर से उसने अपनी मंशा भी बताई थी कि वह रुचिका-राठौर प्रकरण पर फिल्म के लिए एक स्टोरी तैयार करना चाहता है। जिस धर्मशाला में वह रात बिताता था, वह न तो कोर्ट परिसर से दूर है और न राठौर के निवास स्थान से। &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S3FwAMmX7ZI/AAAAAAAAAqc/XBxkURQtwlM/s1600-h/DSC_0064.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 222px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S3FwAMmX7ZI/AAAAAAAAAqc/XBxkURQtwlM/s320/DSC_0064.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5436249373897387410" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;उत्सव की कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं है। उल्टे वह बहुत प्रतिभाशाली छात्र रहा है। उसके पिता और माता बनारस के प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रोफेसर और चिकित्सक हैं। उन दोनों को भी उत्सव के कृत्य पर आश्चर्य है और उनका साफ कहना है कि किसी को भी कानून हाथ में लेने का हक नहीं है, लेकिन वे यह भी बताते हैं कि उस्तव की दिमागी हालत ठीक नहीं है। उसका पिछले चार महीने से अहमदाबाद में डिप्रेशन का उपचार चल रहा है, जिसके कागज लेकर वे दोनों बनारस से पंचकूला पहुंच रहे हैं। उत्सव ने छोटे चाकू से राठौर पर तीन वार करने की कोशिश की। गनीमत रही कि राठौर के चेहरे पर हल्की सी चोट आई। वे बच गए। चोट ज्यादा घातक भी हो सकती थी। &lt;br /&gt;राठौर ने अपनी तरफ से हमलावर युवक के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं कराने का निर्णय लिया है। हो सकता है, कि यह गांधीगीरी दिखाकर वे उन करोड़ों भारतीयों की सहानुभूति हासिल करने की चेष्टा कर रहे हों, जो रुचिका गेहरोत्रा मामले में उनके कारनामों से बेहद नाराज हैं। कौन नहीं जानता कि राठौर ने रुचिका को विदेश जाने से रोका। उसका योन शोषण किया। उसके परिजन उनके खिलाफ शिकायत नहीं करें, इसके लिए उसके भाई को झूठे कार चोरी के मामलों में बंद कराकर बुरी तरह टार्चर किया। फीस जमा नहीं करा पाने पर रुचिका को स्कूल से बर्खास्त करा दिया। इस सबसे वह बालिका इस कदर टूटी कि अंतत: रुचिका ने आत्महत्या कर ली। &lt;br /&gt;मीडिया के प्रेशर और लोगों के सड़कों पर उतर पड़ने के बाद रुचिका के परिजनों की हिम्मत बंधी है। केंद्र और हरियाणा सरकार भी जागी हैं. इतने साल बाद उन्हें भी लग रहा है कि रुचिका के परिवार के साथ ज्यादती हुई है. गृह मंत्री ने तो रुचिका के पिता को बुलाकर बात भी की है. मीडिया, लोगों और सरकारों की सक्रियता के बाद ऊंची अदालतों ने भी सकारात्मक रुख दिखाते हुए राठौर के खिलाफ नए सिरे से मामले दर्ज कर दोबारा जांच के निर्देश दिए हैं। इसके बावजूद जिस तरह राठौर को हरियाणा की पुलिस बचाने की चेष्टा करती रही है और राठौर के चेहरे पर गहरी होती मुस्कान देखी गई है, उससे उत्सव क्चया, हजारों-लाखों लोगों के मन में आक्रोश पैदा होता है। &lt;br /&gt;हालांकि किसी भी तरह की हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता और किसी को भी कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है.उत्सव ने जो किया, उसका समर्थन उसके माता पिता तक ने नहीं किया. लेकिन यह भी सच है कि इस प्रकरण ने आम आदमी के मन में राठोर जैसे पुलिस अधिकारियों के प्रति असम्मान और नफरत पैदा कर दी है. उन्हें लगता है कि पद का दुरपयोग कर अधिकारी कितने निचले स्तर हरकतों पर उतर सकते हैं..यह प्रकरण बताता है.सत्ता-व्यवस्था में बैठे लोगों को सोचना होगा कि उत्सव जसे प्रतिभाशाली नौजवान यदि अपने करियर को दांव पर लगाकर इस तरह आपा खो रहे हैं तो इसकी वजह क्या है। समय रहते उन कारणों को दूर करना होगा, नहीं तो एेसे बहुत से उत्सव कानून को हाथ में लेते नजर आएंगे। इस घटना से यह भी पता चलता है कि हमारा युवा वर्ग इस तरह के मामलों में कितना संजीदा होता जा रहा है. &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2992817046882856726?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2992817046882856726/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2992817046882856726' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2992817046882856726'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2992817046882856726'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/02/blog-post_09.html' title='इन उत्सवों को संभालिए'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S3FwQ_mwcJI/AAAAAAAAAqk/Iw9Mis3XKxs/s72-c/DSC_0068.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2890616093863132150</id><published>2010-02-01T18:37:00.003+05:30</published><updated>2010-02-01T19:00:59.648+05:30</updated><title type='text'>एक और शानदार उपलब्धि</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2bXg_dAxEI/AAAAAAAAAqM/8L-Wum6XmNQ/s1600-h/ar-rahman-oscar-2009.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 272px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2bXg_dAxEI/AAAAAAAAAqM/8L-Wum6XmNQ/s320/ar-rahman-oscar-2009.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5433266962257986626" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;जाने-माने संगीतकार ए आर रहमान ने डैनी बायल की आस्कर विजेता फिल्म स्लमडाग मिलिनियर के लिए बेस्ट कम्पाइलेशन साउंडट्रैक और बेस्ट मोशन पिक्चर सांग श्रेणियों में दो ग्रैमी अवार्ड जीतकर विश्व मंच पर एक बार फिर भारतीयों का मस्तक ऊंचा कर दिया है। पिछले साल रहमान ने आस्कर में धूम मचाई थी। उन्हें ब्रिटिश भारतीय फिल्म स्लम डाग मिलिनियर में संगीत के लिए दो आस्कर अवार्ड से नवाजा गया था। ग्रैमी अवार्ड प्राप्त करने के बाद रहमान ने इसे अद्भुत अनुभव बताते हुए भगवान का शुक्रिया अदा किया। साउंडट्रैक श्रेणी में रहमान ने फिल्म कार्डिलेक रिकाड्स के लिए स्टीव जोर्डन, इनग्लोरियस बास्टर्ड के लिए क्वेनटीन टोरांटिनो और ट्विलाइट एवं ट्र ब्लड के निर्माताओं को पछाड़कर ग्रैमी जीता है। सर्वश्रेष्ठ गीत की श्रेणी में रहमान के जय हो ने आस्कर के लिए चयनित फिल्म द रेसलर में रेसलर गीत लिखने वाले ब्रूस स्प्रिंगस्टीन को हराया। लास एंजिलिस में आयोजित 52 वें ग्रैमी पुरस्कारों के भव्य समारोह में जहां रहमान को दो-दो पुरस्कार मिले, वहीं दो अन्य भारतीय उस्तादों को निराशा हाथ लगी। उस्ताद अमजद अली खान और उस्ताद जाकिर हुसैन को कामयाबी नहीं मिल सकी। अमजद अली खान को उनकी एल्बम एनसियंट साउंड्स के लिए नामित किया गया था जबकि तबला वादक जाकिर हुसैन को सर्वोत्तम क्लासिकल क्रासओवर एल्बम की श्रेणी में द मेलोड़ी आफ रिदम के लिए नामांकन मिला था। पिछली बार हुसैन को उनकी एल्बम ग्लोबल ड्रम प्रोजेक्ट के लिए ग्रैमी अवार्ड से नवाजा गया था। जहां तक रहमान का सवाल है, जय हो के लिए उन्हें पहले ही गोल्डन ग्लोब ट्राफी और दो अकादमी अवार्ड मिल चुके हैं। वे पहले भारतीय हैं, जिन्हें आस्कर पुरस्कार मिला। रहमान ने ग्रैमी अवार्ड जीतने के बाद भले ही ईश्वर का आभार व्यक्त किया हो, लेकिन उनके परिवार, मित्रों और संगीत के जानकारों को इससे कोई ताज्जुब नहीं हुआ है। सभी का मानना है कि रहमान इस पुरस्कार के योग्य हैं। जय हो को अपनी आवाज देने वाले सुखविंदर सिंह की प्रतिक्रिया सही है कि रहमान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान मिलनी ही थी। उन्होंने यह भी कहा कि रोजा से यहां तक का रहमान का सफर बहुत ही खास रहा है। आस्कर अवार्ड जीतने वाले साउंड आर्टिस्ट रसूल पोकुट्टी ने इसे विलक्षण जीत बताते हुए कहा कि रहमान की जीत दिखाती है कि भारत सृजनात्मकता के क्षेत्र में भी एक ताकत के रूप में उभर रहा है। 44 वर्षीय रहमान को मद्रास का मोत्जार्ट कहा जाता है। वह बेहद विनम्र हैं। बहुत कम लोगों को मालूम है कि रहमान का जन्म का नाम ए एस दिलीप कुमार था, जिसे बदलकर वे अल्लाह रक्खा रहमान यानि ए आर रहमान बने। सुरों के बादशाह रहमान ने हिंदी के अलावा कई अन्य भाषाओं में बनने वाली फिल्मों में भी संगीत दिया है। रहमान को संगीत अपने पिता आर के शेखर से विरासत में मिला, जो मलयाली फिल्मों में संगीत देते थे। हालांकि नौ साल की अल्पायु में ही रहमान के सिर से पिता का साया उठ गया। विलक्षण प्रतिभा के धनी रहमान के गानों की दो सौ करोड़ से भी अधिक रिकार्डिग अब तक बिक चुकी हैं। विश्व के टाप टेन म्युजिक कंपोजर्स में वे शुमार किए जाते हैं। रहमान ग्यारह बार फिल्म फेयर, सहित अनेक पुरस्कार जीत चुके हैं। 2000 में उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा गया था। निश्चय ही उनकी महान उपलब्धियों पर भारतीयों को उन पर गर्व है। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2890616093863132150?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2890616093863132150/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2890616093863132150' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2890616093863132150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2890616093863132150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/02/blog-post_01.html' title='एक और शानदार उपलब्धि'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2bXg_dAxEI/AAAAAAAAAqM/8L-Wum6XmNQ/s72-c/ar-rahman-oscar-2009.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-3637567704920236807</id><published>2010-02-01T13:38:00.002+05:30</published><updated>2010-02-01T13:54:07.263+05:30</updated><title type='text'>क्या मुंबई उनकी जागीर है ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2aPi8miS9I/AAAAAAAAAp8/gPVTDGd469Q/s1600-h/Bal_Thackeray.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2aPi8miS9I/AAAAAAAAAp8/gPVTDGd469Q/s320/Bal_Thackeray.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5433187831015164882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कभी-कभी लगता है कि हमारे देश में अराजकता फैलाने वाले कुछ बाहुबलि किस्म के क्षत्रपों के लिए जैसे कानून है ही नहीं। बाल ठाकरे और राज ठाकरे ने मुंबई में जिस तरह का अराजक माहौल पैदा कर दिया है, उसे देखकर आश्चर्य होता है। इससे भी बढ़कर ताज्जुब इस बात का होता है कि वहां की सरकार पंगु बनी हुई है। बाल ठाकरे कभी मुकेश अंबानी को धमकाते हैं, कभी सचिन तेंदुलकर को तो कभी शाहरुख खान को। मुकेश अंबानी देश के कारपोरेट जगत का ऐसा चेहरा हैं, जिनकी दुनिया भर में ख्याति है। सचिन तेंदुलकर को केवल भारत के उनके प्रशंसक ही नहीं, विश्व भर के उनके चाहने वाले क्रिकेट का भगवान मानते हैं। पिछले बीस साल से वे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहे हैं और उन्होंने जहां तमाम तरह के रिकार्ड कायम किए हैं, वहीं भारतीय क्रिकेट को बुलंदियों पर पहुंचाकर उसे सम्मान दिलाया है। शाहरुख एेसे चमकते सितारे हैं, जिन्हें संसार भर में मान-सम्मान मिला है। अलग-अलग कारणों से बाल ठाकरे ने इन तीन हस्तियों को धमकाने की चेष्टा की है। बाल ठाकरे मुंबई के मठाधीश बने हुए हैं। यह जानकर आश्चर्य होता है कि पिछले तीन विधानसभा चुनाव में मुंबई और महाराष्ट्र के लोगों ने उन्हें सबक सिखाया है, फिर भी उनकी और उनके भतीजे राज ठाकरे की समझ में यह बात नहीं आ रही है कि लोग चरमपंथी विचारधारा और माफिया डान की धमकाने वाली शैली को पसंद नहीं करते हैं। राज ठाकरे और बाल ठाकरे को यह भ्रम हो गया है कि मुंबई और मराठावाद के वे जितने बड़े पैरोकार बनकर उबरेंगे और मुंबईकर के नाम पर लोगों को हड़काएंगे, आम मुंबईवासी शायद उन्हें उतना ही पसंद करेंगे। सही बात तो यह है कि इस तरह नफरत फैलाकर, क्षेत्र, भाषा और धर्म के नाम पर लोगों को बांटकर वे लोगों की नजरों में अपना कद घटा रहे हैं। मुंबई में रहने वाले नामचीन लोगों को शांति से अपना काम करना है। यह सोचकर वे कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। इसे ठाकरे परिवार लोगों की बुजदिली मानकर और दबाने की कोशिश करता है। शाहरुख खान हों या सचिन तेंदुलकर, उन्होंने एेसी कोई बात नहीं कही जो देश विरोधी हो। क्या संविधान में हरेक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है? शाहरुख और सचिन भी उतने ही मुंबईकर हैं, जितना ठाकरे का परिवार। किसी को भी किसी को धमकाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। शाहरुख ने केवल इतना कहा था कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों को भी आईपीएल में खिलाया जाना चाहिए। बोली के समय उनके साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ, उससे किसी को भी दुख पहुंच सकता है। लगभग यही बात गृह मंत्री पी चिदम्बरम ने भी कही है। बाल ठाकरे ने उनके खिलाफ जबान क्यों नहीं खोली? अब ठाकरे सिनेमाघरों के मालिकों को धमकाने पर उतर आए हैं। उन्होंने पत्र लिखकर मुंबई के सिनेमाघर मालिको से कहा है कि वे शाहरुख की फिल्में नहीं लगाएं। योगगुरू बाबा रामदेव ने तो साफ कहा है कि मुंबई सबकी है और वहां किसी की दादागीरी नहीं चलनी चाहिए। लखनऊ में रामदेव ने सही ही कहा कि वे लोग घोर असंवैधानिक काम कर रहे हैं। उन पर कार्रवाई होनी चाहिए। इसके लिए जरूरत पड़े तो राज्यों को विशेष कानून बनाना चाहिए। रामदेव ने कहा कि जाति-धर्म और क्षेत्न के नाम पर देश को बांटने की कोशिश की जा रही है। ये देश के लिए खतरनाक है। अच्छी बात है की संघ ने हिंदी भाषी उत्तर भारतियों की रक्षा का प्रण लिया है लेकिन यह सवाल तो उनसे भी पूछा ही जाएगा कि इतने लम्बे समय तक संगठन चुप्पी क्यों साधे रहा. क्या किसी को भी इस तरह किसी को सरेआम धमकाने की इजाजत दी जानी चाहिए. महाराष्ट्र  में सर्कार ओउर पुलिस प्रशासन नाम की कोई व्यवस्था काम कर रही की नहीं ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-3637567704920236807?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/3637567704920236807/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=3637567704920236807' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3637567704920236807'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3637567704920236807'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='क्या मुंबई उनकी जागीर है ?'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2aPi8miS9I/AAAAAAAAAp8/gPVTDGd469Q/s72-c/Bal_Thackeray.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2289456789946495300</id><published>2010-01-31T23:47:00.002+05:30</published><updated>2010-02-01T00:11:56.173+05:30</updated><title type='text'>दांव पर मनमोहन सिंह की साख</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2XJ6bV6bbI/AAAAAAAAAp0/DP0iVN0aexg/s1600-h/manmohan.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 227px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2XJ6bV6bbI/AAAAAAAAAp0/DP0iVN0aexg/s320/manmohan.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5432970531101633970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सतहत्तर वर्षीय डा. मनमोहन सिंह ने जब 22 मई 2009 को दूसरी बार देश की बागडोर संभाली तो देश के हर वर्ग को उनसे ढेरों उम्मीदें थीं। 2004 में जब वे पहली बार प्रधानमंत्री बने, तब उनके बारे में मिली-जुली सी धारणा थी। यह भाव भी था कि सोनिया गांधी की कृपा से ही वे इस महत्वपूर्ण पद तक पहुंचे हैं, लेकिन 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस नीत यूपीए गठबंधन को दोबारा जनादेश मिला तो इसकी एक वजह मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लोगों का विश्वास भी था। उनकी दूसरी पारी के एक साल पूरा होने में अभी चार महीने हैं, लेकिन आम आदमी में गहरी निराशा देखी जा रही है। दुनिया भर में उनकी ख्याति कुशल अर्थशास्त्री की है। चोटी के देश और उनके राष्ट्राध्यक्ष वैश्विक मंदी के दौर में मनमोहन सिंह के सूझ-बूझ भरे फैसलों की प्रशंसा कर चुके हैं। खुद उनकी सरकार के प्रचार प्रबंधक मंदी के बावजूद साढ़े छह से सात प्रतिशत की विकास दर को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन घरेलू मोर्चे पर महंगाई को नहीं रोक पाने पर वे बगलें झांकते हुए नजर आ रहे हैं। बल्कि कहना चाहिए कि इसके लिए एक दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. &lt;br /&gt;आम आदमी की बात करके वोट हासिल करने वाली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी रिकार्डतोड़ महंगाई पर लंबी रहस्यमय चुप्पी साधे हुए हैं। बीते सप्ताह तीन उल्लेखनीय घटनाएं घटीं। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोनिया गांधी पर यह कहते हुए शब्दबाणों का हमला बोला कि अब उन्हें उनसे महंगाई कम करने की अपील इटेलियन भाषा में करनी पड़ेगी, क्योंकि अन्य भाषा वे समझ नहीं रही हैं। कभी सोनिया और राहुल का स्तुतिगान करने वाले लालू प्रसाद यादव बिहार की सड़कों पर उतर पड़े। उन्होंने महंगाई के विरोध में राज्य बंद कराया और उनके करीब बारह हजार समर्थकों ने गिरफ्तारी दी। लालू के निशाने पर केन्द्र के साथ नीतीश सरकार भी है। तीसरी घटना केन्द्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार का पुणे में दिया गया बयान है। उन्होंने कहा कि महंगाई के लिए वे अकेले जिम्मेदार नहीं हैं। मूल्य निर्धारण का फैसला केबिनेट करती है और उसके मुखिया प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह हैं। &lt;br /&gt;अगले महीने संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला है। इसमें रेल और आम बजट आएगा, लेकिन बजट में किसी की दिलचस्पी होगी, लगता नहीं। बजट से महंगाई घटेगी और लोगों को राहत मिलेगी, यह उम्मीद भी नहीं है। उम्मीद विपक्षी दलों से भी नहीं है। महंगाई को लेकर वे दो-चार दिन हल्ला करेंगे। संसद ठप करेंगे। कार्रवाई नहीं चलने देंगे। संसद परिसर में स्थित गांधी जी की प्रतिमा के सामने पोस्टर-बैनर लेकर बैठेंगे-फोटो खिंचवाएंगे और इस तरह अपने कत्र्तव्य की पूर्ति कर लेंगे। यह सब महंगाई से त्रस्त लोगों की भावनाओं को कैश करने की मंश से होगा। सांसदों को महंगाई से कोई खास फर्क पड़ता है या उन्हें आम लोगों की चिंता है, एेसा उनके व्यवहार से नहीं लगता। वसे भी जनता ने एेसे प्रतिनिधि संसद नहीं भेजे हैं, जो उनके दुख-दर्द को समझते हों। आजाद भारत की यह एेसी संसद है, जिसमें सर्वाधिक तीन सौ से भी अधिक करोड़पति सांसद पहुंचे हैं। उन्हें पता ही नहीं है कि सब्जी-दाल, दूध, तेल, आटा और रसोई की दूसरी जरूरी चीजों के दाम कितने बढ़े हैं और उन्होंने आम आदमी का जीवन किस कदर बेहद कठिन बना दिया है। धूमिल ने लिखा है, एक आदमी रोटी खाता है। एक आदमी रोटी बेलता है। एक तीसरा आदमी भी है, जो ना रोटी खाता है और न बेलता है। वह सिर्फ रोटी से खेलता है। यह तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है। &lt;br /&gt;डा. मनमोहन सिंह से लोगों को इसलिए भी उम्मीद थी क्योंकि वे समावेशी विकास की बात करते रहे हैं। लोग जानते हैं कि उन्होंने गुरबत से सात रेसकोर्स तक का सफर लंबे संघर्षो और कठिन परिश्रम से तय किया है। उनकी सादगी और ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है, लेकिन वे काबिल और संवेदनशील प्रधानमंत्री हैं, यह अभी उन्हें सिद्ध करना है। 1990-91 में पीवी नरसिंह राव सरकार ने देश में आर्थिक उदारीकरण के दौर की शुरुआत की थी। उनकी सरकार में वित्त मंत्री का दायित्व यही मनमोहन सिंह संभाल रहे थे। दुर्भाग्य की बात यही है कि आर्थिक उदारीकरण की नीतियों का लाभ धन्नासेठों की तिजोरियों को और ठसाठस भरने में भले ही सफल रहा, लेकिन देश के आम आदमी तक उसका लाभ बीस साल बाद भी नहीं पहुंच पाया है। मनमोहन सिंह महंगाई को तुरंत काबू में करने के ठोस उपाय नहीं करते हैं तो लोगों का उनसे मोहभंग और तेज होगा। तब कांग्रेस को भी संभलने का मौका नहीं मिलेगा। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2289456789946495300?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2289456789946495300/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2289456789946495300' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2289456789946495300'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2289456789946495300'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/01/blog-post_31.html' title='दांव पर मनमोहन सिंह की साख'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S2XJ6bV6bbI/AAAAAAAAAp0/DP0iVN0aexg/s72-c/manmohan.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-578323098647011900</id><published>2010-01-17T23:26:00.002+05:30</published><updated>2010-01-17T23:38:09.470+05:30</updated><title type='text'>अशुभ साबित हुआ छियानवे</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S1NR9gkpulI/AAAAAAAAAps/PKsorLYgu7I/s1600-h/Jyoti_Basu.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 212px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S1NR9gkpulI/AAAAAAAAAps/PKsorLYgu7I/s320/Jyoti_Basu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5427772093069113938" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;उन्नीस सौ छियानवे में कई अहम घटनाएं हुईं। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी, जो मात्र तेरह दिन चल सकी। कहने को 1977 और 1989 में भी गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ, लेकिन उन सरकारों के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर कांग्रेस की कोख से ही जन्मे थे। अटल जी कभी कांग्रेस में नहीं रहे, इसलिए उनके नेतृत्व में 96 में बनी सरकार को ही सही मायने में पहली गैर कांग्रेसी सरकार कहना चाहिए। वे बहुमत सिद्ध नहीं कर सके, लिहाजा सरकार गिर गई। तीसरे मोर्चे को सरकार बनाने का मौका मिला। प्रधानमंत्री के रूप में उस वक्त 82 वर्ष की आयु वाले वयोवृद्ध साम्यवादी नेता ज्योति बसु के नाम पर सर्व सहमति बनी। ज्यादातर नेताओं का मत है कि ज्योति बसु प्रधानमंत्री बने होते तो शायद आज राजनीतिक हालात कुछ और होते। माकपा पोलित ब्यूरो ने उस प्रस्ताव का अनुमोदन नहीं किया। नतीजतन ज्योति बाबू प्रधानमंत्री नहीं बन सके। बाद में उन्होंने इसे एेतिहासिक भूल बताते हुए कहा कि पोलित ब्यूरो का निर्णय सही नहीं था, लेकिन वे पार्टी के अनुशासित सिपाही थे। उस समय सिर झुकाकर पोलित ब्यूरो के निर्णय को मान लिया। इसे आप दुर्योग नहीं तो क्या कहेंगे कि छियानवे का अंक न ज्योति बाबू को तब रास आया था और न अब। उनका निधन भी छियानवे वर्ष की आयु में हुआ। 