Thursday, August 6, 2009

जोनी के बिना रक्षा बंधन

इस बार का रक्षा बंधन हमारे परिवार के लिए अजीब सी खामोशी लेकर आया। सब चुप-चुप से थे। हमें पिछला रक्षाबंधन याद आ रहा था। पिछले साल जब मैं सोकर उठा तो देखा कि जोनी खुशी से फुदक रहा है। उसके माथे पर टीका लगा था और दाएं हाथ पर पंजे से थोड़ा ऊपर राखी का अनमोल धागा।
मेरे लिए यह थोड़ा-थोड़ा सुखद और कुछ आश्चर्यजनक था। मैंने बीती रात सोने के लिए जाते समय इस तरह के दृश्य की कल्पना नहीं की थी। सुखद इसलिए था कि मेरी बेटी कावेरी ने घर में बिल्कुल हमारे बच्चे की तरह ही पले और रहे जोनी को वही प्यार और सम्मान प्रदान किया, जो वह अपने भाई अंकुर और मुङो देती आई है। आश्चर्यजनक शायद इसलिए कि कावेरी ने हमारे सोकर उठने, स्नान कर तैयार होने और राखी बंधवाने का इंतजार नहीं किया था। मैने देखा कि अंकुर अभी भी सोया पड़ा है और कावेरी हमारे जगने से पहले ही जोनी के दाएं हाथ पर राखी बांध चुकी है।

