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पाला खींचकर लड़ते ये एंकर

ओमकारचौधरी /  मीडिया पिछलेदिनोंकुछघटनाओंकोसोशलमीडियाऔरकुछचैनलोंनेकाफीतूलदेनेकीकोशिशकीलेकिनमुख्यधाराकेमीडियामेंइनकोशिशोंकोवैसीतवज्जोनहींमिली, जैसीतूलदेनेवालोंनेउम्मीदकीथी।कहींकोईधरने-प्रदर्शन, ज्ञापन-बाजीअथवाबयानबाजीहुईनहीं।प्रिंटनेतोइनमसलोंकीतरफध्यानतकनहींदिया।एकघटनास्वामीरामदेवऔरपुण्यप्रसूनवाजपेयीसेजुड़ीहुईहै।दूसरीरवीशकुमारकोजानसेमारनेकीधमकीसेजुड़ीहै।पुण्यप्रसूनलंबेसमयसेआजतकपरदस्तकपेशकरतेआरहेथे।कईमहत्वपूर्णअवसरोंपरभीवहविशेषकार्यक्रमऔरसाक्षात्कारवगैरालेतेथे।दर्शकवर्गयहभलीभांतिअवगतहैकिवहकिसविचारधाराकेहैंऔरउनकापरदेपरटोनक्यारहताहै।हाथमसलतेहुएपरदेपरअवतरितहोनेवालेपुण्यप्रसूनकोदेशमेंसबकुछखराबहीखराबदिखाईदेताहै।उनकेअनुसार, अच्छाकुछनहींहोरहा। इसीतरहशुरूकेवर्षोंमेंशालीनताकालबादाओढ़करजमीनपरपत्रकारिता

नमस्कार

कई साल बाद आज फिर मेरा ये ब्लागपोस्ट सामने आ गया। जब से फेसबुक पर विचारों को शेयर करने का चलन बढ़ा है और सोशल मीडिया के दूसरे मंच लोगों को मिल गए हैं। तब से ब्लाग वगैरा पर मेरे जैसे लोगों ने लिखना पढ़ना बंद सा ही कर दिया है। फिर से कोशिश करते हैं इस पर भी नियमित रूप से कुछ लिखना पढ़ना शुरू करें।

किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं राहुल गाँधी

पिछले महीने 19 तारीख को अपना 41वां जन्मदिन मनाने वाले राहुल गांधी इस वक्त कठिन परीक्षा के दौर से गुजर रहे हैं। वे एेसे मरुस्थल में फसलें लहलाने की मृगतृष्णा पाल बैठे हैं, जहां दूर-दूर तक न पानी है, न खाद और न बीज। देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में उन्होंने जमीन की यह जंग एेसे समय शुरू की है, जब आसमान से आग बरस रही है और दिल्ली भी तप रही है। वे गांव, गरीब, किसान और बेरोजगार नौजवानों को यह भरोसा देने की कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस उनके दुख-दर्द को समझती है और उनके साथ है। वे संक्षेप में लोगों को समझाने की कोशिश करते हैं कि मायावती की बसपा सरकार बिल्डरों, भूमाफियाओं और दलालों के साथ मिलकर उनकी उपजाऊ जमीनों को दिन दहाड़े लूटने में लगी है। लेकिन जब लोग महंगाई और भ्रष्टाचार पर सवाल पूछ बेठते हैं तो उनकी बोलती बंद हो जाती है। उनसे जवाब नहीं सूझता। उनकी यह जंग एेसे समय शुरू हुई है, जब केन्द्र की डा. मनमोहन सिंह सरकार गंभीर आरोपों और संगीन सवालों में घिरी हुई है।
जमीन से जुड़ने की कवायद
राहुल गांधी पर विपक्षी दलों के नेता यह कहकर प्रहार करते रहे हैं कि वे उड़नखटोले से उतरने, भाषण देकर वापस…

यू पी में जमीन तलाशती कांग्रेस

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राहुल गाँधी पद यात्रा पर हैं. किसानों के बीच जा रहे हैं. उनकी जमीनें लूटे जाने के आरोप माया सरकार पर लगा रहे हैं. विरोधी दलों ने उलटे राहुल और कांग्रेस पर ही निशाना साध दिया है. वो पूछ रहे हैं की कांग्रेस को तभी किसानों की याद क्यों आती जब किसी राज्य में चुनाव होने होते हैं. उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव हैं, कही राहुल गाँधी अपनी पार्टी की खोई हुई जमीन तो तलाश नहीं कर रहे हैं?
omkarchaudhary@gmail.com