1996 ने हरदनहल्ली डोड्डेगोड़ा देवेगौड़ा के रूप में देश को एक ऐसा सुस्त और मजबूर प्रधानमंत्री दिया, जो अपने काम-काज के लिए कम और सोते रहने के लिए ज्यादा जाना गया। &lt;br /&gt;ज्योति बसु अपनी पूरी उम्र जीकर गए हैं। वे भाग्यशाली कहे जाएंगे। एेसे राजनेता विरले ही मिलेंगे, जिन्होंने लगभग सौ साल का इतना गरिमापूर्ण जीवन जिया हो। हमेशा विवादों के परे रहने वाले ज्योति बाबू का निधन एेसे समय हुआ है, जब माकपा को उनके नेतृत्व और मार्गदर्शन की सबसे ज्यादा जरूरत थी। माकपा ही नहीं, पूरा वामपंथ दर्शन हिचकोले खाता हुआ नजर आ रहा है। सत्तर के दशक में ज्योति बसु की अगुआई में वामपंथियों ने पश्चिम बंगाल से दक्षिण पंथ का बिस्तर गोल कर दिया था। वे सत्ता में आए तो साढ़े तीन दशक तक लोगों ने उन्हें सिर-माथे पर बैठाए रखा। लगातार तेईस साल तक मुख्यमंत्री रहने का अनोखा कीर्तिमान ज्योति बाबू के नाम है। उनके नेतृत्व में वामपंथियों के गढ़ में जो एेतिहासिक एवं क्रांतिकारी फैसले हुए, उन्हीं के परिणामस्वरूप कांग्रेस को वहां पुर्नजीवन का अवसर नहीं मिला। खेतिहर मजदूरों, किसानों, गरीबों के हित में ज्योति बसु सरकार ने महत्वपूर्ण निर्णय लिए। यह कहना गलत नहीं होगा कि अनुशासित वामपंथी होते हुए भी उन्होंने विदेशी निवेश को पश्चिम बंगाल में आमंत्रित किया और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभाई। हाल के लोकसभा चुनाव में माकपा-भाकपा की दुर्दशा पर वे बेहद व्यथित थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से वामपंथियों की मौजूदा नीतियों और कुछ निर्णयों पर खुला प्रहार किया था। नंदी ग्राम और सिंगूर में किसानों पर जिस तरह कई बार गोली चलवाई गई और लाठीचार्ज हुए, ज्योति बाबू उसके भी खिलाफ थे। उद्योगपतियों के लिए जिस जोर जबरदस्ती से किसानों की उर्वरा भूमि का अधिग्रहण हुआ और उनके विरोध को कुचलने की कोशिशें की गईं, उसके चलते लोगों में वामपंथियों के प्रति लोगों में गुस्सा पनपा। नतीजतन उन्हें चुनाव में इसकी कीमत अदा करनी पड़ी। &lt;br /&gt;ममता बनर्जी ने उन किसानों और गरीबों को वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ लामबंद करने में सफलता प्राप्त कर ली, जो पिछले साढ़े तीन दशक से उनकी ताकत बने हुए थे। प्रकाश करात के नेतृत्व में पोलित ब्यूरो ने पिछले कुछ अरसे में कुछ एेसे निर्णय लिए हैं, जिनके नतीजे आत्मघाती साबित हुए हैं। अमेरिका से असैन्य एटमी करार के मुद्दे पर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-1 से समर्थन वापसी का निर्णय भी उनके लिए अत्मघाती सिद्ध हुआ। पहली सरकार पर वामपंथियों का नियंत्रण था, लेकिन यूपीए ने जब ममता बनर्जी के साथ चुनाव लड़ने का निर्णय लिया तो वामपंथियों की चूलें हिल गईं। अब आलम यह है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में लाल ब्रिगेड़ में हड़कंप की स्थिति है। वहां विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा समय नहीं है। लोकसभा चुनाव के नतीजे और वहां के राजनीतिक हालात यह बताने को काफी हैं कि वामपंथियों का किला ढह रहा है। इसकी रोकथाम करने की कुव्वत यदि किसी में थी, वह ज्योति बाबू ही थे, लेकिन उम्र और हालातों ने उनका साथ नहीं दिया। 96 के अंक ने उन्हें एक बार फिर झटका दिया। एेसा झटका, जिसने वामपंथ ही नहीं नहीं, देश से भी एक बेहतरीन नेता छीन लिया। एेसे नेता सदियों में एक-आध ही तैयार होते हैं। ज्योति बसु के बाद वामपंथियों को अहसास होगा कि उन्होंने एक नेता नहीं, सिर की छत ही खो दी है। प. बंगाल की वामपंथी सरकार यदि उनके दिखाए मार्ग पर बढ़ती तो उसे ये दिन नहीं देखने पड़ते। &lt;br /&gt;&lt;strong&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-578323098647011900?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/578323098647011900/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=578323098647011900' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/578323098647011900'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/578323098647011900'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='अशुभ साबित हुआ छियानवे'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S1NR9gkpulI/AAAAAAAAAps/PKsorLYgu7I/s72-c/Jyoti_Basu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-6768590624113121480</id><published>2009-12-28T18:41:00.004+05:30</published><updated>2009-12-28T19:07:51.187+05:30</updated><title type='text'>फिर बेआबरू हुए एनडी तिवारी</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Szi0nQHx5aI/AAAAAAAAApk/sxlqCRNn1OQ/s1600-h/IN03_TIWARI_2830f.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 182px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Szi0nQHx5aI/AAAAAAAAApk/sxlqCRNn1OQ/s320/IN03_TIWARI_2830f.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5420280737975887266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;इस महत्वपूर्ण दशक का यह अंतिम साल 2009 बस विदा ही होने वाला है। 3 दिन बाकी हैं। लोग नये साल 2010 का स्वागत करने की तैयारी में जुटे हैं। समाचार-पत्र 2009 की घटनाओं से अटे पड़े हैं। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में भी पिछले कई दिन से बीत रहे इस वर्ष की चर्चित घटनाओं पर रोचक वृत्तचित्र देखने को मिल रहे हैं। एेसे में रविवार की सुबह के समाचार-पत्रों की सुर्खी बने 86 वर्षीय नारायण दत्त तिवारी। मीडिया में सैक्स स्कैंडल उछलने के बाद दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों में उन्हें आंध्र प्रदेश के राज्यपाल पद से इस्तीफा देना पड़ा। सही बात तो यह है कि कांग्रेस नेतृत्व को उनसे इस्तीफे के लिए कहना पड़ा। तिवारी करीब सत्तर साल से सार्वजनिक जीवन में हैं। मात्र सत्रह साल की उम्र में वे स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेते हुए पहली बार जेल गये थे। वे उन कुछ गिने-चुने राजनेताओं में हैं, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय हैं। उन भाग्यशाली राजनेताओं में शुमार हैं, जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन के ज्यादातर वसंत महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए देखे। &lt;br /&gt;21 मई 1991 में राजीव गांधी की श्री पेरूम्बदूर में लिट्टे के आत्मघाती दस्ते के हाथों हत्या के बाद प्रधानमंत्री पद की दौड़ में पीवी नरसिंहराव के मुकाबले तिवारी पिछड़ गये थे, जिसका उन्हें हमेशा मलाल रहा। दो साल पहले वे राष्ट्रपति बनना चाहते थे, लेकिन सोनिया गांधी उनके नाम पर राजी नहीं हुईं। उनकी पहली पसंद शिवराज पाटील थे, लेकिन जब वाममोर्चा सहमत नहीं हुआ तो पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में प्रतिभा देवी सिंह पाटील को चुन लिया गया। वे उस समय राजस्थान की राज्यपाल थी। खिन्न एनडी तिवारी को बाद में राज्यपाल पद से संतुष्ट होना पड़ा। उन्हें आंध्र प्रदेश में गर्वनर बनाकर भेजा गया। इस उम्र में, कार्यकाल के बीच में ही इस तरह बेआबरू होकर राजभवन छोड़ना पड़ेगा, उन्होंने सोचा भी नहीं होगा। लेकिन इन हालातों के लिये कोई और नहीं, खुद तिवारी ही जिम्मेदार हैं। &lt;br /&gt;सार्वजनिक जीवन में आने वाले हर व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह नैतिकता के उच्च मानदंडों को स्थापित कर आने वाली पीढ़ी के लिये श्रेष्ठ उदाहरण पेश करे। शुचितापूर्ण, संयमित जीवन जीने वाले राजनेताओं की अपने देश में कमी नहीं है, लेकिन बेहद विलासितापूर्ण और बैड़रूम पालिटिक्चस करने वालों की भी कमी नहीं है। और इसी के चलते राजनीति और नेताओं के स्तर व सम्मान में भारी गिरावट दर्ज की गयी है। आंध्र प्रदेश के राजभवन में जो कुछ घटा, उसने तिवारी ही नहीं, पूरी कांग्रेस को शर्मसार कर दिया है। तेलुगू न्यूज चैनल ने जो कुछ दिखाया, उसमें कितनी हकीकत है, यह तो फोरेंसिक जांच से ही सामने आयेगा, लेकिन कांग्रेस को यदि जरा भी संदेह होता तो तिवारी की इस तरह विदाई नहीं होती। इस प्रकरण ने एक बार फिर सार्वजनिक जीवन जीने वालों के आचरण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। &lt;br /&gt;लगभग हर बड़े शहर में एकाधिक सरकारी अतिथि-गृह होते हैं। उनके बारे में जिस तरह की चर्चा और धारणा आमतौर पर बनी हुई है, उसे जब-तब इस तरह के होने वाले कर्मकांड पुष्ट ही करते हैं। राज्यपाल किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के संवेधानिक मुखिया होते हैं। हर छोटा-बड़ा फैसला राज्यपाल के नाम पर होता है। इस पद की अपनी एक गरिमा और मर्यादा रही है। कुछ् साल पहले तक भी गर्वनर पद पर एेसे किसी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं होती थी, जिसके चरित्र, ईमानदारी और सार्वजनिक जीवन पर किसी तरह के प्रश्न चिह्न खड़े किये जा सकें। एक दौर एेसा भी था, जब सक्रिय राजनीति में रहने वालों की नियुक्ति राजभवनों में नहीं की जाती थी, लेकिन जिस तरह अन्य संवेधानिक पदों और संस्थानों में गिरावट देखने को मिली है, वैसा ही राजभवनों में भी देखने को मिलने लगा है। राजभवनों की गरिमा और मर्यादा का हनन और पतन दुर्भाग्य से इंदिरा गांधी के शासनकाल में प्रारंभ हुआ, जब जम्मू-कश्मीर से लेकर आंध्र प्रदेश तक की चुनी हुई सरकारों को असंवेधानिक तरीके से बर्खास्त कराया गया। अब तो इंतिहा ही हो गयी है। अधिकांश राजभवनों में ऐसे महामहिम विराजमान हैं, जो कुछ समय पहले तक किसी न किसी राज्य के मुख्यमंत्री थे। केन्द्र में जिस पार्टी की सरकार आती है, वह मौका मिलते ही राजभवनों में अपने प्यादों की तैनाती करती है.&lt;br /&gt;जहां तक आंध्र प्रदेश के राजभवन में हुई घटना का सवाल है, यह वास्तव में अभूतपूर्व है। यदि यह घटना सही है तो कहना होगा कि राजनीति पतन के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी है। एनडी तिवारी 86 वर्ष के हैं। सहज ही विश्वास नहीं होता कि कोई व्यक्ति उम्र के अंतिम पड़ाव पर इस तरह की हरकत कर सकता है, लेकिन यह कोई अकेली घटना है, जिस पर इस कदर परेशान होकर स्यापा किया जाये। भारतीय राजनीति में नेताओं के सैक्स स्कैंडल, वीडियो, फोटो और पोस्टर पहले भी सामने आते रहे हैं। 2006 में घाटी में एक एेसा ही वीडियो सामने आया था, जिसमें राजनेताओं और नौकरशाहों को कम उम्र की युवतियों के साथ रंगरेलियां मनाते हुए दिखाया गया था। उस पर पूरी घाटी में जबरदस्त बवाल हुआ था। तब उमर अब्दुल्ला का नाम भी उछाला गया था। बाद में सीबीआई ने कहा कि उमर उनमें नहीं हैं। 2005 में संघ से भाजपा में आए संजय जोशी की भी एक सीडी प्रकट हुई थी। बाद में फोरेंसिक जांच में उसे नकली पाया गया। उत्तर प्रदेश के मधुमिता शुक्ला हत्याकांड को कैसे भुलाया जा सकता है? अमरमणि त्रिपाठी मधुमिता हत्याकांड में इस समय उम्रकैद की सजा भुगत रहे हैं। मेरठ की कविता चौधरी के साथ यूपी के कई जाने-माने नेताओं के रिश्तों की सैक्चस सीडी महीनों चर्चा में रही। कविता चौधरी की हत्या कर दी गयी। उसकी हत्या के आरोप में गिरफ्तार रवीन्द्र प्रधान भी गाजियाबाद की डासना जेल में रहस्यमय हालातों में मारे गये। नारायण दत्त तिवारी जिस समय उत्तराखंड के मुख्यमंत्री थे, उनके मंत्री हरक सिंह रावत भी एक महिला के साथ रिश्तों को लेकर फंसे थे। उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 1978 में बाबू जगजीवन राम के बेटे का एक किस्सा सूर्या पत्रिका में छपा तो पूरा देश सन्न रह गया था। राजग शासनकाल में तहलका टेप कांड ने इसी तरह की सनसनी फैलायी थी, जिसमें कई सैन्य व अन्य अधिकारी काल गर्ल की मांग करते और उनसे फ्लर्ट करते दिखाये गये थे। &lt;br /&gt;कहने का आशय यह है कि राजनीति और नौकरशाही में एेसे लोगों की आज कोई कमी नहीं है, जो सार्वजनिक जीवन में उच्च मानदंडों की स्थापना के प्रति न तो चिंतित हैं और न उनका इस सबसे सरोकार है। इस तरह के मामलों को देखकर एक अहम सवाल यह भी उठता है कि इस तरह चरित्र के लोगों को राजनीतिक दल प्रश्रय क्यों देते हैं? घटना के मीडिया में उछलने के बाद चेहरे पर कालिख नहीं लगे, इससे बचने के लिये राजनीतिक दल भले ही एेसे लोगों को पद से हटाने, उन्हें निलंबित करने और सार्वजनिक जीवन में उच्च मानदंड स्थापित करने का विधवा विलाप करते नजर आते हों, हकीकत यही है कि एेसा करके वे सिर्फ और सिर्फ लोगों के खौफ से करते हैं। क्या कांग्रेस नेतृत्व को पहले से जानकारी नहीं थी कि एनडी तिवारी के बारे में किस तरह की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में उड़ती रहती हैं? उनके नाम के साथ इस तरह की यह कोई पहली घटना नहीं जुड़ी है। जब कांग्रेस नेतृत्व को उनके किस्सों और चरित्र की जानकारी थी तो उन्हें पहले उत्तराखंड का मुख्यमंत्री और बाद में आंध्र प्रदेश का गर्वनर क्यों बनाकर भेजा गया?&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-6768590624113121480?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/6768590624113121480/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=6768590624113121480' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6768590624113121480'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6768590624113121480'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/12/blog-post_28.html' title='फिर बेआबरू हुए एनडी तिवारी'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Szi0nQHx5aI/AAAAAAAAApk/sxlqCRNn1OQ/s72-c/IN03_TIWARI_2830f.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-7027421836312597624</id><published>2009-12-23T17:53:00.013+05:30</published><updated>2009-12-23T22:21:45.398+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='झारखण्ड'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किस्मत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भ्रष्टाचार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नतीजे'/><title type='text'>किस्मत खराब है झारखंड की !</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SzJKf73_62I/AAAAAAAAApU/p5qTttsSVUc/s1600-h/shibu%5B1%5D.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 265px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SzJKf73_62I/AAAAAAAAApU/p5qTttsSVUc/s320/shibu%5B1%5D.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5418475214189095778" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;झारखंड के नतीजे आ गये हैं। हालात कमोबेश जस के तस हैं। इन नतीजों ने लोगों को थोड़ा हैरान और परेशान किया है। झारखंड से जो संकेत मिले हैं, वे शुभ नहीं हैं। इनसे निराशा का भाव उत्पन्न होता है। सवाल है कि क्या झारखंड की किस्मत में जोड़-तोड़ और मोल-भाव के आधार पर बनने वाली अस्थिर सरकारें ही लिखी हैं? या इस राज्य के राजनीतिक, सामाजिक और जातीय समीकरण ही कुछ एेसे बन गये हैं कि कोई एक दल अपने दम पर बहुमत हासिल करने की दशा में ही नहीं रह गया है? झारखंड नवम्बर 2000 में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के साथ अस्तित्व में आया था। वहां की सरकारें विकास के पथ पर कदम आगे बढ़ा चुकी हैं, लेकिन इस आदिवासी बाहुल्य राज्य का दुर्भाग्य देखिये कि यहां नौ साल में छह सरकारें बन चुकी हैं और राज्य के लोग पांच मुख्यमंत्री देख चुके हैं। राजनीतिक अस्थिरता ही झारखंड की सबसे बड़ी समस्या नहीं है, राजनीतिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचार अकूत खनिज संपदा वाले इस धनी किन्तु गरीब और बेबस राज्य की जड़ों में मट्ठा डालकर इसे भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। धनी इसलिये, क्योंकि यदि यहां स्थिर सरकारें बनतीं और खनिज संपदा पर देसी-विदेशी थैलीशाह सरकारों से मिलकर डाका नहीं डालते, कायदे की योजनायें बनतीं, उन्हें सुनियोजित ढंग से लागू किया जाता तो झारखंड की गरीबी और लाचारी का अब तक कुछ उपचार तो हो गया होता। एेसा नहीं हुआ। जिन उम्मीदों को लेकर आदिवासियों ने अपने लिये अलग राज्य की मांग के लिये लंबे समय तक संघर्ष किया, वे उम्मीदें कभी की धराशायी हो चुकी हैं। इस खंडित जनादेश ने विकास, सामाजिक न्याय और बेकारी के निराकरण की बाट जोह रहे लोगों को और भी निराश किया है। झारखंड फिर जोड़-तोड़, बेमेल गठबंधन सरकार की ओर बढ़ रहा है। &lt;br /&gt;इस जनादेश ने इस कारण भी लोगों को हैरान और निराश किया है, क्योंकि उन्हें लगता था कि जिन ताकतों ने वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते हुए भ्रष्टाचार किया है अथवा उन्हें प्रश्रय देने का काम किया है, मतदाता उन्हें सजा देंगे। नतीजों से तो नहीं लगता कि मतदाताओं ने एेसे दलों और नेताओं को कोई सीख दी है। कौन नहीं जानता कि पौने दो साल के अल्प समय में साढ़े चार हजार करोड़ का घोटाला करने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री मधु कौड़ा किसकी कृपा से सत्ता में पहुंचे थे? वे निर्दलीय थे। उनके साथ चार और निर्दलीय विधायक थे। कांग्रेस और लालू यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल ने भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के मकसद से मधु कौड़ा को मुख्यमंत्री पद सौगात में सौंप दिया। मुख्यमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति किस हद तक भ्रष्टाचारी हो सकता है, ये मधु कौड़ा के कारनामों ने देश को बताया। वह इस समय जेल की हवा खा रहे हैं। यह इस लोकतंत्र की विसंगतियां हैं या लोगों की मतांधता कि जिस मधु कौड़ा ने लोगों की मेहनत की कमाई को लूटा, उन्हीं लोगों ने उनकी पत्नी गीता कौड़ा को जिताकर विधानसभा भेज दिया है? &lt;br /&gt;इस जनादेश से कुछ अहम सवाल उठे हैं। साढ़े चार हजार करोड़ का भ्रष्टाचार करने वाले को मुख्यमंत्री बनाने का पाप करने वाली पार्टियों को इस चुनाव में मतदाताओं ने किस बात का ईनाम दिया है? कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की सदस्य संख्या इस चुनाव में बढ़ गयी है, हालांकि वे बहुमत के आस-पास भी नहीं हैं और यदि कांग्रेस ने सरकार बनाने की चेष्टा की तो झारखंड मुक्ति मोर्चा के बिना यह संभव नहीं है। जिस शिबू सोरेन को तमाड़ के लोगों ने उप चुनाव में परास्त कर मुख्यमंत्री पद छोड़ने को मजबूर कर दिया था, उन्हें अब इतनी ताकत दे दी है कि उनके बिना कोई सरकार बनाने के बारे में सोच भी नहीं सकता है। यानि सत्ता की चाबी उन गुरू जी के हाथ में है, जो 2005 के विधानसभा चुनाव में नकार दिये गये थे। इसके बावजूद राज्यपाल सिब्ते सजी ने भाजपा गठबंधन के नेता के बजाय उन्हें बुलाकर मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी। न उनके पास बहुमत था और न वे साबित कर सके। लिहाजा, उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। उन्हें हत्या जैसे संगीन आपराधिक मुकदमों की वजह से तीन बार केन्द्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। दो बार मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। और जब राजद व कांग्रेस के कहने पर मधु कौड़ा कुर्सी छोड़नी पड़ी तो उसके पीछे कारण यही गुरू जी महाराज थे। अमेरिका के साथ एटमी करार के विरोध में जब वाम मोर्चा ने डा. मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया तो शिबू सोरेन इस शर्त पर सरकार को समर्थन देने पर राजी हुए थे कि झारखंड में उन्हें कौड़ा के स्थान पर मुख्यमंत्री पद सौंपा जाये। राजद और कांग्रेस ने उनकी शर्त मानी, लेकिन तमाड़ से जब उन्होंने उप चुनाव लड़ा तो इस खुली राजनीतिक सौदेबाजी से नाराज लोगों ने उन्हें सबक सिखा दिया। हारने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा। ताज्जुब की बात है कि साल भर के भीतर ही लोग शिबू सोरेन की करामात को भूल गये और कांग्रेस के इस पाप को भी कि उसने मधु कौड़ा जैसे भ्रष्टाचारी को मुख्यमंत्री बनवाया था।&lt;br /&gt;लगता है, राज्य में अंतरकलह से घिरी भारतीय जनता पार्टी भी लोगों को यह विश्वास दिला पाने में नाकाम सिद्ध हुई कि वह बेहतर, पारदर्शी निर्णय करने वाली, साफ-सुथरी और स्थिर सरकार दे सकती है। भाजपा ने महंगाई, स्थिरता और भ्रष्टाचार को मुख्य मुद्दा बनाया था। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों को एक रुपया किलो गेहूं, 25 पैसे किलो नमक, तीन महीने में राशन कार्ड देने और किसानों को केवल दो प्रतिशत पर ऋण देने के लोकलुभावन वादे करने वाली भाजपा के सदस्यों की संख्या में यदि इस बार कमी आई है तो उसे सोचना होगा कि एेसा क्यों हुआ? यह भाजपा ही नहीं, उसकी सहयोगी जनता दल यू के लिये भी खतरे की घंटी है, क्योंकि बिहार में विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं रह गये हैं। अर्जुन मुंडा का यह बयान बहुत कुछ कहता है कि भाजपा-जदयू अपनी गलतियों की वजह से हारे हैं। कभी भाजपा के कुशल मुख्यमंत्री रहे बाबू लाल मरांडी ने इस चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाया। इसका लाभ उन्हें भी मिला और कांग्रेस को भी। &lt;br /&gt;इसमें अब किसी को शक नहीं है कि झारखंड एक बार फिर अस्थिरता की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। जिन शिबू सोरेन से इस चुनाव में कांग्रेस ने गठबंधन तक करना मुनासिब नहीं समझा, उनके बिना वह किसी सरकार की कल्पना भी नहीं कर सकती। शिबू सोरेन ने अभी कुछ ही दिन पहले बोकारो में कहा था कि सत्ता की चाबी उनके हाथ में रहने वाली है। उनका यह राजनीतिक आत्मविश्वास सही साबित हुआ। अगले कुछ दिनों में यदि गुरूजी फिर झारखंड की कमान संभालते हुए दिखाई दें तो आश्चर्य नहीं करिएगा। उनकी पार्टी को 81 के सदन में एक चौथाई सीटें भी नसीब नहीं हुई हैं, लेकिन यही हमारे इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी खामी है कि चंद सांसदों के बल पर चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बन जाते हैं। चार निर्दलियों के साथ मधु कौड़ा पौने दो साल तक मुख्यमंत्री बने रहकर हजारों करोड़ का घोटाला करने में कामयाब हो जाते हैं। ऐसे में यदि झामुमो नेता सोरेन फिर कांग्रेस और दूसरे दलों की कृपा से मुख्यमंत्री बनते हैं तो कैसा आश्चर्य? इन हालातों के लिये बहुत हद तक खुद झारखंड के लोग ही जिम्मेदार हैं, जो खंडित जनादेशों के फलस्वरूप बन और बिगड़ रही सरकारों और पनप रहे भ्रष्टाचार से कोई सबक लेने को तैयार ही नहीं दिख रहे। &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-7027421836312597624?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/7027421836312597624/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=7027421836312597624' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/7027421836312597624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/7027421836312597624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/12/blog-post_23.html' title='किस्मत खराब है झारखंड की !'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SzJKf73_62I/AAAAAAAAApU/p5qTttsSVUc/s72-c/shibu%5B1%5D.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-413465195390392772</id><published>2009-12-13T00:18:00.003+05:30</published><updated>2009-12-13T00:36:07.029+05:30</updated><title type='text'>क्यों जरूरी हैं नए, छोटे राज्य</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SyPpbhN7uVI/AAAAAAAAAok/gwwQfCAWmtQ/s1600-h/FI1768521_1E.gif"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 302px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SyPpbhN7uVI/AAAAAAAAAok/gwwQfCAWmtQ/s320/FI1768521_1E.gif" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5414427836012018002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;तेलंगाना राज्य की मांग मानकर लगता है, केन्द्र ने बर्र के छत्ते में हाथ में डाल दिया है। आंध्र प्रदेश की राजनीति में तो भूचाल आ ही गया है, हरित प्रदेश, बुंदेलखंड, पूर्वाचल, महाकौशल, विंध्याचल, ग्रेटर कूचविहार, गोरखालैंड, कोच राजभोगसी मातृभूमि, बोड़ोलैंड, सौराष्ट्र, विदर्भ, रायलसीमा, त्रवणकौर, कुर्ग, तुल्लुनाडु, लद्दाख और पानून सहित देश के विभिन्न हिस्सों में अट्ठारह नये राज्यों की मांग के समर्थन में चलते रहे आंदोलनों के फिर से जोर पकड़ने की आशंका उत्पन्न हो गयी है। गोरखालैंड के लिए जहां अनशन शुरू हो गया है, वहीं अजित सिंह ने शीतकालीन सत्र के बाद हरित प्रदेश के लिए व्यापक आंदोलन छेड़ने का एेलान कर दिया है। आंध्र प्रदेश में टीडीपी और प्रजा राज्यम पार्टी तो तेलंगाना के विरोध में सड़कों पर आ ही गयी हैं, कांग्रेस के भीतर से भी विरोध के स्वर तेज हो गये हैं। के चंद्रशेखर राव के आमरण अनशन से घबरायी केन्द्र सरकार ने अलग तेलंगाना गठित करने की प्रक्रिया शुरू करने का एेलान तो कर दिया है, लेकिन लगता है कि वह बुरी तरह फंस गयी है। हालात इतने विषम हो चले हैं कि उसकी आंध्र प्रदेश की सरकार शहीद भी हो सकती है।  