Friday, May 15, 2009

तीसरे मोर्चे की सरकार क्यों नहीं

भारत और विश्व के समक्ष इस समय जिस तरह की समस्याएं हैं, उसमें तीसरे मोर्चे की सरकार क्या उन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होगी? 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह व चंद्रशेखर और 1996 में एचडी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की सरकारों को आर्थिक मोर्चे पर विफल माना गया। कहा जाता है कि 1990-91 में वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकार के समय देश में भुगतान संतुलन का संकट खड़ा हो गया था। आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ कहते हैं कि उसके बीज राजीव गांधी सरकार के समय ही पड़ चुके थे, जब 1989 में केन्द्र और राज्य सरकारों का वित्तीय घाटा जीडीपी का दस प्रतिशत तक पहुंच गया था। दूसरे यह भी याद रखना होगा कि तीसरे मोर्चे की सरकारें अपनी अंदरूनी लड़ाईयों की वजह से कम और भाजपा व कांग्रेस की बेवफाई की शिकार अधिक हुई। मोरारजी देसाई की सरकार गिरने के बाद चौधरी चरण सिंह ने इंदिरा गांधी पर भरोसा किया। वे सदन का मुंह भी नहीं देख सके। कांग्रेस ने बिना ठोस कारण के समर्थन वापसी का एेलान कर दिया। 1989में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी, जिसे भाजपा और वामपंथियों ने समर्थन दिया। मंदिर-मंडल का विवाद छिड़ा। भाजपा ने हाथ खींच लिया। सरकार गिर गयी। चंद्रशेखर ने चरण सिंह प्रकरण से सीख नहीं ली। राजीव गांधी पर भरोसा कर बैठे। सरकार बनी लेकिन बहुत मामूली वजह को तूल देकर कांग्रेस ने सरकार गिरा दी। 1996 में राष्ट्रपति डा.शंकर दयाल शर्मा ने सबसे बड़े दल भाजपा के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया। उन्होंने शपथ ली। तेरह दिन में सरकार गिर गयी। वे बहुमत साबित नहीं कर पाये। वामपंथियों और कांग्रेस के समर्थन से तीसरे मोर्चे के नेता के रूप में देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने, लेकिन ज्यादा समय तक नहीं चल सके। गुजराल के नेतृत्व में सरकार बनी लेकिन कांग्रेसाध्यक्ष सीताराम केसरी की सनक के चलते वह भी अल्पजीवी साबित हुई। जैन कमीशन की रिपोर्ट का बहाना बनाकर उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। आज कांग्रेस केन्द्र में उसी द्रमुक के साथ बैठी है, जिसे तब उसने गुजराल सरकार से बाहर करने की शर्त रख दी थी।
1989 में गठबंधन सरकारों का जो दौर शुरू हुआ, वह जारी है। इसके अभी खत्म होने की आसार भी नहीं हैं। राष्ट्रीय दलों का आधार तेजी से खिसका है। क्षेत्रीय दलों ने उस पर कब्जा किया है। कांग्रेस का कभी एक छत्र राज था। अब कई राज्यों से लगभग सफाया हो गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार में उसका नाम लेवा-पानी देवा नहीं बचा। पश्चिम बंगाल और तमिलनाड़ु जैसे बड़े राज्यों में वह सिमट गयी है। यानि दो सौ सीटें एेसी हैं, जहां कांग्रेस का आधार सिमट गया है। देश के सात-आठ राज्य एेसे हैं, जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से होता है। बाकी राज्यों में क्षेत्रीय दल उसके मुकाबिल हैं। 543 लोकसभा सीटों में से यदि कांग्रेस के पास डेढ़ सौ सीटें ही हैं तो इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि करीब दो तिहाई से ज्यादा मतदाता उसे वोट नहीं देते हैं। कमोबेश यही हाल भारतीय जनता पार्टी का है। मंदिर आंदोलन से अपना जनाधार बढ़ाने वाली भाजपा 1999 में 182 सीटों तक पहुंच गयी थी लेकिन 2004 के चुनाव में वह 138 पर अटककर रह गयी। इस बार भाजपा नीत राजग का नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी के बजाय लाल कृष्ण आडवाणी कर रहे हैं। भाजपा और उसके सहयोगियों को लगता है कि सरकार उनकी बन जायेगी। उनकी मानें तो भाजपा की सीटें बढ़ेंगी और उसके सहयोगियों की भी। सर्वेक्षणों, ओपिनियन और एग्जिट पोल्स पर भरोसा करें तो राजग दो सौ की संख्या पार नहीं कर रहा। भाजपा का दावा है कि राजग 220सीटें ला रहा है। उधर कांग्रेस भी इसी तरह का दावा कर रही है कि यूपीए को 205 सीटें मिलने जा रही हैं।
