Sunday, January 11, 2009

इस पाकिस्तान पर कैसे भरोसा करें

जनरल परवेज मुशर्रफ के पराभव और लोकतांत्रिक शक्तियों के हाथ में पाकिस्तान की सत्ता आने के बाद लोगों ने उम्मीद की थी कि देर-सबेर अब यह देश अमन और विकास की पटरी पर लौट आएगा। चरमपंथी, अलगाववादी अलग-थलग होंगे। तबाही की इबारत लिखने वाले दफना दिए जाएंगे। स्याह रात के बाद एक खुशनुमा सुबह देखने को मिलेगी, लेकिन यह उम्मीद पालने वालों को गहरी निराशा हाथ लगी है। अपनी स्थापना के बाद से ही सेना की तानाशाही के शिकार रहे इस पड़ोसी मुल्क से फिर निराशाजनक संकेत मिल रहे हैं। जनता ने जिस सरकार को चुनकर देश को विकास और शांति के पथ पर लाने की जिम्मेदारी सौंपी थी, उसके ओहदेदार आपस में ही भिड़ते नजर आ रहे हैं। सेना और आईएसआई फिर से हकूमत पर शिकंजा कसने लगी है। पाकिस्तान में हालात बहुत पेचीदा हो चले हैं। जांच-पड़ताल से साफ हो गया है कि मुंबई हमलों में वहां की सरकारी एजेंसियों का हाथ है। बिना उनकी मदद के शस्त्रों से लैस दस आतंकवादी कराची से जलपोत पर सवार होकर मुंबई तक नहीं पहुंच सकते थे। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब सरकारी एजेंसियों की भूमिका की चर्चा की तो पाकिस्तानी निजाम बौखला गया। वहां के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने मनमोहन सिंह को शालीनता बनाए रखने की हिमाकत तक दे डाली। वहां के ताजा घटनाक्रम से साफ संकेत मिल रहे हैं कि सेना और लोकतांत्रिक सरकार के बीच नए सिरे से खींचतान शुरू हो गई है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।
एकमात्र जीवित पकड़े गए आतंकवादी अजमल अमीर कसाब के पाकिस्तानी होने की स्वीकारोक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार महमूद अली दुर्रानी को कितनी महंगी पड़ी, इसी से स्पष्ट है कि इसके कुछ ही समय बाद उन्हें पद से बर्खास्त कर दिया गया। यह घटना आईएसआई और चरमपंथी ताकतों के फिर से हावी होने के संकेत दे रही है। सेना और आईएसआई में बैठे तत्व नहीं चाहते कि पाकिस्तानी सरकार स्वीकार करे कि मुंबई के हमलावर पाकिस्तान से ताल्लुक रखते हैं। ऐसा होने पर सबसे पहले शिकंजा उसी के अफसरों पर कसा जाने वाला है। जांच और न्याय के कटघरे में वहां की नौसेना और खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों को खड़ा होना पड़ेगा क्योंकि मंबई हमले में उनकी मिलीभगत के ठोस प्रमाण भारत सरकार के पास हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की बर्खास्तगी के बाद कसाब के पाकिस्तानी होने की बात वहां की सूचना मंत्री शेरी रहमान ने भी कही। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी जानते हैं कि इसके बाद उनका प्रधानमंत्री बने रहना मुश्किल हो जाएगा। शेरी रहमान बेनजीर भुट्टो परिवार की करीबी हैं। जरदारी बेनजीर के मारे जाने के बाद से ही आतंकवादी जमातों पर पूरी तरह नकेल कसे जाने के पक्षधर रहे हैं। मुंबई हमले में भी वे गिलानी के रुख से सहमत नहीं बताए जा रहे हैं। नवाज शरीफ और जरदारी इस पक्ष में हैं कि आतंकवादियों का बचाव नहीं किया जाए परन्तु ऐसे में सेना और आईएसआई का असली रूप खुलकर सामने आने की आशंका है। इसलिए गिलानी अंतिम समय तक भी न नुकर के ही मूड़ में दिखाई देते रहे।