दिवंगत राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगन मोहन रेड्डी के रोसैया को मुख्यमंत्री के रूप में पचा नहीं पा रहे हैं. पहले विधायकों के इस्तीफों का नाटक हुआ और अब बीस मंत्रियों ने भी अपने त्यागपत्र सौंप दिए हैं. कांग्रेस हाई कमान को सीधा सन्देश है कि आन्ध्र में वाही होगा जो राजशेखर रेड्डी का परिवार चाहेगा. संकट गहरा है. यही वजह है कि शनिवार को प्रणब मुखर्जी ने जगन मोहन रेड्डी से बात की और पार्टी नात्रत्व की नाराजगी से उन्हें अवगत करा दिया. &lt;br /&gt;नये राज्यों के गठन की मांग को लेकर आंदोलन चलाने वालों के जो तर्क हैं, उन्हें आप खारिज नहीं कर सकते। भारत की आबादी 115 करोड़ से ऊपर पहुंच रही है। प्रदेश हैं कुल पैंतीस। इनमें 28 राज्य हैं और सात केन्द्र शासित प्रदेश। इनमें कई राज्य तो क्षेत्रफल और जनसंख्या के मामले में दुनिया के साठ देशों से भी बड़े हैं। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या सोलह करोड़ को पार कर चुकी है। राजस्थान की आबादी करीब 6 करोड़ है। बिहार और पश्चिम बंगाल की आठ करोड़ से अधिक। तमिलनाड़ु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात छह करोड़ से अधिक की आबादी वाले राज्य हैं। इसके विपरीत पुंडुचेरी, लक्ष्यदीप, दमन और दीव, दादरा नगर हवेली, चंडीगढ़, अंडमान निकोबार द्वीप समूह, उत्तराखंड, त्रिपुरा, सिक्किम, मिजोरम, मणिपुर और गोवा दस से अधिक राज्य एेसे हैं, जिनकी जनसंख्या एक करोड़ भी नहीं है। बड़े राज्यों में कई तरह की समस्याएं हैं। बेरोजगारी, कानून व्यवस्था और न्याय व्यवस्था ही नहीं, शासन-प्रशासन के स्तर पर भी फैसले लेने और हर क्षेत्र के संतुलित विकास में साफ-साफ झोल दिखायी देते हैं। &lt;br /&gt;अमेरिका की जनसंख्या दुनिया की कुल जनसंख्या का केवल पांच प्रतिशत है, लेकिन वहां साठ के करीब राज्य हैं। भारत की जनसंख्या दुनिया की कुल जनसंख्या की सत्रह प्रतिशत है, लेकिन यहां केवल पैंतीस राज्य हैं। दर्जनों राज्यों में जनसंख्या का घनत्व कहीं ज्यादा है। वहां कई तरह की समस्याएं खड़ी होनी शुरू हो चुकी हैं। एक-दो राज्यों को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो अधिकांशत: यह देखने में आया है कि छोटे राज्यों के विकास तेज गति से होते हैं। मौजूदा राज्यों में हरियाणा को आदर्श राज्य के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि भौगोलिक रूप से इसे दिल्ली के पास होने और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा करीब होने का सीधा लाभ भी मिला है, लेकिन नक्चसल प्रभावित राज्यों को छोड़ दें तो बाकी छोटे राज्यों में आमतौर पर असंतुलित विकास और समस्याओं की अनदेखी करने के आरोप सुनने में कम ही आते हैं। &lt;br /&gt;यह सही है कि कई क्षेत्रों में राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की मंशा से भी नये राज्यों के गठन की मांग को लेकर आंदोलन हुए हैं, लेकिन इसे दूसरे नजरिये से देखने की जरूरत है। बदले हुए हालातों में छोटे राज्यों के महत्व और जरूरत को बहुत देर तक टाला नहीं जा सकेगा। देश के विभिन्न भागों में करीब डेढ़ दर्जन नये राज्यों की मांग इस समय चल रही है। तेलंगाना की घोषणा के बाद आंध्र प्रदेश में इसके समर्थन और विरोध में जिस तरह के हालात उत्पन्न हो गये हैं, हो सकता है उस पर थोड़ा पानी डालने के मकसद से ही कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने नये राज्यों के लिये राज्य पुर्नगठन आयोग बनाने की जरूरत बतायी हो, लेकिन यह हकीकत है कि इसका गठन अविलंब होना चाहिए, जो देखे कि कहां-कहां नये राज्यों का गठन जरूरी है। देश के अट्ठारह क्षेत्रों में यदि सरकारें आंदोलनों का सामना करेंगी तो स्वाभाविक है, वहां तमाम तरह के विकास कार्य सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। &lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-413465195390392772?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/413465195390392772/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=413465195390392772' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/413465195390392772'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/413465195390392772'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='क्यों जरूरी हैं नए, छोटे राज्य'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SyPpbhN7uVI/AAAAAAAAAok/gwwQfCAWmtQ/s72-c/FI1768521_1E.gif' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2170061899714211706</id><published>2009-11-30T19:59:00.002+05:30</published><updated>2009-11-30T20:15:27.978+05:30</updated><title type='text'>भारत की सुरक्षा चिंताएं कायम</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SxPabMs-QnI/AAAAAAAAAoY/2l19I03Dlcg/s1600/Sucurity+in+india.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 235px; height: 276px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SxPabMs-QnI/AAAAAAAAAoY/2l19I03Dlcg/s320/Sucurity+in+india.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5409907738203275890" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले को एक साल हो गया है। इस बीच कोई बड़ी वारदात नहीं हुई, तो क्या यह मान लेना सही होगा कि भारत अब सुरक्षित है? यह सही है कि पहले के मुकाबले गृह मंत्रालय ज्यादा चुस्त-चौकस नजर आ रहा है। केन्द्र और राज्यों के बीच बेहतर तालमेल और सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है। सूचनाओं पर त्वरित कार्रवाई भी होती दिख रही है। केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन कर दिया है। अवैध  गतिविधि निरोधक अधिनियम को और कड़ा बना दिया गया है। समुद्री किनारों की सुरक्षा चाक चौबंद कर दी गई है, लेकिन क्या इतने भर से यह मान लेना सही होगा कि खतरा टल गया है और अब आतंकवादी वारदातें नहीं होंगी? भारतीय निजाम को न तो इस तरह की खुशफहमी पालनी चाहिए और अच्छी बात यह है कि उसने पाली भी नहीं है। अभी बहुत से मोर्चे हैं, जिन पर काम करने की जरूरत है। हमारे सुरक्षा और खुफिया तंत्र में भारी खामियां हैं, जिन्हें जल्द से जल्द दूर करना होगा। राज्य सरकारों को और संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से काम करना होगा। &lt;br /&gt;सुरक्षा विशेषज्ञों का यह मानना है कि विगत एक साल में यदि आतंकवादी कोई संगीन वारदात नहीं कर पाए हैं, तो इसकी वजह कुछ हद तक सरकारी चौकसी है और बड़ा कारण पाकिस्तान के अंदरूनी हालात हैं। आईएसआई, वहां की सेना के भारत विरोधी मानसिकता के अफसर और सरकार जेहादियों से जूझ रहे हैं। लगभग प्रतिदिन वहां किसी न किसी शहर में बड़ी आतंकवादी वारदात हो रही है, जिनमें बेकसूर लोग मारे जा रहे हैं। सेना, पुलिस, अधिकारी और नेता उन जेहादियों के निशाने पर हैं जो अपने अस्तित्व की जंग लड़ रहे हैं। पहले जम्मू-कश्मीर और भारत उनके एजेंडे में पहले स्थान पर थे, अब वे थोड़ा नीचे खिसक गए हैं। वेद मारवाह ने हाल में एक पत्रिका से कहा कि भारत से खतरा टला नहीं है। वहां जंग जीतने या हारने की सूरत में उनकी बंदूकों की नाल भारत की ओर होंगी। उनका जाल और ढांचा बरकरार है। &lt;br /&gt;सवाल है कि यदि खतरा कम नहीं हुआ है तो क्या हमारी सुरक्षा-खुफिया एजेंसियां और सरकारें पहले के मुकाबले एेसे हालातों का सामना करने के लिए बेहतर तैयारियों के साथ कमर कसकर तैयार हैं? जवाब है-नहीं। यह सही है कि गृह मंत्री के तौर पर पी चिदम्बरम के काम-काज ने माहौल बदला है, लेकिन क्चया हर स्तर पर अधिकारी उतनी ही मुस्तैदी से सुरक्षा को चाक-चौबंद करने में जुटे हैं? यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की सुरक्षा को अब बाहर से नहीं, भीतर से भी गंभीर खतरा उत्पन्न होता दिख रहा है। नक्सली आंदोलन अब असहनीय हिंसा के रास्ते पर बढ़ चुका है। जो लोग अब तक इसे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्या बताकर नक्सलियों से वार्ता शुरू कर उन्हें विकास की मुख्य धारा में वापस लाने की पैरवी करते थे, उनके माथे पर शिकन नजर आने लगी है। 1967 में बहुत छोटे से क्षेत्र से शुरू हुआ नक्सलबाड़ी आंदोलन देखते देखते बीस राज्यों तक विस्तार पा चुका है। जाहिर है, अब नक्सलवादी कानून-व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर सरेआम सत्ता को चुनौती देने लगे हैं। &lt;br /&gt;यह सही है कि सीमा पार के आतंकवाद में कमी आई है। इसकी वजह भारत की ओर से शुरू की गई कूटनीतिक लड़ाई भी है। पाकिस्तान के अंदरूनी हालात भी और उस पर अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का दबाव भी, लेकिन यह हालत हमेशा रहने वाली नहीं है। पाकिस्तानी हकूमत कश्मीर का राग अभी भी पहले की तरह अलाप रही है। वहां के कुछ सिरफिरे मंत्री अब भी आतंकवादियों की करतूत को जेहाद बताकर आग से खेलने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए भारत को वे तमाम सुरक्षा उपाय करने ही होंगे, जिनसे अतंकवादियों की घुसपैठ रुके। घुसपैठ कर भी जाएं तो वारदात नहीं करने पाएं। कर दें तो जल्द से जल्द उन्हें कठोर सजा मिले। इसके लिए कड़े कानून बनाने, सुरक्षा-खुफिया एजेंसियों को चाक चौबंद करने, सरकारों की एप्रोच में बुनियादी अंतर लाने और खासकर सुरक्षा तंत्र को जवाबदेह बनाने की जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2170061899714211706?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2170061899714211706/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2170061899714211706' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2170061899714211706'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2170061899714211706'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/11/blog-post_30.html' title='भारत की सुरक्षा चिंताएं कायम'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SxPabMs-QnI/AAAAAAAAAoY/2l19I03Dlcg/s72-c/Sucurity+in+india.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-8922477377527734661</id><published>2009-11-27T18:02:00.005+05:30</published><updated>2009-11-27T18:15:04.437+05:30</updated><title type='text'>अमेरिका और चीन लें जिम्मेदारी</title><content type='html'>त्निनिदाद में राष्ट्रमंडल देशों के नेताओं का सम्मेलन एेसे समय हो रहा है, जब अगले महीने होने जा रहे कोपनहेगन सम्मेलन की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। कोपहेगन में जलवायु परिवर्तन पर गंभीर मंत्रणा होने और कुछ अहम फैसले लिये जाने की संभावना है। हालाँकि जानकार इस तरह के दावों को संदेह की द्रष्टि से  देख रहे हैं &lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Sw_Hf7kuAbI/AAAAAAAAAoQ/KdwwXv1hUrw/s1600/global+warming+.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 265px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Sw_Hf7kuAbI/AAAAAAAAAoQ/KdwwXv1hUrw/s320/global+warming+.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5408761028876829106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;त्रिनिदाद सम्मेलन का ध्यान भी पूरी तरह जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित रहने की संभावना है। इस सम्मेलन का महत्व इस कारण भी बढ़ गया है क्योंकि यह 53 देशों वाले राष्ट्रमंडल संगठन की स्थापना की 60वीं वर्षगांठ पर हो रहा है। प्रधानमंत्नी मनमोहन सिंह अपने अमेरिका दौरे के बाद त्निनिदाद में पोर्ट आफ़ स्पेन पहुँच चुके हैं। माना जा रहा है कि कोपनहेगेन में जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा से पहले ये जलवायु परिवर्तन संबंधित मुद्दों पर सहमति बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। इसमें राष्ट्रमंडल से बाहर के देशों के अहम नेताओं को भी आमंत्नित किया गया है। इनमें संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून, फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी और डेनमार्क के प्रधानमंत्नी लार्स लेक रास्मुसिन शामिल हैं। &lt;br /&gt;ब्रिटेन के प्रधानमंत्नी गार्डन ब्राउन ने उम्मीद जाहिर की है कि यह कोपनहेगेन सम्मेलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। हालांकि पयर्वेक्षकों का साफ कहना है कि इस सम्मेलन में भी ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन के लिए जि़म्मेदार देशों और छोटे विकासशील देशों के बीच की खाई और मतभेदों को पाटना मुश्किल होगा। कोपनहेगेन सम्मेलन से भी हालांकि बहुत ज्यादा उम्मीदें लोग नहीं लगा रहे हैं क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी का कहना है कि कोपेनहेगन में ऐसी कोई संधि नहीं होने जा रही है जो कानूनी रुप से बाध्यकारी हो। हालांकि जलवायु परिवर्तन पर एक राजनीतिक सहमति बन सकती है जो अगले कुछ महीनों में क़ानूनी संधि के लिए रास्ता बनाए। विकासशील देश और पर्यावरण कार्यकर्ता इस देरी से नाराज हैं और कह रहे हैं कि इससे धनी देशों की छवि पर नाकारात्मक असर पड़ रहा है। कोपनहेगन सम्मेलन का महत्व इस कारण बढ़ गया है क्चयोंकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इसमें शामिल होने का एलान किया है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि चीनी राष्ट्रपति वहां पहुंचेंगे या नहीं। ये ही दोनों देश ग्रीनहाऊस गैसों का सर्वाधिक उत्सर्जन करते हैं। अमेरिका ने घोषणा की है कि वो कई चरणों में ग्रीनहाउस गैसों से होने वाला उत्सर्जन कम करेगा और इसकी शुरुआत 2020 तक 17 फ़ीसदी की कटौती से की जाएगी। यह पहला मौका है जब अमेरिका ने कोई लक्ष्य निर्धारित किया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-8922477377527734661?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/8922477377527734661/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=8922477377527734661' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8922477377527734661'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8922477377527734661'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='अमेरिका और चीन लें जिम्मेदारी'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Sw_Hf7kuAbI/AAAAAAAAAoQ/KdwwXv1hUrw/s72-c/global+warming+.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2384473053437405278</id><published>2009-11-25T16:00:00.002+05:30</published><updated>2009-11-25T16:24:36.617+05:30</updated><title type='text'>क्या हमने 26/11 से कुछ सीखा</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Sw0M0RCEM5I/AAAAAAAAAmo/xhDWV56XpSA/s1600/Taz+Hotal.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 222px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Sw0M0RCEM5I/AAAAAAAAAmo/xhDWV56XpSA/s320/Taz+Hotal.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5407992819606631314" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पिछले साल बुधवार 26/11 &lt;/strong&gt;की उस स्याह और खौफनाक रात को कैसे भुलाया जा सकता है। मुंबई पर हुए आतंकी हमले को भारतीय कभी नहीं भुला सकेंगे। समुद्री रास्ते से कराची से मुंबई पहुंचे दस आतंकवादियों अजमल आमिर कसाब, इस्माइल खान, हफीज अरशद, जावेद, नजीर, शोएब, नासिर, बाबर रहमान, अब्दुल रहमान और फराहदुल्ला ने छत्रपति शिवाजी टर्मिनल (सीएसटी), लियोपोल्ड कैफे, नरीमन हाउस, होटल ट्राइडेंट आबेराय और होटल ताज में जो नरसंहार किया, उसके जख्म अभी तक भी हरे हैं। जांच-पड़ताल और जीवित पकड़े गए अजमल कसाब से हुई पूछताछ से यह साबित हो चुका है कि भारत को दहला देने वाले इस सुनियोजित षड़यंत्र के तार सीधे पाकिस्तान से जुड़े थे। वहीं से मोबाइल फोनों पर आतंकवादियों के आका उन्हें संचालित कर रहे थे। आतंकियों की क्रूरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि 60 घंटे तक चली वारदात में 173 लोगों को अपने बहुमूल्य जीवन से हाथ धोना पड़ा। इनमें पुलिस अफसर, कमांडो, होटल कर्मचारी, उनके परिजन और अन्य नागरिकों के अलावा कई विदेशी मेहमान शामिल थे। यह सही है कि इस घटना ने भारतीय सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों को कई सीख दी है। सरकार ने इस तरह की वारदातों की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए कई कदम भी उठाए हैं, लेकिन इस घटना के एक साल पूरा होने के बाद यह सवाल जरूर उठ रहा है कि इतनी खौफनाक वारदात के बाद भी क्या हालात बदले हैं। क्या हम लोगों ने कुछ सीखा है। क्या आम भारतीय पहले के मुकाबले अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। क्या मुंबई जैसे  हमलों का खतरा टल गया है। क्या सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के तौर-तरीकों में अंतर आया है?&lt;br /&gt;यह सही है कि 26 नवम्बर 2008 के बाद मुंबई जैसी बड़ी आतंकवादी वारदात देश में नहीं हुई है और इस बीच सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों ने आतंकवादियों को पहले ही दबोचकर कई षड़यंत्रों को विफल करने में सफलता प्राप्त की है, लेकिन न तो सीमा पार से घुसपैठ में कमी आई है और न ही छिटपुट वारदातें बंद हो रही हैं। यह सही है कि केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच तालमेल और सूचनाओं का आदान-प्रदान बढ़ा है। केन्द्रीय खुफिया तंत्र की सूचनाओं पर अब राज्य उतनी लापरवाही भी नहीं दिखा रहे हैं, जैसी पहले दिखाते थे। इस बीच केन्द्र ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी का गठन किया गया है। देश के समुद्री किनारों की सुरक्षा चाक-चौबंद करने के लिए सैंकड़ों चौकियां बनाई जा रही हैं। समुद्री मार्गो की निगरानी के लिए हवाई बेड़े को लगाया गया है, लेकिन जहां तक आम आदमी और उसकी सुरक्षा का सवाल है, वह अभी भी भगवान भरोसे ही है। मीडिया के जरिए सरकार भले ही यह दिखावा करे कि वह पूरी तरह सजग और चाक-चौबंद है परन्तु वस्तुस्थिति यही है कि मुंबई जैसे &lt;br /&gt;हमलों के बाद सरकार में बैठे लोगों की सुरक्षा का ताम-झाम जरूर बढ़ जाता है-आम आदमी की हालत जस की तस रहती है। त्योहारों, विशेष अवसरों को छोड़ दें तो न सुरक्षा एजेंसियां रूटीन में रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, होटलों, धर्मशालाओं आदि की चैकिंग करती हैं और न ही उन्हें इस सबकी चिंता है। &lt;br /&gt;खुद प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी चिदम्बरम हाल में कह चुके हैं कि सीमा पार बैठे षड़यंत्रकारी फिर मुंबई जैसे हमलों की साजिशों को अंजाम देने की फिराक में हैं। प्रधानमंत्री ने वाशिंगटन में भी कहा है कि पाकिस्तान मुंबई हमलों की जांच में सहयोग नहीं कर रहा और उससे तब तक बातचीत संभव नहीं है, जब तक वह हाफिज सईद और इस वारदात से जुड़े दूसरे तमाम चेहरों को गिरफ्तार कर सजा नहीं दे देता। इन बयानों से साफ है कि तमाम कोशिशों के बावजूद भारतीय निजाम पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव बना पाने में नाकाम रहा है। यहां तक कि विश्व भर से आतंकवाद का सफाया करने का दम भरने वाले अमेरिका पर भी भारत सरकार यह दबाव बनाने में विफल रही है कि वह अपने प्रभाव का उपयोग कर पाकिस्तान पर निर्णायक दबाव बनाए। &lt;br /&gt;जहां तक आतंकवादी वारदातों से निपटने के लिए किए जा रहे इंतजामों का सवाल है, वे भी अपर्याप्त हैं। केन्द्र ने मुंबई, कोलकाता, चैन्नई और हैदराबाद में एनएसजी के नए हब बनाने का एेलान किया है, जिनमें से प्रत्येक में 240 कमांडों रहेंगे। इस तरह की व्यवस्था असम, कश्मीर और दूसरे पूर्वात्तर राज्यों में नहीं की जा रही है, जबकि वहां आतंकवादी वारदातें होती ही रहती हैं। एनएसजी और दूसरे सुरक्षा बलों को उस तरह के हथियार, बुलेट प्रूफ जकेट और हैलीकाप्टर आदि उपलब्ध नहीं कराए जा सके हैं, जैसे अमेरिका और कुछ अन्य पश्चिमी देशों की सुरक्षा एजेंसियों के पास हैं। यह सर्वविदित है कि दिल्ली के मानेसर से मुंबई पहुंचने में एनएसजी को पूरी रात ही लग गई थी। उन्हें समय से विमान भी उपलब्ध नहीं कराया जा सका था। हमारी सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य, चुस्त-चौकस और तैयारी में होती तो अव्वल तो दस हथियारबंद आतंकवादी समुद्री रास्ते से देश में प्रवेश ही नहीं कर पाते और पांच जगहों पर तबाही की इबारत लिखने की मंशा से घुस भी गए थे तो साठ घंटे तक एके 47 और हैंड ग्रेनेडों से मौत और तबाही का वह खेल नहीं खेल पाते। &lt;br /&gt;यह तथ्य किसी से छिपे नहीं हैं कि हमारे यहां सुरक्षा बेड़े की हालत कितना खस्ता है। भारतीय पुलिस सेवा में साढ़े पांच सौ से अधिक अधिकारियों की कमी है। राज्य पुलिस सुधारों को लागू करने के लिए तैयार नहीं हैं। पुलिस के आधुनिकीकरण की मुहिम जिस तेजी से आगे बढ़नी चाहिए थी, नहीं बढ़ पा रही है। बदले हुए हालातों में जिस तरह के प्रशिक्षण की जरूरत है, वैसा सुरक्षा बलों को नहीं दिया जा रहा। यही हालत न्याय व्यवस्था की है। राज्य सरकारें मुकदमों के भारी ढेर को कम करने की दिशा में गंभीर दिखाई नहीं देती। जितनी अदालतों, जजों, बुनियादी ढांचे की जरूरत है, उनके आधे से काम चलाने की कोशिशें हो रही हैं। इस वजह से आतंकवादियों और गंभीर वारदातों के अपराधियों तक को जल्द समय रहते सजा नहीं मिल पाती है. न्याय के लिए पीड़ितों को कई कई साल तक भटकना पड़ता है.&lt;br /&gt;यह सही है कि पी चिदम्बरम ने गृह मंत्रालय को सक्रिय कर दिया है। अब खुफिया अधिकारियों की प्रतिदिन बैठक होती है और राज्यों को जो सूचनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, उनके रिमाइंडर भी भेजे जाने लगे हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। यह सोचकर इतराने से काम नहीं चलेगा कि मुस्तैदी के कारण आतंकवादी मुंबई के बाद वैसा हमला करने में नाकाम रहे हैं। राज्यों पर इसके लिए दबाव बनाना होगा कि वे अपने सुरक्षा और खुफिया तंत्र को सुदृढ़ और जवाबदेह बनाएं। खाली पदों को भरें। पुलिस तंत्र को सक्षम बनाएं। उन्हें अत्याधुनिक शस्त्रों से लैस करें। मुंबई हमले के समय विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय का जो अभाव दिखाई दिया था, उसके कारणों को समझते हुए उसे ठीक करें और छोटी से छोटी सूचना पर त्वरित कार्रवाई करने की कार्य संस्कृति विकसित करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2384473053437405278?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2384473053437405278/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2384473053437405278' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2384473053437405278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2384473053437405278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/11/2611.html' title='क्या हमने 26/11 से कुछ सीखा'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Sw0M0RCEM5I/AAAAAAAAAmo/xhDWV56XpSA/s72-c/Taz+Hotal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-8075518724737486049</id><published>2009-09-20T17:51:00.004+05:30</published><updated>2009-09-20T18:04:23.697+05:30</updated><title type='text'>थरूर जैसों को मंत्री होना चाहिए ?</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SrYhDQnF_OI/AAAAAAAAAmg/QtFv8AZgQY8/s1600-h/triple_tharoor.