इन दावों की असलियत कल खुलने जा रही है। देश ही नहीं, पूरी दुनिया की नजरें सबसे बड़े लोकतंत्र के चुनावी नतीजों पर टिकी हैं। यूपीए (कांग्रेस) और राजग (भाजपा) की कम से कम इसके लिये तो तारीफ करनी होगी कि ये दोनों अपने दम पर बहुमत हासिल कर लेने का दावा नहीं कर रही हैं। उन्हें इस जमीनी सच्चाई का पता है कि नतीजे आने के बाद सरकार बनाने के लिये उन्हें तीसरे और चौथे मोर्चे की पार्किंग में खड़े दलों से मदद की जरूरत पड़ेगी ही। मीडिया में तमाम तरह की अटकलें शुरू हो चुकी हैं कि तीसरे और चौथे मोर्चे के दल सौदेबाजी के बाद किस गठबंधन को समर्थन दे सकते हैं। इन मोर्चो के टूटने का अंदेशा इसलिये बढ़ गया है क्चयोंकि तेलंगाना राष्ट्रीय समिति के सर्वेसर्वा के चंद्रशेखर राव नतीजे आने से पहले ही राजग के साथ चले गये जबकि बेंगलुरू में तीसरे मोर्चे की रैली कराने वाले एचडी देवगौड़ा के सुपुत्र कुमार स्वामी मीडिया के कैमरों से मुंह छुपाते हुए अंधेरे में सोनिया गांधी के दरबार में हाजिरी देने जा पहुंचे। तीसरे चौथे मोर्चे में एेसे कई दल हैं, जो पहले राजग का हिस्सा रहे हैं। कई एेसे हैं, जो साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के नाम पर धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटते हुए कांग्रेस के साथ जाने का एेलान कर देंगे।
इस समय दरअसल, सबकी नजरें माकपा महासचिव प्रकाश करात पर टिकी हुई हैं। वे इस तरह की भाव भंगिमा बनाये हुए हैं, जसे यूपीए को समर्थन नहीं देंगे। वे गैर कांग्रेस-गैर भाजपा सरकार का शिगूफा छोड़ते रहे हैं। तीसरे मोर्चे की सरकार गठित करने के प्रति वे आश्वस्त दिखते रहे हैं। सबकी नजरें इस पर टिकी हैं कि सबसे बड़े दल के रूप में कौन उभरता है। कांग्रेस या भाजपा? देखना यह भी है कि कांग्रेस अगर सबसे बड़े दल के तौर पर सामने आयी तो भी क्या प्रकाश करात और उनकी वामपंथी टोली तीसरे मोर्चे की सरकार गठित करने की जिद पकड़े रहेगी? कांग्रेस पहले ही एेलान कर चुकी है कि वह तीसरे मोर्चे की सरकार को समर्थन नहीं देगी। दोनों की खींचातानी लंबी खिंची तो एेसे में राजग की संभावनाएं बन सकती हैं। तीसरे मोर्चे की सरकार इसलिये बनती नजर नहीं आ रही क्चयोंकि वहां मायावती, जयललिता, प्रकाश करात, चंद्रबाबू नायडु से लेकर एचडी देवेगौड़ा तक प्रधानमंत्री बनने की कतार में हैं। उनमें से अधिकांश नेताओं के अहम आपस में टकराते हैं। इससे भी बड़ा सवाल तो नम्बरों का है। तीसरे मोर्चे के नेता 272 का आंकड़ा कहां से लायेंगे? कोई भी सर्वेक्षण उन्हें सौ से ऊपर सीटें देने को तैयार नहीं है। यह भी गौर करने वाली बात है कि वामपंथियों के वर्चस्व वाली सरकार को रोकने के लिये अमेरिका भी सक्रिय हो चुका है। एेसा पहली बार हुआ है कि अमेरिका भारत में एेसी सरकार नहीं बनने देना चाहता, जो आते ही एटमी डील को रद्द कर दे और विदेश नीति को बदलकर उल्टी गंगा बहाने की कोशिशों में जुट जाये। अमेरिकी राजनयिक की चंद्रबाबू नायडु और पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण से मुलाकातों को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। प्रकाश करात ने तीसरे मोर्चे के नेताओं को मतगणना के दो दिन बाद नई दिल्ली बुलाया है। के चंद्रशेखर राव पहले ही राजग का दामन थाम चुके हैं। देखना यही है कि तब तक बाकी आठ दलों के नेता एकजुट रहते हैं या नहीं।