गोली नहीं, बोली से ही निकलेगा हल

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घाटी की ताजा हिंसा में ग्यारह जून से अब तक करीब पचास लोगों की मौत हो चुकी है। हजारों की भीड़ कर्फ्यू तोड़कर शासन-प्रशासन के खिलाफ उग्र नारेबाजी कर रही है। सुरक्षाबल और राज्य सरकार जितने बेबस इस समय दिखाई दे रहे हैं, इससे पहले कभी नहीं दिखे। राज्य ही नहीं,केन्द्र सरकार भी हतप्रभ है। अलगाववाद की इस ताजा लहर को पाकिस्तान निश्चय ही हवा दे रहा है, लेकिन विचारणीय बात यह है कि घाटी के बिगड़े हालातों के लिए भारत कब तक पाकिस्तान को कोसता रहेगा?

क्या इस पर मंथन नहीं होना चाहिए कि केन्द्र और राज्य सरकार से कहां-कहां गंभीर चूकें होती रही हैं? उन भूलों को सुधारने की दिशा में जितने ईमानदार प्रयास होने चाहिए थे, क्या किए गए? सबसे अहम सवाल तो यही है कि आखिर कश्मीर को लेकर सरकार की नीति क्या है? हर नेता वहां की समस्या और उत्पन्न हालातों का आकलन अलग-अलग तरह से करके बयानबाजी कर रहा है। इससे हालात बिगड़ेंगे या सुधरेंगे? यह आश्चर्य की बात है कि मौजूदा हालातों को बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अमन बहाली के लिए राजनैतिक पैकेज की जरूरत बता रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने संसद में …

तुम्हारा स्वागत है

सुबह गुनगुनी धूप
बहुत चुपके से
आ घुसी मेरे बिस्तर में
मैंने देखा, मुस्कुराया
पूरे मन से कहा
हे सूर्य किरण
तुम्हारा स्वागत है.
सैर करने निकला
यह देख हैरान हुआ
वो पसरी थी फूलों पर
पत्तियों पर, कलियों पर
ओंस से सराबोर पत्तों पर.
कुम्हला रहे पंछियों के
रंग बिरंगे पंखों पर.
तितलियों की थिरकन पर
हरियाली भरे रास्तों पर
स्कूल जा रहे बच्चों के
खिलखिलाते चेहरों पर
अल सुबह कबाड़ के ढेर से
फटे पुराने कपडे, बोतल
बचा खुचा खाना बीन रहे
नन्हे नन्हे हाथों पर
जवान उम्र को रिक्शे
पर बैठाकर ढोते हुए
झुर्रियों भरे चेहरे पर
मैंने देखा रात का
अंधकार छंट गया है
दिन के उजाले में
अंधकार मगर बाकी है
पंछी उड़ चले उस ओर
सूर्योदय हो रहा जिस ओर
जगमग प्रकाश था अब
गगन से धरा तक
उस गुनगुनी धूप को देख
मै ही नहीं मुस्कुराया
मुस्कुरा उठी थी
पूरी कायनात ही.

omkarchaudhary@gmail.com

मनमोहन के अजब गजब मंत्री

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डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार 22 मई को अपना एक साल पूरा करने जा रही है। उनकी पहली सरकार से इस सरकार की तुलना शुरू हो चुकी है। जाहिर है, उनकी दूसरी सरकार का पहला साल काफी मुश्किल और चुनौती भरा रहा है। महंगाई चरम पर रही। आम आदमी को राहत नहीं मिली। पेट्रोल-डीजल की मूल्य वृद्धि ने मुश्किलों को और बढ़ा दिया। संसद में विपक्ष एकजुट हुआ। काफी सालों बाद वित्त विधेयक पर किसी सरकार को विपक्ष के कट मोशन का सामना करना पड़ा। अन्य मुश्किलों के अलावा जो सबसे बड़ी दिक्चकत मनमोहन सिंह के सामने आई, वह थी कुछ मंत्रियों और घटक दलों के नेताओं की स्वेच्छाचारिता। लगता ही नहीं है कि मंत्री कैबिनेट की सामूहित जिम्मेदारी के प्रति प्रतिबद्ध हैं। एनसीपी नेता, कृषि मंत्री शरद पवार के बयानों ने जहां चीनी, चावल, दाल और दूध जसी जरूरत की खाद्य वस्तुओं की महंगाई और ज्यादा बढ़ाने का काम किया, वहीं तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी पर पश्चिम बंगाल की राजनीति हावी रहे। उन्होंने कई मुद्दों पर मनमोहन सरकार के समक्ष कठिनाई पेश की। डीएमके प्रमुख, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री करुणानिधि के पुत्र अलागिरी की संसद से अनु…