Friday, April 24, 2009

इतना कम मतदान शुभ संकेत नहीं

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश में पचास प्रतिशत से भी कम मतदान क्या साबित करता है? जम्मू-कश्मीर में 46 प्रतिशत वोटिंग समझ में आती है, लेकिन हिन्दी क्षेत्र के इन ठेठ खांटी राज्यों में मतादाताओं की उदासीनता कई शंकाएं और सवाल खड़े करती है। सवाल इसका नहीं है कि कम मतदान होने का नफा-नुकसान किस पार्टी को होगा। सबसे अहम सवाल तो यही है कि तमाम कोशिशों के बावजूद लोकतंत्र के इस महापर्व के प्रति लोग इतने उदासीन क्यों बने हुए हैं? क्या उनका राजनीतिज्ञों से मोहभंग हो रहा है? लोकतांत्रिक प्रणाली से विश्वास उठ रहा है? सरकारों, नेताओं, नौकरशाही ने उन्हें निराश और हताश कर दिया है?

कारण, चाहे जो हो, यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बहुत शुभ संकेत नहीं हैं। निर्वाचन आयोग, मीडिया और स्वयंसेवी संगठनों से लेकर तमाम वर्गो के जागरूक लोग पिछले दो महीने से मतदाताओं को अधिक से अधिक मतदान के लिए प्रेरित करने की कोशिशों में जुटे हैं। योग गुरू रामदेव ने भी इस बार अधिक से अधिक मतदान की अलख जगाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी, लेकिन इसके बावजूद यदि लोग घरों से नहीं निकल रहे हैं तो इसकी तह में जाकर जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर कारण क्या हैं?
सबसे बड़ी वजह तो खुद विभिन्न राजनीतिक दलों के वे नेता ही नजर आ रहे हैं, जिनके बयान लोगों में भ्रम पैदा कर रहे हैं। कुछ नेता एक-दूसरे पर सिर्फ कीचड़ उछालने में लगे हैं तो बहुत से नेता देश, समाज के सामने उपस्थित मूल मुद्दों को परे रखकर केवल भावनात्मक मुद्दों को उछालने की चेष्टा कर रहे हैं। लालू-पासवान-मुलायम-पवार-पटनायक-जयललिता जैसे क्षत्रपों ने मतदाताओं में भ्रम और निराशा भरने में अहम भूमिका अदा की है। लालू-मुलायम-पासवान-पवार यूपीए के साथ होकर भी साथ नहीं हैं। वे दो-दो जुबान बोलकर संकेत दे रहे हैं कि जहां उनकी ज्यादा कीमत लगेगी, वे उस ओर जाएंगे।
न यूपीए और न ही राजग मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में सफल हो पाए हैं कि वे स्थायी सरकार बनाने में कामयाब होंगे। कहने को भाजपा-कांग्रेस राष्ट्रीय दल हैं, लेकिन वे कुछ ही राज्यों में सिमटकर रह गए हैं। केन्द्र में यदि वे सरकार गठित करते हैं तो उन्हें क्षेत्रीय दलों के रहमोकरम पर निर्भर रहना पड़ता है। क्षेत्रीय दलों के उभार ने उन्हें राज्यों में समेट दिया है। सरकार के गठन और उसके स्वरूप को लेकर जैसा भ्रम इस बार है, वैसा कभी नहीं रहा। ज्यादातर राज्यों में मतदाता भ्रम का शिकार है। उसे समझ में नहीं आ रहा कि किसे वोट करे?
आम मतदाता को लगता है कि वह चाहे जिसे मत दे, चुनाव परिणाम आने के बाद राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल जोड़-तोड़ और राजनैतिक सौदेबाजी का एक नया खेल खेल खेलते नजर आएंगे। आज चुनावी मैदान में जो दल एक-दूसरे के खिलाफ खम ठोकते नजर आ रहे हैं, वे गलबहियां डालते नजर आएँगे। यही कारण है कि मतदाता निराश और हताश है और घर से नहीं निकल रहा है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि राजनीतिक दल मतदाताओं को भ्रमित करने के खेल में सफल हो गए हैं। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए निश्चय ही अशुभ संकेत हैं।

1 comments:

MANVINDER BHIMBER April 24, 2009 at 7:46 PM  

blog ka sawroop achcha lag hai....post mai aapne sab kuch saaf saaf kah diya hai ....omkaar ji ...achchi post ke liye badhaaee

जो लिखा

पहले पेट पूजा.. फिर काम दूजा


फोटो : दीप चन्द्र तिवारी

तकनीकी सहयोग- शैलेश भारतवासी

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