3 comments:

हरि जोशी May 15, 2009 at 6:57 PM  

इस बात को प्रकाश करात भी जानते हैं कि वह पोलित ब्‍यूरो नहीं हैं। वामदलों का विरोध सिर्फ अपना गढ़ बचाने के लिए था और चुनाव से पहले उनका ये नाटक राजनीतिक मजबूरी था। अगर पांच साल तक वह बिना विवाद के सरकार चलवाते रहते तो चुनाव तो उन्‍हें कांग्रेस के साथ ही लड़ना था। ऐसे में वह कांग्रेस के खिलाफ किस आधार पर वोट मांगते।
तीसरा मोर्चा या चौथा मोर्चा चूनाव लड़ने के लिए एक मुखौटा लगाता है और परिणाम आने के बाद उसका चेहरा बदल जाता है। ये बात उन दलों पर भी लागू होती है जो यूपीए और एनडीए में हैं। अगर एनडीए सरकार बनाने में पीछे रही और अजित सिंह को मौका मिला तो वह कृषि या कोई और मंत्रालय का सौदा कर यूपीए में भी खिसक सकते हैं। ऐसे ही बहुत से क्षेत्रीय प्रभाव वाले दल हैं।
वैसे इन मोर्चों में दो सीट जीतने वाला भी प्रधानमंत्री बनने का सपना देखता है। याद कीजिए कि बाबू जगजीवन राम प्रधानमंत्री क्‍यों नहीं बन सके थे। चौधरी चरणसिंह ने क्‍या टिप्‍पणी की थी। ऐसे में तीसरे मोर्चे की सरकार कैसे बन सकती है।
वैसे जैसा मीडिया रिपोर्ट के आधार पर लग रहा है अगर वैसा ही रहा तो कोई भी सरकार माया और जय‍ललिता के समर्थन के बगैर नहीं बनेगी। खासतौर पर एनडीए की। अगर ऐसा हुआ तो ये दोनों वीरांगनाएं बीच बाजार में कब समर्थन लेने वाले के कपड़े फाड़ दें; आकलन करना मुश्किल नहीं है।

MANVINDER BHIMBER May 15, 2009 at 9:54 PM  

सही तो ये है की बड़े चुनाव देखे लेकिन ऐसा चुनाव नहीं देखा। अजीब चुनाव .......किसी को कुछ पता नहीं, कोई कुछ भी कहने को तैयार नहीं। कोई आज कांग्रेस की सरकार बना रहा है तो थोड़ी देर में ही वो "कनफ्यूज्ड" बीजेपी की सरकार बनाने का दावा कर रहा है। जब बड़े बड़े चुप है तो oron का क्या कहाँ ......कल सब साफ़ हो जाना है .......थोडा सब्र करें .....यही कह सकते है

Ankur's Arena May 16, 2009 at 2:47 AM  

sarkar jo bhi bane, isthir rahne to nahi jaa rahi hai. Aapke lekh mein jin pichhli kamzor sarkaron ka zikr hai, vah saaf darshata hai ki kamzor gathbandhan aur samjhoton ki kamzor neev ke upar 5 sala majboot sarkar nahi ban sakti. afsos bas itna hai ki halke se zatke mein hi iss khokhli imarat ka girna tay hai.
... vaise sahi likha hai, taash ke patton sareekhi imaarati sarkar ko america bhi nahi chahega.
...chahte to hum bhi nahi hai par...

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फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

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