मुङो उस घटना ने भीतर से बहुत आह्लादित कर दिया था। काश, सब इन मूक जानवरों को इसी तरह प्यार और सम्मान देते। पिछले साल हमारा राखी बंधवाने का नम्बर जोनी के बाद आया। डोगी को राखी बांधने पर मैंने कावेरी से चुटकी भी ली, लेकिन हमारे परिवार का कोई भी सदस्य जोनी के साथ उस तरह पेश नहीं आता था, जैसा आमतौर पर डोगी के साथ लोग पेश् आते हैं। उसे हमेशा सदस्य की तरह ही माना।
इस बार परिवार में राखी के रोज इसलिए खामोशी सी पसरी रही, क्योंकि जोनी हमारे बीच नहीं था। वह हमसे इतनी दूर चला गया, जहां से कोई लौटकर वापस नहीं आता। कभी-कभी लगता है कि हम लोग कितने बेबस हैं। जिन्हें प्यार करते हैं, उन्हें हमेशा के लिए अपने पास नहीं रख पाते। वह चौदह साल से हमारे परिवार का अभिन्न अंग था। उदास होता था.तो हम परेशान हो उठते थे। बीमार होता तो तुरंत डाक्टर के यहां ले जाते। खेलता रहता तो सुकून मिलता। जब पूरा परिवार साथ बैठकर किसी मसले पर चर्चा करता था तो वह भी उचककर खाली पड़े सोफे पर आ बैठता था। हमारी तरफ टुकुर-टुकुर कर देखता रहता था। मानो, कह रहा हो कि मैं भी सब सुन और समझ रहा हूं। मेरी पत्नी कमलेश उसे धमकाकर सोफे से नीचे उतारती तो शरारती जोनी उसकी निगाह फिरते ही फिर वहीं आ जमता था।
पिछला एक साल उसके और हमारे लिए कष्ट भरा रहा। डीएलए के स्वामी और प्रधान संपादक अजय अग्रवाल ने करीब दो साल पहले मुङो मेरठ संस्करण का दायित्व सौंपा। हमारा परिवार दिल्ली से मेरठ शिफ्ट हो गया। संस्करण शुरू हुआ। मैं करीब दस महीने मेरठ में रहा, लेकिन चूकि दोनों बच्चे दिल्ली में पढ़ रहे थे, इसलिए हमें वापस दिल्ली लौटना पड़ा। मैंने दोबारा हरिभूमि ज्वाइन किया। चूकि घर-परिवार-सामान शिफ्ट हो रहा था, इसलिए मां ने कहा कि कुछ समय के लिए जोनी को गांव में उनके पास छोड़ दें। एेसा ही हुआ। शुरू में तो नहीं परन्तु बाद में उसका वहां मन लग गया। इस बीच खबर आई कि वह बीमार रहने लगा है। बड़े भैय्या ने उसे दिखाया। दवा दिलाई। थोड़ा ठीक हुआ लेकिन फिर बीमार पड़ गया।
एक दिन अंकुर ने कहा कि पापा जोनी को ले आते हैं। यहां उसकी ठीक से सेवा टहल हो जाएगी। मैं और कावेरी उसे संभाल लेंगे। वो यहां ठीक हो जाएगा। उसने जैसे मेरे मन की कह दी थी। हालांकि मैं और कमलेश जोनी की बीमारी को समझ रहे थे, लेकिन बच्चों के सामने कह नहीं रहे थे। जोनी की उम्र दरअसल पूरी हो चली थी। वह चौदह साल से हमारे परिवार के साथ था। पामेलियन नस्ल के डोगी की इससे ज्यादा उम्र आमतौर पर नहीं होती है। हमें पता था कि अब इसका आखिरी समय निकट आ गया है। बहुत दिन तक वह हमारे साथ नहीं रहेगा।
मुङो आज भी याद है। मैं उस समय दैनिक जागरण मेरठ में था। फोटोग्राफर आबिद एक जूते के डिब्बे में इसे लेकर आया था। जोनी उस समय मुश्किल से पंद्रह दिन का था। मैंने ही उसे कह रखा था कि पामेलियन बच्चा मिले तो लेकर आना। मैं उसे घर लेकर गया तो सब लोग बहुत खुश हुए। पहले ही दिन से वह सबका चहेता बन गया। जोनी के साथ हमारे परिवार की अनगिनत यादें हैं। गांव में छोड़े हुए उसे हालांकि ज्यादा समय नहीं बीता था, लेकिन लग रहा था, जैसे कई साल हो गए हैं।
मैं अगली सुबह ही गांव पहुंच गया। जोनी तो जसे मेरा इंतजार ही कर रहा था। मां ने बताया कि कई दिन से यह आंखें ही नहीं खोल रहा है। चुप-चाप पड़ा रहता है। मैं पहुंचा तो उसकी आंखों में चमक लौट आई। मैंने उसकी खाने की कटोरी गाड़ी में रखी। खिड़की खोली तो पता नहीं उसके शरीर में कहां से जान आ गई। उसने उछलकर गाड़ी में छलांग लगा दी। मुङो लगा कि वह अंकुर, कावेरी और कमलेश के पास जाने को इस कदर उतावला है। मैने गाड़ी स्टार्ट की। आगे बढ़ाई तो वह पिछली सीट से उठकर मेरी बराबर वाली सीट पर आ गया। थोड़ी देर उचक-उचक कर बाहर का नजारा लेता रहा लेकिन जब शरीर ने साथ नहीं दिया तो कान दबाकर बैठ गया। आंखें बंद कर ली। वह सफर पूरा होने का इंतजार कर रहा था।
उस दिन तीन जामों में गाड़ी फंसी। पहला जाम मोदीनगर में मिला। दूसरा मुरादनगर में और तीसरा वसुंधरा में। मोदीनगर में मैंने उसे पानी दिया तो गप-गप करके वह पी गया। मुङो भूख लग आई थी। भुने हुए चने का डिब्बा खोला। कुछ निकाले तो जोनी ने हसरत और शिकायत भरी निगाह से मेरी ओर देखा, जैसे कह रहा हो कि यह क्या बदत्तमीजी है? क्या मुङो भूख नहीं लगी है? मैंने तीन-चार दाने उसके पास टपकाए तो उसने तुरंत लपक लिए। मैंने यह जानने के लिए कम दाने डाले थे कि यह खाता भी है कि नहीं। उसके बाद मैंने मुट्ठी भर दाने सीट पर डाल दिए, जिन्हें वह रास्ते भर खाता रहा। डेढ़ घंटे का सफर उस दिन हमने साढ़े तीन घंटे में तय किया।