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 216px; height: 298px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SrYhDQnF_OI/AAAAAAAAAmg/QtFv8AZgQY8/s320/triple_tharoor.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5383526744450268386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;शशि थरूर &lt;/strong&gt; का नाम तो आप जानते होंगे? वही, थरूर जो सयुंक्त राष्ट्र महासभा में 2006 तक उप सचिव के पद पर रहे और कोफी अन्नान रिटायर हो रहे थे तो नए महासचिव पद के लिए हुए चुनाव में जिन्हें भारत ने अपनी ओर से उम्मीदवार बनाया। जो बान की मून से हार गए। अब भी नहीं समङों हों तो बता दें कि आजकल ये महाशय भारत सरकार में विदेश राज्य मंत्री हैं। यूएन से भारत लौटे तो कांग्रेस ने उन्हें केरल से लोकसभा का टिकट थमा दिया। वे जीतकर आए तो जैसे मंत्री पद उनकी राह देख रहा था। आमतौर पर पहली बार के सांसद को मंत्री पद नहीं मिलता लेकिन चूकि उनका प्रोफाइल बड़ा ही समृद्ध था, इसलिए मनमोहन सरकार में शपथ लेने के लिए उन्हें पापड़ भी नहीं बेलने पड़े। &lt;br /&gt;उन्हीं लेखक, राजनयिक, राजनीतिक और मंत्री महोदय ने ट्वीटर पर एक पत्रकार के सवाल के जवाब में कहा कि विमान के इकोनोमी क्लास में यात्रा करने वाले लोग मवेशी यानि जानवर की तरह होते हैं। शायद उन्हें इसका इल्म नहीं था कि उनकी यह अभद्र टिप्पणी उनके आगे के करियर पर विराम भी लगा सकती है। जब उन्होंने टिप्पणी की, उसके दो दिन पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मुंबई गई तो विमान की इकोनोमी क्लास में बैठकर और लौटी भी उसी क्लास में। राहुल गांधी ने भी नई दिल्ली से लुधियाना तक की यात्रा स्वर्ण शताब्दी एक्सप्रेस से की। यानि सोनिया और राहुल ने मवेशियों की तरह विमान और ट्रेन में सफर किया। &lt;br /&gt;शशि थरूर के इस दंभपूर्ण वाहियात बयान से देश भर से तीखी प्रतिक्रिया आई हैं। खुद कांग्रेस के कई नेता उबल पड़े हैं। उन्हें लगता है कि थरूर ने सोनिया और राहुल गांधी का अपमान किया है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने थरूर से इस्तीफे की मांग की है तो पार्टी प्रवक्ता जयंती नटराजन ने इस टिप्पणी को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया है। मनीश तिवारी ने कहा है कि पार्टी उचित समय पर थरूर के खिलाफ कार्रवाई करेगी। दिल्ली के दो आलीशान पांच सितारा होटलों में तीन महीने तक रहने का रिकार्ड जिन दो मंत्रियों ने कायम कर करोडो़ रुपया खर्च किया है, उनमें शशि थरूर भी हैं। वे और विदेश मंत्री एसएम कृष्णा फाइव स्टार होटलों में डेरा जमाए हुए थे। यह मामला मीडिया में तब उछला जब वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने प्रेस के सामने इन दोनों को सलाह दी कि वे या तो अपने आवासों में जाएं या फिर हैदराबाद हाउस के अतिथि गृह में चले जाएं। इन्हें होटलों से जाना पड़ा। प्रणब दा ने मंत्रियों को यह सलाह भी दी थी कि मंदी के दौर को देखते हुए मंत्री पांच सितारा होटलों में कार्यक्रम वगैरा न रखें और बिजनेस क्लास के बजाय विमान की इकोनोमी क्लास में यात्रा करें। कई मंत्रियों ने उस समय इस पर नाक-भौं भी सिकोड़ी। &lt;br /&gt;इस तथ्य का खुलासा बाद में हुआ कि प्रणब मुखर्जी ने दरअसल, प्रधानमंत्री डा.मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की हिदायतों के बाद ही मीडिया के सामने इन मंत्रियों को सलाह दी थी ताकि इनके साथ-साथ दूसरे शाहखर्च मंत्रियों को भी संदेश चला जाए। प्रणब मुखर्जी एेसे मंत्रियों को सलाह देने तक सीमति नहीं रहे। पिछले सप्ताह वे कोलकाता गए तो सामान्य व्यवसायिक विमान की इकोनोमी क्लास में बैठकर। मनमोहन सिंह, सोनिया और राहुल को इसकी भनक लग गई थी कि कुछ मंत्रियों ने खर्चो में कटौती करने की उनकी मुहिम का विरोध किया है। संभवत: एेसे लोगों को नसीहत देने के लिए ही सोनिया ने मुंबई तक का सफर यात्री विमान की इकोनोमी क्लास में किया, जबकि सुरक्षा कारणों से एसपीजी, आईबी और दूसरी एजेंसियां उन्हें सलाह देती रही हैं कि वे विशेष विमान से ही यात्रा करें ताकि खतरे को कम किया जा सके।&lt;br /&gt; थरूर की कौन सी ग्रन्थी ने उन्हें इतनी अभद्र टिप्पणी के लिए प्रेरित किया, यह तो वही जानें, लेकिन इससे उठे बवाल ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सोनिया और राहुल उनकी हिमाकत से नाराज हैं। इसकी जानकारी मिलते ही न केवल उन्होंने बयान पर माफी मांगी बल्कि माफी मांगने के लिए शुक्रवार को सोनिया गांधी के आवास भी पहुंच गए। जाहिर है, उनकी कोशिश मंत्री पद बचाने की है। कांग्रेस ने संकेत दिए हैं कि शशि थरूर को माफ नहीं किया जाएगा और देर-सबेर उन्हें मंत्री पद से जाना होगा।  &lt;br /&gt;यहां सवाल यह उठता है कि लंदन में जन्मे, पढ़े-लिखे और 28 साल तक संयुक्त राष्ट्र महासभा यानि विदेश में ही नौकरी करने वाले शशि थरूर को भारत और यहां के नागरिकों, उनकी समस्याओं, माली हालत और जमीनी वास्तविकताओं की कितनी समझ है? अगर यह सब भी नहीं हो तो कम से कम उन्हें इसका ज्ञान तो होना ही चाहिए कि इस देश की एक सौ बीस करोड़ में से सौ करोड़ जनता तो विमानों में भी यात्रा नहीं करती है। वह तो ट्रेन, बसों, तांगों, ट्रकों वगैरा में ही सफर करती है। सवाल है कि जिस व्यक्ति को भारत जैसे गरीब देश की दशा और दिशा की जानकारी तक नहीं है, उसे मंत्री किसने बनाया है? उसी कांग्रेस ने न जो अपना हाथ आम आदमी के साथ बताकर वोट लेती रही है? तो दोषी कौन है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-8075518724737486049?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/8075518724737486049/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=8075518724737486049' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8075518724737486049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8075518724737486049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/09/blog-post_20.html' title='थरूर जैसों को मंत्री होना चाहिए ?'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SrYhDQnF_OI/AAAAAAAAAmg/QtFv8AZgQY8/s72-c/triple_tharoor.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-7296849837314094033</id><published>2009-09-11T13:02:00.003+05:30</published><updated>2009-09-11T13:18:25.169+05:30</updated><title type='text'>जेट के लिए ये शुभ संकेत नहीं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqoAgDFziQI/AAAAAAAAAmQ/_p38ePU_sxU/s1600-h/jet.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 195px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqoAgDFziQI/AAAAAAAAAmQ/_p38ePU_sxU/s320/jet.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5380113255432947970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लगता है कि भारत की निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी एयरलाइंस जेट एयरवेज में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कभी प्रबंधन उन्नीस सौ कर्मचारियों की छंटनी का एेलान कर असंतोष को दावत देता है तो कभी अचानक सूचना मिलती है कि चार सौ से अधिक पायलट स्वास्थ्य खराब होने के कारण एक साथ छुट्टी पर चले गए हैं। एयरलाइंस के एक बड़े अधिकारी ने हाल में हैदराबाद में स्वीकार किया कि यात्रियों की संख्या में 20 से 25 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। मंदी और फ्यूल में बारह प्रतिशत की बढ़ोत्तरी का बहाना बनाकर एयरलाइंस इसी साल जून में घरेलू उड़ानों में किरायों में वृद्धि कर ही चुकी है। जेट एयरवेज कंपनी के साठ वर्षीय चेयरमैन नरेश गोयल का नागरिक उड्डयन क्षेत्र में अड़तीस वर्ष का अनुभव है। कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अवार्ड उनके नाम हैं। जेट एयरवेज को दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली एयर लाइंस का रुतबा हासिल है। 1993 में जेट के पहले विमान ने उड़ान भरी थी और निसंदेह इस सोलह साल के सफर में इसने कई आयाम स्थापित किए। एक सौ सात विमानों के बेड़े के साथ जेट एयरवेज रोजाना 65 शहरों के लिए तीन सौ तीस उड़ानें भरता है। न्यूयार्क, बैंकाक, सिंगापुर, लंदन सहित सोलह विदेशी शहरों तक भी जेट की उड़ानें उपलब्ध हैं। जाहिर है, विश्व स्तरीय सेवा उपलब्ध कराने के उसके दावे को देखते हुए ही सरकार ने उसे इतनी ऊंची उड़ान भरने के लिए लाइसैंस जारी किए, लेकिन अहम सवाल यही खड़ा हो रहा है कि क्चया जेट एयरवेज वे उच्च मानदंड बनाए रखने में सफल रही है, जिसके वह दावे करती है? जेट के विमानों में यात्रा करने वाले अधिकांश यात्रियों के हाल के महीनों के अनुभव कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। चाहे टिकट बुकिंग का मसला हो, पैसे वापस लौटाने का, फ्लाइट कैंसिंल होने की सूरत में यात्रियों को होटलों आदि में ठहराने की व्यवस्था का अथवा फ्लाइट के संबंध में महत्वपूर्ण सूचनाएं देने का, जेट का हाल सरकारी एयरलाइंस से भी बदत्तर नजर आने लगा है। &lt;br /&gt;घरेलू उड़ानों में यदि जेट यात्रियों की पहली पसंद बनी तो इसकी कुछ पुख्ता वजहें रहीं। आरामदेह यात्रा के मामले में किंगफिशर ने भी अपना विशेष स्थान बनाया है लेकिन मंदी का रोना रोते हुए जिस तरह इन नामचीन निजी एयरलाइनों ने एक-एक कर सुविधाओं में कमी करनी शुरू की है, उससे इनके पेशेवर होने पर ही संदेह होने लगा है। निजी एयरलाइनों ने पैकेज लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाने की गर्ज से एक दिन की हड़ताल का एेलान किया, लेकिन उन्हें सरकार के कड़े रुख के बाद हड़ताल वापसी का निर्णय लेना पड़ा। निजी एयरलाइनें भले ही मंदी का रोना रो रही हैं, वास्तविकता यह है कि अधिकांश रूट्स पर उनके विमानों में कोई सीट खाली नहीं होती। कुछ रूट्स पर तो हफ्तों पहले बुकिंग कराने के बावजूद टिकट कन्फर्म नहीं होते हैं। &lt;br /&gt;यात्रियों के प्रति जिम्मेवारी और जवाबदेही के मामले में निजी एयरलाइनें किस कदर बेपरवाही दिखाने लगी हैं, इसका अंदाजा हाल की लेह-लद्दाख की यात्रा के दौरान खुद लेखक को हुआ। यह ठीक है कि रिमोट एरिया की अपनी कुछ दिक्कतें हैं और मौसम खराब होने की हालत में कोई भी एयरलाइन हो, उड़ान का खतरा नहीं उठा सकती। लेह और आसपास के पूरे क्षेत्र में इस समय तापमान दस से पंद्रह डिग्री सेल्सियस के बीच है। दूर नजर आने वाली पहाड़ियों पर बर्फबारी साफ दिखती है। पहाड़ी इलाकों में कब घना कोहरा छा जाए। धुंध के साथ बारिश शुरू हो जाए, कहा नहीं जा सकता। वापसी के समय हमें भी मौसम की बेरुखी का शिकार होना पड़ा। तय समय पर लेह एयरपोर्ट पर पहुंचे। सिक्योरिटी जांच के बाद बोर्डिंग पास ले लिया लेकिन खराब मौसम के चलते दिल्ली से लेह पहुंचने वाला जेट का विमान दिल्ली से रवाना ही नहीं हो सका। साढ़े तीन घंटे तक एयरपोर्ट पर ही इंतजार करते रहे। अंतत: यह उद्घोषणा हुई कि फ्लाइट कैंसिल कर दी गई है। बोर्डिंग पास वापस ले लिए गए। टिकटों पर सुबह सवा पांच पहुंचने का समय दर्ज कर दिया गया। बताया गया कि दिल्ली से विशेष विमान आएगा, जो सात बजे उड़ान भरेगा। &lt;br /&gt;एेसी दशा में एयरलाइनें यात्रियों को होटलों में ठहराने, उनके खान-पान और लाने-ले जाने की व्यवस्था करती है। यात्रियों को जेट एटरलाइन के लेह प्रबंधकों ने इस तरह की सुविधा देने से इंकार कर दिया। इससे भी बड़ा आश्चर्य हमें तब हुआ, जब सुबह पौने पांच बजे होटल छोड़कर हम लेह एयरपोर्ट पहुंचे और वहां बताया गया कि हमारी फ्लाइट तो ग्यारह बजे है। जब जेट के प्रबंधक को पकड़ा गया तो उसने माना कि पहले सात बजे ही फ्लाइट उड़ान भरने वाली थी। बाद में इसमें संशोधन हुआ, जिसकी सूचना वे लोग कुछ यात्रियों को नहीं दे सके। इन कुछ यात्रियों की तादाद बीस से ऊपर थी। आप सहज ही कल्पना कर सकते हैं कि विश्व स्तरीय सुविधाएं देने का दावा करने वाली जेट एयरलाइंस के प्रबंधकों का क्या हाल है। वह भी देश के रिमोट एरियाज में। कहा-सुनी के बाद आखिर हम लोगों को सवा सात बजे रवाना होने वाली किंगफिशर की फ्लाइट में जगह मिल पाई। &lt;br /&gt;अब यह घटनाएं आम हैं। आम आदमी के लिहाज से हमारी घरेलू एयरलाइनें आज भी सस्ती नहीं हैं। खासकर किंगफिशर, जेट, एयर इंडिया वगैरा की यात्रा बाकी के मुकाबले महंगी हैं। इनमें यात्रियों की घटती संख्या की एक बड़ी वजह बढ़ते किराये और घटती सुविधा है तो बहुत हद तक यह रवैया भी है कि यात्रियों की गर्ज है तो वह खुद फ्लाइट के कैंसिल होने की जानकारी हासिल करे। नियमानुसार एेसी दशा में एयरलाइनों को यात्रियों को एसएमएस अथवा फोन काल से सूचना देनी होती है। जेट एयरलाइन देश की निजी क्षेत्र की सबसे अच्छी विमान सेवा होने का दावा करती है, लेकिन यही हाल रहा तो बहुत जल्दी उसे अपने रुतबे से हाथ धोना पड़ेगा। पिछले साल अक्तूबर में दीवाली से ठीक पहले अचानक उन्नीस सौ कर्मचारियों की छंटनी के फरमान के बाद इस एयरलाइन्स को जबरदस्त आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। तब नरेश गोयल को खुद सामने आकर आंदोलनरत कर्मचारियों से माफी मांगनी पड़ी थी। जिस तरह चार सौ से अधिक पायलट एक साथ छुट्टी पर चले गए हैं, उससे जहां एयरलाइन में बढ़ रहे असंतोष के संकेत मिलते हैं, वहीं यह भी पता चलता है कि अनुशासनहीनता चरम पर है और यात्रियों को होने वाली असुविधा की चिंता उन्हें नहीं है। जाहिर है, किसी भी एयरलाइन के लिए ये कोई शुभ संकेत नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqoAnU9if8I/AAAAAAAAAmY/5AmToijI2bs/s1600-h/jet+1.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 256px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqoAnU9if8I/AAAAAAAAAmY/5AmToijI2bs/s320/jet+1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5380113380489199554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-7296849837314094033?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/7296849837314094033/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=7296849837314094033' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/7296849837314094033'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/7296849837314094033'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html' title='जेट के लिए ये शुभ संकेत नहीं'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqoAgDFziQI/AAAAAAAAAmQ/_p38ePU_sxU/s72-c/jet.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-8008822695859408468</id><published>2009-09-07T21:31:00.003+05:30</published><updated>2009-09-07T21:46:27.881+05:30</updated><title type='text'>वाई एस आर,  सोनिया और कांग्रेस</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqUxv5y6eXI/AAAAAAAAAmI/ejBPUsKLsPI/s1600-h/ysr1.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 257px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqUxv5y6eXI/AAAAAAAAAmI/ejBPUsKLsPI/s320/ysr1.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5378760029001906546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वाई एस आर के नाम से लोकप्रिय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री डा. वाई एस राजशेखर रेड्डी को श्रधांजलि देते समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का गला रुंध आया। कैमरों के सामने बड़ी मुश्किल से उन्होंने भावनाओं पर काबू पाने की चेष्टा की, लेकिन नाकाम रहीं। सोनिया ने अपनी सास इंदिरा गांधी, पति राजीव गांधी और देवर संजय गांधी को बेहद दुखद हादसों में खोया है। इंदिरा और राजीव आतंकवाद के शिकार हुए तो संजय गांधी विमान हादसे में मारे गए। कांग्रेस के कुछ ऊर्जावान, नौजवान और संभावनाओं से भरे हुए कुछ अन्य नेताओं को भी इसी तरह काल का ग्रास बनते उन्होंने देखा है। इनमें राजेश पायलट और माधव राव सिंधिया प्रमुख हैं। पचास और साठ की अल्पायु में यदि कोई इतना दूरदर्शी-ऊर्जावान नेता चला जाए तो यह पूरे देश की क्षति होती है। सोनिया गांधी की इस कदर उदासी के पीछे कहीं न कहीं अपने बहुत करीबियों की वे बेमिसाल यादें हैं, जो हर इस तरह के हादसे के बाद उन्हें और भी परेशान कर जाती हैं। &lt;br /&gt;राजीव गांधी जब तमिलनाडु के श्री पेरुम्ब्दूर में लिट्टे के आत्मघाती हमले के शिकार हुए, तब उनकी उम्र मात्र 46 वर्ष थी। सोनिया और राजीव ने प्रेम विवाह किया था। उन दोनों का दाम्पत्य जीवन 21 वर्ष ही चला कि उन्होंने अपने सबसे प्रिय को अचानक हुए दर्दनाक हादसे में हमेशा के लिए खो दिया। इटेलियन मूल की होने के बावजूद सोनिया ने जिस तरह एक के बाद एक हादसों के बाद खुद को, परिवार और कांग्रेस को संभाला, वह अपने आप में एक मिसाल है। कोई और होता तो वाई एस आर की मौत के बाद ज्यादा से ज्यादा आंध्र प्रदेश की जनता के नाम एक भावुक संदेश देकर कर्तव्य की पूर्ति कर लेता लेकिन सोनिया हैदराबाद गईं। रेड्डी की पत्नी और परिवार के लोगों से मिलीं। उन्हें हिम्मत बंधाने की चेष्टा की। विमान हादसे में माधवराव की मृत्यु के बाद भी इसी तरह के दृश्य देखे गए थे, जब सोनिया उनके परिवार के बीच दो दिन बैठी रहीं। &lt;br /&gt;सोनिया गांधी कांग्रेस जसी एेतिहासिक पार्टी का किस तरह नेतृत्व कर रही हैं, इन घटनाओं से पता चलता है। 2004 में वे चाहतीं तो प्रधानमंत्री बन सकती थीं, लेकिन उन्होंने बड़ा त्याग किया। 2009 में चाहतीं तो अपने पुत्र राहुल गांधी की ताजपोशी करा सकती थीं। डा. मनमोहन सिंह ने यह कोशिश भी की कि कम से कम राहुल केबिनेट मंत्री की उनकी पेशकश को तो मान ही लें, परन्तु वह नहीं माने। निश्चित ही इन घटनाओं ने मौजूदा राजनीति में इस परिवार का सम्मान और भी बढ़ा दिया है। हालांकि यह भी सच है कि सोनिया और राहुल गांधी का जो रुतबा, रसूख और धमक बिना पद के भी है, वह पदों पर बैठे हुए सैंकड़ों लोगों को नसीब नहीं है। सोनिया और राहुल ने विपक्ष के उस आरोप की एक तरह से हवा निकाल दी है कि यह पार्टी तो परिवारवाद और गांधी-नेहरू खानदान की बांदी बनकर रह गई है। यह सही है कि कांग्रेस में 1998 में नए प्राण इसी परिवार ने फूंके लेकिन जिस तरह सोनिया और राहुल महत्वपूर्ण सरकारी पदों से खुद को दूर रखे हुए हैं, वह न केवल दूसरों के लिए मिसाल है, बल्कि विपक्षी हमलों को भोथरा करने की उनकी रणनीति का हिस्सा भी है। &lt;br /&gt;अब वाईएसआर के असामयिक निधन पर सोनिया गांधी के गला रुंध आने के दूसरे पहलू पर गौर करें। कांग्रेस के भीतर इस समय पीढ़ीगत बदलाव का दौर चल रहा है। इसकी गति भले ही धीमी हो लेकिन सोनिया गांधी के फैसलों से साफ है कि कुछ पदों को छोड़कर बाकी पर धीरे-धीरे वे अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को आगे लाने का निर्णय ले चुकी हैं। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, विदेश मंत्री एसएम कृष्णा, इस्पात मंत्री वीरभद्र सिंह, प्रवासी भारतीय मामलों के मंत्री व्यलार रवि ही कांग्रेस की ओर से मंत्रीपरिषद में एेसे नेता हैं, जिनकी उम्र सत्तर के पार है। माना जाता है कि राजनीति में पचास और साठ की उम्र में ही जाकर प्ररिपक्वता आती है। यहां तक कि 1984 में 31 अक्तूबर को जब इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद राजीव गांधी को सातवें प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई थी, तब उन्हें भी नौसिखिया कहा गया था। उनके बहुतेरे फैसले एेसे थे, जिनकी विपक्षी दल और मीडिया खिल्ली उड़ाता था। सही मायने में राजीव गांधी में उसी समय परिपक्वता दिखाई दी था, जब काल के क्रूर हाथों ने उन्हें छीन लिया। उस हादसे से तीन दिन पहले उन्होंने खुद अपने एक करीबी से कहा था कि इस बार अगर देशवासियों ने उन्हें दायित्व सौंपा तो वह उन्हें पूरी तरह बदले हुए राजीव गांधी के रूप में देखेंगे। राजीव एेसे समय चले गए, जब वे बेहतर प्रधानमंत्री हो सकते थे। &lt;br /&gt;राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद सौंपने की मांग करने वाले कांग्रेस के भीतर एेसे नेताओं की कमी नहीं है, जो राजीव गांधी के 39 साल की आयु में प्रधानमंत्री बनने के तर्क पेश करते हैं। डा. मनमोहन सिंह ने जब 2004 में प्रधानमंत्री पद संभाला तो वे 72 के थे। हालांकि उनकी दो बार बाईपास सर्जरी हो चुकी है, लेकिन पूरी तरह स्वस्थ, चुस्त-चौकस नजर आते हैं। उनकी केबिनेट में कुछ अहम पदों पर भले ही कुछ उम्र दराज नेता विराजमान हैं लेकिन जिस तरह पचास-साठ की उम्र और उससे भी कम आयु के नेताओं को आगे लाया गया है, उससे संकेत साफ हैं कि अनुभव के साथ-साथ कांग्रेस नई पीढ़ी को धीरे-धीरे आगे ला रही है। आंध्र के दिवंगत मुख्यमंत्री रेड्डी की उम्र भी साठ थी। कांग्रेस अध्यक्ष के गमगीन होने की एक बड़ी वजह यह भी है। रेड्डी ने 2004 के चुनाव से पहले तीन महीने की पदयात्रा करके आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को दस साल बाद पुर्नजीर्वित किया था। 2009 में तो उन्होंने और भी बड़ा करिश्मा किया। 2004 में मिली लोकसभा सीटों में उन्होंने और वृद्धि कर दी। दोबारा वहां सरकार तो बनाई ही। यही वजह है कि चार बार लोकसभा सदस्य और छह बार विधानसभा सदस्य रहे वाईएसआर को सोनिया और मनमोहन सिंह ने दूरदर्शी और संभावनाओं से भरा नेता बताते हुए याद किया। &lt;br /&gt;जमीन से जुड़े नेताओं को आज अंगुलियों पर गिना जा सकता है। खासकर कांग्रेस में एेसे नेता गिने-चुने ही हैं। ज्यादातर राज्यों में सरकारें इसलिए बन जाती हैं क्चयोंकि शासन कर रही सरकारों के खिलाफ स्वभाविक जन नाराजगी होती है। शीला दीक्षित और वाईएसआर जैसे मुख्यमंत्री कम ही देखने को मिलते हैं, जो पांच और दस साल के शासन के बाद फिर भी जन विश्वास हासिल करने में सफल रहें। 2009 में वाईएसआर ने विकास और विश्वास के नारे पर जनादेश हासिल किया। निश्चित ही कह सकते ैहैं कि वे संभावनाओं से भरे नेता थे और कांग्रेस नेतृत्व यदि सदमे में है तो इसकी वजह समझी जा सकती है। वाईएसआर जसे ऊर्जावान नेता साल-दो-साल में तैयार नहीं होते हैं। जनता एेसे ही किसी पर इतना भरोसा नहीं करती है। उनकी मौत के बाद सवा सौ लोगों के जान दे देने की घटना किसी को भी आश्चर्य में डाल सकती है। इससे पता चलता है कि वे कितने लोकप्रिय थे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-8008822695859408468?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/8008822695859408468/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=8008822695859408468' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8008822695859408468'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/8008822695859408468'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='वाई एस आर,  सोनिया और कांग्रेस'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SqUxv5y6eXI/AAAAAAAAAmI/ejBPUsKLsPI/s72-c/ysr1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-37733341455368440</id><published>2009-08-25T18:23:00.006+05:30</published><updated>2009-08-25T18:49:46.087+05:30</updated><title type='text'>लाइलाज बीमारी से ग्रस्त भाजपा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;क्या भाजपा लाइलाज बीमारी की शिकार हो गई है? लोग जानना चाहते हैं कि पार्टी विद डिफरेंस के आकर्षक श्लोगन के साथ मुख्य धारा की कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को चुनौती देकर केन्द्रीय सत्ता की दहलीज तक पहुंची इस पार्टी को आखिर किसकी &lt;/strong&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SpPjOZYTO8I/AAAAAAAAAmA/MioDCJ6nBX4/s1600-h/bjp-flag-_new.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 216px; height: 192px;" src="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SpPjOZYTO8I/AAAAAAAAAmA/MioDCJ6nBX4/s320/bjp-flag-_new.