Sunday, February 1, 2009

क्यों चुनें भ्रष्ट, बेईमान और अपराधियों को?

देशवासी संसद, विधानसभा और स्थानीय निकायों में किस तरह के जनप्रतिनिधि चाहते हैं? अपराधी, दागी, भ्रष्ट, बेईमान, अनपढ़ और गैर जिम्मेदार अथवा फिर देशभक्त, ईमानदार, शिक्षित, जिम्मेदार और साफ-सुथरी छवि वाले। पिछली कुछ लोकसभा, विधानसभा, विधान परिषदों, स्थानीय निकायों को देखें तो गहरी निराशा होती है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि 14वीं लोकसभा में एेसे सदस्यों की संख्या सौ से ऊपर रही, जिन पर कोई न कोई मुकदमा चल रहा था। कई राज्यों के विधानसभाओं में एेसे विधायक चुनकर पहुंचे, जिन पर हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण, बलात्कार और लूट जैसी गंभीर धाराओं में मुकदमें चल रहे हैं। केन्द्र की यूपीए सरकार में कई एेसे मंत्री हैं, जिन पर गंभीर मामले अदालतों में विचाराधीन हैं। यही हाल कई राज्य सरकारों का है।
जहां सरकारों और सदनों में बहुतायत में एेसे दागी बैठकर फैसले करते हों, वहां जनता की भलाई की बात कैसे सोची जा सकती है? चुनाव से पहले जो जनप्रतिनिधि हाथ जोड़कर घर-घर वोट मांगते नजर आते हैं, चुने जाने के बाद उनके आवासों पर जनता-जर्नादन नहीं, बड़े-बड़े बिल्डर, कांट्रेक्टर, भू-माफिया, छंटे हुए बदमाश, व्यवसायी और शराब माफिया नजर आने लगते हैं। पिछले चुनाव में जो जनप्रतिनिधि अपनी संपत्ति का ब्योरा लाखों में दर्शाते हैं, वे एक-दो चुनाव के बाद करोड़ों के मालिक हो जाते हैं। सदनों में जनहित और देशहित से जुड़े मसलों पर गंभीर बहसों के बजाय एेसे मसलों पर शोर-शराबे होने लगे हैं, जिन पर वोट मिलने की उम्मीद रहती है। पूरा देश टेलीविजन पर सदन की गरिमा तार-तार होते हुए देखता है।
एक-दो को छोड़कर किसी भी राजनीतिक दल के नेता यह संकल्प लेने को तैयार नहीं दिखते कि वे दागियों को टिकट नहीं देंगे। चुनाव के समय राजनीतिक दलों में इसे लेकर होड़ मचती है कि कौन ज्यादा बाहुबलियों को अपनी ओर खींचता है। निर्वाचन आयोग की सख्ती के बावजूद धनबल और बाहुबल का भौंडा प्रदर्शन बेरोक-टोक जारी है। एेसे माननीयों को भी चुनाव लड़वाने में राजनीतिक दलों को शर्म नहीं आती, जिनके खिलाफ तीस से चालीस तक मुकदमें दर्ज हैं।
एेसे राजनीतिक दल भी हैं, जो धनपतियों से मोटी धनराशि लेकर उन्हें टिकट थमाने में हिचक महसूस नहीं करते। एेसे जनप्रतिनिधि चुने जाने के बाद भेंट चढ़ाई गई उस धनराशि को न केवल ब्याज सहित वसूलने में जुट जाते हैं, बल्कि अपनी आने वाली सात पुश्तों का बंदोबस्त भी कर जाते हैं। जोड़-तोड़, गणेश-परिक्रमा और धनबल के आधार पर यदि मंत्री पद मिल जाता है तो एेसे माननीय अपने पूरे खानदान, रिश्तेदारों, जान-पहचान वालों और समर्थकों के साथ-साथ चुनाव के समय मोटा चंदा देने वालों के तमाम कष्ट दूर कर डालते हैं। हर नया प्रोजेक्ट उन्हें दुधारू गाय नजर आता है।
आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले स्वाधीनता सेनानियों ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि अंग्रेजों के जाने के बाद जब सत्ता और शक्ति देशवासियों के हाथों में आएगी तो भ्रष्टाचार पूरी व्यवस्था और लोगों की उम्मीदों को इस तरह लील जाएगा। आम आदमी हतप्रभ और लाचार है। चुनाव से पहले उनकी तमाम दिक्कतों को दूर करने का वादा करने वाले राजनीतिक दल और उनके नेता चुने जाने के बाद अपने परिवार की दिक्कतें दूर करने में जुट जाते हैं। आम आदमी अपने जायज काम करवाने के लिए एक विभाग से दूसरे विभाग और एक बाबू से दूसरे बाबू व अधिकारी के यहां धक्के खाता रहता है, परन्तु सिवाय हताशा के उसे कुछ नहीं मिलता। इंसाफ पाने के लिए वह न्यायालयों की शरण में जाता है तो उसे वहां भी गहरी निराशा हाथ लगती है। एक मामूली से मामले में न्याय पाने के लिए कई बार तो उसे दस से पंद्रह साल तक वकीलों, कोर्ट-कचहरी और मोहर्रिर के चक्चकर काटने पड़ते हैं। लुट-पिटकर भी तारीख ही उसके हिस्से में आती है।
देश में इस पर गंभीर चर्चा छेड़े जाने की जरूरत है कि मतदाताओं को किस तरह के जनप्रतिनिधि चुनने चाहिए। टेलीविजन चैनलों पर कभी-कभार इस पर बहस होती है, लेकिन इस बहस को शहरों की गलियों, नुक्कड़ों और चौराहों से लेकर गांव की चौपालों तक ले जाए जाने की जरूरत है। जिस सरकारी तंत्र को देश की जनता को अपना माई-बाप समझना चाहिए, वह उनके इशारों पर कत्थक नृत्य करता नजर आता है, जो वंशवाद को बढ़ाने में लगे हैं और जिन्होंने माफियाओं, बाहुबलियों, अपराधियों और मुनाफाखोरों के हाथों में सत्ता और अपने जमीर को गिरवी रख दिया है। पुलिस-प्रशासन लोकसेवक के अपने दायित्व को भूलकर एेसे राजनेताओं की जी-हुजूरी में दुम हिलाते नजर आने लगे हैं, जो सिर्फ और सिर्फ अपने, अपने परिवारजनों और अपनी पार्टी के हित के बारे में सोचते हैं। किस क्षेत्र में कौन सा विकास कार्य होना है और उसका उसे क्या राजनीतिक और अािर्थक लाभ मिलेगा, यह सोचकर फैसले लिए जाते हैं। विकास को तरसती जनता आजादी के इतने वर्षो बाद भी खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रही है। हर पांच साल बाद वह इस आस-उम्मीद में दूसरी पार्टी को सत्ता सौंपती है कि शायद वह उसके सपने पूरे करेगी लेकिन सिवाय निराशा के उसे कुछ नहीं मिलता।
सवाल है कि इस निराशाजनक स्थिति से कैसे उबरा जाए? इसका एक ही उपाय है कि लोगों को जागरूक करने का अभियान छेड़ा जाए। वे चाहे किसी भी राजनीतिक दल के समर्थक हों, उन्हें इसके लिए शिक्षित किया जाए कि चुनाव में एेसे उम्मीदवार को किसी भी सूरत में वोट न दें, जो भ्रष्ट, बेईमान, अपराधी, गैर जिम्मेदार और अराजक हो। संसद, विधानसभाओं और स्थानीय निकायों में यदि लोगों ने पढ़े-लिखे, स्वच्छ छवि वाले, देशभक्त और ईमानदार जनप्रतिनिधि ही भेजने का पक्का प्रण ले लिया तो मौजूदा हालात सुधरने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

