Friday, April 10, 2009

मूल मुद्दों की किसे फिक्र है ?

महंगाई, बेरोजगारी, आतंकवाद, आंतरिक सुरक्षा, मंदी और किसानों की आत्महत्या जैसे ज्वलंत मुद्दों पर अधिकांश राजनीतिक दल और नेता खामोश हैं। घोषणा-पत्र या तो जारी कर दिए गए हैं अथवा हो रहे हैं। हर चुनाव में वादे किए जाते हैं, जनता को ख्वाब दिखाए जाते हैं, लेकिन चुनाव परिणाम आने और सरकार बन जाने के बाद न जनता वादों का हिसाब लेती है और न नेता जवाबदेह बनना पसंद करते हैं। अफसोस की बात है कि देश के समक्ष उपस्थित मूल मुद्दों पर चर्चा अथवा बहस नहीं हो रही है। बहस के मुद्दे बन गए हैं जूते। बगदाद से शुरू हुई यह खतरनाक परिपाटी लंदन और दिल्ली होते हुए कुरूक्षेत्र तक पहुंच गई है, जिस पर तत्काल कड़ाई से रोक लगाए जाने की जरूरत है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन नेता अपने आचरण पर भी गौर करें।
देश, समाज, युवाओं, किसानों, महिलाओं, पिछड़े-दबे-कुचले वंचित वर्गो की मूलभूत समस्याओं के समाधान के प्रति वे कितने संजीदा हैं, उन्हें अपने आप से पूछना चाहिए। हर चुनाव में राजनीतिक दल और उनके नेता किसी भावनात्मक मुद्दे को तूल देकर लाभ लेने की कोशिश करते हैं। एेसा करते समय वे भूल जाते हैं कि इससे कितने लोगों की भावनाएं फिर से आहत होती हैं? फिर से बरसों पुराने जख्म हरे हो जाते हैं, लेकिन वोट के सौदागरों को शायद लोगों की पीड़ा से कुछ खास लेना-देना नहीं रह गया है। येन-केन-प्रकारेण वे सीटों की संख्या इतनी बढ़ा लेना चाहते हैं कि सत्ता के द्वार तक पहुंचने में दिक्कत न आए।
देश के प्रमुख नेता भाषणों के दौरान किस तरह की अवांछित बयानबाजी कर रहे हैं, इसे पूरा देश देख और सुन रहा है। केन्द्र में मंत्री पद की शपथ लेते समय लालू प्रसाद यादव ने संविधान की रक्षा की शपथ भी ली थी लेकिन एक कौम विशेष की वोटों के ध्रुवीकरण के लिए वरुण गांधी के संबंध में एेसी टिप्पणी कर गए, जिस पर सहज यकीन नहीं होता कि कोई मंत्री एेसी बात कह सकता है? 1984 के सिख विरोधी दंगों ने हजारों परिवारों को गहरे जख्म दिए थे। हर चुनाव में राजनीतिक दल उन जख्मों को जानबूझकर कुरेदते हैं। भोले-भाले लोगों को उत्तेजित कर हर बार सड़कों पर प्रदर्शन के लिए उकसाते हैं। क्या किसी भी दल ने इसके प्रति गंभीरता दिखायी कि जो भी दंगों के पीछे रहा, उसे जल्दी से जल्दी कठोर सजा मिले? जवाब है नहीं, क्योंकि एेसा होने पर हर बार एक वर्ग की वोटों का जुगाड़ करने वाला एक मुद्दा हमेशा के लिए दफन हो जाने की आशंका है। आखिर किस दिशा में जा रहा है हमारा राजनीतिक निजाम?

ओमकार चौधरी
omkarchaudhary@gmail.com

4 comments:

रंजीत April 10, 2009 at 6:27 PM  

मूल मुद्दों की किसे फिक्र है ? Shayad kisi ko nahin... lekin yakeen hai ki ek din sabko iskee fikra karnee padegee.

हरि April 10, 2009 at 6:49 PM  

राजनेताओं से तो मूल मुद्दों की उम्‍मीद करना ही बेमानी है लेकिन आम आदमी भी मुद्दों पर वोट नहीं करता। ये चिंता की बात है।
हम और आप भले ही चींखें कि लोकतंत्र जीत गया लेकिन सच ये है कि पंडित, बनिया, जाट, गूजर या अगड़े-पिछड़े जीतते हैं; मुद्दे दरकिनार रहते हैं।

Anonymous,  April 10, 2009 at 7:52 PM  

अजी जिस ओर भी जा रहा है, जाने दीजिये
जूते तो हैं ना
मारो जूते तान के
हर इक बेईमान के

रवीन्द्र रंजन April 13, 2009 at 8:24 PM  

यह वाकई में दुर्भाग्यपूर्ण है कि जूते जैसे मसले की वजह से राजनीति और हल्की हो गई है। जिन मुद्दों की चर्चा होनी चाहिए, नहीं हो रही है। दुखद तो ये है कि पत्रकार बिरादरी के कुछ लोग भी अपने पूर्वाग्रहों के चलते जरनैल की इस हरकत को सही बताने पर तुल गए हैं। मुद्दों की राजनीति बची ही कहां है। अब तो अपसंस्कृति, अपशब्दों की राजनीति शुरू हो गई है।

जो लिखा

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फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

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