Friday, June 5, 2009

मैडम स्पीकर छह दशक बाद


मीरा कुमार लोकसभा की पहली महिला स्पीकर बन गयी हैं। वे दलित वर्ग से हैं, इसलिए भी इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए खास दिन बताया जा रहा है। एक दलित महिला को लोकसभा अध्यक्ष बनाने के कांग्रेस के फैसले को सराहा जा रहा है। निसंदेह मीरा कुमार पढ़ी-लिखी, सुयोग्य, समर्थ नेता हैं। एक राजनयिक से राजनेता और अब लोकतंत्र के सर्वोच्च प्रतीक की सर्वेसर्वा बनने तक का उनका सफर संघर्षपूर्ण और रोचक रहा है, लेकिन उन्हें सत्तापक्ष की ओर से एक दलित नेता के तौर पर प्रचारित करने की कोशिश बताती है कि उनके जरिए पार्टी अतीत में अपने छिटक गए दलित जनाधार को फिर से पाने की चेष्टा कर रही है। पक्ष-विपक्ष के नेताओं ने संसद में हालांकि मीरा कुमार के चुने जाते ही उनकी स्तुति में मंगल गीत गाए, जैसी कि एक परंपरा बन गयी है, लेकिन इस अवसर पर कुछ सवाल पूछ लिए जाएं तो गलत नहीं होगा।
कांग्रेस और यूपीए का इसी तरह का मंगलगान पिछले साल भी हुआ था, जब प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में चुना गया था। सवाल दरअसल इसी से जुड़ा हुआ है। कांग्रेस को आजादी के साठ-बासठ साल बाद ही इसकी याद क्यों आई कि राष्ट्रपति पद पर किसी महिला को भी होना चाहिए या लोकसभा की स्पीकर कोई महिला भी बनाई जानी चाहिए? राष्ट्रपति पद पर तो खैर दलित वर्ग से पहले भी नेता बैठे हैं लेकिन प्रधानमंत्री पद पर अभी तक भी कोई दलित क्यों नहीं बैठ सका? क्या कभी किसी दलित अथवा मुस्लिम वर्ग के नेता को प्रधानमंत्री बनने भी दिया जाएगा? यह एेसा कटु सत्य है, जिसका जवाब देश की कोई राजनीतिक पार्टी नहीं देना चाहेगी। मीरा कुमार निसंदेह योग्य सांसद, मंत्री और नेत्री हैं, लेकिन उन्हें लोकसभा की पहली दलित स्पीकर के तौर पर प्रचारित कर दलित मतदाताओं को साधने की कोशिश करना क्या उचित है? आखिर अब तक कांग्रेस को यह सुध क्यों नहीं आई कि किसी दलित वर्ग की महिला को भी स्पीकर होना चाहिए था। पार्टी को अब ये टोने-टोटके इसलिए करने पड़ रहे हैं, क्योंकि उसे लग रहा है कि एेसा करने से उसका खिसका दलित जनाधार वापस लौट सकता है।
बहुत लंबे समय तक अल्पसंख्यक, ब्राह्मण और दलित कांग्रेस पार्टी के एकजुट वोटर रहे। इसी कारण कांग्रेस का केन्द्र और अधिकांश राज्यों में एक छत्र राज रहा। कुछ घटनाएं घटीं, जिनके चलते 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद सिख, 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद मुसलिम और लगभग इसी काल में शनै: शनै: दलित मतदाता उससे छिटक गया। मंदिर-मंडल प्रकरण के बाद जैसे-जैसे भाजपा उभरी, वैसे वैसे ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से कटकर उसके साथ जुड़ गया। ब्राह्मणों के भाजपा से जुड़ने की एक वजह अटल बिहारी वाजपेयी भी रहे। कांग्रेस कमजोर हुई तो भाजपा के साथ-साथ विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दल मजबूती से उभरे। छोटे दलों के सहयोग से केन्द्र में गठबंधन सरकारों के युग का सूत्रपात हुआ। शुरू में इनका प्रयोग सफल नहीं रहा लेकिन बाद में अटल जी ने लगभग पूरे समय तक सरकार चलाई। काफी लंबे समय तक कांग्रेस एकला चलो का राग अलापती रही, लेकिन शिमला के चिंतन शिविर में उसे भी गठबंधन की राह को अपनाना पड़ा। 2004 में उसे अपेक्षाकृत एक मजबूर सरकार का नेतृत्व करना पड़ा। एक एेसी सरकार, जो वामपंथियों के रहमोकरम पर टिकी थी। इस बार भी डा.