जोनी की वापसी ने परिवार पूरा कर दिया। सब खुश थे। जोनी भी। अगली सुबह कावेरी ने उसे साबुन से नहलाया। थोड़ी देर धूप में उसने उलटी-पलटी करके खुद को सुखाया, लेकिन साफ लगा कि उसके शरीर में पहले जैसी ताकत नहीं बची है। शाम को उसे दस्त लग गए। जो खा रहा था, वह बाहर निकल रहा था। लगता है, ठंडा पानी सहन नहीं कर पाया। दवा दिलवाई गई। वह संभल गया। कुछ दिन ही निकले, वह फिर उदास हो गया। उसने खाना छोड़ दिया। कमजोर इतना हो गया कि चलते-चलते बैठ जाता था। दो दिन तक जब उसने कुछ नहीं खाया तो अंकुर डाक्टर के पास ले गया। डाक्टर ने जांच-पड़ताल के बाद बताया कि उसके फेफड़े जवाब दे चुके हैं। शरीर में ज्यादा ताकत नहीं बची है। यही कारण है कि वह बार-बार बीमार पड़ रहा है। उसे ग्लूकोज चढ़वाया गया। इसके बाद उसने कुछ आंखें खोली। घर लौटा तो थोड़ा खाना भी खाया। हम लोगों की जान में जान आई, लेकिन यह सब क्षणिक सिद्ध हुआ। तीन दिन बाद उसकी दशा अचानक बिगड़ गई।
मैं क्नाट प्लेस दफ्तर में था। कावेरी इतनी घबरा गई थी कि फोन तक नहीं कर सकी। उसकी मम्मी ने फोन पर मुङो बताया कि जोनी उठ नहीं रहा है। उसका शरीर अकड़ गया है। पानी डालते हैं तो मुंह से वापस आ जाता है। वह कराह रहा है। मैं समझ गया कि जोनी हमें छोड़कर हमेशा के लिए जा रहा है। मैंने कमलेश से कहा कि उसके पास बैठ जाओ। उसके शरीर पर हाथ फेरते रहो। शायद आखिरी सांस लेते समय उसका कष्ट कुछ कम हो। इसके तीन मिनट बाद ही कमलेश ने रोते हुए मुङो फोन किया। बताया कि जोनी चला गया है।
वह तीन जून की दोपहर थी। मैंने अंकुर को फोन किया। वह जामिया में था। मैंने उसे तुरंत घर पहुंचने को कहा। मैं रात में करीब साढ़े आठ बजे घर पहुंच सका। सन्नाटा पसरा पड़ा था। कावेरी गुमसुम थी। अंकुर अखबार में सिर दिए बैठा था। कमलेश बेहद उदास। मेरी रुलाई फूट पड़ी। हम सब थे.जोनी नहीं था। हमें लगा कि घर का अभिन्न अंग हमें छोड़कर चला गया। अंकुर ने अपने दोस्तों के साथ जाकर पीछे नहर के पास उसे अंतिम विदाई दी। हम लोगों को संभलने में कई दिन लग गए। कावेरी की खामोशी और बातचीत में दर्द बहुत कुछ बता रहा था। मैं जानबूझकर उसका जिक्र नहीं कर रहा था। जानता था कि खुद को रोने से रोक नहीं सकूंगा। फिर बच्चों को कैसे संभालूंगा।
जिस दिन जोनी गया, उससे पहली रात को मेरी तीन बार आंख खुली। आमतौर पर वह मेरे बिस्तर के पास मेरे जूते या चप्पलों पर सिर रखकर सोता था। उस रात उसे वहां नहीं देखकर मैं सकपकाया। उठकर देखा तो वह बाहर बैठक में खड़ा पता नहीं किसे निहार रहा था। मैं फिर लेट गया। सोचा कि कोई चुहिया देख ली होगी। थोड़ी देर बाद फिर जगा तो वह वहां भी नहीं था। उठकर देखा तो अंकुर के कमरे में खड़ा उसके बिस्तर की ओर देख रहा था। वह शायद अंकुर को वहां नहीं पाकर निराश था। अंकुर उस दिन घर नहीं आया था। अपने हास्टल में रुक गया था। सुबह देखा कि जोनी उठ ही नहीं पा रहा है। जब पता चला कि वह नहीं रहा तो मुङो रात की बातें याद आ गई। मुङो लगा कि जोनी को अपने अंत का अहसास हो गया था। वह रात में सो नहीं पाया और विदा लेने से पहले घर के हर सदस्य और कोने को देख लेना चाहता था। हम तीनों से तो वह मिल लिया लेकिन अंकुर से नहीं मिल पाया।
इस बार रक्षा बंधन की सुबह पूरे परिवार ने जोनी को बेहद मिस किया। कावेरी एकदम खामोश थी। हम जगे। स्नान किया। थोड़ी देर मैंने प्राणायाम किया। इसके बाद उसने पहले अंकुर और बाद में मेरी कलाई पर राखी बांधी। थोड़ी देर बाद उसने अपनी मम्मी से कहा कि यह राखी मेरे (कावेरी के) हाथ पर बांध दो। मैं उसे नकलची बंदर कहकर चिढ़ाता रहता हूं। मैंने उसे चिढ़ाया तो उसने बताया कि यह राखी जोनी की है, जिसे मैं अपने हाथ में बंधवा रही हूं। ओफ्फ...मैं उसे देखता ही रह गया। मुंह से एक लफ्ज नहीं निकल पाया। पिछले रक्षाबंधन का सारा दृश्य मेरी आंखों के सामने चलचित्र की तरह चलने लगा। हम जोनी को भुलाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कावेरी उसे नहीं भूल सकी थी। मैं वहां से खड़ा हुआ। बाथरूम में जा घुसा। वहां पहुंचते ही रुलाई फूट पड़ी। जब संयत हो गया, तभी बाहर निकला।
मैं अभी तक भी यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि क्या जिसे हम जानवर कहते हैं, वह परिवार का इस कदर अभिन्न अंग बन सकता है? वो अब नहीं है लेकिन हमें लगता है कि वह हमेशा हमारे बीच रहने वाला है। राखी पर वह उतनी ही शिद्दत से याद आएगा, जितना इस बार आया।

