Monday, March 30, 2009

माया ने हीरो बनाया वरुण को


वैसे तो मायावती कब, किससे, क्यों और किस बात पर खफा हो जाएं, कहा नहीं जा सकता और क्या कार्रवाई कर बैठें, कहा नहीं जा सकता लेकिन ऐसे समय जबकि चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, वे किसी पार्टी के घोषित प्रत्याशी को अप्रत्याशित रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में निरूद्ध करने का फैसला लेंगी, किसी को आशंका तक नहीं थी। वरुण गांधी ने अगर सात और आठ मार्च को पीलीभीत में भड़काने वाला भाषण दिया और चुनाव आयोग के आदेश पर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया तो मामला यहां खत्म होना चाहिए था। अदालत और कानून को अपना काम करने देना चाहिए था। ऐसा हुआ नहीं। वरुण गांधी ने अग्रिम जमानत ली। मामले को राजनीति से प्रेरित बताकर रद्द कराने की हाईकोर्ट से गुहार लगाई। तर्क नहीं चले तो आखिरकार पीलीभीत कोर्ट में आत्मसमर्पण का फैसला ले लिया। वे सीधे-सीधे जाकर यदि गिरफ्तारी दे देते तो
कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन चुनाव के मौसम में उन्होंने समर्थकों की भीड़ जुटाकर शक्ति-प्रदर्शन की कोशिश की। भीड़ पर किसका बस चलता है। जब पीलीभीत का प्रशासन लोगों को शहर में आने से नहीं रोक पाया तो गलती किसकी है? दूसरे राज्य सरकार का खुफिया तंत्र कहां सोया हुआ था? क्या उसे अंदाजा नहीं था कि वरुण गांधी के समर्पण के समय कितनी भीड़ इकट्ठा होने जा रही है?
मायावती सरकार वरुण पर रासुका लगाकर अपनी खीझ और विफलता ही जाहिर कर रही है। जब वरुण खुली जीप में जुलूस के रूप में शहर में घूम रहे थे, तब ही प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया? पहली रात में ही आस-पास के गांवों से ट्रेक्टर-ट्रॉली, टैम्पो, कारों व दूसरे वाहनों से वरुण समर्थक शहर में जुटना शुरू हो गए थे। यदि प्रशासन को इसकी जानकारी थी तो उसने वरुण को पीलीभीत पहुंचने से पहले से ही निरूद्ध क्यों नहीं किया? रासुका लगाने के जो चार कारण शासन-प्रशासन गिना रहा है, उसमें से भड़काऊ भाषण देने, समर्पण के लिए जाते समय रास्ता बदल लेने, कोर्ट व जेल के सामने अपने समर्थकों को संबोधित कर फिर से भड़काने और जब पुलिस उन्हें अपनी अभिरक्षा में लेकर जा रही थी, तब वरुण के समर्थकों द्वारा पुलिस के साथ हाथापायी व मारपीट करने के अलावा पथराव करने, हिंसा फैलाने और लोकजीवन को अस्त-व्यस्त करने के आरोप शामिल हैं। सवाल है कि भीड़ को नियंत्रित करने, किसी नेता के जुलूस को नियंत्रित कर तय रास्ते से ले जाने और अभिरक्षा में भाषण नहीं देने देने की जिम्मेदारी किसकी है? जाहिर है, पुलिस-प्रशासन और शासन अपनी कमजोरी का ठीकरा वरुण गांधी के सिर पर फोड़ रहा है।
मामला दरअसल, जितना सीधा नजर आ रहा है, इतना है नहीं। इससे कहीं आगे का है। उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए हैं तो कानून उन्हें माफ नहीं करेगा, लेकिन मायावती को लगता है कि वरुण गांधी पर रासुका लगाकर वे उस समुदाय व वर्ग के लोगों की नजरों में नायिका बन जाएंगी, जिनके खिलाफ कथित रूप से वरुण ने सात और आठ मार्च की जनसभाओं में जहर उगला था। इसका लाभ बसपा को अकेले पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र में ही नहीं मिलेगा, पूरे उत्तर प्रदेश में मिलेगा। उनके निशाने पर मुलायम सिंह यादव भी हैं। अगर वरुण को जेल में डालकर वे देश-प्रदेश के मुसलमानों को खुश कर पाती हैं तो चुनाव में उन्हें इसका लाभ मिलेगा और मुलायम सिंह भारी घाटे में होंगे। इस पूरे प्रकरण का सबसे अफसोसजनक पहलू यही है कि मायावती को राजनीतिक लाभ की सम्भावना दिखायी देने लगी है। रासुका की जिन धाराओं के तहत उन्हें निरूद्ध किया गया है, वे हाईकोर्ट में ठहर पाएंगी या नहीं, यह बाद की बात है। कानूनन तीन महीने के भीतर सरकार को रासुका की हाईकोर्ट से पुष्टि करानी होती है। तब तक लोकसभा के चुनाव निपट चुके होंगे। वरुण को जेल में डालकर जो लाभ बसपा नेता मायावती लेना चाहती हैं, वह तब तक ले चुकी होंगी। आरोप सिद्ध नहीं भी हुए तो उनका क्या जाता है? मायावती भ्रम में हैं कि इस प्रकरण से राजनीतिक लाभ अकेले बसपा को मिलेगा। वस्तुस्थिति यह है कि वरुण प्रकरण से राज्य में हिन्दू मतदाताओं का भी नए सिरे से ध्रुवीकरण होगा और इसका लाभ वहां हारी-थकी पड़ी भारतीय जनता पार्टी को सीधे तौर पर मिलेगा।
ओमकार चौधरी omkarchaudhary@gmail.com

1 comments:

dharmendra March 30, 2009 at 6:55 PM  

sir aapne sahi nabaj pakdi. ek dam solid. varun gandhi par apne ko dalito ki sabse badi subhchintak mayawati ne jo rasuka lagaya hai uska kewal aur kewal ek hi maksad hai muslimo ka vote lena. isi karan mayawati ne is mudde ko aur badhne diya.
sir apne yahan ki rajneeti ab to bachha bhi samajh sakta hai. thik usi tarah jaise humsabhi bollywood ke pictures ke bare me suru mey hi bata dete hain ki iski ending kya hoge.

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