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5373888616853617602" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;नजर लग गई है। जनता पार्टी, जनता दल, संयुक्त मोर्चा और राष्ट्रीय मोर्चा की सरकारों के प्रयोग की विफलता के बाद भाजपा नीत राजग गठबंधन ने छह साल तक केन्द्र में शासन करके कांग्रेस के इस दुष्प्रचार की हवा निकाल दी थी कि गैर कांग्रेसवाद का नारा बुलंद करने वाली विपक्षी पार्टियां वैकल्पिक, स्थायी और साफ-सुथरी सरकार नहीं दे सकती। कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां यह कहकर लोगों, खासकर अल्पसंख्यकों को डराते रहे कि यदि भाजपा की सरकार बन गई तो देश टूट जाएगा। 90 के दशक से राज्यों में भी भाजपा की सरकारें सफलता के साथ काम करती आ रही हैं और 1998 से 2004 तक केन्द्र में भी उसकी सरकार रही। न देश टूटा और न राज्यों में रहने वाले अल्पसंख्यकों को असुरक्षा का बोध हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी भी और चली भी। &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;कुछ आत्मघाती गलतियां नहीं होती तो राजग न 2004 में हारता और न 2009 के इस प्रतिष्ठित चुनाव में। 2004 में भाजपा के चुनाव प्रबंधक और रणनीतिकार अति आत्मविश्वास के शिकार हो गए। शाइनिंग इंडिया के आत्ममुग्ध प्रचार ने उनकी लुटिया डुबो दी, जबकि 2009 के आम चुनाव में नकारात्मक प्रचार शैली भारी पड़ गई। पार्टी नेता मतदाताओं को यह समझाने में नाकाम सिद्ध हुए कि डा. मनमोहन सिंह कैसे सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं और लाल कृष्ण आडवाणी किस तरह मजबूत नेता हैं और निर्णायक सरकार देने में सक्षम हैं। मुंबई पर आतंकवादी हमले को मुद्दा बनाकर कांग्रेस को घेरने की उनकी रणनीति काम नहीं आई। कंधार प्रकरण पर कांग्रेस ने हमला बोला तो भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई ।  &lt;br /&gt;कहते हैं, घर में कंगाली की हालत हो तो कलह भी शुरू हो जाती है। भाजपा सत्ता से बाहर क्या हुई, इसके नेताओं में सिर-फुटौव्वल इस कदर बढ़ गई कि कई कद्दावर नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लिस्ट लंबी होती जा रही है। शुरुआत तो हालांकि दस साल पहले गुजरात में शंकरसिंह वाघेला से हुई थी, लेकिन बाद में उत्तर भारतीय कई नेता बगावत करते हुए भाजपा से छिटक गए। इनमें उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं उमा भारती, पार्टी के थिंक टैंक माने जाने वाले गोविंदाचार्य, दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे मदन लाल खुराना और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी शामिल हैं। हाल में रक्षा, वित्त और विदेशमंत्री जैसे अहम पदों पर रहे जसवंत सिंह को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब अरुण शौरी का नम्बर है। वसुंधरा राजे भी हठ पकड़े हुए हैं। &lt;br /&gt;कह सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी की अंतरकलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। जसवंत सिंह प्रकरण अभी शांत भी नहीं हुआ है कि अटल सरकार में मंत्री रहे अरुण शौरी ने भी शीर्ष नेतृत्व पर हमला बोल दिया है। उन्होंने भले ही पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह का नाम नहीं लिया हो, लेकिन उनके निशान पर वही हैं। उन्होंने कुछ अप्रिय लगने वाले सवाल दाग दिए हैं। मसलन, लोकसभा चुनाव में नाकामी के लिए राज्यों के नेताओं को बलि का बकरा क्यों बनाया जा रहा है। पार्टी नेतृत्व खुद इसकी जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा क्यों नहीं दे देता? उन्होंने सवाल पूछा है कि विधायकों का समर्थन प्राप्त उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद से भुवन चंद खंडूडी को क्चयों हटाया गया? इसी तरह राजस्थान में विपक्ष की नेता वसुंधरा राजे को 57 विधायकों के समर्थन के बावजूद पार्टी नेतृत्व हटाने पर क्यों तुला हुआ है। उन्होंने यह सवाल भी पूछा है कि भाजपा के संस्थापक सदस्य जसवंत सिंह को निष्कासित करने से पूर्व नोटिस देने की औपचारिकता तक क्यों नहीं निभाही गई। शौरी के बगावती तेवरों से एक बार फिर पार्टी नेतृत्व सकते में है। &lt;br /&gt;लोकसभा चुनाव में हार के बाद शुरू हुई कलह थमने का नाम नहीं ले रही है। जसवंत सिंह, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा उन वरिष्ठ नेताओं में रहे हैं, जो लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी तय करने की मांग जोर-शोर से उठाते रहे हैं। दबाव के बाद राजनाथ सिंह ने बाल आप्टे के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई, जिसे हार के कारणों को तलाशने की जिम्मेदारी सौंपी गई। आप्टे कमेटी ने शिमला की चिंतन बैठक में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी। वह मीडिया के हाथ भी लग गई। आप्टे कमेटी ने साफ कहा है कि पार्टी नेतृत्व न तो चुनाव का एजेंडा तय कर पाया और न ही महंगाई, आतंकवाद जैसे मुद्दों पर कांग्रेस को घेर पाया। बल्कि मजबूत नेता-निर्णायक सरकार का उसका नारा भी लोगों को प्रभावित करने में नाकाम सिद्ध हुआ। मनमोहन सिंह को अब तक सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कहना लोगों को नागवार गुजरा। चुनाव के बीच में नरेन्द्र मोदी का नाम भी भावी प्रधानमंत्री के रूप में उछालना भाजपा को भारी पड़ा। &lt;br /&gt;आश्चर्य की बात यह है कि पार्टी नेतृत्व ने इस रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार करने के बजाय उसके पेश किए जाने से ही इंकार कर दिया। आज हालत यह है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता नेतृत्व पर अपनी भड़ास निकालते हुए नजर आ रहे हैं। यह सही है कि 2004 में भाजपा की इतनी बुरी हार नहीं हुई थी, जितनी इस बार हुई है। ऊपर से हर बड़े नेता को कोई न कोई अहम पद की लालसा है। एेसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि अटल बिहारी वाजपेयी स्वस्थ होते और फैसलों में सक्रिय भूमिका निभाते तो क्या इस तरह की नौबत आती? निश्चित ही पार्टी को अटल जी के मार्गदर्शन और नेतृत्व की बेहद कमी खल रही है। कहना होगा कि भाजपा अजीबोगरीब संकट से गुजर रही है, जिससे निकलना उसके नेतृत्व के लिए इस समय सबसे बड़ी चुनौती है। जसवंत सिंह, अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और वसुंधरा राजे नासमाझ या छोटे-मोटे कार्यकर्ता नहीं हैं। अनुशासन का डंडा चलाकर सबको चुप कराने के बजाय यदि मूल समस्या के समाधान की तरफ गंभीर पहल की जाए तो यह पार्टी के व्यापक हित में होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-37733341455368440?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/37733341455368440/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=37733341455368440' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/37733341455368440'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/37733341455368440'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/08/blog-post_25.html' title='लाइलाज बीमारी से ग्रस्त भाजपा'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SpPjOZYTO8I/AAAAAAAAAmA/MioDCJ6nBX4/s72-c/bjp-flag-_new.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-6717868747083584377</id><published>2009-08-11T17:26:00.004+05:30</published><updated>2009-08-11T17:42:11.524+05:30</updated><title type='text'>स्वाइन फ्लू का हौव्वा ठीक नहीं</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SoFgDDoUA6I/AAAAAAAAAlw/jkRUYz6A7F0/s1600-h/flu.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 170px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SoFgDDoUA6I/AAAAAAAAAlw/jkRUYz6A7F0/s320/flu.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368677836432606114" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;क्या स्वाइन फ्लू वास्तव में इतनी खतरनाक बीमारी है, जितनी मीडिया के द्वारा बताने की कोशिशें की जा रही हैं? क्या अन्य पश्चिमी देशों की तरह यह भारत में भी महामारी का रूप धारण कर चुकी है? क्या सरकार इसे रोकने में नाकाम साबित हो गई है और इतने लोग इसकी चपेट में आ गए हैं कि जिससे लोग अपने को असुरक्षित महसूस करने लग गए हैं। यदि मीडिया की कवरेज को देखें तो कुछ एेसे ही संकेत मिलते हैं, लेकिन जिस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है, क्या हालात वैसे ही हैं? यह जानने के लिए तथ्यों पर गौर करना आवश्यक है। अमेरिका के मेक्सिको से शुरू हुई यह बीमारी अब तक दुनिया के 167 देशों तक फैल चुकी है। खुद अमेरिका की बात करें तो वहां अब तक साढ़े छह हजार लोग स्वाइन फ्लू की चपेट में आए हैं, जिनमें से 436 की मृत्यु हुई है। अर्जेटीना में 7 लाख 60 हजार लोग इसकी चपेट में आए हैं और 337 लोगों की मौत हुई है। आस्ट्रेलिया में करीब 25 हजार लोग स्वाइन फ्लू से ग्रस्त पाए गए हैं, जिनमें से 85 की मृत्यु हुई है। ब्रिटेन में एक लाख दस हजार लोग इससे प्रभावित हुए हैं और छत्तीस की मौत हुई है। भारत में अब तक केवल 860 लोग स्वाइन फ्लू से ग्रस्त पाए गए हैं। जिन्हें स्वाइन फ्लू होने का संदेह था, एेसे छत्तीस सौ लोगों की जांच-पड़ताल की गई है। स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद की मानें तो भारत सरकार ने समय रहते हवाई अड्डों और सी-पोर्ट्स पर ही विदेशों से आने वालों के स्वास्थ्य के परीक्षण का महत्वपूर्ण फैसला लिया। अब तक 47 लाख लोगों की स्क्रीनिंग हवाई अड्डों और सी-पोर्ट्स पर की गई है। जिन पर भी संदेह हुआ, उन्हें तुरंत नजदीकी अस्पतालों में भर्ती करके चिकित्सा मुहैया कराई गई। नतीजतन, खतरा टल गया, लेकिन बाहर से आने वाले बहुत से लोगों ने यह बात छिपाई कि उन्हें स्वाइन फ्लू है। इसी का नतीजा है कि देश के कुछ बड़े महानगरों में स्वाइन फ्लू फैला लेकिन बाकी देशों के मुकाबले यह बहुत कम है और यहां मृत्यु दर भी बहुत कम है। अब तक छह मौतें हुई हैं। देश में हर साल 4 लाख लोग एड्स से मर जाते हैं। करीब तीन लाख लोग टीबी के शिकार होते हैं। डेढ़ हजार हर साल मलेरिया से मर जाते हैं और 78 हजार महिलाएं प्रसवकाल में दम तोड़ देती हैं। सवाल है कि स्वाइन फ्लू से ज्यादा मौतें हो रही हैं या अन्य बीमारियों से। मीडिया में बाकी बीमारियों के इन भयावह आंकड़ों को क्यों नहीं दिखाता? जिस तरह स्वाइन फ्लू की कवरेज की जा रही है, उससे लोग जागरूक और सजग होने के बजाय घबरा रहे हैं। स्कूल-कालेजों में छुट्टी की जा रही हैं। किसी को हल्की खांसी-जुकाम जैसी बीमारी भी हो रही है तो वे स्वाइन फ्लू की आशंका में अस्पतालों की ओर दौड़ रहे हैं। पूरे देश में भय का वातावरण बना दिया गया है। प्रधानमंत्री से लेकर स्वास्थ्य मंत्री तक इस पर ब्यौरे ले रहे हैं। यह अच्छी बात है कि एहतियात बरती जाए, लेकिन किसी भी बीमारी को सनसनीखेज तरीके से प्रसारित कर टीआरपी बढ़ाने की कोशिश करना क्या किसी भी दृष्टि से उचित है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-6717868747083584377?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/6717868747083584377/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=6717868747083584377' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6717868747083584377'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6717868747083584377'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/08/blog-post_11.html' title='स्वाइन फ्लू का हौव्वा ठीक नहीं'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SoFgDDoUA6I/AAAAAAAAAlw/jkRUYz6A7F0/s72-c/flu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-6394888572249678246</id><published>2009-08-10T18:46:00.002+05:30</published><updated>2009-08-10T18:55:28.845+05:30</updated><title type='text'>भारत-पाक और अमेरिकी हस्तक्षेप</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SoAfufCmqAI/AAAAAAAAAlo/K4801CLZG10/s1600-h/barack-obama-manmohan-singh-2009-7-9-5-43-46.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 212px;" src="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SoAfufCmqAI/AAAAAAAAAlo/K4801CLZG10/s320/barack-obama-manmohan-singh-2009-7-9-5-43-46.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5368325639292495874" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सोलह जुलाई को शर्म अल शेख में जारी साझा बयान को एक महीना भी नहीं हुआ और पाकिस्तान अपनी असलियत पर उतर आया है। सैय्यद यूसुफ रजा गिलानी ने डा. मनमोहन सिंह को आश्वसान दिया था कि मुंबई हमले के दोषियों को किसी सूरत में नहीं बख्शा जाएगा। मनमोहन सिंह ने विपक्ष की चिंताओं के जवाब में संसद में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि भारत उस समय तक पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय बातचीत शुरू नहीं करेगा, जब तक वह अपना वादा पूरा नहीं कर देता। देश शर्म अल शेख में जारी हुए बयान को शंका की दृष्टि से देख रहा है। बयान की भाषा से साफ है कि भारतीय नेतृत्व बयान जारी करने के लिए दबाव रहा है। आतंकवाद को बातचीत की प्रक्रिया से अलग रखने और बयान में ब्लूचिस्तान का जिक्र आने से साफ है कि इसमें अमेरिका की अहम भूमिका रही है। पाकिस्तान-अफगानिस्तान की सरहद पर तालिबान और अलकायदा से छिड़ी जंग में फंसा अमेरिका पाकिस्तान को खुश रखना चाहता है। इसके लिए वह भारत की चिंताओं, हितों और स्वतंत्र विदेश नीति तक को दांव पर लगा रहा है। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़े और पाक हकूमत को भारत के साथ लगती सीमा पर सेना तैनात करने का बहाना मिल जाए। &lt;br /&gt;अमेरिका जिस तरह भारत के मामलों में दखलांदाजी कर रहा है, वह आगे चलकर बेहद घातक सिद्ध हो सकती है। साझा बयान को आनन-फानन में तैयार करवाया गया। जल्दबाजी में खराब ड्राफ्टिंग की बात खुद विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार की। विपक्षी दल प्रधानमंत्री के इस तर्क से सहमत नहीं है कि जब ब्लूचिस्तान में हमारी कोई दखल ही नहीं है तो भारत को साझा बयान में उसका जिक्र कर देने भर से क्यों चिंतित होना चाहिए। रक्षा विशेषज्ञ और विदेश नीति के जानकार पहले ही इसे प्रधानमंत्री की एेतिहासिक भूल और चूक बता चुके हैं। &lt;br /&gt;विपक्ष और रक्षा विशेषज्ञों की शंका बेवजह नहीं है। अभी साझा बयान में पाकिस्तान द्वारा दिए गए आश्वासन की स्याही सूखी भी नहीं है कि मुंबई हमले के प्रमुख षड़यंत्रकारी जमात उद दावा के चीफ हाफिज सईद को लाहौर उच्च न्यायालय के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी क्लीन चिट दे दी। आश्चर्य की बात तो यह है कि पाकिस्तान सरकार ने हाफिज सईद को रिहा किए जाने के फैसले के खिलाफ कोर्ट में पुख्ता सबूत पेश ही नहीं किए, जो भारत पहले ही सौंप चुका है। सबूतों की चौथी खेप हाल ही में उसे सौंपी गई है। इससे भी आश्चर्य का विषय यह है कि वहां के गृहमंत्री और विदेशमंत्री भारत से सईद के खिलाफ और पुख्ता सबूतों की मांग कर रहे हैं। पाकिस्तानी मंत्रियों के रवये से साफ है कि भारत द्वारा पहले सौंपे गए सबूतों को लेकर वे कतई संजीदा नहीं हैं। मुंबई हमले को लेकर पहले ही दिन से पाकिस्तान का रवया असहयोग का बना हुआ है। उसमें आज भी कोई बदलाव नहीं दिख रहा। &lt;br /&gt;यह सही है कि जार्ज बुश ने उस समय भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद से तमाम तरह की पाबंदियों का सामना कर रहे भारत को प्रतिबंधमुक्त कराने में अहम भूमिका निभाई। दोनों देशों के बीच असैन्य परमाणु करार हुआ। ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए इस असैन्य परमाणु करार की जितनी जरूरत भारत को है, उससे कम अमेरिका को भी नहीं है। वह ऊर्जा उत्पादन के रिएक्टर, तकनीक, यूरेनियम वगैरा भारत को बेचेगा तो उससे अरबों डालर कमाएगा। उसके इंजीनियरों को यहां स्थापित होने वाले रिएक्यटरों में काम मिलेगा। यह सच है कि दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग के नए युग की शुरुआत हुई है परन्तु अमेरिका ने जिस तरह भारत की विदेश और सामरिक नीति को प्रभावित करना शुरू किया है, उसके बहुत घातक परिणाम होने जा रहे हैं।&lt;br /&gt;अभी तक को भारत यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान सीमा पार से आतंकवादी भेजकर यहां खून खराबा कराता रहा है। ब्लूचिस्तान का जिक्र साझा बयान में आने से अब ठीक यही आरोप पाकिस्तान भारत पर मंढने से नहीं चूकेगा। यानि अमेरिकी हस्तक्षेप ने भारत के हाथ से एक बड़ा कूटनीतिक अस्त्र छीन लिया है। रक्षा विशेषज्ञ हिलेरी क्लिंटन की यात्रा के समय उस हुए उस समझौते को भी घातक मान रहे हैं, जिसमें कहा गया है कि एंड यूज मानिटरिंग अरेजमेंट को आगे से भारत द्वारा अमेरिकी रक्षा प्रोद्योगिकी और उपकरणों को खरीदने के उद्देश्य से भारत द्वारा स्वीकृति पत्र के रूप में माना जाएगा। इसका मतलब यही है भारत जो भी रक्षा सामग्री खरीदेगा, उसमें यह पूर्व शर्त होगी कि भारत के सुरक्षा प्रतिष्ठानों और उपकरणों की अमेरिकी सरकार द्वारा एंड यूज मानिटरिंग की जाएगी। इसे देश की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन नहीं मानें तो क्या मानें? &lt;br /&gt;एटमी परमाणु करार के समय यह आशंका प्रकट की जा रही थी कि अमेरिका और अन्य ईंधन व प्रोद्योगिकी आपूर्तिकर्ता देश इसके बदले में भारत को एनपीटी और सीटीबीटी पर हस्ताक्षर करने को बाध्य करेंगे। प्रधानमंत्री ने सदन को आश्वस्त किया कि एेसी कोई शर्त भारत पर नहीं थोपी गई है, लेकिन जी-आठ राष्ट्रों की बैठक में इन राष्ट्रों ने साफ कर दिया कि भारत को पुर्नसंस्करण व्यवस्थाओं और प्रक्रियाओं वाली प्रोद्योगिकी तभी दी जाएगी, जब वह एनपीटी पर हस्ताक्षर करेगा। इसका सीधा सा मतलब यही निकलता है कि अमेरिका ने भारत के साथ धोखाधड़ी की है। इन घटनाओं से साफ है कि अमेरिकी हस्तक्षेप और दबाव के चलते सरकार ने विदेश नीति और सामरिक हितों के मूलभूत आधार को ही हिला कर रख दिया है। यही हाल रहा तो अमेरिकी हस्तक्षेप भारत को कहीं का नहीं छोड़ेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-6394888572249678246?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/6394888572249678246/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=6394888572249678246' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6394888572249678246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/6394888572249678246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/08/blog-post_10.html' title='भारत-पाक और अमेरिकी हस्तक्षेप'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SoAfufCmqAI/AAAAAAAAAlo/K4801CLZG10/s72-c/barack-obama-manmohan-singh-2009-7-9-5-43-46.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-3034656401915209459</id><published>2009-08-06T22:00:00.003+05:30</published><updated>2009-08-06T22:27:13.441+05:30</updated><title type='text'>जोनी के बिना रक्षा बंधन</title><content type='html'>इस बार का रक्षा बंधन हमारे परिवार के लिए अजीब सी खामोशी लेकर आया। सब चुप-चुप से थे। हमें पिछला रक्षाबंधन याद आ रहा था। पिछले साल जब मैं सोकर उठा तो देखा कि जोनी खुशी से फुदक रहा है। उसके माथे पर टीका लगा था और दाएं हाथ पर पंजे से थोड़ा ऊपर राखी का अनमोल धागा। &lt;br /&gt;मेरे लिए यह थोड़ा-थोड़ा सुखद और कुछ आश्चर्यजनक था। मैंने बीती रात सोने के लिए जाते समय इस तरह के दृश्य की कल्पना नहीं की थी। सुखद इसलिए था कि मेरी बेटी कावेरी ने घर में बिल्कुल हमारे बच्चे की तरह ही पले और रहे जोनी को वही प्यार और सम्मान प्रदान किया, जो वह अपने भाई अंकुर और मुङो देती आई है। आश्चर्यजनक शायद इसलिए कि कावेरी ने हमारे सोकर उठने, स्नान कर तैयार होने और राखी बंधवाने का इंतजार नहीं किया था। मैने देखा कि अंकुर अभी भी सोया पड़ा है और कावेरी हमारे जगने से पहले ही जोनी के दाएं हाथ पर राखी बांध चुकी है।&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SnsLPV2kXBI/AAAAAAAAAlg/uF0dlHNTyqE/s1600-h/jony+with+kavery.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 238px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SnsLPV2kXBI/AAAAAAAAAlg/uF0dlHNTyqE/s320/jony+with+kavery.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5366895739134041106" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मुङो उस घटना ने भीतर से बहुत आह्लादित कर दिया था। काश, सब इन मूक जानवरों को इसी तरह प्यार और सम्मान देते। पिछले साल हमारा राखी बंधवाने का नम्बर जोनी के बाद आया। डोगी को राखी बांधने पर मैंने कावेरी से चुटकी भी ली, लेकिन हमारे परिवार का कोई भी सदस्य जोनी के साथ उस तरह पेश नहीं आता था, जैसा आमतौर पर डोगी के साथ लोग पेश् आते हैं। उसे हमेशा सदस्य की तरह ही माना। &lt;br /&gt;इस बार परिवार में राखी के रोज इसलिए खामोशी सी पसरी रही, क्योंकि जोनी हमारे बीच नहीं था। वह हमसे इतनी दूर चला गया, जहां से कोई लौटकर वापस नहीं आता। कभी-कभी लगता है कि हम लोग कितने बेबस हैं। जिन्हें प्यार करते हैं, उन्हें हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख पाते। वह चौदह साल से हमारे परिवार का अभिन्न अंग था। उदास होता था.