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

14 comments:

mehek August 6, 2009 at 11:31 PM  

bahut hi marmik lekh,sahi hai jo saath rehte hai ghar ka sadasya ban jaate hai,phir wo janwar hi ho.lagav tho mann ka hota hai.pehle gar koi kehta hamare doggy ko doggy nahi kehna,wo hamare ghar ka ember hai,ahut ajib lagta.magar jab hamare yaha 2 doggy aaye,hum bhi ahi kehte hai,wo hamare ghar ke member hai,koi janwar nahi.ishwar jonny ki yaadon ko hamesha taza rakhe,aur uski atma ko shanti de.

jitendra August 7, 2009 at 8:04 AM  

sir aapka lekh (joni ke bina raksha bandhan ) mila bahut achcha laga, thanks sir,

Uttama August 7, 2009 at 9:36 AM  

अलग ही मज़ा है इन जानवरों से प्रेम का, उनके साथ अलग सी दुनिया में जीने और आनंद लेने का. मैं समझ सकती हूं जॉनी के लिए लिखे इन शब्दों में दर्द. आपने मार्मिक चित्रण कर सुबह-सुबह ही रुला दिया. एक-एक शब्द गहराई तक मार करता है मर्म की.

parul August 7, 2009 at 9:37 AM  

jayega takleef to bahut hoti h but samay ke sath kuch ceeje apnanai padti h, apke is lekh ko padkar muje mere bade bhai ki yaad aa gai ajj se 6 saal phale 26 saal ke mere bhai ki death ho gai thi, but bhool nahi pai, par apne apko sambhalna pda, aur rakhi ke din to aur bhi dikkat hoti, but sir take care

