Tuesday, March 3, 2009

मजबूर नहीं, मजबूत सरकार चाहिए

सबसे बड़े फैसले के लिए चुनावी बिगुल बज उठा है। मतदाताओं को एक बार फिर तय करना है, दिल्ली में किसकी सरकार हो। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन ने केन्द्रीय सत्ता में पांच साल पूरे कर लिए हैं, लेकिन अपना कार्यकाल पूरा कर लेना ही किसी सरकार की उपलब्धि नहीं हो सकती। सत्ता का असली भाग्यविधाता भारत का आम मतदाता है, जिसे लुभाने के लिए सभी राजनीतिक दल चुनाव आते ही शाष्टांग आसन करते नजर आने लगते हैं। इसी मतदाता को तय करना है कि मनमोहन सरकार को दोबारा जनादेश देना है या नहीं। चुनाव की घोषणा तक भी गठबंधनों के साथ और सहयोगियों को जोड़ने की कवायद जारी है। हर तरह के समीकरण बिठाने की जोड़-तोड़ जारी है। कुछ दिनों में लंबे-चौड़े वादों वाले घोषणा-पत्र जारी होंगे, जिनमें सतरंगी सपने दिखाए जाएंगे। अब तक मतदाता भी कुछ-कुछ जान चुका है कि चुनाव के समय दिखाए जाने वाले सपने सच नहीं होते हैं। देश के इस भाग्यविधाता को इस बार बहुत सोच-विचारकर अपने मताधिकार का प्रयोग करना होगा। यह सही है कि 1989 में गठबंधन सरकारों का जो दौर शुरू हुआ था, वह इस समय का कटु सत्य बन चुका है। न कांग्रेस अपने बूते सरकार बनाने की सोच सकती है और न भारतीय जनता पार्टी। यही कारण है कि दोनों मतदाताओं के सामने अपनी कमीज ज्यादा सफेद होने का दावा करती नजर आएंगी। चुनाव आयोग लाख दावा कर ले, सब जानते हैं कि राजनीतिक दल और उनके धनी-मानी प्रत्याशी आजकल किस तरह वोटों का जुगाड़ करते हैं। किस तरह मतदान के पूर्व पैसे, दारू और दूसरे साजो-सामान बांटे जाते हैं। इस सबके बावजूद मतदाता हर बार मन बनाता है और मन में ही अहम फैसला करता है कि उसे परिवर्तन करना है अथवा उसी को दोबारा मौका देना है, जिसे उसने पांच साल में जांचा-परखा है। मतदाताओं के लिए फैसले की घड़ी आ गई है।
14वीं लोकसभा कैसी रही, सब जानते हैं। आजादी से अब तक इतनी कम बैठकें किसी लोकसभा की नहीं हुई। इतना हंगामा-शोर शराबा कभी नहीं हुआ। कुल कार्यवाही का 24 प्रतिशत समय हो-हल्ले में बरबाद हो गया। लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने भी बाद में माना कि सरकारी पक्ष विपक्षी सदस्यों को समझाने-बुझाने और मनाने में विफल रहा। इससे पहले इतने दागी सांसद (एक सौ बीस से अधिक) कभी चुनकर नहीं पहुंचे। शायद यही वजह रही कि रोज हंगामे हुए और गंभीर मसलों पर कभी सार्थक बहस और पहल नहीं हुई। यह दुर्भाग्य रहा कि अटल बिहारी वाजपेयी और चन्द्रशेखर जैसे प्रखर वक्ता अस्वस्थता के कारण सदन में ही नहीं आ सके। बाद में चन्द्रशेखर को देश ने खो दिया। देश के चिंतकों-विचारकों के लिए संसद की गरिमा और मर्यादा का क्षरण गहरी चिंता का विषय है। दुर्भाग्य की बात यह है कि लोग राजनीति के इस अद्योपतन पर लंबी-चौड़ी बहसें तो करते हैं परन्तु जब अच्छे चरित्र और योग्य सांसदों के चुनने का अवसर आता है तो वे मतदान तक करने नहीं जाते। आज देश के समक्ष सबसे अहम सवाल यही है कि हम कैसे सांसद चुनना चाहते हैं। कैसी सरकार बनना चाहते हैं। जिसमें अपराधियों का आधिपत्य हो या जिसमें साफ-सुथरी छवि के लोग हों ?
अफसोस की बात है कि पिछले करीब बीस वर्षो से देश पर मजबूर सरकारें शासन कर रही हैं। 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार केवल ग्यारह महीने चली। चन्द्रशेखर की सरकार और भी कम समय तक शासन कर सकी। पी वी नरसिंह राव की सरकार बेशक पांच साल चली लेकिन वह भी अल्पमत सरकार थी और उसे बचाए रखने के लिए झारखंड मुक्चित मोर्चा के सांसदों के अलावा कुछ और दलों के सांसदों की खरीद-फरोख्त की गई थी। देवगौड़ा और गुजराल की सरकारों को भी देश याद नहीं करना चाहता। दो बार अटल बिहारी वाजपेयी को भी अस्थिरता का सामना करना पड़ा। बहुमत नहीं मिल पाने के कारण उनके नेतृत्व में बनी पहली सरकार मात्र तेरह दिन में गिर गई। दूसरी सरकार को तेरह महीने में गिरा दिया गया। तीसरी बार जो सरकार बनी, वही अपना कार्यकाल पूरा कर सकी। लेकिन यह कहा जा सकता है कि वाजपेयी ही असल में पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। उनसे पहले प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, एच डी देवगौड़ा और इन्द्र कुमार गुजराल कांग्रेस के सदस्य रह चुके थे।
इस बार भी किसी एक पार्टी को बहुमत मिलने के चमत्कार की उम्मीद देशवासियों को नहीं है। जब राष्ट्रीय स्तर पर देखते हैं तो कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ही एेसे दो विकल्प नजर आते हैं, जिनका स्वरूप आप अखिल भारतीय कह सकते हैं। कर्नाटक में सरकार बनने से पहले तक भाजपा यह दावा करने की स्थिति में नहीं थी। इस समय हालत यह है कि कांग्रेस और भाजपा की राज्य सरकारें संख्या में लगभग बराबर हैं। गठबंधन सहयोगियों की बात करें तो उनकी संख्या भी लगभग बराबर है। एेसे राज्य, जहां उनका जनाधार लगभग नहीं के बराबर है, उनकी संख्या भी बराबर है। उत्तर प्रदेश और तमिलनाड़ु जैसे बड़े राज्य दोनों के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं। बिहार में जहां भाजपा के पास जनता दल मजबूत सहयोगी के रूप में मौजूद है तो पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को ममता बनर्जी का साथ मिल गया है। हिन्दी भाषी राज्यों में कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्चकर तय है। यहां बराबरी का मुकाबला देखने को मिलेगा। यू पी में मायावती और आंध्र प्रदेश में चन्द्रबाबू नायडू इनके लिए सिरदर्द बनकर उभरने वाले हैं। चुनाव के बाद ये दो एेसी ताकतें होंगी, जो तय करेंगी कि केन्द्र में किसकी सरकार बने ? जाहिर है, मायावती जमकर सौदेबाजी करने की हालत में होगी।
इस चुनाव में भी क्षेत्रीय दल महत्वपूर्ण भूमिका में होंगे। शरद पवार, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव जैसे नेता चुनाव के बाद कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। इनके साथ सीटों के तालमेल में ही कांग्रेस को पसीना आया हुआ है। वश्विक मंदी के इस दौर में देश को एक मजबूर नहीं, मजबूत सरकार की दरकार है। आने वाले वर्षो में देश के समक्ष कई तरह की समस्याएं आने वाली हैं। उनमें अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और पड़ोसी देशों के साथ द्विपक्षीय मसले भी होंगे। आर्थिक मोर्चे पर यदि संभलकर काम करते हुए सही नीतियां नहीं बनाई गई तो देश के समक्ष भारी संकट खड़ा हो सकता है। आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर और गंभीरता से काम किए जाने की जरूरत है। ये काम कोई मजबूर सरकार नहीं कर सकती। इसलिए मतदाताओं की जिम्मेदारी इस बार कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। उन्हें सोच-समझकर जनादेश देना होगा।
ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