तो हम परेशान हो उठते थे। बीमार होता तो तुरंत डाक्टर के यहां ले जाते। खेलता रहता तो सुकून मिलता। जब पूरा परिवार साथ बैठकर किसी मसले पर चर्चा करता था तो वह भी उचककर खाली पड़े सोफे पर आ बैठता था। हमारी तरफ टुकुर-टुकुर कर देखता रहता था। मानो, कह रहा हो कि मैं भी सब सुन और समझ रहा हूं। मेरी पत्नी कमलेश उसे धमकाकर सोफे से नीचे उतारती तो शरारती जोनी उसकी निगाह फिरते ही फिर वहीं आ जमता था। &lt;br /&gt;पिछला एक साल उसके और हमारे लिए कष्ट भरा रहा। डीएलए के स्वामी और प्रधान संपादक अजय अग्रवाल ने करीब दो साल पहले मुङो मेरठ संस्करण का दायित्व सौंपा। हमारा परिवार दिल्ली से मेरठ शिफ्ट हो गया। संस्करण शुरू हुआ। मैं करीब दस महीने मेरठ में रहा, लेकिन चूकि दोनों बच्चे दिल्ली में पढ़ रहे थे, इसलिए हमें वापस दिल्ली लौटना पड़ा। मैंने दोबारा हरिभूमि ज्वाइन किया। चूकि घर-परिवार-सामान शिफ्ट हो रहा था, इसलिए मां ने कहा कि कुछ समय के लिए जोनी को गांव में उनके पास छोड़ दें। एेसा ही हुआ। शुरू में तो नहीं परन्तु बाद में उसका वहां मन लग गया। इस बीच खबर आई कि वह बीमार रहने लगा है। बड़े भैय्या ने उसे दिखाया। दवा दिलाई। थोड़ा ठीक हुआ लेकिन फिर बीमार पड़ गया। &lt;br /&gt;एक दिन अंकुर ने कहा कि पापा जोनी को ले आते हैं। यहां उसकी ठीक से सेवा टहल हो जाएगी। मैं और कावेरी उसे संभाल लेंगे। वो यहां ठीक हो जाएगा। उसने जैसे मेरे मन की कह दी थी। हालांकि मैं और कमलेश जोनी की बीमारी को समझ रहे थे, लेकिन बच्चों के सामने कह नहीं रहे थे। जोनी की उम्र दरअसल पूरी हो चली थी। वह चौदह साल से हमारे परिवार के साथ था। पामेलियन नस्ल के डोगी की इससे ज्यादा उम्र आमतौर पर नहीं होती है। हमें पता था कि अब इसका आखिरी समय निकट आ गया है। बहुत दिन तक वह हमारे साथ नहीं रहेगा। &lt;br /&gt;मुङो आज भी याद है। मैं उस समय दैनिक जागरण मेरठ में था। फोटोग्राफर आबिद एक जूते के डिब्बे में इसे लेकर आया था। जोनी उस समय मुश्किल से पंद्रह दिन का था। मैंने ही उसे कह रखा था कि पामेलियन बच्चा मिले तो लेकर आना। मैं उसे घर लेकर गया तो सब लोग बहुत खुश हुए। पहले ही दिन से वह सबका चहेता बन गया। जोनी के साथ हमारे परिवार की अनगिनत यादें हैं। गांव में छोड़े हुए उसे हालांकि ज्यादा समय नहीं बीता था, लेकिन लग रहा था, जैसे कई साल हो गए हैं। &lt;br /&gt;मैं अगली सुबह ही गांव पहुंच गया। जोनी तो जसे मेरा इंतजार ही कर रहा था। मां ने बताया कि कई दिन से यह आंखें ही नहीं खोल रहा है। चुप-चाप पड़ा रहता है। मैं पहुंचा तो उसकी आंखों में चमक लौट आई। मैंने उसकी खाने की कटोरी गाड़ी में रखी। खिड़की खोली तो पता नहीं उसके शरीर में कहां से जान आ गई। उसने उछलकर गाड़ी में छलांग लगा दी। मुङो लगा कि वह अंकुर, कावेरी और कमलेश के पास जाने को इस कदर उतावला है। मैने गाड़ी स्टार्ट की। आगे बढ़ाई तो वह पिछली सीट से उठकर मेरी बराबर वाली सीट पर आ गया। थोड़ी देर उचक-उचक कर बाहर का नजारा लेता रहा लेकिन जब शरीर ने साथ नहीं दिया तो कान दबाकर बैठ गया। आंखें बंद कर ली। वह सफर पूरा होने का इंतजार कर रहा था। &lt;br /&gt;उस दिन तीन जामों में गाड़ी फंसी। पहला जाम मोदीनगर में मिला। दूसरा मुरादनगर में और तीसरा वसुंधरा में। मोदीनगर में मैंने उसे पानी दिया तो गप-गप करके वह पी गया। मुङो भूख लग आई थी। भुने हुए चने का डिब्बा खोला। कुछ निकाले तो जोनी ने हसरत और शिकायत भरी निगाह से मेरी ओर देखा, जैसे कह रहा हो कि यह क्या बदत्तमीजी है? क्या मुङो भूख नहीं लगी है? मैंने तीन-चार दाने उसके पास टपकाए तो उसने तुरंत लपक लिए। मैंने यह जानने के लिए कम दाने डाले थे कि यह खाता भी है कि नहीं। उसके बाद मैंने मुट्ठी भर दाने सीट पर डाल दिए, जिन्हें वह रास्ते भर खाता रहा। डेढ़ घंटे का सफर उस दिन हमने साढ़े तीन घंटे में तय किया। &lt;br /&gt;जोनी की वापसी ने परिवार पूरा कर दिया। सब खुश थे। जोनी भी। अगली सुबह कावेरी ने उसे साबुन से नहलाया। थोड़ी देर धूप में उसने उलटी-पलटी करके खुद को सुखाया, लेकिन साफ लगा कि उसके शरीर में पहले जैसी ताकत नहीं बची है। शाम को उसे दस्त लग गए। जो खा रहा था, वह बाहर निकल रहा था। लगता है, ठंडा पानी सहन नहीं कर पाया। दवा दिलवाई गई। वह संभल गया। कुछ दिन ही निकले, वह फिर उदास हो गया। उसने खाना छोड़ दिया। कमजोर इतना हो गया कि चलते-चलते बैठ जाता था। दो दिन तक जब उसने कुछ नहीं खाया तो अंकुर डाक्टर के पास ले गया। डाक्टर ने जांच-पड़ताल के बाद बताया कि उसके फेफड़े जवाब दे चुके हैं। शरीर में ज्यादा ताकत नहीं बची है। यही कारण है कि वह बार-बार बीमार पड़ रहा है। उसे ग्लूकोज चढ़वाया गया। इसके बाद उसने कुछ आंखें खोली। घर लौटा तो थोड़ा खाना भी खाया। हम लोगों की जान में जान आई, लेकिन यह सब क्षणिक सिद्ध हुआ। तीन दिन बाद उसकी दशा अचानक बिगड़ गई। &lt;br /&gt;मैं क्नाट प्लेस दफ्तर में था। कावेरी इतनी घबरा गई थी कि फोन तक नहीं कर सकी। उसकी मम्मी ने फोन पर मुङो बताया कि जोनी उठ नहीं रहा है। उसका शरीर अकड़ गया है। पानी डालते हैं तो मुंह से वापस आ जाता है। वह कराह रहा है। मैं समझ गया कि जोनी हमें छोड़कर हमेशा के लिए जा रहा है। मैंने कमलेश से कहा कि उसके पास बैठ जाओ। उसके शरीर पर हाथ फेरते रहो। शायद आखिरी सांस लेते समय उसका कष्ट कुछ कम हो। इसके तीन मिनट बाद ही कमलेश ने रोते हुए मुङो फोन किया। बताया कि जोनी चला गया है। &lt;br /&gt;वह तीन जून की दोपहर थी। मैंने अंकुर को फोन किया। वह जामिया में था। मैंने उसे तुरंत घर पहुंचने को कहा। मैं रात में करीब साढ़े आठ बजे घर पहुंच सका। सन्नाटा पसरा पड़ा था। कावेरी गुमसुम थी। अंकुर अखबार में सिर दिए बैठा था। कमलेश बेहद उदास। मेरी रुलाई फूट पड़ी। हम सब थे.जोनी नहीं था। हमें लगा कि घर का अभिन्न अंग हमें छोड़कर चला गया। अंकुर ने अपने दोस्तों के साथ जाकर पीछे नहर के पास उसे अंतिम विदाई दी। हम लोगों को संभलने में कई दिन लग गए। कावेरी की खामोशी और बातचीत में दर्द बहुत कुछ बता रहा था। मैं जानबूझकर उसका जिक्र नहीं कर रहा था। जानता था कि खुद को रोने से रोक नहीं सकूंगा। फिर बच्चों को कैसे संभालूंगा। &lt;br /&gt;जिस दिन जोनी गया, उससे पहली रात को मेरी तीन बार आंख खुली। आमतौर पर वह मेरे बिस्तर के पास मेरे जूते या चप्पलों पर सिर रखकर सोता था। उस रात उसे वहां नहीं देखकर मैं सकपकाया। उठकर देखा तो वह बाहर बैठक में खड़ा पता नहीं किसे निहार रहा था। मैं फिर लेट गया। सोचा कि कोई चुहिया देख ली होगी। थोड़ी देर बाद फिर जगा तो वह वहां भी नहीं था। उठकर देखा तो अंकुर के कमरे में खड़ा उसके बिस्तर की ओर देख रहा था। वह शायद अंकुर को वहां नहीं पाकर निराश था। अंकुर उस दिन घर नहीं आया था। अपने हास्टल में रुक गया था। सुबह देखा कि जोनी उठ ही नहीं पा रहा है। जब पता चला कि वह नहीं रहा तो मुङो रात की बातें याद आ गई। मुङो लगा कि जोनी को अपने अंत का अहसास हो गया था। वह रात में सो नहीं पाया और विदा लेने से पहले घर के हर सदस्य और कोने को देख लेना चाहता था। हम तीनों से तो वह मिल लिया लेकिन अंकुर से नहीं मिल पाया। &lt;br /&gt;इस बार रक्षा बंधन की सुबह पूरे परिवार ने जोनी को बेहद मिस किया। कावेरी एकदम खामोश थी। हम जगे। स्नान किया। थोड़ी देर मैंने प्राणायाम किया। इसके बाद उसने पहले अंकुर और बाद में मेरी कलाई पर राखी बांधी। थोड़ी देर बाद उसने अपनी मम्मी से कहा कि यह राखी मेरे (कावेरी के) हाथ पर बांध दो। मैं उसे नकलची बंदर कहकर चिढ़ाता रहता हूं। मैंने उसे चिढ़ाया तो उसने बताया कि यह राखी जोनी की है, जिसे मैं अपने हाथ में बंधवा रही हूं। ओफ्फ...मैं उसे देखता ही रह गया। मुंह से एक लफ्ज नहीं निकल पाया। पिछले रक्षाबंधन का सारा दृश्य मेरी आंखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगा। हम जोनी को भुलाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कावेरी उसे नहीं भूल सकी थी। मैं वहां से खड़ा हुआ। बाथरूम में जा घुसा। वहां पहुंचते ही रुलाई फूट पड़ी। जब संयत हो गया, तभी बाहर निकला। &lt;br /&gt;मैं अभी तक भी यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि क्या जिसे हम जानवर कहते हैं, वह परिवार का इस कदर अभिन्न अंग बन सकता है? वो अब नहीं है लेकिन हमें लगता है कि वह हमेशा हमारे बीच रहने वाला है। राखी पर वह उतनी ही शिद्दत से याद आएगा, जितना इस बार आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;ओमकार चौधरी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;omkarchaudhary@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-3034656401915209459?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/3034656401915209459/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=3034656401915209459' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3034656401915209459'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3034656401915209459'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='जोनी के बिना रक्षा बंधन'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SnsLPV2kXBI/AAAAAAAAAlg/uF0dlHNTyqE/s72-c/jony+with+kavery.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-1590628676613004900</id><published>2009-07-27T17:12:00.004+05:30</published><updated>2009-07-27T17:27:05.393+05:30</updated><title type='text'>देश ने क्या सीखा कारगिल से</title><content type='html'>छब्बीस जुलाई को देश ने कारगिल जंग का दसवां विजय दिवस मनाया. 15 मई 1999 में शुरू हुई लड़ाई 26 जुलाई को खत्म हुई थी। इसमें भारत के 533 जवान शहीद हुए तो पाकिस्तान को चार हजार जवानों से हाथ धोना पड़ा। यह संयोग है या सोची समझी रणनीति, समझना मुश्किल है लेकिन कारगिल के षड़यंत्रकारी, पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने हाल में दिए एक इंटरव्यू में बेशर्मी के साथ स्वीकार किया कि कारगिल की घुसपैठ में पाकिस्तानी सेना शामिल थी। जिस समय युद्ध हुआ, उस समय और बाद में भी पाकिस्तानी हकूमत यह दावा करती रही कि कारगिल में जेहादियों ने घुसपैठ की थी, न कि उसकी सेना ने। मुशर्रफ ने यह भी कहा है कि यदि कारगिल में घुसपैठ के बाद युद्ध न होता तो भारत कश्मीर मसले पर बातचीत को तैयार नहीं होता। बकौल मुशर्रफ, वे कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहते थे। मुशर्रफ ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अंधेरे में रखकर इस कार्रवाई को अंजाम दिया। इसके कुछ ही समय पूर्व भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए थे। वाजपेयी और नवाज शरीफ दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग व समझबूझ की नई गाथा लिखने की तैयारी में थे। वहां की सेना को यह गवारा नहीं था। मुशर्रफ के बयान से साफ है कि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई भारत विरोधी तत्वों, आतंकवादियों, कथित जेहादियों और घुसपैठियों को न केवल संरक्षण देती रही है, बल्कि षड़यंत्र भी रचती रही है। भारत-पाकिस्तान के बीच अब तक चार युद्ध हो चुके हैं। चारों में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। वहां की सरकार और सेना जानती है कि वह भारतीय सेना से आमने-सामने की लड़ाई में कहीं नहीं टिक सकती। यही कारण है कि अब उसने छद्म युद्ध की साजिश को अंजाम देना शुरू कर दिया है। यह समझने में भी भारतीय निजाम ने कई साल जाया कर दिए।  &lt;br /&gt;कारगिल युद्ध के दस साल बीत जाने के बाद इसके विश्लेषण किए जा रहे हैं कि भारत ने कारगिल से क्या सबक सीखा है? कई सीख ली भी है कि नहीं? ली होती तो समुद्र के रास्ते पाकिस्तान के दस प्रशिक्षित आतंकवादी पिछले साल छब्बीस नवम्बर को मुंबई में घुसकर इतनी जघन्य वारदात को अंजाम नहीं दे पाते। इस घटना से तो यही लगता है कि भारतीय निजाम ने कारगिल से कोई सबक नहीं सीखा है। तब कारगिल में घुसपैठ हुई थी। आज नेपाल, बांग्लादेश की सीमाओं से बेखौफ घुसपैठ हो रही है। मुंबई पर समुद्री रास्ते से अटैक हुआ। कारगिल में हमला रोकने और घुसपैठ की जानकारी समय पर नहीं मिल पाने की वजह खुफिया तंत्र की विफलता को माना गया।  सवाल है कि क्या उसके बाद खुफिया तंत्र को चुस्त-दुरूस्त करने के गंभीर प्रयास हुए? हर बजट में रक्षा बजट में बढोत्तरी होती जा रही है लेकिन क्या हमारी सेनाएं और खुफिया तंत्र देश की सरहदों को महफूज रखने में सफल हो पा रहे हैं। अफसोस की बात तो यह है कि हमारा निजाम इस तरह की घटनाओं से कोई सबक नहीं लेता। &lt;br /&gt;कारगिल में घुसपैठ को रोकने में विफल रहने के कारणों की जांच के लिए केन्द्र सरकार ने एक जांच कमेटी बनाई थी। के सुब्रहण्यम इसके अध्यक्ष थे और वरिष्ठ पत्नकार वीजी वर्गीज के अलावा लेफ्टिनेंट जनरल के के हजारी और सतीश चंद्र सदस्य। तथ्य सामने थे इसलिए निष्कर्ष निकालने में कतई देरी नहीं हुई। समय पर कारगिल समीक्षा समिति की रिपोर्ट सौप दी गई, लेकिन इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। कुल 9 हजार दस्तावेज कमेटी को दिए गए थे और जो सवाल पूछे गए उनके जवाब भी मिले थे। इसके 2200 पन्नों में सारे दस्तावेज और भारत की ओर से हुई गलतियों की भी खुल कर जानकारी दी गई थी। कमेटी ने उन सारे हालातों पर खुल कर विचार किया और अपने निष्कर्ष रखे जिससे कारगिल जैसे हालात दोबारा नहीं पैदा हो सके। यह आश्चर्य का विषय है कि सरकार ने इसके निष्कर्षों को संसद के सामने सार्वजनिक नहीं किया। देश को यह जानने का हक है कि कारगिल क्यों हुआ? रक्षा विशेषज्ञ कारगिल पर खुलकर अपनी राय जाहिर करते रहे हैं। अधिकांश का यही मत है कि हमारा खुफिया तंत्र खतरे को भांपने में पूरी तरह नाकाम रहा।  भारत और पाकिस्तान के बीच दुनिया के सबसे उंचे रणक्षेत्न में हुए कारगिल युद्ध के बारे में कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हमने इसके सबक को गंभीरता से लिया होता तो मुंबई पर गत वर्ष 26 नवंबर को हुए हमले जैसे हादसे नहीं हुए होते और रक्षा मामलों में हमारी सोच ज्यादा परिपक्व होती।&lt;br /&gt;रक्षा विश्लेषक और नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के निदेशक सी उदय भास्कर का कहना है कि यह युद्ध दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच हुआ। यह युद्ध चूंकि मई 1998 में पोखरण परमाणु विस्फोट के बाद हुआ था, लिहाजा पूरी दुनिया की निगाहें इस पर टिकी थी और भारत ने इसमें स्वयं को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति साबित किया। उन्होंने कहा कि 10 साल बीतने के बाद भी हमने इससे कोई सबक नहीं लिया। इस तरह के युद्ध लड़ने के लिए सेना को जिस तरह के ढांचे की जरूरत है, वह आज तक मुहैया नहीं हो सकी है। भास्कर मानते हैं कि कारगिल युद्ध का एक बहुत बड़ा कारण हमारी खुफिया तंत्न की विफलता था। उनका कहना है कि मुंबई हमला समुद्री कारगिल था।&lt;br /&gt;इंडियन डिफेंस रिव्यू पत्निका के संपादक भरत वर्मा के अनुसार कारगिल युद्ध से मुख्य तीन बातें सामने आईं, राजनीतिक नेतत्व द्वारा निर्णय लेने में विलंब, खुफिया तंत्न की नाकामी और रक्षा बलों में तालमेल का अभाव। उन्होंने कहा कि कारगिल के सबक को यदि हमनें गंभीरता से नहीं लिया तो मुंबई जैसे आतंकी हमले लगातार जारी रहेंगे। कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन हमारी जमीन में अंदर तक घुस आया, लेकिन हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने पाकिस्तान में स्कार्दू में प्रवेश कर घुसपैठियों की आपूर्ति को रोकने का निर्णय नहीं किया। यदि हमारा नेतृत्व यह फैसला करता तो इसके दूरगामी परिणाम होते। रक्षा विश्लेषक ब्रह्म चेलानी ने कहा कि कारगिल युद्ध का सबसे बड़ा सबक यह है कि पाकिस्तान हर उस स्थिति का फायदा उठाने से पीछे नहीं हटेगा, जहां सुरक्षा या सैन्य तैयारियों में कमी है। उन्होंने कहा कि कारगिल के बाद पाक समर्थित आतंकवादियों के आत्मघाती हमलों में काफी वृद्धि हो गई है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-1590628676613004900?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/1590628676613004900/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=1590628676613004900' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/1590628676613004900'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/1590628676613004900'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/07/blog-post_27.html' title='देश ने क्या सीखा कारगिल से'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-3163965491389565262</id><published>2009-07-20T15:59:00.006+05:30</published><updated>2009-07-20T16:24:53.387+05:30</updated><title type='text'>जमीन बचाने व हथियाने की जंग</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmRMHOnoOZI/AAAAAAAAAlY/RMCAnoNiPnk/s1600-h/DSC00762.JPG"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 175px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmRMHOnoOZI/AAAAAAAAAlY/RMCAnoNiPnk/s320/DSC00762.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5360493143544838546" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मित्रों यह मेरी सौवीं पोस्ट है. जिन पर सौंवी पोस्ट लिखना चाहता था, नहीं लिख सका. जिन पर नहीं लिखना चाहता था, उन्हीं पर सौंवी पोस्ट जा रही है. सियासत पर लिखते हुए कोफ्त होती है लेकिन इसके सिवा चारा भी नहीं है. आप सभी दोस्तों का आभारी हूँ, जिनका सहयोग मिलता रहा. &lt;br /&gt;                                                           -ओमकार चौधरी &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्तर प्रदेश में सियासी महाभारत छिड़ गयी है। रीता बहुगुणा जोशी के बयान ने मायावती को मौका दे दिया है। लोकसभा चुनाव में अपने मंसूबों पर पानी फिरने की बड़ी वजह मायावती कांग्रेस के उभार को मानती हैं। वे कांग्रेस पर वार करने का मौका तलाश ही रही थी कि रीता जोशी ने दे दिया। वहां विधानसभा चुनाव में अभी तीन साल का वक्त है। कांग्रेस और बसपा के बीच &lt;br /&gt;जिस तरह की सियासी जंग शुरू हुई है, उससे लगता है कि यह लड़ाई अभी और तेज होगी। मायावती जिस अंदाज में शासन चलाती हैं, उसमें घटने के बजाय टकराव और बढ़ने की आशंका है। सत्ता और शक्ति उनके पास है। जिन बयानों पर उन्होंने किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत, वरुण गांधी और रीता जोशी के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमें कायम कराकर जेल भेजने का बंदोबस्त किया, कोई और मुख्यमंत्री होता तो शायद नोटिस भी नहीं लेता, क्योंकि राजनीति में इस तरह के जुमले आम बात है। जनवरी 2007 में खुद मायावती ने भी ठीक इसी तरह की भाषा का प्रयोग तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के लिये किया था। वे भी उसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर मायावती को जेल की हवा खिलवा सकते थे, लेकिन उन्होंने एेसा नहीं किया। रीता जोशी पर दलित उत्पीड़न एक्ट बनता भी है कि नहीं, यह तो अब अदालत तय करेगी, लेकिन इससे एक बात साफ हो गयी है कि लोकसभा चुनाव से पहले सर्वजन समाज की बात करने वाली मायावती की समझ में आ गया है कि बिना दलितों को एकजुट रखे, वे पावर में नहीं रह पाएंगी। राज्य में बिजली-पानी-बदत्तर होती कानून व्यवस्था और बेरोजगारी बड़ी चुनौती के रूप में उनके सामने हैं। लोगों की नाराजगी बढ़ रही है। खासकर सवर्ण तबके में उनके शासन के तौर-तरीके से नाराजगी बढ़ रही है। एेसा नहीं होता तो लोकसभा चुनाव में बसपा की एेसी गत नहीं होती।&lt;br /&gt;ताजा प्रकरण के बाद कुछ सवाल आम लोगों के मन मस्तिष्क में उठ रहे हैं। रीता जोशी ने अभद्र टिप्पणी की। मायावती ने उन्हें गिरफ्तार करवाकर जेल भिजवा दिया। वकीलों की हड़ताल का बहाना बनाकर दो दिन तक उनकी जमानत को रोके रखा। भीड़ ने लखनऊ में रीता जोशी के घर और कारों को आग लगा दी। पुलिस एक डेढ़ घंटे तक मौके पर नहीं पहुंची। कांग्रेस ने बसपा के एक विधायक के खिलाफ नामजद रिपोर्ट करायी, लेकिन उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया। अगर दोषी रीता जोशी हैं तो उनकी गिरफ्तारी के साथ मामला यहीं खत्म होना चाहिए था। इसके आगे की कार्रवाई अदालत में होनी थी, लेकिन मायावती ने इसे सियासी रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने रीता जोशी ही नहीं, कांग्रेस और सोनिया गांधी को भी दलित विरोधी साबित करने की कोशिश की। इसके लिए वे लगातार दो दिन तक लखनऊ में प्रेस कांफ्रैंस करती रही। मानो राज्य में इससे बड़ा मसला कोई है ही नहीं। जिस तरह उन्होंने बेवजह सोनिया गांधी को विवाद में घसीटा, उसे लोगों ने पसंद नहीं किया। इस राजनीतिक लंद-फंद से मायावती खासकर दलित समाज की सहानुभूति तो बटोर सकती हैं परन्तु अन्य तबकों में जिस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है, उससे नुकसान होने की आशंका अधिक है। &lt;br /&gt;अब जरा यह भी समझ लिया जाये कि मायावती कांग्रेस और सोनिया गांधी से इस कदर नाराज क्यों हैं? उन्हें यह नागवार गुजरा कि राहुल गांधी उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में दलितों के घर गये। वहां भोजन किया और वहीं एक खाट डालकर सो गए। तब मायावती ने कहा कि उन्हें पता चला है कि कांग्रेस का यह युवराज दलितों से मिलकर जब दिल्ली लौटता है तो विशेष साबुन से स्नान करता है और अपनी शुद्धि भी करवाता है। 2007 में मायावती अपने बलबूते सत्ता में लौटी तो इसलिए क्योंकि उन्हें दलितों के साथ-साथ अगड़ों ने भी वोट दिया। सत्ता में आने के बाद बिगड़ी कानून व्यवस्था की सबसे अधिक शिकार यही अगड़े बने। मुलायम सिंह यादव के कथित गुंडा राज को विदा करने की गर्ज से लोगों ने मायावती को जनादेश दिया, लेकिन वे बिजली-पानी-बेरोजगारी जैसी समस्याओं के समाधान के बजाय अपनी मूर्तियां लगवाने और बड़े-बड़े पार्क बनवाने में हजारों करोड़ रुपया खर्च करने में लग गयी। विपक्ष में रहते हुए उन्होंने जिन माफियाओं का विरोध किया, लोकसभा चुनाव में उनमें से कई को टिकट थमा दिया। जिस सवर्ण वर्ग ने उन्हें यूपी की सत्ता सौंपी थी, उसी ने लोकसभा चुनाव में उन्हें वोट नहीं देकर एक करारा झटका दे डाला। &lt;br /&gt;मायावती की उम्मीदें दलितों के साथ-साथ मुसलमान और अगड़ों पर टिकी थी। राहुल गांधी ने कुछ हद तक ही सही, मायावती के दलित वोट बैंक में भी सेंध लगायी। मुसलमानों ने सपा-बसपा को कम और कांग्रेस को अधिक संख्या में वोट डाले। सवर्ण और नौजवान मतदाताओं ने भी कांग्रेस में विश्वास जाहिर किया। नतीजतन यूपी में जो कांग्रेस विधानसभा चुनाव में चौथे स्थान पर थी, वह लोकसभा चुनाव में दूसरे नम्बर की पार्टी बन गयी। बसपा पिछड़ गयी। केन्द्र की सत्ता में वापसी के बाद सोनिया गांधी ने मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष बनाकर एक और मास्टर स्ट्रोक लगा दिया। यही नहीं, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह मायावती को यह धमकी भी दे आये कि उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमें दर्ज कराकर यदि उत्पीड़नात्मक कार्रवाई की तो ध्यान रहे कि उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले में सीबीआई जांच भी चल रही है। उन्हें भी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। मायावती को लगता है कि कांग्रेस उनके लिये बड़ा खतरा बन सकती है। वे जानती हैं कि उनकी राजनीतिक जमीन खिसकी तो कांग्रेस को लाभ मिलेगा। ताजा सियाजी जंग की वजह ही यह है कि मायावती अपनी राजनीतिक जमीन को बचाना चाहती हैं और कांग्रेस उसे हथियाना चाहती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-3163965491389565262?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/3163965491389565262/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=3163965491389565262' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3163965491389565262'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/3163965491389565262'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/07/blog-post_20.html' title='जमीन बचाने व हथियाने की जंग'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmRMHOnoOZI/AAAAAAAAAlY/RMCAnoNiPnk/s72-c/DSC00762.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-387125501136924472</id><published>2009-07-17T11:21:00.007+05:30</published><updated>2009-07-17T11:58:11.814+05:30</updated><title type='text'>अमर्यादित और बदले की राजनीति</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmAYo8NbF7I/AAAAAAAAAlI/WGPX9kl475U/s1600-h/mayawati.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 187px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmAYo8NbF7I/AAAAAAAAAlI/WGPX9kl475U/s320/mayawati.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5359310648207153074" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;पिछले सवा साल में रीता बहुगुणा जोशी तीसरी नेता हैं, जिन्हें मायावती सरकार ने बदजुबानी के आरोप में सींखचों के पीछे भेजा है। पिछले साल मार्च-अप्रैल में किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत को बिजनौर में आपत्तिजनक बयान देने के आरोप में बुक किया गया था। इस साल लोकसभा चुनाव के समय पीलीभीत में भड़काऊ भाषण देने पर वरुण गांधी को गिरफ्तार किया गया और अब मुरादाबाद में मायावती के संबंध में अभद्र भाषा का प्रयोग करने पर रीता बहुगुणा जोशी को एससी एसटी अधिनियम के तहत जेल भेजा गया है। टिकैत को उनके गांव सिसौली से गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस को &lt;br /&gt;जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। कई दिन के टकराव के बाद भी शासन नाकाम रहा तो टिकैत को बिजनौर में सरेंडर का मौका दिया गया। वरुण गांधी ने सरेंडर किया तो उनके समर्थकों ने पीलीभीत में उग्र प्रदर्शन किया। नतीजतन टकराव हुआ और मायावती को वरुण पर रासुका लगाने का बहाना मिल गया। हालांकि कोर्ट के निर्देश पर न केवल वरुण रिहा हुए और उनसे रासुका भी हटी। रीता जोशी कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष हैं। भाषण देते समय उन्होंने निश्चय ही मुख्यमंत्री &lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmAYutNi5sI/AAAAAAAAAlQ/mGePKNMTQ7E/s1600-h/reeta.