भारतीय नेतृत्व के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह पाकिस्तान में किससे बात करे? किस पर भरोसा करे? राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बयानों में तो विरोधाभास है ही, वहां के गृहमंत्री, विदेशमंत्री, सूचनामंत्री भी अलग-अलग जबान बोलते दिखाई दे रहे हैं। सेनाध्यक्ष कियानी से लेकर वहां के वायुसेना प्रमुख तक युद्ध की भाषा बोल रहे हैं। पाकिस्तानी निजाम पूरी तरह बेलगाम है। इस पूरे घटनाक्रम ने विश्व बिरादरी के समक्ष पाकिस्तान को पूरी तरह वस्त्रविहीन कर दिया है। अमेरिका भी यह जान रहा है कि पाकिस्तान में इस समय बेहद कमजोर सरकार है। प्रधानमंत्री का न अपनी सेना पर नियंत्रण है। न आईएसआई पर। न नौसेना-वायुसेना प्रमुखों पर और न ही मंत्रियों पर। कसाब उनका ही नागरिक है, यह स्वीकार करने में पाकिस्तानी हुक्मरानों को डेढ़ महीने का समय लग गया। जिस तरह सेना और आईएसआई का बचाव वहां के गृह मंत्रालय ने किया, उससे पूरे विश्व में यही संदेश गया है कि मुंबई हमले के पीछे पाकिस्तान सरकार में बैठे जिम्मेदार लोगों का ही हाथ है और सरकार अब उनकी खाल बचाने में लगी है।
इस मामले में पाकिस्तान पूरी तरह घिर चुका है। भारत ने हालांकि हमले के तुरंत बाद आतंकवादियों के प्रशिक्षण केन्द्रों पर हमले न करके रणनीतिक भूल की। उसे कूटनीतिक प्रयासों के बजाय इजरायल की तरह हमले करने चाहिए थे। इससे पाकिस्तान के साथ-साथ उन संगठनों को भी कड़ी शिक्षा मिलती, जो भारत को उदार और कमजोर इच्छाशक्ति वाला देश मानकर समय-समय पर हमलों के षड़यंत्रों को अंजाम देने में लगे रहते हैं। कूटनीतिक रास्ता अक्सर लंबा और थकाऊ होता है। भारत ने यह रास्ता इसलिए अपनाया क्योंकि वह जानता है कि अमेरिकी सेनाएं इस समय पाक-अफगानिस्तान सीमा पर तालिबान और अलकायदा से लड़ रही हैं। इसके अलावा विश्व बिरादरी के सामने यह साबित करना जरूरी था कि मुंबई ही नहीं, भारत पर होने वाले अधिकांश आतंकवादी हमलों के पीछे पाकिस्तान का ही हाथ रहता है। पूरे तथ्यों के साथ भारत सरकार ने दुनिया भर के देशों के सामने असलियत रखी। पाकिस्तानी हकूमत जानती है कि बहुत लंबे समय तक वह दुनिया को मूर्ख नहीं बना सकती। अगर उसने अब भी आतंकवादियों का बचाव जारी रखा तो पाक विश्व में अलग-थलग पड़ जाएगा।
मुंबई हमले में पाकिस्तान सरकार के रवैये, बदलते बयानों, कभी घुड़की तो कभी नरमी ने उसकी स्थिति हास्यास्पद बना दी है। वहां भले ही लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के हाथ में सत्ता है परन्तु वह सेना और आईएसआई के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ भी नहीं है। यही वजह है कि भारतीय नेतृत्व की मुश्किलें और भी बढ़ गयी हैं। उसे समझ ही नहीं आ रहा है कि जिस तरह व्यवहार पाकिस्तान सरकार कर रही है, उस पर वह कैसे प्रतिक्रिया व्यक्त करे? अमेरिका ने भारत की मुश्किलें घटाने के बजाय बढ़ाने का काम किया है। उसके नुमाइंदे दिल्ली में कुछ कहते हैं और इस्लामाबाद में कुछ। सीमा पार कुछ ऐसी ताकतें भी सक्रिय हैं, जो युद्ध चाहती हैं। भारत जानता है कि युद्ध में पाकिस्तान को एक और शिकस्त देने के बावजूद आतंकवाद खत्म नहीं होगा। वह तभी खत्म होगा, जब पाकिस्तान सरकार वहां चल रहे प्रशिक्षण केन्द्रों को खुद खत्म करेगी। ऐसा तब संभव है जब विश्व बिरादरी, संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद के साथ-साथ अमेरिका भी उस पर निर्णायक दबाव बनाए।

3 comments:

Suresh Chnadra Gupta January 11, 2009 at 1:18 PM  

बात तो आप सही कह रहे हैं. देखिये क्या होता है?

MANVINDER BHIMBER January 11, 2009 at 6:33 PM  

आप सही कह रहे है की पकिस्तान में किस से बात की जाए .....अच्छी पोस्ट के लिए बढ़ाई sweekarain

ऋचा जोशी January 12, 2009 at 8:19 PM  

सेना, आईएसआई और चरमपंथयों का त्रिकोण ही प‍ाकिस्‍तान की सत्‍ता की असली धुरी हैं। चुनी हुई सरकार या तख्‍ता पलट कर आई सरकार तो महज कठपुतलियां बन कर ही रह जाती हैं वहां।

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