8 comments:

हरि March 3, 2009 at 9:19 PM  

हालात तो मज‍बूर सरकार वाले ही हैं।

अविनाश वाचस्पति March 3, 2009 at 9:59 PM  

चाहते सब मजबूत हैं
पर बने हुए सब बुत हैं
नेता मद में देखो धुत हैं
इसलिए हम भी मजबूर हैं

Manvinder March 3, 2009 at 10:01 PM  

आपकी पोस्ट लाजवाब है .....उसमे उठाए गए सवाल भी जानदार हैं .....पर मैं अपनी बात आखिरी पंक्ति से जोड़ना चाहूंगी ......मतदाता को घर से बहार aana होगा चुनाव के दिन....अपने जनादेष के लिए ....ओमकार जी ...ये अब बहुत jaruri हो गया है ......हम में से अधिकाँश लोग मतदान के दिन घरों मैं बैठ कर tv देखते है या फिर aouting के लिए निकल जाते है ...... ऐसे कैसे मजबूत सरकार की कल्पना की जा सकती है

संगीता पुरी March 4, 2009 at 12:26 AM  

बहुत सुंदर विश्‍लेषण के साथ आपने यह आलेख लिखा है।

अखिलेश्‍वर पांडेय March 4, 2009 at 12:53 AM  

यह कोई नई बात नहीं है, जब किसी लोकसभा ने न याद रखने जैसे कई कीर्तिमान बनाए हैं। इससे पहले की कई लोकसभा ऐसी रही जब न जाने क्‍या-क्‍या हुआ। मैं आपके विचारों से सहमत होते हुए यह कहना चाहता हूं कि आखिर पब्लिक कब इन नकारों को सबक सिखाएगी। या यूं ही चलता रहेगा।

SALEEM AKHTER SIDDIQUI March 4, 2009 at 4:02 PM  

sir aapke vichar bahut hi sahi ho sakte hain. lekin dharm aur jati ki rajniti main kya ye sambhav hai.

SALEEM AKHTER SIDDIQUI March 4, 2009 at 4:04 PM  

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