9 comments:

therajniti February 1, 2009 at 9:35 PM  

सर, आपने बिल्कुल सही लिखा है. सभी चाहते है कि ख़ुद को छोड़ कर सभी इमानदार हो जाए. भगत सिंह पैदा हो पर पड़ोस में.

अग्नि बाण February 1, 2009 at 10:51 PM  

आपका प्रश्न जायज है मगर पूरा नही. अगर भ्रष्ट, चरित्रहीन, बेईमान, दारुबाज, धोखेबाज और अपराधी हमारे लोकतंत्र की आवाज यानी की पत्रकारिता के रखवाले हो सकते हैं तो राजनेता क्यूँ नही.
या फ़िर यूँ कहें की अपनी गंदगी दुसरे पर उछालने में लिप्त दुसरे को दोषी कैसे कह सकते हैं.

हिमांशु February 1, 2009 at 11:19 PM  

सही है. धन्यवाद

अशोक मधुप February 1, 2009 at 11:27 PM  

आप चुने न चुने क्या फर्क पड़ता हे, जिन्हें चुना जाना है, वह चुने जा रहे हैं, जिन्हें चुनना है, वह चुनने में लगे है। दक्षिण भारत कनार्टक , महाराष्ट्र मे दो तिहाई उत्तर भारतीय रहतें हैं, यह अगर एकत्र हो जाए तो वहां के हालात कुछ आैर हों किंतु किसी को अपनी जिंदगी से फुरसत नही है। वे सोचतें है।वोट डालकर क्या करेंगे। हम बूथ पर जाने तक सोचे होते है कि वोट इसे देंगे ,उसे देंगे किंतु वहां जाकर जाति के मतदाता को हारता देखकर हम उसे वोट दें देते हैं, हिंदू मतदाता बूथ पर हिंदू बना आता है, मुस्लिम मुस्लिम। देशा मे एेसा केोई कानून नही है कि बहिष्कार पर चुनाव नही होंगा। दस लाख मतदाताआे में यदि चार वोट पडे़ । इनमे से तीन किसी एक को मिल जांए तो वह जीत जाएगा।

विष्णु बैरागी February 1, 2009 at 11:47 PM  

आपका कहना और सोचना सही है। लोगो को जागरूक हुए बिना निजात नहीं मिलने वाली।
इवीएम/मत पत्र पर 'इनमें से कोई नहीं' वाला विकल्‍प उपलब्‍ध कराने की सिफारिश चुनाव आयोग ने सरकार को भेजी है। इस सिफारिश पर अमल हो, इस हेतु अभियान चलाने की आवश्‍यकता है।
ऐसे प्रत्‍येक अभ्यिान में मैं शरीक होना चाहूंगा।

Ajit February 2, 2009 at 11:00 AM  

sahi kaha apne, magar jo is baat ko samajh rahein unhe milkar kuch karna chahiye.
best wishes!
ajit kumar, radiancemedia, delhi, radiancemedia@gmail.com

हरि जोशी February 2, 2009 at 2:36 PM  

जब चुनाव के लिए मौजूद विकल्‍प ही चोर उचक्‍के हों तो संकट को समझा जा सकता है। जब तक हम हिंदु या मुसलमान रहेंगे, सवर्ण और अवर्ण रहेंगे; भारतीय नहीं होंगे तब तक कुछ नहीं होगा लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब आम आदमी ही इन्‍हें सड़क पर लिटा-लिटा कर हिसाब चुकता करेगा।

जो लिखा

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

ऊपर वापिस लौटें