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 203px; height: 320px;" src="http://3.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmAYutNi5sI/AAAAAAAAAlQ/mGePKNMTQ7E/s320/reeta.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5359310747260348098" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;मायावती के संबंध में अमर्यादित भाषा का उपयोग किया, जिस कारण उन्हें मुरादाबाद से दिल्ली लौटते समय गाजियाबाद में गिरफ्तार किया गया, लेकिन जिस तरह लखनऊ में रीता जोशी के घर को आग लगायी गयी, उससे साफ है कि मामला राजनीतिक रंजिश का बन चुका है। कांग्रेस नेत्री ने अमर्यादित भाषा का उपयोग कर कोई श्रेष्ठ उदाहरण पेश नहीं किया, लेकिन उसके बाद मायावती की पार्टी के लोगों ने जो कुछ किया है, उसे उचित कैसे ठहराया जा सकता है? &lt;br /&gt;इस पूरे प्रकरण को राजनीतिक दृष्टि से देखें तो बसपा-कांग्रेस के बीच टकराव के असल कारण समझ में आ जाएंगे। लोकसभा चुनाव से पहले मायावती ने राज्य में एेसी हवा बनायी कि वे पचास सीटें जीतेंगी और तब उन्हें प्रधानमंत्री बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। उन्होंने गुंडों, माफियाओं और अपराधिक छवि के कई लोगों को टिकट दिये तो लोगों का माथा ठनका। लोगों ने उन्हें मुलायम सिंह यादव के निरंकुश शासन से तंग आकर सत्ता सौंपी थी क्योंकि माया ने तब नारा दिया था, चढ़ गुंडन की छाती पर-मोहर लगेगी हाथी पर। लोगों ने देखा कि मायावती तो खुद भी गुंडों को प्रश्रय दे रही हैं। लोकसभा चुनाव में बसपा दो दर्जन सीटें भी नहीं जीत सकीं। राहुल गांधी ने चुनाव से पहले जिस तरह दलितों के घरों में पहुंचकर भोजन और विश्राम किया, उससे कांग्रेस के प्रति दलितों के नजरिये में बदलाव आया। कांग्रेस को न केवल मुसलमानों के वोट मिले बल्कि दलितों ने भी वोट डाले। मायावती के लिये यह बड़ा राजनीतिक झटका था। मायावती जहां छिटक रहे दलितों और मुसलमानों को फिर से बसपा के साथ जोड़ने की जुगत में लगी हैं, वहीं कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश की बदली हुई राजनीतिक फिजां में अपने खोये जनाधार को पाने के लिये हाथ-पांव मार रही है। यह मायावती को नागवार गुजर रहा है। &lt;br /&gt;रीता जोशी ने मुरादाबाद के एक गांव में दलित लड़कियों पर हो रहे बलात्कार के मामले में मायावती सरकार को यह कहते हुए घेरा कि डीजीपी हेलीकाप्टर की उड़ान पर सात लाख खर्च करते हैं और बलात्कार की शिकार दलित महिलाओं के परिजनों को केवल पच्चीस हजार रुपये की मदद देते हैं। इसी झोंक में वे मायावती के बारे में आपत्तिजनक शब्द कह गयीं। राजनीतिक मंचों से कई बार इस तरह के शब्द मुंह से निकल जाते हैं, जिन पर आमतौर पर सत्तारूढ़ दलों के मुखिया नोटिस भी नहीं लेते। मायावती के साथ एेसा नहीं है। वे अपनी आलोचना को पचा नहीं पातीं। यहां तो मामला अमर्यादित भाषा का भी था। सो, उन्होंने इसे कांग्रेस बनाम दलित की बेटी बनाने में देर नहीं की। उनके सिपहसलार सतीश मिश्र ने संसद को ठप्प करा दिया। नेशनल प्रेस के सामने बयान दिया कि चूकि कांग्रेस दलित विरोधी है, इसलिए रीता जोशी ने सोनिया गांधी के इशारे पर एक दलित की बेटी मायावती के खिलाफ इस तरह की भाषा का प्रयोग कर उन्हें अपमानित करने की चेष्टा की। अब सोनिया संसद में माफी मांगें। आश्चर्य की बात है की जिस भाषा का प्रयोग रीता जोशी ने किया है, ठीक उसी तरही की बातें खुद मायावती ने जनवरी २००७ में मुलायम सिंह यादव के लिए की थी. मायावती अपनी उन कटु टिप्पणियों को भूल गई. &lt;br /&gt;कांग्रेस की ओर से नपे-तुले शब्दों में प्रतिक्रिया आयी। कहा गया कि रीता जोशी पहले ही उन शब्दों के लिये खेद व्यक्त कर चुकी हैं। कांग्रेस भी इस तरह के शब्दों के उपयोग को सही नहीं मानती लेकिन प्रतिक्रिया स्वरूप जिस तरह उनके घर और कारों को आग लगायी गयी, और पुलिस घंटों तक मौके पर नहीं पहुंची, उससे साफ है कि यह सब सरकार की शह पर किया गया। इस घटना से प्रदेश की राजनीति गरमा गयी है। करीब एक दर्जन सीटों पर वहां विधानसभा उप चुनाव हो रहे हैं। बसपा अब इस मामले को तूल देकर कांग्रेस को घेरने की कोशिश करेगी। कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतारकर संगठन को सक्रिय करेगी। समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी इसे कांग्रेस-बसपा की नूरा-कुश्ती बताकर पल्ला झाड़ लिया है। जाहिर है, इस बेवजह के विवाद के चलते राज्य की मूलभूत समस्याएं कुछ समय के लिये नेपथ्य में चली जाएंगी। यही मायावती चाहती हैं। &lt;br /&gt;कांग्रेस के कुछ नेता कह रहे हैं कि रीता बहुगुणा जोशी को जिस तरह गिरफ्तार किया गया, वह सही नहीं है। वे खेद व्यक्त कर चुकी थीं। उन्हें सफाई का मौका दिया जाना चाहिए था। जब वरुण गांधी को मायावती सरकार ने लपेटा था, तब यही कांग्रेसी नेता माया सरकार की कार्रवाई को सही ठहराते नजर आ रहे थे। भड़काऊ, आपत्तिजनक और अमर्यादित बयान देने की छूट किसी को भी क्यों होनी चाहिए? वो टिकैत हों, वरुण गांधी या फिर रीता जोशी। यदि उन्होंने कानून तोड़ा है तो उन पर कार्रवाई होनी ही चाहिए। वे राजनेता हैं, इसलिये उनके प्रति नरमी दिखायी जानी चाहिए-एेसा कहने और सोचने वाले क्चया कानून के राज में विश्वास रखते हैं? हालांकि जिस तरह लोकसभा चुनाव में मायावती ने वरुण गांधी की गिरफ्तारी को वोटों में तब्दील करने की कोशिश की, उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता। रीता जोशी की गिरफ्तारी भी उन्होंने एससी एसटी एक्ट में करायी है। इससे लगता है कि मायावती कांग्रेस को दलित विरोधी करार देने की कोशिश करेंगी। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन राजनीतिक स्कोर के लिये इस तरह की राजनैतिक पैंतरेबाजी को सही नहीं ठहराया जा सकता। क्या यह सही समय नहीं है, जब हमारे नेता आत्मचिंतन करें कि वे किस तरह का आचरण करने लगे हैं। बाहर ही नहीं, कई बार तो संसद तक में असंसदीय शब्दों का प्रयोग किया जाता है। वैसे एक सवाल राज्य की मुख्यमंत्री मायावती से भी है कि वे रीता जोशी के घर को जलाने के कृत्य को गैर कानूनी मानती हैं या नहीं? अगर हां तो जितनी जल्दबाजी उन्होंने रीटा को गिरफ्तार करने में दिखायी है, इस मामले में क्यों नहीं दिखायी? घटना के 24 घंटे बाद भी अपराधियों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया, जबकि नामजद रिपोर्ट करायी जा चुकी है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-387125501136924472?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/387125501136924472/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=387125501136924472' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/387125501136924472'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/387125501136924472'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/07/blog-post_17.html' title='अमर्यादित और बदले की राजनीति'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SmAYo8NbF7I/AAAAAAAAAlI/WGPX9kl475U/s72-c/mayawati.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-2726547906579358450</id><published>2009-07-10T18:21:00.003+05:30</published><updated>2009-07-10T18:42:01.386+05:30</updated><title type='text'>ज़रदारी के बयान पर खामोशी क्यों</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Slc8g6xpsCI/AAAAAAAAAk8/cQHzG-JxheU/s1600-h/asif+ali+zardari.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 234px; height: 320px;" src="http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Slc8g6xpsCI/AAAAAAAAAk8/cQHzG-JxheU/s320/asif+ali+zardari.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5356816818011484194" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;हर कोई हैरान है। इस पर भी कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने यह सच स्वीकार कर लिया कि आतंकवादी पाकिस्तान ने ही पाले-पोसे हैं और इस पर भी कि भारत सरकार पाक की इस स्वीकारोक्ति के बाद भी खामोश बनी हुई है। हैरानी यह देखकर भी हुई कि जी-आठ देशों ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ी जा रही जंग में पाकिस्तान को पूरा सहयोग करने का एेलान किया है। अमेरिका पहले ही पाकिस्तान को दी जा रही आर्थिक सहायता में तीन गुना वृद्धि कर चुका है। सवाल यह है कि जरदारी के खुलासे के बाद पाकिस्तान को आतंकवाद का पोषक मानें या उससे पीड़ित? जरदारी के बयान के बाद आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान की भूमिका पर क्या किसी को शंका होनी चाहिए? भारत तीस साल से पाक प्रायोजित आतंकवाद का शिकार है। भारत कहता आया है कि पाकिस्तान न केवल आतंकियों की जमात तैयार करने में लगा है बल्कि उसने इसे सरकारी नीति में शामिल कर लिया है। आईएसआई और सेना के पूर्व अधिकारी आतंकवादियों को भर्ती करते हैं। उन्हें प्रशिक्षण देते हैं। अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्र चलाने की सघन ट्रेनिंग के बाद उन्हें मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, बंगलुरू, अयोध्या, संसद, लालकिला जैसे टारगेट दिये जाते हैं। वे अवैध रूप से भारतीय सीमा में घुसपैठ करते हैं। मासूमों का कत्लेआम करते हैं। आतंकियों को घुसपैठ कराने के लिए पाकिस्तानी सेना हर हथकंडा अपनाती है। शुरू में पश्चिमी देशों ने भारत के इन खुलासों को गंभीरता से नहीं लिया लेकिन 2001 में जैसे ही अमेरिका पर अटैक हुआ, उनकी समझ में आ गया कि पाकिस्तान की धरती पर किस तरह के सांप-सपोले तैयार किए जा रहे हैं। वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला करने वाले आतंकवादियों में से अधिकांश के तार किसी न किसी तरह से पाकिस्तान से जुड़े थे। &lt;br /&gt;आसिफ अली जरदारी ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए जो कटु सत्य स्वीकार किया, उसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति दो ही सूरतों में इस तरह की सच्चाई स्वीकार करता है। या तो उसे इसका इल्म ही न हो कि वह जो कहने जा रहा है, उसके नतीजे क्या होंगे या फिर वह व्यक्ति एेसा खुलासा कर सकता है, जिसे शासन चलाने में दिक्कतें पेश आ रही हों और उसके मातहत काम करने वाले उसकी सुन ही नहीं रहे हों। जरदारी किन हालातों में इस पद तक पहुंचे हैं, यह किसी से दबी-छुपी बात नहीं है। उन्होंने बेनजीर भुट्टो को आतंकवाद के हाथों खोया है। कई साल के वनवास के बाद जब वे पाकिस्तान लौटी तो आत्मघाती हमले में मारी गईं। उस समय जनरल परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति थे। सेना, शासन-प्रशासन सब उनके इशारे पर काम करता था। अपनी हत्या से पहले बेनजीर यह आरोप लगा चुकी थीं कि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा नहीं दी जा रही है। उनकी हत्या के बाद इस तरह के आरोप लगे कि आईएसआई के कुछ अधिकारी नहीं चाहते थे कि बेनजीर की सत्ता में वापसी हो। बेनजीर की हत्या के बाद आम चुनाव हुए। उनकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को जनादेश मिला। यूसुफ रजा गिलानी प्रधानमंत्री बने और बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति। &lt;br /&gt;जाहिर है, मुशर्रफ और उनकी सरकार के उन चेहरों की विदाई हो गई जो लंबे समय से पाकिस्तानी निजाम पर काबिज थे। वैसे तो मुशर्रफ के रहते हुए ही तालिबान, अलकायदा और कुछ दूसरे चरमपंथी संगठनों ने आंखें तरेरनी शुरू कर दी थी लेकिन जैसे ही बेनजीर की पार्टी सत्ता में आई, इन जमातों ने खुलकर खून-खराबा शुरू कर दिया। मुशर्रफ की विदाई और जरदारी की ताजपोशी अमेरिका की इस शर्त पर हुई थी कि यह सरकार एक तो मुशर्रफ के खिलाफ किसी तरह की बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करेगी। दूसरे, पाक सरकार अफगानिस्तान सीमा पर चल रही अमेरिकी कार्रवाई में सहयोग देगी। जाहिर है, चरमपंथी संगठनों को पाकिस्तान सरकार द्वारा अमेरिकी हकूमत के इशारों पर नाचना नागवार गुजरा। उन्होंने स्वात ही नहीं, लाहौर, इस्लामाबाद, कराची से लेकर देश के सभी प्रमुख शहरों में बड़े धमाके किए। विदेशी पर्यटकों की पहली पसंद पांच सितारा होटलों, विदेशी दूतावासों, पुलिस, सेना और अधिकारियों पर अटैक शुरू कर दिए। आज पाकिस्तान में हालात कितने भयावह हैं, यह पूरी दुनिया जान चुकी है। श्रीलंका की क्रिकेट टीम को दौरा बीच में ही छोड़कर किन हालातों में स्वदेश लौटना पड़ा, यह सबने देखा। जब से यह सरकार बनी है, तब से देश में पूरा निजाम ठप है। विदेशियों की आमद में भारी कमी दर्ज की गई है। &lt;br /&gt;राष्ट्रपति जरदारी बच्चे नहीं हैं। जानते हैं कि जो कह रहे हैं, उसके नतीजे क्या होंगे। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने उनके बयान पर सफाई देकर मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की है परन्तु कमान से तीर निकल चुका है। जुबान से निकली बात पर कितनी भी लीपा-पोती की कोशिश की जाए, उससे पल्टा नहीं जा सकता। उन्होंने जो कुछ कहा, उसके अर्थ साफ हैं। उनके निशाने पर पूर्व राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ ही नहीं, उनके पूर्ववर्ती शासनाध्यक्ष भी हैं, जिन्होंने भारत और अफगानिस्तान को अस्थिर करने के लिए आतंकवादियों को न केवल पाला-पोसा, बल्कि संरक्षण भी दिया। पाकिस्तान के चेहरे पर पड़ा नकाब तब उतरना शुरू हुआ था, जब सीमा पार से भेजे गए आतंकियों की पहचान भारत ने की और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाक को बेनकाब किया। जरदारी ने कहा कि पाकिस्तान ने अपने सामरिक हितों को साधने के लिए ही आतंकवादियों को पाला-पोसा लेकिन आतंकियों ने 9-11 की घटना के बाद उन्होंने पाकिस्तान को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया। &lt;br /&gt;दरअसल, पाकिस्तानी निजाम की समझ में अब आ रहा है कि आतंकवादियों को पाल-पोस और प्रश्रय देकर उसने कितनी बड़ी भूल की है। अलकायदा, तालिबान, लश्कर ए तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन सहित अनेक आतंकवादी संगठनों को वहां से लगातार खाद-पानी मिलता रहा। ओसामा बिन लादेन हों या मुल्ला उमर, हिजबुल-लश्कर और जमात उद दावा के हाफिज मोहम्मद सईद हों या बैतुल्लाह-वे तभी तक शांत थे, जब तक पाकिस्तान उन्हें मनमानी करने की छूट दिए हुआ था। जैसे  ही अमेरिकी सेनाओं ने उन पर शिकंजा कसा, इन सभी चरमपंथी संगठनों की बंदूक की नालें पाकिस्तानी निजाम की ओर तन गई। अभी भी पाकिस्तानी सेना और आईएसआई में एेसे बहुत से अफसर हैं, जो चरमपंथियों के प्रति हमदर्दी रखते हैं। वे नहीं चाहते कि जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग उनकी करतूतों का इस तरह खुलासा करें क्योंकि इससे मुशर्रफ सहित अनेक चेहरों पर पड़े नकाब उतर जाने का खतरा है। जरदारी के बयान पर खामोशी औढ़ने के बजाय भारत को सारे विश्व को बताना चाहिए कि पाकिस्तान ने प्रशिक्षित आतंकियों को भेजकर किस तरह यहां मासूमों की हत्या कराई और मुंबई जैसे हमले करवाकर भारत को अस्थिर करने का षड़यंत्र रचा। जब तक पाकिस्तान आतंकियों के ढाचे को पूरी तरह खत्म नहीं कर दे, तब तक भारत को उससे किसी स्तर की बातचीत भी नहीं करनी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-2726547906579358450?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/2726547906579358450/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=2726547906579358450' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2726547906579358450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/2726547906579358450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/07/blog-post_10.html' title='ज़रदारी के बयान पर खामोशी क्यों'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Slc8g6xpsCI/AAAAAAAAAk8/cQHzG-JxheU/s72-c/asif+ali+zardari.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-5021693325136699225</id><published>2009-07-06T20:49:00.003+05:30</published><updated>2009-07-06T21:07:10.247+05:30</updated><title type='text'>भोजन का अधिकार क्यों नहीं</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SlIZuapXX6I/AAAAAAAAAkw/ujLaivzXkrg/s1600-h/IndiaBegger.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 232px; height: 320px;" src="http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SlIZuapXX6I/AAAAAAAAAkw/ujLaivzXkrg/s320/IndiaBegger.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5355371192114438050" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;करोड़ों परिवारों और लोगों के पास आज भी अपना घर नहीं है। मध्यम आय वर्गीय परिवार शहरों में किराए के मकानों में रहने को विवश हैं, क्योंकि जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं। बैंकों से ब्याज पर ऋण लेने की वे हिम्मत नहीं कर पाते। ब्याज दरें हद से ज्यादा हैं, जिन्हें बैंक कम करने को तैयार नहीं हैं। यह हाल तो नौकरीपेशा, मध्य आय वर्गीय परिवारों का है। अब जरा उनके बारे में सोचिए, जो दूर दराज के राज्यों से एक जोड़ी कपड़ों में महानगरों, नगरों और कस्बों की ओर रोजी-रोटी की तलाश में चले आते हैं। इनमें मजदूर, रिक्शा चालक और भीख मांगकर अपना पेट भरने वाले करोड़ों लोग शामिल हैं। ये लोग फुटबाथ पर रातें गुजारने को मजबूर हैं। तपती रातें हों, कड़ाके की ठंड अथवा बरसात का मौसम, इनके लिए कोई बचाव नहीं है। हालात भयावह हैं। भुखमरी, कुपोषण, गरीबी, अभाव-एेसे अभिशाप बन गए हैं, जो भारत की करीब तीस-पैंतीस करोड़ आबादी का दामन छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जब हमें आजादी मिली, तब देश की आबादी लगभग इतनी ही थी। इस गरीब आबादी पर सरकारों को भी दया नहीं आती। शायद इसलिए, क्योंकि यह अपने मताधिकार का उपयोग भी नहीं कर पाती है। लाखों नौजवान शहरों में कामकाज की तलाश में आते हैं लेकिन जब नौकरी नहीं मिलती तो रिक्शा चलाकर या दिहाड़ी कमाकर किसी तरह उदर पूर्ति करते हैं। किराए बहुत ज्यादा होने के कारण ये लोग रहने का ठौर-ठिकाना भी नहीं कर पाते। इनके सामने फुटबाथों पर रातें गुजारने के सिवा कोई चारा नहीं बचता। डा. मनमोहन सिंह सरकार ने अगले पांच साल में शहरों को झुग्गी-झोंपड़ियों मुक्त करने का एेलान तो किया है लेकिन उस आबादी को छत देने का भरोसा उसने भी नहीं दिया है, जो सड़कों के बीच या किनारों पर स्थित फुटबाथ पर रातें बिताती है। &lt;br /&gt;आंकड़े चौंकाने वाले हैं, लेकिन यह वास्तविकता है कि आजादी के बासठ साल बाद भी भारत की बीस करोड़ से अधिक आबादी कुपोषण और भुखमरी की शिकार है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उड़ीसा से तो भुखमरी की खबरें मिलती ही रहती हैं, बाकी राज्य भी अपवाद नहीं हैं। पूरे विश्व में हर दिन करीब 18 हजार बच्चे भूख से मर रहे हैं। विश्व की करीब 85 करोड़ आबादी रात में भूखे पेट सोने के लिए विवश है। पूरी दुनिया में करीब 92 करोड़ लोग भुखमरी की चपेट में हैं। भारत की बात करें तो हमारे देश में 42.5 फीसद बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। 2006 एेसा वर्ष रहा, जिसमें भूख या इससे होने वाली बीमारियों के कारण पूरे विश्व में 36 करोड़ लोगों की मौत हुई थी। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ भारत में करीब 20 करोड़ लोग खाली पेट रात में सोने के लिए विवश हैं। पिछले दिनों न्यूयार्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे विश्व के तमाम देशों की तुलना में भारत में वृहत पैमाने पर बाल पोषण कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके बावजूद भारत की हालत चिंताजनक है। भारत में जब से आर्थिक उदारीकरण आया है, एक अद्भुत विरोधाभास उदारवादियों में देखने को मिला है। जहां भारत में कई जगह अभ्युदय हो रहा है, वहीं हालात 20 साल से ज्यादा खराब होते गए हैं। खासकर लोगों की खुराक कम हुई है। सिर्फ जिंदा रहने के लिए लोग इस देश में भोजन ग्रहण कर रहे हैं और इसका मूल कारण जनसंख्या का बढ़ना नहीं है, जैसा कि अनुमान लगाया जाता रहा है। कारण है, सरकारों की उदासीनता। सरकारी नीतियां अत्यंत गरीबों और वंचितों को केन्द्र में रखकर बनाई ही नहीं जाती। &lt;br /&gt;भारत विश्व की दूसरी सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था हो सकती है लेकिन मंजिल अभी भी बहुत दूर है क्योंकि भुखमरी को दूर करना सबसे बड़ी समस्या है और विश्व में भारत को इसमें 94वां स्थान मिला है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स में जारी अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्था के विश्व भुखमरी सूचकांक -2007 में भारत को 118 देशों में 94वें स्थान पर रखा गया है। भारत का सूचकांक अंक 25.03 है, जो वर्ष 2003 (25.73) के मुकाबले कुछ ही बेहतर हुआ है। आंकड़े बताते हैं कि हालात कितने खराब हैं। लगता ही नहीं कि सरकारें गरीबी दूर करने, असमानता मिटाने और बेहद अभावों में जी रहे लोगों का जीवन स्तर बेहतर बनाने की दिशा में ठोस उपाय कर रही है। सभी राजनीतिक दल नारे तो बहुत आकर्षक देते आए हैं परन्तु उनकी नीतियां गरीब विरोधी रही हैं। सरकारें अपना बजट या तो कारपोरेट घरानों की सलाह पर बनाती हैं अथवा मध्यम आय वर्गीय परिवारों के दबाव में, जिनके बारे में यह धारणा बन गई है कि सरकारें बनाने या गिराने में यह वर्ग ही महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। आजादी के बाद की विकास यात्रा का अध्ययन करें तो पता चलता है कि अमीर और अमीर हुए हैं। गरीब और ज्यादा गरीब होते चले गए हैं। यह आंकड़े आंखें खोलने वाले हैं। यहां के 35 अरबपति परिवारों की संपत्ति 80 करोड़ गरीब, किसानों, जमीन से वंचित ग्रामीणों, मजदूरों, शहरी झुग्गी-झौंपड़ी वालों की कुल संपत्ति से ज्यादा है। दूसरी तरफ दुनिया में 14 करोड़ 30 लाख बो कुपोषण के शिकार हैं। इनमें से 5 करोड़ 70 लाख भारत में हैं, जो 47 प्रतिशत होता है। एक हकीकत यह भी है कि गरीब ज्यादा तेजी से मर रहे हैं। उनकी आबादी भी बढ़ रही है। &lt;br /&gt;कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ का नारा देकर फिर से सत्ता में लौटी डा. मनमोहन सिंह की सरकार ने बजट सत्र में शिक्षा के अधिकार का विधेयक लाने का एेलान किया है। यह अपने आप में कम हैरत की बात नहीं है कि अब तक बनी सरकारों को शिक्षा के अधिकार का कानून बनाने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। चूकि मनमोहन सरकार ने यह पहल की है, इसलिए उसे साधूवाद दिया जाना चाहिए, लेकिन कुपोषण-भुखमरी और अत्यंत गरीबी को देखते हुए क्या सरकार का यह फर्ज नहीं बनता है कि वह भोजन के अधिकार का कानून भी बनाए। राज्य सरकारें भले ही बदनामी के भय से भुखमरी की घटनाओं से इंकार करें परन्तु हकीकत यह है कि लगभग हर राज्य में भूख और बेहद गरीबी से लोग मर रहे हैं। देश को आजाद हुए बासठ साल हो गए हैं। आश्चर्य और अफसोस की बात है कि आज तक भी किसी सरकार ने भोजन के अधिकार का कानून नहीं बनाया। कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने इस आशय का विधेयक विधानसभा में लाने की घोषणा की है। बाकी राज्य सरकारें अभी तक चुप्पी साधे बैठी हैं। देखना यही है कि क्या केन्द्र की सरकार इस दिशा में पहल करेगी? क्या प्रणब मुखर्जी गरीबों को यह अधिकार देने की पहल करेंगे? पूरे देश की निगाहें प्रणब मुखर्जी पर टिकी थी। हर साल बजट पेश करने की परंपरा का निर्वहन करते हुए उन्होंने सोमवार को लोकसभा में इस साल के शेष बचे आठ महीनों के लिए बजट पेश किया। लोगों को उम्मीद थी कि वे राइट टु फूड (भोजन का अधिकार) पर कुछ ठोस पहल करेंगे, लेकिन उन्होंने केवल खाद्य सुरक्षा की बात की। जाहिर है, इससे अत्यंत गरीबों और वंचितों को फिर गहरी निराशा हुई होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-5021693325136699225?