Manvinder August 7, 2009 at 10:58 AM  

mukje to aaj bhi wah din yaad hai jab Aabid aapke Shastr Nagar waale ghar mai jony ko chod kar aaya tha....us wakt aap or ham sath hi jagran mai thai.....wo din bhi yaad aa gaya...jab jony apki driving seat par baitha hua tha....yaad kariye to...
janwar kitne yaad aate hai....mujhe meri jimmy ki bhi yaad aa gai....
behad marmik post likhi hai...

ASHA RANI August 7, 2009 at 11:12 AM  

aapka samvednayon se bhra lekh padha aur sachmuch man bhavuk ho gaya ki jaanvar bhi hamare vaise hi saathi hote hain jaise hamare any parijan. Aadikal se hi manav avm janvaron ka abhinn saath raha hai ham un par nirbhar hain, saath ke liye bhi, sahyog ke liye bhi.Kavery ne use itna pyar v maan diya, achchha laga, betian hoti hi hain itne komal dil ki.

Ankur's Arena August 7, 2009 at 1:15 PM  

जोनी का हमारी ज़िन्दगी में आना किसी गुडलक से कम नहीं था...
उसके आने के बाद हमारे परिवार ने हर तरह के दिन देखे लेकिन कभी भी हिम्मत नहीं हारी और उसके प्यार के साथ हम आगे ही बढ़ते गए... वो हमारी हर संवेदना का हिस्सा बन गया... मेरा कावेरी का भाई, मम्मी आपका बेटा और माँ (दादी) का पोता हो गया... हमने उसे नहीं, बल्कि उसने हमें अपनाया. माँ उसे अपने बुढापे का सहारा मान चुकी थी, उस बेजुबान से ही बातें करती रहती थी... इसलिए मैं चाहता था की वो उसी के पास रहे गाँव में. वो भी माँ को चाहता था लेकिन उसका मन तो हमसे ही जुडा था, इसलिए उसका आखरी समय हमारे साथ ही गुज़रा. उसने अपनी अंतिम साँसे उसकी सबसे ज्यादा सेवा करने वाली, मेरी मम्मी, की गोद में ली. मम्मी ने कभी उसे दिखावे का प्यार नहीं किया, केवल अपना फ़र्ज़ पूरा किया... इसीलिए वो सबसे ज्यादा मम्मी की ही मानता था, उन्ही का सबसे ज्यादा सम्मान करता था.. कावेरी की तो जान था वो, कमबख्त उसके स्कूल से घर आने पर ही खाना खाता था... उसके साथ लड़े बिना, खेले बिना उसका वो खाया पिया भी कहाँ हज़म होता था... और अपने आखरी दिनों में वो आपके करीब सबसे ज्यादा आ गया था... आप जहाँ बैठे वहां वो भी बैठे, जहाँ जाएँ वहां वो भी जाए... सुबह आपको गाडी तक छोड़ना और रात को आपके साथ आपकी चप्पलों के पास ही सोना.. ये सब वो शायद अपना फ़र्ज़ समझकर करता रहा, शायद वो जाने से पहले हमें रुलाने और तड़पने के गुर सीख गया था...
मुझे फिर भी उम्मीद थी कि वो हमारे साथ रहेगा तो शायद ठीक हो जाये, लेकिन जब डॉक्टर ने कहा कि आपको कुछ दिन पहले आना चाहिए था, तो शायद वो कुछ दिन जी लेता, तब मैंने एहसास किया कि भावनओं और संवेदनाओ के साथ साथ हमें अपना और अपनों का पूरा ख्याल करना चाहिए... क्योंकि जब तक वो होते हैं, हम निश्चिंत होकर अपनी अपनी उधेड़ बुनो में लगे रहतें हैं... कभी यह ध्यान ही नहीं करते कि हम जीवन कि आपाधापी में कितने दूर निकल आयें हैं और हमने जाने-अनजाने क्या कुछ खो दिया है... चाहे इंसान हो या जानवर, उसके लिए आपका प्यार, आपकी संवेदना को अर्थ तभी मिलता है जब हम उन्हें और उनके पास खुद जाकर पूछें, "क्या बात है तुम बड़े चुप चुप रहते हो... मुझे नहीं बताओगे?" ...बस इतने से शब्दों का खर्च आता है अपनों को अपना बनाने में... मुझे लगता है कि जितना प्यार मुझे जोनी ने दिया, मैं उसका आधा भी उसे नहीं दे पाया... समय रहते गर मैं अपनी चिंता दिखा पाता तो शायद वो और जी जाता... अब मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि उसे कभी याद न करूँ, क्योंकि जब भी वो याद आता है, मैं बच्चों की तरह बिलख जाता हूँ और फिर खुद को संभालना मुश्किल हो जाता है...