मनमोहन सिंह एक गठबंधन सरकार का ही नेतृत्व कर रहे हैं परन्तु उसके मुकाबले यह सरकार कहीं ज्यादा टिकाऊ और आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही है। कांग्रेस का जनाधार बढ़ा है। हिमाचल प्रदेश, बिहार और कर्नाटक को छोड़कर उसे राज्य से बढ़त मिली है। उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जोरदार वापसी ने पार्टी के नीति नियंताओं का विश्वास बढ़ाया है। वहां मायावती, मुलायम और भाजपा का कमजोर होना और कांग्रेस का अपेक्षाकृत मजबूत होना इसका द्योतक है कि जो वोटर उससे छिटक गया था, वह वापस लौट रहा है। कांग्रेस ने इस चुनाव में बसपा के दलित, भाजपा के ब्राह्मण और सपा के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा दी है।
चौंसठ वर्षीया मीरा कुमार एेसे समय लोकसभा की पहली दलित महिला स्पीकर बनी हैं, जब कांग्रेस हिन्दी भाषी राज्यों में अपने खोए दलित जनाधार की वापसी के लिए पुरजोर कोशिश कर रही है। मीरा कुमार एेसी नेता हैं, जो तीन राज्यों उत्तर प्रदेश के बिजनौर, दिल्ली के करौल बाग और बिहार के सासाराम क्षेत्र का लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। वे मायावती की तरह लोकप्रिय भले न रही हों परन्तु दलितों के एक बड़े वर्ग में उन्हें जो सम्मान हासिल है, वह मायावती और राम विलास पासवान को भी कभी नहीं मिला। वे पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम की बेटी हैं, इसलिए भी उन्हें दलित समाज में खास सम्मान हासिल है। मीरा कुमार की लोकसभा के सर्वोच्च आसन पर एेसे समय ताजपोशी हुई है, जब उत्तर प्रदेश में मायावती का प्रभामंडल उतार पर है और बिहार के हाजीपुर से राम विलास पासवान हारे हैं। कांग्रेस दरअसल, एक साथ कई मनोरथ साधना चाहती है। देश की इस सबसे बड़ी पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी खुद महिला हैं। पिछले साल जब शिवराज पाटिल के नाम पर सहमति नहीं बनी तो उन्होंने खुद पहल करते हुए राष्ट्रपति पद पर पहली महिला प्रतिभा पाटिल को बैठाकर सीधे-सीधे संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी आधी आबादी को वास्तव में सम्मान देने के पक्ष में है। अब मीरा कुमार को पहली महिला स्पीकर बनाकर उन्होंने इसकी एक तरह से फिर पुष्टि कर दी। चूकि वह दलित भी हैं, इसलिए राजनीतिक रूप से यह सोने पर सुहागा वाली बात हो गयी है। इस वर्ग का फिर से विश्वास हासिल करने के लिए कांग्रेस ने मीरा कुमार के अलावा दलित वर्ग के पांच अन्य नेताओं सुशील कुमार शिंदे, मुकुल वासनिक (महाराष्ट्र), कांतिलाल भूरिया (मध्य प्रदेश), कुमारी सैलजा (हरियाणा) और कृष्णा तीरथ (दिल्ली) को खासतौर से मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री पदों से नवाजा है। यही नहीं, उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सौंपी गयी हैं।
2004 के मुकाबले इस चुनाव में कांग्रेस की ताकत निसंदेह बढ़ी है। इस बार पार्टी को मुस्लिम, ब्राह्मणों और दलितों के वोट भी काफी संख्या में मिले हैं। यही वजह है कि पार्टी 145 से बढ़कर 206 तक पहुंच गयी है। वोट बैंक बढ़ने की वजह केवल जातीय समीकरण नहीं होते। इसके बावजूद इसकी सत्यता से इंकार भी नहीं किया जा सकता। दलितों को पार्टी के साथ फिर से जोड़ने की कवायद राहुल गांधी ने शुरू की थी। कह सकते हैं कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह उसे आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस की इस कुल कवायद का मतलब साफ है। वह अपने पुराने जनाधार को वापस जोड़कर इस गठबंधन राजनीति से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इसमें उसे कितनी सफलता मिलती है।

3 comments:

Sachi June 5, 2009 at 4:47 PM  

She belongs to Dalit community, but in real terms she is not Dalit.

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