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/5021693325136699225/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=5021693325136699225' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5021693325136699225'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5021693325136699225'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='भोजन का अधिकार क्यों नहीं'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/SlIZuapXX6I/AAAAAAAAAkw/ujLaivzXkrg/s72-c/IndiaBegger.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-4106532187748687889</id><published>2009-06-21T19:11:00.002+05:30</published><updated>2009-06-21T19:19:06.433+05:30</updated><title type='text'>लालगढ़ों के मूल को समझना होगा</title><content type='html'>लालगढ़ सुर्खियों में है। पिछले करीब दस दिन से मीडिया की प्रमुख खबर बना हुआ है। पहले खबर आई कि माओवादियों ने सत्तारूढ़ सीपीएम के पार्टी दफ्तर को आग लगा दी। फिर पता चला कि उन्होंने चार नेताओं की हत्या कर दी। खबर आई कि वहां की पुलिस चौकी वीरान हो गई है। सीपीएम समर्थक इलाका छोड़कर भाग खड़े हुए हैं। माओवादियों की तरफ से एेलान हुआ कि लालगढ़ इलाका अब आजाद है। यानि वहां पूरी तरह माओवादियों का राज स्थापित हो गया है। टीवी चैनलों पर शुरू में जो तस्वीरें दिखाई गई, उनसे यह भ्रम बना कि वहां नक्सलवादी जो चाह रहे हैं, कर रहे हैं। सरकार, प्रशासन-पुलिस, कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। केन्द्र जागा। गृहमंत्री पी चिदम्बरम ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य से बात की। पूछा कि इतनी ढील क्यों दे रखी है? केन्द्रीय बलों की कई और कंपनी वहां भेजी गई। टीवी चैनलों पर जो ताजा फुटेज आ रहे हैं, उनमें माओवादी सीन से गायब हैं और अद्धसैनिक बलों के जवान सड़कों, गांवों में बेखौफ आगे बढ़ते और घरों से लोगों को निकालकर लठियाते हुए दिखाई दे रहे हैं। &lt;br /&gt;लालगढ़ को लेकर जिस तरह का हव्वा खड़ा किया गया, क्या वह ठीक है? क्या लालगढ़ में जो हुआ, वैसा कभी कहीं नहीं हुआ? घाटी के तो कई इलाकों में अलगाववादी इसी तरह की कानून व्यवस्था की समस्याएं खड़ी करते रहते हैं। उड़ीसा, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड में भी नक्सलवादी जगह जगह बारूदी सुरंगें बिछाकर सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों पर प्राणघातक हमले करते रहते हैं। पश्चिम बंगाल एेसा अकेला राज्य तो नहीं, जहां नक्सलवादियों ने कानून और व्यवस्था को ध्वस्त किया है। देश के पंद्रह राज्यों के डेढ़ सौ से अधिक जिले इस समय माओवादी हिंसा और आंदोलन से पीड़ित हैं। इन राज्यों में फरवरी से मई के बीच तीन महीने के भीतर सुरक्षा बलों के सौ से अधिक जवान और अफसर नक्सली हिंसा में मारे जा चुके हैं। नई दिल्ली में गृहमंत्री चिदम्बरम ने सवाल पूछा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने समय रहते लालगढ़ में हिंसारत माओवादियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई क्यों नहीं की? उनके संगठन को प्रतिबंधित क्यों नहीं किया गया? गृहमंत्री से पूछा जाना चाहिए कि क्या बाकी सभी प्रभावित राज्यों में माओवादी संगठन प्रतिबंधित हैं?&lt;br /&gt;लालगढ़ वेस्ट बंगाल के पश्चिमी मिदनापुर जिले का कस्बा है। यह आदिवासी इलाका है और उत्तर से उत्तर पूर्व होते हुए दक्षिण-पूर्व तक गए उस लाल गलियारे का अंग है, जिसके बारे में कहा जाता है कि माओवादी उसे आजाद क्षेत्र बनाने के सपने देख रहे हैं। यह लाल पट्टी नेपाल की सीमा से लेकर बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश होते हुए महाराष्ट्र तक जाती है। सत्तर के दशक में शुरू हुआ माओवादी आंदोलन इस समय अपने सबसे विकट स्वरूप में हमारे सामने है। एक लंबे अरसे से नक्सली नेता गरीबों, किसानों, आदिवासियों, बेरोजगारों को न्याय दिलाने के नाम पर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहे हैं। यह बात सिद्ध हो चुकी है कि उनके तार पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से लेकर नेपाल के माओवादियों तक से जुड़े हैं, जो भारत को अस्थिर होते देखना चाहते हैं। माओवादी हिंसा में अब तक हजारों बहुमूल्य जानें जा चुकी हैं। इनमें बड़ी संख्या सुरक्षाकर्मियों की भी है, जो कभी बारूदी सुरंगों तो कभी माओवादियों के बर्बर हमलों की भेंट चढ़ गए। माओवादी आंदोलन-हिंसा और इस त्रासदी का सबसे निराशाजनक पहलू सरकार का रवैया है। &lt;br /&gt;केन्द्र और प्रभावित राज्य सरकारों ने नक्सली हिंसा से निपटने की हुंकार तो बहुत बार भरी लेकिन किया धरा कुछ खास नहीं। सरकारी रवैये से यह आम धारणा बन गई है कि जब तक सुरक्षाकर्मी और आम आदमी किसी हिंसा की बलि चढ़ते रहते हैं, तब तक सरकारों के कानों पर जूं नहीं रेंगती। जैसे ही किसी बड़े नेता अथवा मुख्यमंत्री पर हमला होता है, सरकार की चेतना लौट आती है। आंध्र प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडु पर नक्सली हमला हुआ तो वहां नक्लसवादियों के निपटने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। पिछले साल नवम्बर में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य के काफिले को भी पश्चिम मिदनापुर जिले में ही नक्चसलवादियों ने बारूदी सुरंग से उड़ाने की कोशिश की। खासकर इस क्षेत्र के चार जिलों में माओवादियों और सीपीएम के बीच वर्चस्व को लेकर संघर्ष छिड़ा हुआ है। यह अपने आप में आश्चर्य का विषय है कि मुख्यमंत्री पर हमले के बाद भी सरकार ने हिंसा में लिप्त संगठनों के खिलाफ उस तरह की सख्त कार्रवाई नहीं की, जसी जरूरत और अपेक्षित थी। संभवत: यही वजह है कि उनके हौंसले बुलंद होते गए। &lt;br /&gt;जमीनी हकीकत यह है कि राज्य सरकारों के पास न तो नक्सलवादी संगठनों से निपटने की राजनीतिक इच्छाशक्ति है और न ही संसाधन। केन्द्र दावा करता है कि आधुनिक साजो सामान खरीदने के लिए वह प्रभावित राज्यों को हर साल बड़ी रकम देता रहा है, जबकि राज्य पैसे की कमी का रोना रोते रहते हैं। राज्यों की सत्तारूढ़ पार्टियों को यह भय भी सताता रहता है कि सख्ती करने से कहीं उनका वोट बैंक न खिसक जाए। &lt;br /&gt;लालगढ़ की घटना को खतरे की एक और घंटी मानते हुए केन्द्र सरकार को पहल करनी होगी। प्रधानमंत्री पहले भी प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुला चुके हैं। इस समस्या के हर पहलू को समझना होगा। यह केवल कानून और व्यवस्था की ही समस्या नहीं है। इसके सामाजिक और आर्थिक पहलू भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह ठीक है कि किसी को भी हिंसा की इजाजत नहीं दी जा सकती और एेसे तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की ही जानी चाहिए लेकिन सरकार को इस पर भी गहन मंथन करना होगा कि आखिर इस पूरी आदिवासी पट्टी का आजादी के इतने सालों बाद भी वैसा  विकास क्चयों नहीं हो सका, जैसा देश के अन्य भू-भागों का हुआ है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-4106532187748687889?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/4106532187748687889/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=4106532187748687889' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/4106532187748687889'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/4106532187748687889'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/06/blog-post_21.html' title='लालगढ़ों के मूल को समझना होगा'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-678340068237998061</id><published>2009-06-15T16:27:00.003+05:30</published><updated>2009-06-15T16:44:04.130+05:30</updated><title type='text'>धोनी नहीं, बीसीसीआई को कोसें</title><content type='html'>पिछली टी-ट्वेंटी विश्व चैम्पियन टीम इंडिया सुपर-8 मुकाबले के तीन में से दो शुरुआती मैच हारने के बाद मुकाबले से बाहर हो गई है। इस बार वह सेमीफाइनल में भी नहीं पहुंच पायी। जाहिर है, उन करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह बुरी खबर है, जो भारतीय टीम को सिर्फ और सिर्फ जीतते हुए देखना चाहते हैं। जीत का यह चस्का टीम इंडिया के साथ-साथ भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को भी लग चुका है। पिछले दो साल से इस टीम के प्रदर्शन में निरंतरता रही है। उसने आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, पाकिस्तान, न्यूजीलैंड से लेकर इंग्लैंड जैसी श्रेष्ठ टीमों को परास्त किया है। पिछले टी-ट्वेंटी विश्व कप को जीतकर तो जैसे धोनी की अगुआई वाली यूथ ब्रिगेड ने तहलका ही मचा दिया था। सब जानते हैं कि वनडे की विश्व चैम्पियन आस्ट्रेलिया टीम का मान मर्दन सबसे पहले टीम इंडिया ने ही किया था। विदेशी जमीन पर जिस तरह की जीतें इस टीम ने दर्ज की हैं, उससे लोगों का उस पर भरोसा पुख्ता हुआ। यही वजह है कि भारतीयों की उम्मीदें इस बार भी सातवें आसमान पर थीं। वे धोनी के धुरंधरों के हाथ में इस बार भी टी-ट्वेंटी कप की चमचमाती हुई ट्राफी देखना चाहते थे। &lt;br /&gt;यह नामुमकिन भी नहीं था। जिस तरह का प्रदर्शन यह टीम करती आई है, उससे लग रहा था कि इस टूर्नामैंट में भी ये खिलाड़ी वैसा ही करिश्मा दोहरा सकते हैं। एक-दो फेरबदल करके धोनी को लगभग वही टीम दी गई, जो पिछली बार विश्व कप लेकर मुंबई लौटी थी। जिसका मुंबई में शानदार स्वागत किया गया था। हालांकि यह कहने वालों की कमी नहीं है कि सचिन तेंदुलकर जैसे अनुभवी क्रिकेटर को टी-टवेंटी टीम में भी रखा जाना चाहिए लेकिन लगता है, खुद मास्टर ब्लास्टर ही यह नहीं चाहते कि उनकी वजह से इस टीम के बेटिंग आर्डर में किसी तरह की छेड़छाड़ की जाए। वे भारत के लिए लंबे अरसे से ओपनिंग करते रहे हैं। इस टूर्नामैंट से पहले वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर की जोड़ी अच्छे तालमेल से खेलते हुए अच्छी शुरुआत देती रही है। यह अलग बात है कि कंधे की चोट के कारण सहवाग को लंदन से वापस लौटना पड़ा और धोनी को उनके स्थान पर मुंबई के रोहित शर्मा को खिलाना पड़ा। सहवाग ने चोट छिपाई या बीसीसीआई ने धोनी को विश्वास में नहीं लिया, यह जांच का विषय है क्योंकि इसी प्रकरण के बाद से धोनी काफी उखड़े-उखड़े नजर आए। &lt;br /&gt;टी-टवेंटी के इस विश्व खिताबी मुकाबले में टीम इंडिया के सुपर-8 मुकाबले में ही बाहर हो जाने के बाद जाहिर है, कई तरह के सवाल उठेंगे। वह उठने शुरू भी हो चुके हैं। सवाल उठने भी चाहिए क्योंकि इसी से सुधार की शुरुआत होती है। धोनी पर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। उन पर बेवजह बेटिंग आर्डर से छेड़छाड़ करने, आउट आफ फार्म गेंदबाजों को खिलाने, खुद अच्छा प्रदर्शन नहीं करने, इंग्लैंड के साथ होने वाले करो या मरो वाले मैच से पहले प्रेक्टिस नहीं करने जैसे कितने ही आरोप लगाए गए हैं। बीस ओवरों वाले इन मैचों में निर्णय तुरंत लेने होते हैं। उसमें आप इंतजार नहीं कर सकते। इंग्लैंड के खिलाफ जिस मैच में तीन रन से हारने के बाद टीम टूर्नामैंट से बाहर हुई, उसमें रवीन्द्र जड़ेजा जैसे कम अनुभवी बल्लेबाज को जबरदस्त फार्म में चल रहे अनुभवी युवराज सिंह से पहले भेजने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि 35 गेंदों में सिर्फ 25 रन बनाने वाले जड़ेजा ने बहुत धीमा खेला, जबकि उस समय तेज खेलकर टीम पर प्रति ओवर रन रेट का बोझा कम करने की जरूरत थी। धोनी ने भी माना है कि उनका यह फैसला गलत साबित हुआ। उन्होंने उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करने पर देशवासियों से माफी भी मांगी है। &lt;br /&gt;धोनी बेहतरीन खिलाड़ी और एक सुलङो हुए कप्तान हैं। उनके नेतृत्व में भारतीय टीम ने विदेशी धरती पर जाकर वह कारनामा कर दिखाया है, जो बरसों से कोई टीम या कप्तान नहीं कर सका। वह आगे बढ़कर खुद कमान संभालते रहे हैं। उनकी और उनके निर्णयों की आलोचना करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि धोनी की यह यूथ ब्रिगेड ही पिछली बार टी-टवेंटी विश्व कप जीतकर लायी थी। इसी टीम ने देश को विश्व चैम्पियन होने का गौरव दिलाया था। एेसा नहीं है कि सेमीफाइनल से पहले ही किसी टूर्नामैंट से बाहर हो जाने से दुख नहीं होता, लेकिन यह कोई पहली एेसी टीम नहीं है, जो इस तरह विदा हुई हो। आस्ट्रेलिया जैसी विश्व चैम्पियन तो इस बार लीग मुकाबलों में ही बाहर हो गई। यह समय दरअसल, कप्तान और टीम की हौसला अफजाई का है न कि जाने-अनजाने उनकी आलोचना करके उनका मनोबल गिराने का। &lt;br /&gt;प्रशंसकों के लिए यह जानना जरूरी है कि जिस तरह कोई भी सफलता स्थायी नहीं होती, उसी तरह असफलता भी चिरकाल के लिए नहीं होती है। धोनी के जज्बे को सलाम किया जाना चाहिए, जिन्होंने टूर्नामैंट से बाहर होने के बाद जहां एक तरफ देशवासियों से माफी मांगी वहीं यह भरोसा भी जताया कि अगली बार भारतीय टीम टी-टवेंटी विश्व कप जीतकर दिखाएगी। बजाय इसके कि खिलाड़ियों की आलोचना करें और कप्तान के फैसलों में मीन-मेख निकालें, हमें उन कारणों की तह में जाना चाहिए, जिनके चलते इस बार टीम इंडिया सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच सकी। सचिन तेंदुलकर हों या सौरव गांगुली, गावस्कर हों या अनिल कुंबले-हरेक को यह विश्वास था कि टीम इस बार भी फाइनल खेलेगी। सचिन ने तो यहां तक कहा कि यह टीम किसी भी टीम को हराने में सक्षम है। फिर एेसा क्या हुआ कि वह मुकाबले से इस तरह बाहर हो गई? &lt;br /&gt;इसका जवाब धोनी नहीं, बीसीसीआई से पूछा जाना चाहिए। धोनी पर केवल यह आरोप लगाया जा सकता है कि उन्होंने अच्छी कप्तानी नहीं की लेकिन इन हालातों की असल जनक बीसीसीआई ही है जिसने खिलाड़ियों को नोट बनाने वाली मशीन में तब्दील करके रख दिया है। क्या किसी ने इस पर ध्यान दिया है कि इन खिलाड़ियों को कितना क्रिकेट खेलना पड़ रहा है? पिछले दो साल में उन्हें आराम के लिए पर्याप्त समय तक नहीं मिल पाया है। एक से दूसरे टूर्नामैंट के बीच थोड़ा बहुत समय होता भी है तो उसमें उन्हें अपने विज्ञापन अनुबंधों के तहत शूटिंग वगैरा के लिए समय निकालना पड़ता है। टी-ट्वेंटी विश्व कप से ठीक पहले आईपीएल का चालीस दिन से भी लंबा टूर्नामैंट दक्षिण अफ्रीका में होकर निपटा है। वहां से खिलाड़ी लौटे तो उन्हें लंदन की फ्लाइट पकड़नी पड़ी। बीसीसीआई की समझ में अब यह बात भी आ जानी चाहिए कि विश्व कप जैसे टूर्नामैंट से पहले यदि टीम इंडिया के खिलाड़ी अलग-अलग टीमों का हिस्सा बनकर एक-दूसरे के खिलाफ जी-जान लगाकर खेलेंगे तो फिर इतनी जल्दी एक टीम के रूप में उनका खेलना आसान नहीं होगा। जैसी एकजुटता पिछले विश्व कप में दिखी थी, वैसी इस बार सिरे से गायब थी। बैटिंग, बालिंग और फील्डिंग में खिलाड़ियों पर थकान साफ साफ नजर आ रही थी। इसलिए कोसना है तो धोनी को नहीं, बीसीसीआई को कोसें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-678340068237998061?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/678340068237998061/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=678340068237998061' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/678340068237998061'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/678340068237998061'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/06/blog-post_15.html' title='धोनी नहीं, बीसीसीआई को कोसें'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' 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सुरक्षा ड्यूटी में तैनात थे। इंदिरा गांधी को जब उन्होंने 31 अक्तूबर 1984 को गोलियों से छलनी कर लहूलुहान किया, तो अन्य सुरक्षाकर्मियों ने बेअंत और सतवंत सिंह पर फायर खोल दी। इन दोनों को अस्पताल भेजा गया। बेअंत ने दम तोड़ दिया जबकि सतवंत को पांच साल बाद केहर सिंह के साथ फांसी दे दी गयी। &lt;br /&gt;दिल दहला देने वाले इस हादसे के आरोपियों में से एक बेअंत अन्य सुरक्षाकर्मियों की गोलियों का शिकार हो गया जबकि प्रधानमंत्री की हत्या करने और उसकी साजिश रचने वाले सतवंत और केहर सिंह को मुकदमें के बाद 1989 में तिहाड़ में फांसी दे दी गयी। जिन्होंने इतनी बड़ी साजिश रची और उसे दुस्साहसिक तरीके से अंजाम दिया, उन्हें उनके किये की सजा मिल गयी। इस दिल दहला देने वाली घटना के बीस साल बाद 2004 में मैंने बेअंत सिंह, केहर सिंह और सतवंत सिंह के परिजनों से मुलाकात कर यह जानने की कोशिश की कि क्या घटना के दो दशक बाद उन्हें देश की प्रधानमंत्री की इस तरह हत्या कर दिये जाने पर अफसोस है? मुङो यह जानकर झटका लगा कि उन्हें प्रधानमंत्री की हत्या का रत्ती भर भी प्रायश्चित नहीं था। केहर सिंह की विधवा जसबीर कौर ने कहा कि इंदिरा गांधी नहीं मारी जानी चाहिए थीं, लेकिन अकाल तख्त को भी तहस-नहस नहीं किया जाना चाहिए था। बेअंत सिंह के उस समय सौ वर्षीय पिता सुच्चा सिंह ने आसमान की तरफ हाथ उठाते हुए जवाब दिया कि उस सच्चे बादशाह के घर को ढहाने वाले के साथ एेसा हुआ तो उन्हें कोई अफसोस नहीं है। जब मैं सुच्चा सिंह से चंडीगढ़ के पास स्थित गांव मलोया में मिला तो यह देखकर चौंका कि उनके घर में बीस साल बाद भी जरनैल सिंह भिंडरावाले की बड़ी सी तस्वीर लगी थी। &lt;br /&gt;जगदीश टाइटलर हों या सज्जन कुमार। एचकेएल भगत हों अथवा अन्य नेता, भले ही बाद में सब सफाई देते नजर आए कि उन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगों में कोई भूमिका नहीं निभाई, लेकिन तथ्य बताते हैं कि जिनका कोई कसूर नहीं था, उन्हें भी इंदिरा गांधी के मारे जाने के बाद नेताओं, प्रशासन और समाज के बड़े तबके ने खून के आंसू रुलाए थे। सिख विरोधी दंगों में तीन हजार लोगों का मारा जाना कोई छोटी-मोटी बात नहीं थी। हजारों सिख विधवाएं आज भी इंसाफ की बाट जोह रही हैं। अकालियों समेत अन्य राजनीतिक दलों ने सिख विरोधी दंगों का अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक ने में तो खूब इस्तेमाल किया, लेकिन पीड़ित परिवारों को शीघ्र न्याय मिले, इसके लिए उन्होंने कुछ नहीं किया। नतीजतन दंगों के इतने साल बाद भी बहुत से सिख परिवार इंसाफ के लिए ठोकरे खाते फिर रहे हैं। बहुत से परिवार एेसे हैं, जो दंगों से पहले बहुत साधन संपन्न थे, लेकिन दंगाइयों ने उनका सब कुछ छीन लिया। वे सड़कों पर आ गए। &lt;br /&gt;पुलिस की जांच में यह साफ हो गया था कि इंदिरा गांधी की हत्या की साजिश रचने वाला केहर सिंह था और साजिश को अंजाम देने वाले बेअंत और सतवंत थे। दिल्ली पुलिस के एक अन्य गिरफ्तार सब इंस्पेक्टर बलबीर सिंह को हालांकि निचली अदालत और हाईकोर्ट ने केहर और सतवंत के साथ फांसी की सजा सुनाई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेकसूर मानते हुए रिहा कर दिया, लेकिन कैट की सिफारिश के बावजूद सरकार ने बलबीर सिंह को वापस नौकरी पर बहाल नहीं किया। सरकार कैट के आदेश के खिलाफ कोर्ट चली गयी। मामला लंबा खिंचा तो बलबीर सिंह ने दिल्ली के एक गुरूद्वारे में सुरक्षा अधिकारी की नौकरी कर ली, लेकिन करीब चार साल तक वह जेल में रहे और इस बीच उनके परिवार को दुनिया भर की जलालतों का सामना करना पड़ा। &lt;br /&gt;बेअंत सिंह ने घायल होने के बाद दम तोड़ दिया लेकिन बाद में उनके परिवार पर भी बहुत बुरी बीती। उनकी पत्नी विमल खालसा लेडी हार्डिग हास्पीटल में नर्स थी। उन्हें पुलिस ने पूछताछ के लिए वहीं से उठा लिया। तीनों बच्चे अमृतकौर, जसविंदर और सर्वजीत स्कूल गए हुए थे। घर आए तो सारा सामान बिखरा पड़ा था। पुलिस ने घर की सघन तलाशी थी। विमल को कई दिन बाद छोड़ा गया। वह छोटे-छोटे बच्चों को लेकर चंडीगढ़ गई तो कोई उन्हें किराए पर मकान देने को तैयार नहीं हुआ। कई महीने उन्हें मोहाली के जंगल में स्थित एक ट्यूबवल के कमरे में बिताने पड़े। कोई स्कूल इंदिरा गांधी के हत्यारोपी बेअंत सिंह के बच्चों को एडमिशन देने को तैयार नहीं हुआ। बाद में उन्होंने खरड़ के एक मिशनरी स्कूल में दाखिला लिया। हालात एेसे बने कि तीनों भाई-बहनों को बाद में प्राइवेट बी काम और बीए करना पड़ा। हालांकि 1989 में विमल खालसा ने फिल्लौर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता लेकिन दो साल बाद ही रहस्यमय हालात में घर में उनकी मौत हो गई। &lt;br /&gt;केहर सिंह का बड़ा बेटा राजिन्दर सिंह विधि एवं न्याय मंत्रालय में स्टेनोग्राफर था। पिता गिरफ्तार हुए तो बेटे का फर्ज निभाते हुए उन्होंने पैरवी की। सरकार इतनी खफा हुई कि उसका मुंबई तबादला कर दिया गया। उसने छुट्टी ले ली तो केस बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में एक साल के लिए भीतर कर दिया। सरकारी नौकरी गई तो क्वार्टर भी छिन गया। बाद में उन्हें भी अपने परिवार के साथ दिल्ली के एक गुरूद्वारे के छोटे से कमरे में शरण लेनी पड़ी। जाने-माने वकील रामजेठमलानी को उन पर दया आई तो उन्होंने राजिन्दर सिंह को अपने यहां मुंशी रख लिया। ये घटनाएं बताती हैं कि जिन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या की, उनके परिवारजनों को भी समाज, प्रशासन और सरकार ने तरह-तरह से प्रताड़ित किया जबकि उन्हें षड़यंत्र की भनक तक नहीं थी। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि किसी देश की प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश जघन्य अपराध की श्रेणी  में आता है, लेकिन जिन्होंने अपराध किया, उन्हें कानून ने सजा दे दी थी। उनके परिवारों का क्या कसूर था, जिन्हें इस कदर प्रताड़ित किया गया। इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। न समाज के, न प्रशासन के और न ही सरकार के।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/995146313743172486-5563017491347564029?l=omkarchaudhary.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/feeds/5563017491347564029/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=995146313743172486&amp;postID=5563017491347564029' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5563017491347564029'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/995146313743172486/posts/default/5563017491347564029'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://omkarchaudhary.blogspot.com/2009/06/blog-post_10.html' title='रिश्तेदार थे, उनका यही कसूर था'/><author><name>ओमकार चौधरी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00252694907504968476</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/S4aMJEOh3cI/AAAAAAAAArg/PL0Esy8gC6E/S220/Omkar+chaudhary.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-995146313743172486.post-3995349881232228786</id><published>2009-06-09T14:22:00.004+05:30</published><updated>2009-06-09T14:41:57.449+05:30</updated><title type='text'>आज भी हरे हैं चौरासी के घाव</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Si4nTe4SEzI/AAAAAAAAAko/ey0pZw7OAm4/s1600-h/bhindranwale_with_entourage.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 320px; height: 255px;" src="http://4.bp.blogspot.com/__27SZr7UV5Q/Si4nTe4SEzI/AAAAAAAAAko/ey0pZw7OAm4/s320/bhindranwale_with_entourage.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5345253023395484466" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वह पांच और छह जून 1984 की रात थी। मेजर जनरल के एस बराड़ की कमांड में सेना ने स्वर्ण मंदिर में छिपे 