उसे जब अंतिम विदाई देने गया, तो मेरे साथ विकास था, उसने फावडे से ज़मीन खोदी और मैं जोनी को गोद में लिए बस यही सोचता रहा कि क्या वो उस दुनिया में जाने के बाद कभी हमें भूल पाएगा? क्योंकि इस जीवन में हम तो उसे नहीं भूल पाएंगे... दुआ करता हूँ कि हमसे जो भी भूल हो गयी हो उस बेजुबान फ़रिश्ते कि सेवा में, उन्हें माफ़ कर वो हमारे परिवार को और आगे बढ़ने का आशिर्वाद दे...

आज जोनी नहीं है, लेकिन उसका जाना भी किसी सीख से कम नहीं. वो सिखा गया की ज़िन्दगी का असली मकसद अपनों को प्यार देना है और प्यार लेना है... बाकी सब कुछ मायने नहीं रखता.

dharmendra August 7, 2009 at 4:16 PM  

apno ko pyar dena hai aur pyar lena, baki kuch nahi hai zindgi me.

Vandana Agarwal August 7, 2009 at 5:30 PM  

pichle mahine maine jab deewar per tangi johny ki tasveer dekhi to achanak pucha johny kaha gaya. Mera ye puchna tha ki omkar bhaisahab ki aankhen bhar aaie. Phir khud ko sambhalte hua unhone bataya johony ab nahi raha. Mai awak thi. Johny ke sath meri bhi chandigar se juri kuch yade hai. Pichle 8 sal mai mai jab bhi vasundhara jati pahle wo khub shoe machata phir muche puchkarta. thodi der meri godi mai baithne ke bad pure pariwar ke sath photot khichwata. Tab kahi ja kar shanti se baithta. Uska jana muje maheene bhar pahle jitna akhra tha. Aaj ye samvednabhara lekh pad ker us din se bhi jayada akhar raha hai. Ankur, Kaveri ke sath johny mera bhi bhai tha.
Vandana Agarwal

Sushant August 7, 2009 at 6:53 PM  

johney ki kahani nay hila diya.
hamara pyar kabhi kabhi is roop may bhi abhivyakti paata hai.zindagi kaival ganit kay savalon kao hul
karnay ka naam nahin hai,jinmay kaival munafay yaa nuksaan byora rakha jata hai.pyar kay agsra srout
anaik hain, jinsay bahti pyar ki rus dhaara zinagi ko jeenay layak banaati hai.
nirmal

हरि जोशी August 8, 2009 at 10:17 AM  

मार्मिक। मेरे घर भी एक मोती था; मैं उन दिनों छोटा था लेकिन उसके जाने के बाद मेरे पिताजी ने तीन दिन तक खाना नहीं खाया था।...लेकिन आजकल तो जमाना आदमी की राख ठंडी होने का इंतजार नहीं करता।

Umesh Joshi August 9, 2009 at 11:32 PM  

aapne to hame bhi rula diya.

Anonymous,  November 19, 2012 at 10:13 AM  

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Anonymous,  November 20, 2012 at 3:01 AM  

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